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सर्कस पर संकट के बादल

सर्कस का जिक्र करने पर याद आते हैं हंसाने वाले जोकर, दिल दहलाने वाले करतब करते कलाकार, ऊंचे झूले, शेर की दहाड़ और जलती बुझती चमचमाती लाइटें आदि, लेकिन सूचना क्रांति के इस हाइटेक दौर में सर्कस से जुड़े लोगों को आशंका है कि यह उद्योग आने वाले कल में कहीं कहानियों में न सिमट जाए। ग्रेट बांबे सर्कस के मालिक केएम संजीव को लगता है कि शायद आने वाले वर्षो में सर्कस का अस्तित्व ही नहीं रहेगा। वह कहते हैं कि एक समय था जब सर्कस का दल किसी शहर में पहुंचता था तो धूम मच जाती थी। तब जितने दिन सर्कस शहर में रहता था, उतने दिन त्यौहार जैसा माहौल होता था। आज यह सब सपना लगता है क्योंकि अब तो सर्कस कब लग कर कब चला जाता है, किसी को पता ही नहीं चलता। उनकी शिकायत है कि आज लोगों के पास सर्कस के लिए समय नहीं है। थोड़ा बहुत समय मिलता है तो लोग घरों में बैठ कर टीवी देखते हैं या कंप्यूटर पर गेम खेलते हैं। सर्कस के मुख्य आकर्षण जानवर होते हैं, जिन्हें बच्चे खूब पसंद करते हैं। लेकिन सरकार ने 1970 में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम लागू कर सर्कस में जानवरों के इस्तेमाल पर ही रोक लगा दी तो यह आकर्षण भी खत्म हो गया। सर्कस के प्रबंधक विनोद कुमार ने कहा कि सरकार के आदेश के बाद हमने करीब दस साल पहले अपने सर्कस के सभी जानवर चेन्नई के चिडि़याघर को दे दिए। हमारी तो आमदनी ही चली गई, क्योंकि बच्चों को शेर, दरियाई घोड़ा, हाथी और भालू देख कर मजा आता था। अब हमारे पास केवल घोड़े, ऊंट, कुत्ते हैं। उन्होंने शिकायत की कि सरकार से उन्हें जानवरों के एवज में कोई मुआवजा नहीं मिला और इन जानवरों के बिना सर्कस भी आधा अधूरा हो गया। विनोद कहते हैं कि हमारे सर्कस की रोजी रोटी ही इन जानवरों से चलती है तो भला हम इन्हें भूखा कैसे रख सकते हैं। सर्कस के जानवरों को भूखा रखने का आरोप सही नहीं है।

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