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मर्द क्यों नहीं रोते?

  • जयप्रकाश चौकसे
सलमान खान की फिल्म में संवाद है कि मर्द रोते नहीं और आंसू आने पर खून बहा देते हैं। एक बॉक्स ऑफिस का अध्ययन करने वाले का कहना है कि शिरीष कुंदूर की ‘जानेमन’ असफल हुई क्योंकि उसमें ‘ही मैन’ की छवि वाला नायक सलमान रोता है। फिल्म उद्योग और उससे जुड़े लोगों में यह भ्रांति है कि नायक को रोना नहीं चाहिए। क्या शक्तिशाली ‘ही मैन’ छवि वाले व्यक्ति रोते नहीं हैं?
रोना एक स्वाभाविक काम है, जीवन केवल मुस्कान नहीं है। आंसू को केवल स्त्री से जोड़ना और कमजोरी का प्रतीक मानना गलत है। सच्चाई तो यह है कि दुख दर्द पर आंसू बहाना मनुष्य होने की निशानी है-संवेदनशील होने का प्रतीक है। आंसू बहाने पर शर्मसार होने की आवश्यकता नहीं है। आत्मा का सारा पाप धुल जाता है और आंसू बहाना पवित्रीकरण की प्रक्रिया है। क्रोंच वध पर आंसू के साथ कविता बहाकर एक डाकू कवि हो गया। यह अतार्किक लगता है कि आंसू के वजन से बॉक्स ऑफिस का पलड़ा डांवाडोल हो सकता है। मीना कुमारी ने तो आंसुओं से पलड़ा अपने पक्ष में कर लिया था। राजेंद्र कुमार आंसुओं के दम पर जुबली कुमार कहलाए थे। ‘संगम’ में ‘दोस्त दोस्त ना रहा’ गाते हुए राजकपूर रोए थे और उस दौर की यह सबसे कामयाब फिल्म थी।
इसी गीत की एक पंक्ति थी ‘पलक पर आंसुओं को तोलतीं, वह तुम न थीं तो कौन था’। ऋषिकेश मुखर्जी की ‘मेम दीदी’ में लंबा चौड़ा पठान जयंत कहता है कि वह खून बहता देख सकता है, आंसू नहीं सह पाता। कमोबेश ऐसी ही भावना अपनी आंखें मिचमिचाने की शैली में राजेश खन्ना ने नायिका पुष्पा से सफल फिल्म ‘अमर प्रेम’ में कही थी। दिलीप कुमार भी आंसू बहाते हुए भारतीय सिनेमा के त्रासदी किंग बने थे।
कुछ बातें लोकप्रिय होकर समाज में स्थापित हो जाती हैं। जैसे कि जब आप हंसते हैं तो जमाना आपके साथ हंसता है और जब आप रोते हो तो अकेले होते हो। इसमें निहित अर्थ है कि जमाना महज तमाशबीन है और दुख के समय आप अकेले रह जाते हैं। इसके साथ यह भी प्रचलित है कि दुख बांटने से हल्का होता है। यह भी कहते हैं कि बच्चा रोए नहीं तो मां को कैसे मालूम होगा कि वह भूखा है गोयाकि दुख से अकेलेपन को खारिज किया जाता है। आंसुओं से कभी भी समाज हेय नहीं माना जाता फिर परदे पर नायक के आंसू बहाने पर कैसे एतराज किया जा सकता है। एंग्री यंग मैन की छवि वाले अमिताभ भी ‘आनंद’ के साथ ही अन्य फिल्मों में रोए हैं।
‘जानेमन’ की असफलता का कारण नायक का आंसू बहाना नहीं है वरन फिल्म का ऑपेरा स्वरूप है। दर्शक अपने अविश्वास की भावना को स्थगित करके सिनमा के परदे पर घटने वाली बात को सत्य मानता है और आप उसके विलिंग सेंस ऑफ डिसबिलीफ को मत तोड़िए। ‘जानेमन’ के एक दृश्य में दरवाजा तोड़कर साजिंदे भीतर आते हैं और अनुपम पूछता है कि क्या हो रहा है तब साजिंदे कहते हैं कि गाने का सीन है, हम नहीं बजाएंगे तो कौन बजाएगा? इस तरह के दृश्य दर्शक की उस भावना को तोड़ते हैं जिसके तहत वह परदे पर प्रस्तुत को सच मानने के लिए आया था। ‘जानेमन’ इस तथाकथित बौद्धिक प्रस्तुति के कारण असफल हुई है। बहरहाल पृथ्वीराज कपूर से रणबीर कपूर तक हर दौर के नायक किसी न किसी फिल्म में रोएं हैं। यहां तक कि नायक ने गाया है कि ‘ये आंसू मेरे दिल की जबान है।’

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