Thursday

मोना के जज्बे को सलाम

  • रणधीर गिलपत्ती
बठिंडा । अगर हौसला बुलंद हो, तो शारीरिक अपंगता भी बौनी हो जाती है और कामयाबी कदम चूमने लगती है। ऐसे लोगों के लिए जिंदगी दिन काटने के बजाय लुत्फ लेने का साधन बन जाती है। ऐसा ही उम्दा उदाहरण है यहां के बैंक अधिकारी जग्गर सिंह सिद्धू और जगजिंदर कौर की बेटी मोना, जो विकलांग होने के बावजूद न केवल मनमीत सिद्धू के नाम से कामयाब डॉक्टर बन गई है, अपितु हैदराबाद से अस्पताल प्रबंधन में पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री लेकर पढ़ाई के लिए अमेरिका भी पहुंच गई है। जिस किसी ने भी उनकी उपलब्धियों को जाना, उसने उनकी हिम्मत को सलाम किया है।
मिले विवरण के अनुसार जिले के गांव मेहता में पैदा हुई मोना पर 11 माह की आयु में ही पोलियो का हमला हो गया। इसमें उनकी एक टांग और बाजू आंशिक रूप से विकृत हो गई।
मोना के मां-बाप व ताया नंद सिंह मेहता , ने उनके इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी पर हर जगह से उन्हें 'रब्ब दा भाणा' मानने की नसीहत ही मिली।
मोना ने शहर के सेंट जोसेफ स्कूल से 90 फीसदी अंक लेकर मैट्रिक पास की। उन्होंने मेडिकल ग्रुप में 12वीं की परीक्षा 80 प्रतिशत अंकों से उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने एमबीबीएस के लिए हुए प्री-मेडिकल एंट्रेंस टेस्ट में उच्च स्थान पाकर अमृतसर के सरकारी मेडिकल कालेज में दाखिला लिया।
प्रथम श्रेणी में एमबीबीएस की डिग्री पास करने के बाद उन्होंने अस्पताल प्रबंधन की मास्टर डिग्री के लिए अपोलो इंस्टीटयूट ऑफ हास्पिटल मैनेजमेंट, हैदराबाद की दाखिला परीक्षा में टॉप किया। इसी दौरान मोना ने लंदन के क्लीनिकल रिसर्च इंस्टीटयूट की रजिस्टर्ड मेंबरशिप, नेशनल ला स्कूल बेंगलूर से मेडिकल ला और एंथिक्स से मेडिकल इंफारमेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा हासिल किया। दो साल बाद ही उन्हें मैक्स हास्पिटल नई दिल्ली ने असिस्टेट मेडिकल सुपरिंटेडेट नियुक्त कर लिया।
यह मोना की उपलब्धियों का ही जलवा है कि देश की मशहूर मासिक मैगजीन 'मैनेजमेंट कंपास' ने इस माह के अंक का टाइटल पेज उन्हें समर्पित कर दिया है।
इसके बाद मोना ने विदेश जाकर उच्च शिक्षा हासिल करने का मन बनाया। उनके पिता ने अपना मकान बैंक के पास गिरवी रखकर उसकी पढ़ाई के लिए राशि जुटाई। मोना ने खुद ही अमेरिकी दूतावास से संपर्क किया व सभी दस्तावेज तैयार कर लिए। इस माह की दो तारीख को वह लॉस एंजिल्स यूनिवर्सिटी में हेल्थ मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए रवाना हुई हैं। यह मोना के हौसले का ही करिश्मा है कि उन्होंने अपंगता के बहाने समाज में दया का पात्र बनकर जीने के बजाय आत्मविश्वास के सहारे अपना रास्ता खुद बनाया। मोना पर उसके परिजनों को ही नहीं पूरे क्षेत्र को भी गर्व है।
जागरण

No comments: