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बागड़ के भय से उबरा खेत?

  • महेश बाग़ी
लोकतंत्र को कार्यपालिका और व्यवस्थापिका जिस तरह खोखला कर रही हैं, उसी तरह न्यायपालिका और लोकायुक्त जैसी संस्थाओं की ज़िम्मेदारी भी बढ़ती जा रही है। इस देश में लोकतंत्र अब तक कायम है तो इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि देश की अवाम का न्यायपालिका पर भरोसा कायम है। पिछले कुछ समय में ऐसे कई मामले सामने आए हैं,जिनमें न्यायपालिका ने कार्यपालिका और व्यवस्थापिका पर नकेल डाल कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को बरकरार रखा। इसी क्रम में मध्यप्रदेश के लोकायुक्त का उल्लेख करना भी आवश्यक है। ग़ौरतलब है कि लोकायुक्त के समक्ष भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार के कई मामले विचाराधीन हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी पत्नी सहित डंपर कांड की जांच का सामना कर रहे हैं। इसके अलावा उनके मंत्रिमंडल के तेरह सदस्य-बाबूलाल गौर, हिम्मत कोठारी, कैलाश विजयवर्गीय, जयंत मलैया, नरोत्तम मिश्रा, गोपाल भार्गव, अनूप मिश्रा, कुसुम मेहदेले, कमल पटेल, विजय शाह, लक्ष्मीकांत शर्मा, गंगाराम पटेल और चौधारी चंद्रभान सिंह भी भ्रष्टाचार के अलग-अलग मामलों में लोकायुक्त के घेरे में हैं। ज़ाहिर है कि मुख्यमंत्री सहित उनके मंत्रिमंडल के लगभग आधे सहयोगी, भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं। चूंकि निकट भविष्य में विधानसभा चुनाव होने वाले है, इसलिए सरकार यह कतई नहीं चाहेगी कि ऐसे समय में लोकायुक्त जाँच किसी निष्कर्ष पर पहुंच कर सरकार को संकट में डाल दे। ऐसे में लोकायुक्त पर दबाव बनाने का सबसे अच्छा तरीका यही था कि उन्हें किसी मामले में उलझाया जाए और ऐसा किया भी गया।
मध्यप्रदेश के लोकायुक्त रिपुसूदन दयाल के खिलाफ़ रिवेरो टाउनशिप में अवैधा तरीके डूप्लेक्स बंगला आवंटित करवाने का मामला प्रकाश में आया। कहा गया कि लोकायुक्त ने अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए उक्त आवंटन प्राप्त किया। इस संबंधा में तथ्य बताते हैं कि लोकायुक्त की पत्नी श्रीमती उषा दयाल के नाम से लॉटरी सिस्टम में प्लांट क्र 76 आवंटित हुआ। श्रीमती दयाल ने एक आवेदन देकर प्लाट क्र. 76 की जगह 60 का आवंटन प्राप्त कर लिया। इसी में पद और प्रभाव के दुरूपयोग का आरोप लगा कर मामला पुलिस तक ले जाया गया। पुलिस ने शिकायतकर्ता की आपत्ति और तथ्यों के अवलोकन के बाद पाया कि इसमें कहीं कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। तब सिधे जिला अदालत में मामला पेश किया गया और वहाँ भी पुलिस रिपोर्ट पर मुहर लग गई। शिकायतकर्ता मामला हाईकोर्ट ले गए और अभी इस पर फैसला आता, इसके पूर्व ही हाईकोर्ट के हवाले से यह ख़बर छपवा दी गई कि जिला जज के फैसले को हाईकोर्ट ने अवैध मानते हुए जज के खिलाफ कार्यवाही की अनुशंसा की है। लेकिन हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार ने यह कह कर सबको चौंका दिया कि ऐसा कोई फ़ैसला दिया ही नहीं गया और अखबारों में मनगंढ़त समाचार छपवा दिया गया।
इस सारी कवायद का लब्बेलुआब यही है कि ऊपरी इशारे पर कुछ लोग लोकायुक्त के पीछे हाथ धोकर पड़े हुए हैं और किसी भी तरह उन्हें अदालती चक्कर में घसीट रहे हैं, ताकि वे अपने अधीन चल रही जांच को जल्दी न निपटा सकें। नेताओं और अफसरों को जनता से कोई डर नहीं है। उसे तो वे अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से बरगला देंगे, किंतु न्यायिक संस्थाओं का ख़ौफ़ उन्हें चैन की नींद नहीं सोने दे रहा है। लोकायुक्त जैसी संस्था पर अगर कुछ लोग अंगुली उठा रहे हैं तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। इससे नेताओं-अफसरों की हिम्मत बढ़ती है और उनके अंदर भरा न्यायपालिका का डर कम होता है। पिछले दिनों इसका नज़ारा दिखा भी था। जब आयकर विभाग ने स्वास्थ्य विभाग के कर्ता-धार्ताओं के यहां छापे मारे और जिसके कारण अजय विश्नोई की स्वास्थ्य मंत्री पद से छुट्टी हुई, तब स्वास्थ्य आयुक्त रहे आईएएस राजेश राजौरा ने इस्तीफे की घोषणा कर दी। अगर सरकार में ईमानदारी होती तो उनका इस्तीफ़ा मंजूर कर लेती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और कुछ ही दिनों बाद राजौरा को नई पद स्थापना दे दी गई। यह सब प्रायोजित था। दरअसल, राजौरा ने जान-बूझ कर इस्तीफे की भाषा वह चुनी थी, जिसे नामंजूर किया जाए और यही हुआ भी। कहने की ज़रूरत नहीं कि दवा घोटाले में शामिल लोगों को बचाने की यह प्रारंभिक कार्यवाही थी। पहले राजौरा बच गए और बाकी भ्रष्टों के बचने का रास्ता साफ़ कर दिया गया।
यह सारी कवायद लोकायुक्त के डर से की गई। यदि यह डर नहीं होता तो क्या नेता-अफसर ऐसा कर पाते ? इस्तीफे की नौटंकी का मकसद ही दवा घोटाले पर परदा डालना था, जिसमें सरकार को प्रारंभिक सफलता मिल गई है। बहरहाल, मामला लोकायुक्त पर दबाव बनाने का है और इन दिनों सत्ता पूरी कोशिश कर रही है कि वह उन्हें येन-केन-प्रकरन उलझाए रखे। रिवेरो टाउनशिप का मामला ऐसा ही है। विधायिका और कार्यपालिका लोकतंत्र को तमाशा बनाने पर आमादा है। दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि खुद को लोकतंत्र का चौथा प्रहरी और सच्चाई का अलमबरदार कहने वाला मीडिया भी लोकतंत्र-विरोधी ताकतों की कठपुतली बनता नज़र आ रहा है। लोकायुक्त को घेरने की ख़ातिर मनगढ़ंत समाचार प्रकाशित करने की प्रवृत्ति लोकतंत्र के दामन पर बदनुमा दाग़ है। इन परिस्थितियों न्यायपालिका, लोकायुक्त, आर्थिक अपराधा अनुसंधान ब्यूरो, महालेखा परीक्षक तथा सतर्कता आयोग जैसी संस्थाओं की ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है। मोजुदा परिस्थितियों में खेत को बागड़ से डरने की कतई ज़रूरत नहीं है। लोकायुक्त को चाहिए कि वे डंपर मामले सहित भ्रष्टाचार के अन्य मामलों में तेज़ी लाएं और जनता के सामने सच्चाई प्रकट करें। न्याय में देरी को माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी अनुचित ठहराया है। डंपर मामले की जांच का काम एक माह में पूरा करने का निर्देश मिलने के छह माह बाद तक जांच पूरी न होने से यह संदेह होता है कि लोकायुक्त कहीं न कहीं दबाव में हैं। न्यायिक संस्थाओं के प्रति आम आदमी का सम्मान बना रहे, इसके लिए ज़रूरी है कि जांच कार्य में तेज़ी लाई जाए और दूधा का दूधा पानी का पानी कर दिया जाए। उम्मीद की जाना चाहिए कि इस दिशा में निकट भविष्य में कोई निष्कर्ष सामने आएगा, जो भ्रष्टो के चेहरे पर पड़ा नकाब उतार सकेगा।
हम समवेत

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