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कबूतर से कूरियर तक

कासिद के जरिए खत भेजने से शुरू हुआ डाक का सिलसिला भले कूरियर और ई-मेल के दौर में पहुंच गया हो लेकिन भारत में आज भी कबूतरों, खच्चरों और ऊंट से डाक सेवा बदस्तूर चल रही है।नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित अरविंद कुमार सिंह लिखित पुस्तक 'भारतीय डाक : सदियों का सफरनामा' के अनुसार उड़ीसा पुलिस ने 1946 में कबूतर डाक सेवा स्थापित की। 40 कबूतरों के साथ शुरू की गई सेवा में इस वक्त करीब 1000 से अधिक कबूतर कार्यरत हैं।ये कबूतर दुर्गम इलाकों में प्राकृतिक प्रकोप या किन्हीं अन्य कारणों से जहां आदमी नहीं पहुंच सकता वहां आज बतौर डाकिया सेवा देते हैं। इस किताब के लेख चिठ्ठियों की अनोखी दुनिया को राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद कक्षा आठवीं की हिन्दी की नई पाठ्यपुस्तक वसंत भाग-3 में शामिल किया गया है।बहरहाल दुनिया की अपनी तरह की यह अनोखी डाक सेवा मोबाइल और इंटरनेट के युग में बंद होने की कगार पर पहुंच गई है। पुस्तक के अनुसार दुनिया की जानी मानी समाचार एजेंसी 'रायटर' ने कबूतरों का उपयोग समाचार हासिल करने के लिए लंबे समय तक किया।इसी प्रकार ब्रिटेन की ग्रेट बैरियर पिजनग्राम कंपनी ने 65 किमी कबूतर संदेश सेवा स्थापित की थी, ताकि संदेश तेजी से पहुंचाया जा सके।
भाषा

1 comment:

mahashakti said...

जानकारी प्रद, अच्‍छा लगा, इस लेख को पढ़ कर