Thursday

नारी, तुम सचमुच शक्ति हो

  • डॉ महेश परिमल

महिलाओं के स्वालम्बन और आत्मनिर्र्भर होने की बात हमेशा कही जाती है, पर इसे चरितार्थ करने के नाम पर केवल बयानबाजी होती है। इस दिशा में जब तक महिलाएँ स्वयं आगे नहीं आएँगी, तब तक कुछ होने वाला नहीं। हाल ही में दो घटनाएँ ऐसी हुई,जिससे लगता है कि महिलाओं ने न केवल आत्मनिर्भरता की दिशा में, बल्कि अपनी जिंदादिली का परिचय आगे आकर दिया। इन दोनों ही घटनाओं से इन महिलाओं ने यह बता दिया कि उनमें भी कुछ कर गुजरने का जज्बा है, इसके लिए वे पुरुषों के आगे किसी प्रकार की सहायता की भी अपेक्षा नहीं करतीं।हुआ यूँ कि राजस्थान के उदयपुर में बारहवीं की परीक्षा चल रही थी, एक केंद्र में साधारण रूप से जैसी आपाधापी होती है, उसी तरह हर तरफ मारा-मारी मची थी। किसी को अपनी सीट नहीं मिल रही थी, किसी को रोल नम्बर ही नहीं मिल रहा था। कोई अपने साथी की तलाश में था, तो कोई बहुत ही बेफिक्र होकर अपना काम कर रहा था। ऐसे में परीक्षा शुरू होने में मात्र दस मिनट पहले एक विचित्र घटना उस परीक्षा केंद्र में हुई। सभी ने अपने-अपने काम छोड़ दिए और उस नजारे को देखने लगे। बात यह थी कि एक नवयौवना दुल्हन परीक्षा केंद्र के बरामदे से गुजरने लगी। शादी का जोड़ा, शरीर पर थोड़े से गहने, हाथों पर मेंहदी, घँघट निकला हुआ, यह थी उषा, जो उस दिन उस परीक्षा केंद्र में बारहवीं की परीक्षा में शामिल होने आई थी। साधारण मध्यम वर्ग परिवार की उषा के माता-पिता की इतनी अच्छी हैसियत नहीं थी कि बहुत सारा दहेज देकर बिटिया की शादी किसी अमीर घर में करते, इसलिए अभी उषा की उम्र शादी लायक नहीं थी, फिर भी उन्होंने उसके लिए योग्य वर की तलाश में थे। योग्य वर मिल भी गया, उन्होंने समझा कि परीक्षा तक सब कुछ ठीक हो जाएगा। उषा ने अपने भावी पति को देखा, दोनों ने मिलकर तय किया कि बारहवीं की परीक्षा तक शादी नहीं होगी, भावी पति ने उषा को बारहवीं की परीक्षा देने की अनुमति भी दे दी। अब किसे पता था कि शादी का मुहूर्त और परीक्षा की तारीख में एक दिन का अंतर होगा। अब मजे की बात यह है कि उषा तो सच्चे मन से परीक्षा की तैयारी कर रही थी। जिस दिन शादी, उसके ठीक दूसरे दिन परीक्षा का पहला पेपर। अब शादी कोई ऐसे तो हो नहीं जाती, पंडितों के सभी प्रसंग निपटाते-निपटाते आधी रात बीत चुकी थी। उसके बाद भोजन और फिर विदाई, बज गए चार। परीक्षा शुरू होनी थी सुबह सात बजे। समय मात्र तीन घंटे का। ऐसे में पढ़ाई आवश्यक थी, सो उषा ने जो थोड़ा समय मिला, उसे पढ़ाई में लगा दिया। अब वह दुल्हन के जोड़े में ही पहुँच गई, परीक्षा भवन। यह उसकी दृढ़ता ही थी, जो उसे यह सब करने के लिए प्रेरित कर रही थी। कुछ कर बताने का साहस ही उसे शक्ति प्रदान कर रहा था। उसने वह सब कुछ किया, जो उसे करना था। इसी से स्पष्ट है कि नारी यदि ठान ले कि उसे यह करना है, तो वह कर के ही रहती है।

एक और घटना राजस्थान से काफी दूर सिकर गाँव की है। इस गाँव में एक स्नातक गृहिणी सुभीता रहती हैं। पति की सहायता करने के लिए उसे शिक्षिका बनने की ठानी। इसके लिए बी.एड. करना आवश्यक था। पति सेना में हैं, इसलिए घर की कई जिम्मेदारियाँ उसे ही सँभालनी पड़ती थी। एक बार जब पति काफी समय बाद सेना से अवकाश लेकर आए, तो सुभीता ने उससे कहा कि घर में कई बार उसे लगता है कि वह केवल घर के कामों में ही सिमटकर नहीं रहना चाहती, वह कुछ और करना चाहती है। पति राजेंद्र को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी। पति के बाद ससुराल वालों ने भी कोई दलील नहीं दी। उन्होंने भी सोचा कि बहू बाहर जाकर कुछ करे, तो उससे समाज का ही भला होगा। अब स्थितियाँ अनुकूल हो, इसके लिए पति-पत्नी ने मिलकर ईश्वर से प्रार्थना की कि उनकी इच्छा पूरी कर दे। पर ईश्वर तो सुभीता को किसी और ही परीक्षा के लिए तैयार कर रहे थे। वह सुभीता को एक जाँबाज महिला के रूप में प्रस्तुत करना चाहते थे। यहाँ भी कुदरत ने अपनी करामात दिखाई। राजेंद्र जब छुट्टियाँ खत्म कर सीमा पर गया, उसके पहले अपने प्यार का बीज सुभीता की कोख पर स्थापित कर गया। सुभीता के लिए अब शुरू हो गई परीक्षा की घड़ी। एक तरफ पढ़ाई, दूसरी तरफ घर के रोजमर्रा के काम और तीसरी तरफ अपने प्यार की निशानी का धयान रखना। समय के साथ-साथ सब कुछ बदलता रहा।

अचानक एक सूचना ने सुभीता को हतप्रभ कर दिया। बीएड परीक्षा की समय सारिणी घोषित की गई, तब उसे ध्यान में आया कि उसकी डॉक्टर ने डिलीवरी की भी वही तारीख दी है। अब क्या होगा, पति हजार किलोमीटर दूर। परीक्षा भी देनी ही है, नहीं तो साल भर की मेहनत पर पानी फिर जाएगा। अब क्या किया जाए? संकट की घड़ी चारों तरफ से अपने तेज घंटे बजा रही थी। परीक्षा की तारीख आ पहुँची, परीक्षा शुरू होने में गिनती के घंटे बचे थे कि सुभीता को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। घर परिवार के सभी सदस्य तनाव में आ गए। अब क्या होगा? इधार सुभीता आश्वस्त थी कि जो भी होगा, अच्छा ही होगा। उसे ईश्वर पर पूरा विश्वास था। आधी रात को उसने एक तंदुरुस्त बच्चे को जन्म दिया। उसके बाद फोन पर अपने पति से कहा- मैं एक भारतीय सिपाही की पत्नी हूँ, मैं इससे भी विकट परिस्थिति के लिए तैयार थी। हमारा बेटा स्वस्थ है और अभी कुछ ही घंटों बाद मैं परीक्षा देने जा रही हूँ। उधार पति को उसकी जीवटता पर आश्चर्य हो रहा था, लेकिन वह खुश था कि मेरी पत्नी ने एक जाँबाज महिला होने का परिचय दिया है। उधार परीक्षा केंद्र में इसकी सूचना दे दी गई, वहाँ के लोगों ने उसके लिए विशेष व्यवस्था करते हुए उसे एक अलग कमरे में पेपर लिखने की छूट दे दी। सुभीता एम्बुलेंस से परीक्षा केंद्र पहुँची और पेपर समाप्त कर तुरंत ही अस्पताल पहुँच गई।

दोनों ही विकट परिस्थितियों में परीक्षा दी, यह बताते हुए खुशी हो रही है कि दोनों ने ही फर्स्ट क्लास में परीक्षा पास की। इस घटना ने साबित कर दिया कि ईश्वर हमारी हर घड़ी परीक्षा लेता है। यह काम इतने खामोश तरीके से होता है कि किसी को पता ही नहीं चलता। इसमें जो पास हो जाता है, उसके लिए फिर एक नई परीक्षा की तैयारी की जाती है। इसी तरह हर घड़ी परीक्षा देते हुए इंसान नए रास्ते तलाशता रहता है। उसे नई मंजिल मिलती रहती है। उन दोनों जाँबाज महिलाओं को सलाम......
हम समवेत

8 comments:

रचना said...

yae sab naari shoshan kae examples haen ham pehlae bhi inka virodh kar chukae haen . inko bahdurii naa kahey aur galmarize bhi naa karey kyoki yae sab karney samaj naario ko majbur kartaa haen .

शोभा said...

आपने बहुत ही सही बात कही है। लेख विचार प्रधान है तथा बहुत कुछ सोचने पर मज़बूर करता है।

anitakumar said...

मेरी बुद्धी काफ़ी छोटी है बात की गहराई नहीं जान सकती, मुझे तो समझ नहीं आया कि ये नारी शोषण के उदाहरण कैसे हैं, क्या उन नारियों को किसी ने मजबूर किया था परिक्षा में बैठने के लिए, पहले कैस में मान भी लें कि पिता को दूसरा मुहुर्त निकलवा लेना चाहिए था( हालांकि पिता की अपनी चिन्ता रही होगी कि इतना योग्य वर हाथ से न निकल जाये), पर दूसरे कैस में कैसे शोषण हुआ, क्या ये कहने की कौशिश की जा रही है कि पति को संयम बरतना चाहिए था जब तक पत्नी की परिक्षायें न हो जाती। तो मुझे लगता है कि इतने दूर की शायद दोनों ने ही न सोची हो

रचना said...

ek bachchi jo 12th class ka exam dae rahee haen uskii shaadi ko abhivavk prathmiktaa dae aur usko shaadi kae mandap sae vivaah kae liyae aana padye is saey jyaada shoshn nahin ho saktaa haen kisi bhi ladki kaa kyoki woh ladkii haen . kya us bachchi ki mansiktaa ho gee jab woh exam daene aayee hogee !!!!!
aur dusra case to aur bhi gayaa bitaa haen ek aurot ko kitni pareshani hotee hae prsav mae yae mujh sae behtar to maa bani vivahit mahila jaantee haen aur us sthti mae usko parkiksha deane jaaney dena shyaad uskae jeevan sae khelane kae samaan hee hota haen . aur jab patni kii ichcha padney kee thee to bachchey kae janam ko aagey bhilae jayaa jaa saktaa tha .
shoshan ko kewal ek nazar sae nahin saamjik utardaaitv kaee nazar sae bhi daekhae
kyon betiyon ko shaadi kae naam par balivedi dee jaatee haen aur kyon yae jaantey hue ki ek strii apnee ko aagey lae jaana chahtee haen usey turant maa banney kae utardaaitav ko nibhana hota haen ??
ab yae mat kahey ki yae sab dono ladkiyon nae apnii ichcha sae kiyaa kyoki jab ek hii option ho to ichchaa kaa kehaan prashn aayaa , choice hee kyaa thee dono kae paas

मीनाक्षी said...

रचनाजी, जिस बदलाव का सपना हम आप देख रहे हैं उसे आने में वक्त लगेगा...विवाह के फौरन बाद और प्रसव के बाद परीक्षा में बैठने के लिए रोका भी जा सकता था... लेकिन शायद उन दोनो के मज़बूत इरादे के आगे समाज और परिवार कमज़ोर पड़ गए...परिमलजी के विचार में इसे नारी का एक कदम आगे बढ़ना ही कहा जा सकता है...

swapandarshi said...

मै रचना से सहमत हूँ. काश इन लड्कियो का परिवार उनकी मेधा का और जीवन मे आगे बढ्ने के मौके सहजता से देता.
जरा भी संजीदगी इन परिवारो वलो मे होती तो शादी और बच्चा दोनो ज़रूरी नही थे. ये स्त्रियो को मौके देने के नाम पर अमानवीय स्थिति मे धकेलना है

Suresh Chandra Gupta said...

आपने बिल्कुल सही लिखा, 'उन दोनों जाँबाज महिलाओं को सलाम'. पर आपकी इस पोस्ट से रचना जी नाराज हो गईं. पता नहीं क्यों जब भी कोई किसी नारी की उपलब्धि की बात करता है तो रचना जी नाराज हो जाती हैं. या तो वह इस विषय पर अपना एकाधिकार मानती हैं, या वह किसी और ही बात पर बहुत ज्यादा परेशान हैं.

रचना said...

swaal maere naaraj honey yaa khush honey kaa nahin haen {aur naahiee mae aap kitarah vyaktigat aakshep kar rahee hun } swaal haen equal opportunities kaa aur jo maene kehaa haen awapna darshi bhi keh rahee haen
par shyaad naari ko manviytaa sae daekhen kae liyae abhi samaj kae thaekaedaaro ko vakt lagegaa
IS THARH KAE AALEKH MAE UPLABDHI DAEKHANA KAM SAE KAM MUJHE TO NAHIN AATA