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चिरू रामाराव बनने की राह पर



  • कल्याणी शंकर

फिल्मी सितारे ऎसा क्यों सोचते हैं कि अगर उन्हें फिल्मों में सफलता मिल गई, तो वे राजनीति में भी सफल ही होंगेक् क्या इसीलिए तेलगु फिल्मों के प्रसिद्ध सितारे चिरंजीवी ने राजनीतिक पार्टी का गठन किया हैक् अपनी नवगठित पार्टी के कार्यालय का हैदराबाद में उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा कि पार्टी के नाम की घोषणा 26 अगस्त को तिरूपति में की जाएगी। वे आंध्रप्रदेश में एन। टी. रामाराव की तरह ही कुछ करने की आशा रखकर अगले चुनावों में वे कांग्रेस को सत्ता से बाहर करना चाहते हैं। एन. टी. रामाराव ने वर्ष 1982 में अपनी पार्टी गठित कर "आत्म गौरवम" के नारे पर नौ माह के अंदर सत्ता प्राप्त की थी। चिरंजीवी ने "सामाजिक न्याय" को अपना नारा बनाया है। वे अपने राजनीतिक कòरियर के लिए बहुत घ्यानपूर्वक योजना बना रहे हैं। इसके लिए उन्होंने फिल्मी परदे पर अपनी 30 वर्षो की छवि में सामाजिक जागरू कता का तत्व शामिल किया है।अपने लाखों प्रशंसकों के बीच "चिरू " के नाम से विख्यात 54- वर्षीय चिरंजीवी को क्या सफलता मिलेगीक् चिरंजीवी को अपने दिमाग में यह बात घ्यान रखनी चाहिए कि जब एन. टी. रामाराव ने तेलगु देशम पार्टी (टीडीपी) की स्थापना की थी, तब से लेकर अब तक स्थितियां काफी बदल चुकी हैं। इस बीच मुसी नदी (हैदराबाद) में बहुत पानी बह चुका है। जब एन. टी. रामाराव को कांग्रेस ने राज्यसभा की सीट देने से मना किया था, उन्होंने टीडीपी गठित की थी, लेकिन तब राज्य में राजनीतिक खालीपन था, क्योंकि कांग्रेस का कोई विकल्प लोगों के पास नहीं था। जब कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव राजीव गांधी 1982 में आंध्रप्रदेश आए, उन्होंने हवाई अड्डे पर मुख्यमंत्री टी. अंजैया को अपमानित किया था। रामाराव ने इस घटना का अपने राजनीतिक उद्भव के लिए चालाकीपूर्वक इस्तेमाल किया था। जल्द ही उन्हें राज्य के युवाओं और महिलाओं से अनपेक्षित समर्थन मिला जिन्होंने उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया। उन्हें वामपंथियों का समर्थन भी हासिल था। रामाराव की तुलना में चिरू को राज्य में पहले से ही स्थापित कांग्रेस और टीडीपी से मुकाबला करना पड़ेगा। अगर वे सत्ता में आना चाहते हैं, तो उन्हें अपने लिए कुछ सहयोगी दल जुटाने ही चाहिए। वर्तमान में वे केवल तीसरे विकल्प के रूप में देखे जा सकते हैं। इस सितारे को कौन सी बात ऎसा विश्वास दे रही हैक् पड़ोसी राज्य तमिलनाड़ु में अन्नाद्रमुक के संस्थापक एम. जी. रामचंद्रन पूजे जाते थे और बाद में उनकी उत्तराधिकारी जे. जयललिता भी दो बार भारी बहुमत के साथ सत्ता में आ चुकी हैं। हाल ही विजय कांत ने अपनी पार्टी गठित की है और कुछ वोट भी हासिल किए हैं। एक अन्य सितारे शरत कुमार भी इन दिनों राजनीति के छिछले तालाब में तैर रहे हैं। द्रमुक और अन्नाद्रमुक जैसी पार्टियों में कई फिल्मी हस्तियां शामिल हैं। कुछ भी हो लेकिन राजनीति में शामिल होने वाले सभी फिल्मी सितारों को सफलता नहीं मिली है। दिवंगत शिवाजी गणेशन जिनके पीछे लाखों प्रशंसकों की ताकत भी थी, हालांकि सांसद बने लेकिन कांग्रेस में बड़े पदों तक नहीं पहुंच पाए। ऎसे ही रेवती, लता और एस. एस. राजेन्द्रन भी कुछ खास छाप छोड़ने में कामयाब नहीं हो पाए। चिरंजीवी रामाराव के करिश्मे को दोहराना चाहते हैं। उनके पास उनकी जाति से जुड़े लाभों के अतिरिक्त नाम, प्रसिद्धि, प्रशंसकों का प्यार और धन जुटाने की क्षमता सभी कुछ है। रामाराव की ही तरह वे न केवल तिरूपति से चुनाव लड़ेंगे बल्कि अपनी पार्टी के नाम की घोषणा भी वहीं से करेंगे। रामाराव जहां अपने प्रामाणिक गुणों और बहादुर रवैये के कारण जाने जाते थे, वहीं चिरंजीवी नरम स्वभाव, सुलझे हुए और खतरों को टालने वाले व्यक्ति हैं। अपने इस नए काम के लिए धन जुटाने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी। देश-विदेश में बसे उनके प्रशंसक उनकी पार्टी के प्रचार कार्य के लिए धन देकर खुश होंगे। चिरू केवल अपनी फिल्मी छवि पर ही निर्भर नहीं कर रहे हैं, बल्कि जातिगत समीकरण पर भी भरोसा कर रहे हैं। चिरंजीवी असरदार कापु समुदाय के हैं, जो तटवर्ती पश्चिमी और पूर्वी गोदावरी जिलों में भारी संख्या में रहते हैं। वे दूसरे समुदायों से भी समर्थन जुटाने की आवश्यकता महसूस कर रहे हैं। कापु समुदाय को सत्ता में हिस्सेदारी की चिरंजीवी से काफी उम्मीदें हैं। वे उनका जोशपूर्वक समर्थन कर रहे हैं। अन्य समुदाय वैसे ही पहले से राज्य में रेड्डी-खम्मा समुदायों के वर्चस्व से उकता चुके हैं। राजनीति में चिरू के प्रवेश से टीडीपी और कांग्रेस जैसे अन्य प्रमुख दल हिल चुके हैं। हालांकि राज्य में किसी तरह की सत्ता-विरोधी लहर दिखाई नहीं दे रही है, लेकिन अनियंत्रित भ्रष्टाचार और अन्य पिछड़ा वर्ग की उपेक्षा का विचार बड़े पैमाने पर फैला हुआ है। विपक्षी पार्टियों के सरकार के खिलाफ विरोध पैदा करने के प्रयासों से सत्तासीन कांग्रेस सफलतापूर्वक निपट चुकी है। नए संगठनों में नेताओं का पलायन भी टीडीपी की समस्या है, अन्य किसी दल की नहीं। इसका यह मतलब कतई नहीं कि चिरंजीवी के संगठन से कांग्रेस को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वह उसे नुकसान पहुंचाने की इस फिल्मी सितारे की क्षमता से सावधान है। जब रामाराव ने तेलगुदेशम पार्टी गठित की थी, तब केन्द्र में सत्तासीन कांग्रेस ने उसे नुकसान पहुंचाने की उसकी ताकत को कमजोर आंकने की भूल की थी। कापु समुदाय परम्परागत रूप से कांग्रेस का मतदाता है, लेकिन चिरंजीवी के आने से इसमें बदलाव होगा। हाल ही उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को तीसरे मोर्चे की ओर से प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार बताने वाले टीडीपी प्रमुख चन्द्रबाबू नायडु और टीआरएस प्रमुख चन्द्रशेखर राव चिरू की पार्टी के आने की आहट से घबड़ाए हुए हैं। पृथक तेलंगाना के अपने वादे को पूरा नहीं कर पाने वाली टीआरएस अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए बसपा जैसे अन्य दलों की ओर देख रही है। टीडीपी सरकार- विरोधी लहर और ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं की शक्ति बढ़ाने पर निर्भर कर रही है। माकपा और भाकपा जैसी वामपंथी पार्टियों के प्रादेशिक नेता चिरंजीवी को अपनी राजनीतिक योजनाएं मजबूत करने के लिए बढ़ावा दे रहे हैं, जबकि उनके राष्ट्रीय नेता तीसरे मोर्चे की उनकी महत्वाकांक्षी योजना में भागीदार एन. चन्द्रबाबू नायडु के साथ बातचीत करते रहे हैं। क्या चिरंजीवी टीआरएस के साथ गठबंधन करने के लिए तैयार होकर वे आंध्रप्रदेश के तटीय इलाकों की सीटों के नुकसान को झेलेंगे जो पृथक तेलंगाना के खिलाफ हैक् अकेले कापु समुदाय अपने स्तर पर राजनीति में चिरंजीवी को सफलता नहीं दिलवा सकता। चिरू इस समुदाय के अतिरिक्त अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जातियों के एक वर्ग को मिलाकर जातिगत आधार पर एक इन्द्रधनुषीय संगठन बनाना चाहते हैं। उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती चिरू को पहले ही अपनी पार्टी बसपा में शामिल होने के संकेत भेज चुकी हैं। अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जातियों के कुछ समूह पहले ही चिरंजीवी को अपना समर्थन दे चुके हैं। इनके अलावा चिरंजीवी को नक्सली संगठनों की ओर से भी मदद और समर्थन का आश्वासन मिल चुका है जो तेलंगाना क्षेत्र में बहुत प्रभाव रखते हैं। चिरू को असल जिंदगी की अपनी इस भूमिका को निभाने के लिए बहुत सावधानीपूर्वक कदम उठाने होंगे। उनके पास राजनीतिक अनुभव की कमी है और वे अपने पारिवारिक सदस्यों से ही घिरे हुए हैं। उन्हें अपने प्रतिद्वंद्वियों को कमतर नहीं आंकना चाहिए जिनके पास अनुभव, पैसा और बचे रहने की पर्याप्त क्षमता है। हाल ही चिरंजीवी ने मीडिया के सामने कहा था कि "आशा करता हूं कि मैं 294 में से 225 सीटों पर जीत दर्ज करू ंगा और अपनी सरकार बनाऊंगा।" लेकिन क्या वे ऎसा कर पाएंगेक्कुछ भी हो लेकिन राजनीति में शामिल होने वाले सभी फिल्मी सितारों को सफलता नहीं मिली है। दिवंगत शिवाजी गणेशन जिनके पीछे लाखों प्रशंसकों की ताकत भी थी, हालांकि सांसद बने लेकिन कांग्रेस में बड़े पदों तक नहीं पहुंच पाए। ऎसे ही रेवती, लता और एस. एस. राजेन्द्रन भी कुछ खास छाप छोड़ने में कामयाब नहीं हो पाए

[लेखिका वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक हैं]

पत्रिका से साभार

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