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जैसे पड़ोसी मुल्क में हुए हो धमाके..

  • अनिल पाण्डेय
शुक्रवार और शनिवार को हमारे देश के दो बड़े शहर बैंगलुरु और अहमदाबाद बम धमाकों से गूंज गए। दोनों ही दिन प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने धमाकों की निंदा कर दी। उनके बयान से ऐसा लगा मानो धमाके भारत में नहीं किसी बल्कि किसी दूसरे मुल्क में हुए हों। न जाने हमारी खुफिया एजेंसियों को भी क्या हो गया है। आतंकवादियों की हिम्मत इतनी बढ़ गई है कि वो हमला करके साफ निकलते जा रहे हैं और हमारी पुलिस व खुफिया एजेंसियां सिर्फ जांच का भरोसा ही दिला रही हैं। रविवार को गृहमंत्री ने कहा कि सरकार संघीय जांच एजेंसी बनाने पर विचार कर रही है। अगर अब भी सरकार विचार ही करेगी तब तो जनता का कल्याण हो चुका। जिस समय पूरा देश महंगाई की आग में झुलस रहा था उस समय सत्तापक्ष उससे निपटने के बजाय कुर्सी की जोड़-तोड़ में लगा रहा। मई में जयपुर में धमाके हुए तब से अब तक जांच की जा रही है जो लगता है, अगले कुछ वर्षों के पहले पूरी नहीं हो पाएगी। फिर आईटी राजधानी बैंगलुरु में धमाके वह भी तब जबकि एक साल से लगातार ऐसी खबरें आ रही थीं कि बैंगलुरु आतंकियों के निशाने पर है। अब यदि इस पर भी सुरक्षा तंत्र कुछ न कर सके तो किसको दोष दें। रही बात पुलिस की तो उससे किसी भी प्रकार की उम्मीद करना बेमानी होगा। पुलिस तो पूरी तरह से राजनेताऒं की परछाई बन चुकी है। यदि उनके सामने भी आतंकी बम लगा रहे हों तो वे तब तक कार्रवाई नहीं करेंगे जब तक उनकी जेब गरम नहीं कर दी जाती या फिर किसी से आदेश न दिलवा दिया जाए।

यह कहना गलत न होगा कि राजनेताऒं की आपसी खींचतान का नतीजा आम जनता को हर बार भुगतना पड़ता है। कई बार मांग उठी कि केंद्रीय एजेंसियों को स्वतंत्र कर दिया जाए पर राजनैतिक लाभ के चलते किसी भी सरकार ने ऐसा नहीं किया। आप सोच सकते हैं कि हमारा देश किस ऒर जा रहा है। देश की सर्वोच्च अदालत ने जिस आतंकी को फांसी की सजा सुना दी उसकी सजा को आज तक टाल के रखा गया है। इसी तरह की दरियादिली का नतीजा था, कि काठमांडू से इंडियन एअरलाइंस की फ्लाइट को हाईजैक कर कंधार ले जाया गया और यात्रियों को छोड़ने के बदले एक खूंखार आतंकवादी को छुड़ा लिया गया। जिस देश का नेतृत्व कड़े फैसले नहीं ले सकेगा और कुर्सी के मोह में पड़ा रहेगा वहां इससे बदतर और क्या हो सकता है। आतंकियों का जब मन चाहता है, जहां मन चाहता है वहां विस्फोट कर देते हैं। लोगों की जान से खिलवाड़ करते हैं और नेताऒं को इन सब पर ठोस कदम उठाने के बजाय भाषण का एक मुद्दा मिल जाता है।

महंगाई पर मूर्ख बनायाः यदि आप सबको याद हो तो लगभग डेढ़ महीने पहले प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने दंभ भरते हुए कहा था कि चार से छह हफ्तों में महंगाई काबू में आ जाएगी और इसकी दर भी घटकर छह फीसदी पर वापस आ जाएगी। लेकिन आंकड़ा कम होने के बढ़ते हुए 12 प्रतिशत को पार कर गया। इन सबसे यह तो सिद्ध हो गया है कि नेताऒं को फायदेमंद लगता है वे वही करते हैं और रही जनता तो उसे तो मूर्खों की श्रेणी में रखा जाता है जिसकी याद सिर्फ चुनावों के वक्त आती है।

1 comment:

राज भाटिय़ा said...

आप सही कह रहे हे, इन का मुल्क होता तो दर्द होता, या फ़िर इन का कोई मरता तो दर्द होता,