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महंगाई से घबराई सरकार

केंद्र सरकार ने कुछ उपभोक्ता वस्तुओं को ड्यूटी और कर से मुक्त करते हुए महंगाई की लगाम थामने की कोशिश की है। पिछले साल भर से या सवा साल से आम जरूरत की उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में जिस तेजी से बढ़ोतरी हुई है, उसने सत्ताधारी दल की चिंताएं बढ़ा दी हैं। महंगाई दर पिछले 13 महीनों में सर्वाधिक रही। इसके चलते विपक्षी दलों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी भी कर ली। यह देख और आसन्न आम चुनाव के मद्देनजर सत्ताधारी दल को आनन-फानन में कीमतें कम करने की दिशा में कदम उठाने पड़े। केंद्र की यह कोशिश फौरी तौर पर उपभोक्ताओं को राहत प्रदान कर सकती है, लेकिन महंगाई को बढ़ने से रोकने के लिए दीर्घकालिक राजनीतिमूलक उपाय जरूरी हैं।
शुल्क घटाने व कर मुक्ति से महंगाई कितनी कम होगी, यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। वित्त मंत्री के अर्थव्यवस्था में मजबूती के दावों के बीच अपेक्षित विकास दर पाने की उनकी जद्दोजहद जारी है। महंगाई को विकास का प्रतीक माना जाता रहा है। यह कुछ हद तक सही हो सकता है, लेकिन विकास का लाभ तभी परिलक्षित होता है जब आम जरूरतों की चीजें आम लोगों तक पहुंचती रहें। रिजर्व बैंक महंगाई बढ़ने की चेतावनी बार-बार देता रहा है और इसे नियंत्रित करने के लिहाज से मौद्रिक नीतियों में कसावट के उपाय भी किए गए, पर वे कारगर साबित नहीं हुए। आर्थिक सर्वेक्षण में प्रस्तुत विकास दर में गिरावट के आंकड़े अर्थव्यवस्था की विसंगति को जाहिर करने वाले ही रहे।
नए वर्ष के बजट में दी गई रियायतों का बाजार पर ऐसा प्रभाव अभी परिलक्षित नहीं हुआ है, जो महंगाई के ग्राफ को कम करने वाला हो। महंगाई का दुष्चक्र ऐसा होता है कि एक बार बढ़ना शुरू हो जाए, तो उसे थाम पाना आसान नहीं होता। राजनीतिक दलों के बीच महंगाई को लेकर जो चिंताएं हैं, वे आरोप-प्रत्यारोप में ही अभिव्यक्त हो रही हैं। आम आदमी के हित में बेहतर होगा कि केंद्र व राज्य सरकारों के साथ राजनीतिक दलों के बीच भी गंभीर विमर्श हों तथा महंगाई को रोकने के ठोस और सुनिश्चित उपाय किए जाएं। महंगाई रोकने की जिम्मेदारी केंद्र व राज्य दोनों की है, भले ही वहां परस्पर विरोधी दलों की सरकारें हों। इन सरकारों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनके उपायों का लाभ आम लोगों तक पहुंचे और यह व्यवस्था के मकड़जाल में उलझकर न रह जाए।
संपादकीय-भास्कर
02 अप्रैल 2008

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