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किसान पुत्र के राज में उजड़ते गांव

  • विनय दीक्षित
भारतीय जनता पार्टी प्रायोजित किसान पुत्र शिवराज सिंह के शासनकाल में मध्यप्रदेश के गांवों की सही स्थिति कैसी है, यह बताने की जरूरत नहीं है। मुख्यमंत्री और सरकार लम्बे चौड़े दावे प्रचारित करते हैं कि सरकार ग्रामीण क्षेत्रों के विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। गांव में बिजली पानी सड़क स्कूल अस्पताल जैसी बुनियादी नागरिक सुविधाओं का मुकम्मल इंतजाम किया गया है और गांव में रोजगार के अवसर सुलभ कराये जा रहे हैं। सरकारी प्रदर्शनियों और मीडिया के विज्ञापनों में सरकार गांव की खुशहाल तस्वीर दिखाकर यह भ्रम पैदा कर रही है कि आज राज्य के गांव खुशहाल है और तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन सच छिपाये नहीं छिपता। सरकारी दस्तावेज़ बताते हैं कि मध्यप्रदेश में सैकड़ों की संख्या में छोटे-छोटे गांव उजाड़ वीरान होते जा रहे हैं। इन गांव में रहने वाले गरीब मजदूर और छोटे किसान, गांव में बुनियादी सुविधाओं के अभाव, खेती की बदहाली और रोजी रोटी के साधानों की कमी के कारण गांव छोड़ने पर मजबूर किए जा रहे हैं। इसके अलावा राजस्व ग्रामों से कहीं ज्यादा बुरी हालत इन वनग्रामों की है, जिन्हें कि राज्य सरकार के वन विभाग ने मनमाने तौर से 2006 के पहले अवैध और अतिक्रमण वाली बस्ती बताकर बल पूर्वक खाली करा दिया था वहाँ के निवासियों को घरवार, खेत, खलिहान और गांव छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया।
यह सर्व विदित है कि सन् 2006 में वनाधिकार (मान्यता) कानून का प्रारूप केन्द्र सरकार द्वारा प्रकाशित किए जाने के बाद और राज्य सरकार को भेजे जाने के बाद मध्यप्रदेश का वन विभाग वन भूमि बचाने के नाम पर कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो गया था क्योंकि यह कानून लागू होने के बाद वन भूमि पर कब्जाधारियों का अधिकार कानूनी रूप से वैधा हो जाता। शासन की यह मंशा तत्कालीन प्रमुख सचिव वन विभाग द्वारा नेता प्रतिपक्ष श्रीमती जमुना देवी को लिखे पत्र से साफ ज़ाहिर होती है। प्रमुख सचिव वन विभाग ने नेता प्रतिपक्ष के दिनांक 21 अगस्त 2007 के पत्र के संदर्भ में जवाब दिया है- ''मैं आपको अवगत कराना चाहूगी कि अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 अभी तक लागू नहीं हुआ है एवं न ही अंतिम रूप में बनाये गये नियमों का प्रकाशन हुआ है, जब तक केन्द्र शासन इस संबंध में अधिनियम लागू करने की अधिसूचना जारी न कर दे, वन भूमि से बेदखली की कार्यवाही रोका जाना वैधानिक नहीं होगा। वैसे भी वन विभाग के द्वारा सामान्यत: पुराने अतिक्रमण नहीं हटाये जा रहे है।'' इससे स्पष्ट है कि वनाधिकार मान्यता कानून के उद्देश्य की पूर्ति न करने की इच्छा से राज्य सरकार ने कानून लागू होने से पहले ही वनग्रामों को उजाड़ करने की कार्यवाही तेजी की थी वैसे भी भाजपा शासन के तीन वर्षों में वन भूमि पर काबिजों की बेदखली का अभियान जोरों से चलाया गया। ऐसे ही अभियान के दौरान पिछले वर्ष सागर जिले में आदिवासी वनवासियों ने अपना विरोध भी व्यक्त किया था, जिसे बल पूर्वक दबा दिया गया। गोंडवाना मुक्ति सेना और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के नेताओं के अलावा कई जनसंगठनों ने इस बारे में राज्य शासन से अपना विरोध व्यक्त करते हुए बेदखली की कार्यवाही रोकने की अपील की थी। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, नेता प्रतिपक्ष जमुना देवी ने वन भूमि के व्यवस्थापन और वन भूमि पर कब्जे को नियमित करने के मामले में शासन से लगातार पत्र व्यवहार किया है और बातचीत भी की है, लेकिन वनग्रामों और वनवासियों को उजाड़ने के लिए कृत संकल्प वन विभाग को मुख्यमंत्री ने खुला समर्थन दिया। इसी का नतीजा है कि कुछ महीनों में ही राज्य में सैकड़ों छोटे गांव और वनग्राम उजाड़ हो गये।
हम समवेत

2 comments:

Richa Joshi said...

मध्य प्रदेश में, कुछ महीनों में ही राज्य में सैकड़ों छोटे गांव और वनग्राम उजाड़े जाना शर्मनाक है। वैसे ये पूरे देश में ही हो रहा है। उत्तरांचल में भी वनवासी संकट है।

संगीता पुरी said...

मध्य प्रदेश में भी स्थिति इतनी बुरी है। मैं तो समझती थी कि सिर्फ हमारे इधर ही ऐसा हाल है। जाने क्या होगा देश का।