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बाप के हाथ में बंदूक, बेटी ने थामी कलम

औरंगाबाद। नक्सली बाप के हाथ में बंदूक देख बेटी का मन विचलित नहीं हुआ। बेटी प्रिया ने बंदूक की जगह कलम थाम ली और गांव में शिक्षा का अलख जगाने लगी। बेटी की कलम के आगे पिता की बंदूक कमजोर साबित हो रही है।
यह नजारा गत गुरुवार को देव प्रखंड के अति नक्सल प्रभावित बनुआ पंचायत अंतर्गत पहाड़ों की तराई व जंगल में चल रहे नवसृजित प्राथमिक विद्यालय पक्कापर में देखने को मिला। विद्यालय के बगल बैठी अनपढ़ भगवतिया ने दबी जुबान बताया की पति श्यामदेव रिकियासन नक्सली संगठन में बंदूक थामे है परंतु बेटी प्रिया के हाथों में कलम है। इसी तरह नक्सली रामजनम रिकियासन की अनपढ़ पत्नी सबीता ने बताया कि उसने भी अपनी बेटी अंजू एवं चिंता के हाथों में कलम पकड़ा दी है। विद्यालय में कार्यरत पंचायत शिक्षक मंजू कुमारी एवं दिलीप कुमार गांवों के वनवासी बच्चों की तकदीर बदल रहे हैं। बताते हैं कि सालों बाद इस इलाके में विद्यालय की घंटी बजी है। रविवार व अन्य छुट्टियों ंको छोड़ सभी दिन नक्सलवाद की इस धरती पर शिक्षा का दीप जलता है। बनुआ पंचायत के खैरा गांव से छह किलोमीटर दूर दुर्गम रास्ते एवं जंगलों से गुजरते हुए इस विद्यालय तक पहुंचा जा सकता है। विद्यालय पहुंचते पर शिक्षकों ने बताया कि विद्यालय में 67 बच्चे नामांकित है। विद्यालय खुले मात्र एक वर्ष हुआ है लेकिन बच्चों के कंठ से निकलने लगे है 'सर अहिंसा का मार्ग अपनाएंगे।' पूछते ही बच्चे हिन्दी, अंग्रेजी व गिनती की सभी वर्णमालाएं सुना देते है। शिक्षकों ने बताया कि विद्यालय भवन न होने, पोषाहार वितरित न किये जाने तथा अन्य सुविधाओं के चलते छात्रों की संख्या में बढ़ोतरी नहीं हो रही है। दोनों पंचायत शिक्षकों को वेतन के नाम पर अभी तक धेला भी नहीं मिला है। बीईओ अरविंद कुमार ने बताया कि शीघ्र ही विद्यालय भवन का निर्माण कराया जाएगा तथा पोषाहार योजना भी चलाई जाएगी। शिक्षकों को मानदेय भी मिलेगा।
सौजन्य-जागरण

3 comments:

sushant jha said...

अच्छा पोस्ट...जारी रहिए..और इस तरह की खबरों का और प्रचार कीजिए....

कंचन सिंह चौहान said...

achhchhi evam badhai yogya pahal

अतुल said...

वाह. बहुत अच्छी सीख.