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एक पेड़ को बचाने की लड़ाई

  • नवीन नवाज
डायनासोर दुनिया से विलुप्त हो चुके है। उनसे पहले के जीव-जंतु भी अब किस्से-कहानियों का हिस्सा हैं, लेकिन एक पेड़ की प्रजाति, जो डायनासोर से पहले भी थी, आज भी जिंदा है। इसी प्रजाति का एक पेड़ जिंगो बाईलोवा कश्मीर में खड़ा है, लेकिन अब अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। इसे यहां चीनी दरख्त कहते है।
भूमि की उर्वरा शक्ति कायम रखने और सौंदर्य प्रसाधन से लेकर दवा तक बनाने के काम आने वाला जिंगो बाईलोवा कोरिया, जापान के अलावा अमेरिका, यूरोप में भी पाया जाता है। कश्मीर के लालमंडी क्षेत्र में स्थित यह पेड़ दक्षिण एशिया का सबसे पुराना जिंगो बाईलोवा है। इसकी आयु दो सौ साल है। यह पेड़ भी मर जाता अगर कश्मीर के फ्लोरीकल्चर डेवलपमेंट एक्सटेशन अधिकारी फिदा अली आलमगीर इधर ध्यान नहीं देते। फिदा ने जब देखा, यह पूरी तरह सूख चुका था। अब इस पर पत्ते आ रहे हैं। इसकी शाखाओं से अन्य पेड़ लगाने की प्रक्रिया भी शुरू है।
फिदा अली कहते हैं कि यह वृक्ष, पेड़ों के किसी भी वर्ग में नहीं आता। इसका अपना अलग वर्ग है। जिंगो बाईलोवा उसी इलाके में होता है, जहां मौसम शीतोष्ण हो। कश्मीर का मौसम ऐसा ही है, यहां साल का औसत तापमान 17 डिग्री के आसपास रहता है, जबकि बारिश करीब 1100 मिलीमीटर होती है। जमीन की प्रकृति भी एसिडिक होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि यह पेड़ पौने तीन करोड़ साल पहले भी पाया जाता था। उस समय डायनासोर थे। पचहत्तर लाख साल पहले ये पेड़ उत्तरी अमेरिका से भी समाप्त हो गए और 25 लाख साल पहले यूरोप में भी इनका नामों-निशान नहीं रहा, लेकिन बाद में अन्य जगहों से लाकर यहां इन्हें लगाया गया। चीन को इसका घर माना जाता है। जिंगो बाईलोवा 40 साल बाद फल देता है और उसी समय इसके नर या मादा वर्ग में होने की पुष्टि होती है। फिदा ने बताया कि नर पेड़ ही ज्यादा मिलते हैं, उनके पत्ते ज्यादा खूबसूरत होते है और गिरने के समय वह स्वर्णपत्र जैसे नजर आते है। फल नर पेड़ पर भी लगते है। उन्होंने बताया कि हमारे देश में जालंधर, ऊटी और देहरादून में भी जिंगो के पेड़ है, लेकिन एक या दो ही और इनकी आयु कहीं भी तीस-चालीस साल से ज्यादा नहीं है।
इस पेड़ का घेरा पौने दो मीटर है, जबकि कोरिया में पाए गए जिंगो का घेरा पौने सात मीटर है। फिदा अली के मुताबिक जब यह पेड़ उन्होंने देखा, तो यह लगभग मर चुका था। पेड़ को किसी ने गलत तरीके से काटा था। उन्होंने इसके आसपास मिट्टी का चबूतरा बनवाया और इसका उपचार शुरू किया। अब इसके निचले हिस्से में शाखाएं निकलने लगी हैं। यह पेड़ नर है। फिदा ने बताया कि इसके बाद पूरी वादी में करीब 50 जिंगो बाईलोवा मिले। इनमें 30 मादा हैं। उन्होंने बताया कि इस पेड़ पर रेडियो एक्टिव किरणों का असर नहीं होता। हिरोशिमा पर 1945 में एटम बम गिरा था। उस समय वहां सब कुछ तबाह हो गया, लेकिन जिंगो बाईलोवा जलने के बावजूद बच गए।
जागरण

1 comment:

आशेन्द्र सिंह said...

ab ladai ek ped ko bachane ki jagah ek ped ko lagane ki honi chahiye. hamare fhar pasarte jaa rahe hain or pedon ki tarah hum bhi kahi vilupt hone ki kagar par hai. subhkamnayen...