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रियलिटी शो के बहाने जिंदगी से खिलवाड़?

  • मंतोष कुमार सिंह

कुकुरमुत्ते की तरह प्रतिदिन फैल रहे टीवी मनोरंजन चैनल अतिशीघ्र प्रसिध्दि पाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। ऐसे नए-नए कार्यक्रम बनाए जा रहे हैं, जिसके जरिए ढेर सारा धन इकट्टठा किया जा सके। प्रसिध्दि और पैसे की लालशा के चलते ये चैनल युवाओं और मासूम बच्चों की जिंदगी के साथ जमकर खिलावड़ कर रहे हैं। आसमान को छुने की तमन्ना संजोए युवा वर्ग तेजी से इनके चंगुल में फंस रहा है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से कई कलाकार बुलंदियों को छू जाते हैं तो कई की जिंदगी खतरे में पड़ जाती है। पिछले दिनों रियलिटी शो कार्यक्रमों के दौरान हुए कई हादसों ने नई बहस को जन्म दिया है।

हाल ही में इंदौर में रियलिटी शो खतरों के खिलाड़ी के दौरान एक युवक की जान खतरे में पड़ गई। कुछ बनने की तमन्ना संजोए 22 वर्षीय अंजार खान भी इस शो में भाग लेने इंदौर पहुंचा था। शो के प्रमोशन के दौरान प्रतिभागियों को लंबे समय तक के लिए पानी से भरे एक बड़े शीशे के टैंक में रहने के लिए कहा गया था। अंजार खान भी तीन से पांच मिनट तक टैंक के अंदर रहा, वह कब बेहोश हो गया किसी को पता ही नहीं चला। लोगों को लगा कि वह सांस रोके है। कुछ देर बाद जब वह पानी में और नीचे जाने लगा तो तमाशा देख रहे लोगों को गड़बड़ी लगी। आयोजकों ने उसे बेहोशी की अवस्था में बाहर निकाला। जब वह मूर्छित हो गया तो आयोजक उसे अस्पताल में छोड़कर भाग गए। अंजार खान के फेफड़े में पानी भर गया।

कुछ दिन पूर्व ऐसे ही एक रियलिटी शो के दौरान कोलकाता में 16 साल की प्रतिभागी शिंजिनी सेनगुप्ता लकवे की शिकार हो गई। शिंजिनी एक शो में नृत्य प्रतिस्पर्धा में भाग ले रही थीं और एक राउंड में उनके खराब नाच पर शो के जजों की फटकार पर वे न केवल रोईं बल्कि उनको इतना सदमा लगा कि उन्हें लकवा मार गया। इससे पूर्व सरेगामापा लिटिल चैंप्स प्रतियोगिता से स्मिता नंदी के बाहर होने पर उनके पिता को दिल का दौरा पड़ गया था। इस घटना का असर लिटिल चैंप्स विजेता अनामिका चौधरी पर पड़ा और कार्यक्रम के दौरान उनकी तबियत बिगड़ गई। रियलिटी शो के दौरान कई और घटनाएं भी जो चुकीं हैं जो किन्हीं कारणों से सार्वजनिक नहीं हो पाईं। इस तरह के रियलिटी शो पर अब सवाल उठने लगे हैं और नियम कानून बनाने की चर्चा होने लगी है। कुछ शो तो उकसाने-भड़काने वाले बनाए ही जाते है। जिसका एक मात्र उद्देश्य टीआरपी होता है। अधिकांश रियलिटी शो विदेशी शो की नकल हैं। दर्शकों की संख्या बढ़ने के लिए जज ऐसे हथकंडे अपनाते हैं। कार्यक्रम के निर्माता भी चहते हैं कि शो के दौरान कुछ ऐसा किया जाए कि लोगों की भावनाएं आहत हों और उनका झुकाव चैनल की ओर हो। टीआरपी के चक्कर में कभी-कभी हदें भी पार हो जाती हैं और शिंजिनी, अंजार और अनामिका जैसी घटनाएं भी घट जाती हैं। यह सच है कि रियलिटी शो ने गांवों और छोटे शहरों के कई गुमनाम लोग को रातों-रात स्टार बना दिया, इसे देखकर और लोगों को लगा कि उनका बच्चा भी बड़ा स्टार बन सकता है। इन शो में अक्सर बचों को उम्र से पहले बड़ा दिखाने की कोशिश की जाती है।

छोटे पर्दे के टैलेंट हंट शो हों, फिल्में या फिर व्यावसायिक विज्ञापन में बाल कलाकारों पर वयस्कों से ज्यादा दबाव होता है। उन्हें मनोरंजन उद्योग के नकारात्मक पहलुओं से भी जूझने को विवश होना पड़ता है। इन बाल कलाकारों पर काम का बोझ इतना बढ़ जाता कि यह कभी यह जान ही नहीं पाते कि समुद्र तट की रेत पर बालू से घर बनाने या आम के पेड़ पर चढ़ने या पेड़ पर चढ़कर अमरूद तोड़कर खाने का मजा क्या होता है। अपने छोटे से शहर या गांव के तालाब में नहाने से वंचित इन बाल कलाकारों की बाल अवस्था को लेकर अब सरकार भी सोचने लगी है। छोटों बच्चों से 12 से 18 घंटे तक काम कराया जाता है। इस दौरान उन्हें शिक्षा-दीक्षा से भी दूर रहना पड़ता है। काम के बोझ के चलते उनका बचपन अंधकारमय हो जाता है। प्रतियोगिता में हार का असर कई बच्चे पर गहराई तक पड़ता और वे सदमें का शिकार हो जाते हैं। कई बार तो जजों की डांट को वे दिल से लगा लेते और उससे जिंदगीभर उबर नहीं पाते हैं।कुल मिलाकर आजकल चैनलों पर प्रतिभाओं का बाजारीकरण हो गया है। प्रोडक्शन हाउस और चैनल वाले युवाओं और बच्चों को चांद-तारे छूने के सपने दिखाकर प्रॉडक्ट की तरह उन्हें बेच रहे हैं। रातों-रात सुपर स्टार बनने की तमन्ना संजोए से प्रतिभागी जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं। यानी मुनाफे के लिए और मनोरंजन का साधन बने इन शो के निर्माताओं को जहां यादा जिम्मेदारी दिखाने कि जरूरत है, वहीं जजों को भी सावधानी बरतनी होगी। सरकार को भी ऐसे रियलिटी शो पर निगरानी रखने के लिए कड़े कदम उठाने पड़ेंगे।

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