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नेपाली माओवादी की भारत में दस्तक

  • मंतोष कुमार सिंह

पहले से ही नक्सली हिंसा से ग्रस्त भारत में नेपाली माओवादियों की दस्तक से केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और पुलिस-प्रशासन के होश उड़ गए हैं। नेपाल में हथियार छोड़कर संसदीय लोकतंत्र में शामिल हुए माओवादियों के प्रमुख नेता पुष्प कमल दहल उर्फ प्रंचड से नाराज माओवादी भारत को अपना ठिकाना बनाने लगे हैं। माओवादियों ने उड़ीसा के मलकागिरी जिले को अपने लिए सबसे सुरक्षित माना है। बताया जा रहा है कि पिछले दिनों जिले के नगरिकों ने नेपाली माओवादियो को देखा भी था। खुफिया अधिकारियों को भी घुसपैठ का अंदेशा हो गया है। उनका कहना है कि हमें नेपाली माओवादियों की घुसपैठ की सूचना मिली है, लेकिन जब तक वे पकड़े नहीं जाते कुछ भी कहना उचित नहीं होगा। कुछ समय पहले नेपाल ने भी भारत को आगाह किया था कि माओवादियों का एक हिस्सा भारतीय सीमा में प्रवेश कर सकता है।

दूसरी ओर पिछले दिनों उड़ीसा में हुई दो बड़ी नक्सली वारदातों से पुलिस-प्रशासन में खलबली मची हुई है। पुलिस महानिदेशक गोपाल चंद्र नंदा का कहना है कि हालांकि मलकानगिरि की पहचान माओवादी गतिविधियों के एक गढ़ के रूप में की जाती रही है, लेकिन कभी उग्रवादियों के हाथों इतनी बड़ी संख्या में लोग मारे नहीं गए। गौरतलब है कि 29 जून को बालीमेला जलाशय पार करते हुए आंध्रप्रदेश के ग्रेहाउंड फोर्स के 36 कमांडो समेत 38 पुलिसकर्मी मारे गए। उसके कुछ ही दिनों बाद 16 जुलाई को संदिग्ध उग्रवादियों की ओर से बारूदी सुरंग में कराए गए विस्फोट में उड़ीसा पुलिस के 17 पुलिसकर्मी मारे गए। प्रशासन इन घटनाओं के पीछे के कारणों के बारे में एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहा है। उड़ीसा पुलिस माओवादी हिंसा में अचानक इजाफे के पीछे के कारणों का पता अभी तक नहीं लगा पाई है।

माओवादी आंदोलन ने नेपाल के पशुपतिनाथ से आंध्रप्रदेश के तिरूपति तक एक लाल गलियारे के निर्माण को अपना लक्ष्य बनाया है। ऐसे में नेपाल में प्रचंड को सत्ता मिलने के बाद माओवादी कार्यकर्ता सीमा लांघ कर भारत में आने की बात को नकारा नहीं जा सकता है। लंबे अर्से से भारत के माओवादी अपने नेपाली समकक्षों से नैतिक के साथ-साथ साजो सामान का समर्थन हासिल करते रहे हैं। कुछ समय पहले उड़ीसा के गजपति जिले के मंद्राबाजू इलाके से कम से कम छह सीडी बरामद की गई थी। इनसे राय में नेपाली माओवादियों की मौजूदगी जाहिर होती है। नेपाली भाषा की सीडी भारतीय माओवादियों और उनके नेपाली समकक्षों के बीच के रिश्तों का एक संकेत हो सकती है।

दक्षिण-पश्चिमी रेंज के पुलिस उप महानिदेशक संजीव पंडा ने भी दोनों घटनाओं में भारत के बाहर प्रशिक्षित माओवादियों के हाथ होने की आशंका जताई है। पंडा के अनुसार विस्फोटकों की भारी मात्रा वाली बारूदी सुरंगों में विस्फोट कराने के लिए बेहद कुशल होना होगा, जो भारतीय माओवादियों के लिए संभव नहीं है। उल्लेखनीय है कि विस्फोट इतना जबरदस्त था कि बारूदी सुरंग निरोधी वाहन पूरी तरह तबाह हो गया। यह सर्वविदित है कि उड़ीसा, आंध्रप्रदेश और छत्तीसगढ़ में सक्रिय माओवादी दूसरे इलाकों के विशेषज्ञों से मदद ले रहे हैं और शायद इन स्थानों में नेपाल भी शामिल है। उड़ीसा में पिछले कुछ वर्षों से नक्सली हिंसा में तेजी से वृध्दि हुई है। राय के अधिकारी इन स्थितियों से निपटने में असमर्थता जाहिर कर रहे हैं। राय के दक्षिणी, उत्तरी और उत्तर पश्चिमी इलाके में नक्सली सबसे अधिक सक्रिय हैं। राय के कम से कम आठ जिलों मलकानगिरि, कोरापुट, रायगडा, गजपति, संबलपुर, देवगढ़, सुंदरगढ और मयूरभंज में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का प्रभाव है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी- मार्क्सवादी लेनिनवादी (जनशक्ति) क्योंझर, जाजपुर और ढेनकेनाल जिले में सक्रिय है। राय के तीस जिलों में से 15 जिले नक्सल प्रभावित हैं। वहीं देश के 13 रायों आंध्रप्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट, कर्नाटक और केरल में नक्सली सक्रिय हैं। नक्सल प्रभावित राय लंबे अरसे से यह मांग करते आ रहे हैं कि नक्सल समस्या को रायों की समस्या न मानकर राष्ट्रीय समस्या माना जाए, क्योंकि लगभग आधा देश इससे ग्रसित है। रायों के बीच आपसी समन्वय न हो पाने के कारण यह समस्या बढ़ती ही जा रही है। प्रभावित रायों में अलग-अलग दलों की सरकार होने का लाभ सबसे यादा नक्सली ही उठा रहे हैं। इसलिए मांग उठ रही है कि केन्द्र सरकार इस समस्या से निपटने के लिए केंद्रीय रणनीति बनाए। दूसरी ओर, केन्द्र सरकार इसके लिए तैयार नहीं है। केन्द्र और रायों की इसी खींचतान का लाभ नक्सली ले रहे हैं। उनकी गतिविधियां बेखौफ जारी हैं। पीड़ित राय सरकारें अपने-अपने ढंग से नक्सलियों से लड़ रहे हैं। संयुक्त रूप से कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। धडल्ले से नक्सलियों के प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं। जिनकी जानकारी सबको है। ऐसे में केंद्र और प्रभावित राय सरकारों को एक मंच पर आकर कोई कारगर रणनीति बनाकर नक्सलियों के खिलाफ चौतरफा धावा बोल देना चाहिए तब जाकर सफलता मिलेगी। केन्द्र और राय सरकारें जब तक एकजुट हो कर नक्सली समस्या का समाधान नहीं करेंगे, तब तक समस्या का समाधान एक दिवा स्वप्न ही साबित होगा।

3 comments:

Umesh said...

कंहा है बन्धु आप । कमरे मे बैठ कर कोरी कल्पना से लेख लिखते हैं आप । आप को मालुम होना चाहिए की नेपाल मे माओवादीयो के उत्कर्ष का कारण सप्रग सरकार तथा उनकी सहयोगी रही वामपंथी ताकते ही हैं । सप्रग की गलत विदेश निती के भयानक दुष्परिणाम देश को भुगतने पड सकते है । हो सकता है की आप दो-एक दिन मे सुने की नेपाल के प्रधानमंत्री माओवादी सुप्रिमो प्रचण्ड बन गए है ।

मंतोष कुमार सिंह said...

उमेश जी शायद आपने लेख को ध्यान से नहीं पढ़ा है। यह सबको मालूम है कि प्रचंड नेपाल के प्रधानमंत्री बनने वाले हैं, लेकिन प्रचंड के संघर्ष को छोड़कर लोकतंत्र में शामिल होने के निर्णय से उनके सभी सहयोगी सहमत नहीं हैं और वे हिंसा का रास्ता भी नहीं छोडऩा चाहते हैं। इसलिए वैकल्पिक और सुरक्षित ठिकाने की तलाश में प्रचंड के विरोधी भारत की आरे रुख करने लगे हैं।

devid said...

महाशय, प्रचन्ड भी पहले भारत से ही नेपाल के माओ वादीओ को संचालीत करता था.उसे प्रत्यक्छ रुप से सीताराम येचुरी का समर्थन प्राप्त था.

बोया पेड बबुल का तो आप कहां से पाओगे.

नेपाल को बर्बाद करने मे पुरा नहीं तो ७०% हाथ भारत का ही है.अब भारत को भी ३०% तो बरबाद
होना ही पडेगा.ये सायद नेपाल के लोगो की बददुआ
लगी है भारत को. लेकीन १००% जीत तो माओवादी गये न.