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स्वच्छता वर्ष में भारत की भागीदारी

  • मिथिलेश कुमार
दुनिया भर में कम से कम 120 करोड़ लोग शौचालय सुविधा से वंचित हैं। इसमें सर्वाधिक संख्या भारत के लोगों की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ द्वारा संयुक्त रूप से किए गए अध्ययन रिपोर्ट में बताया गया है कि शौचालय का उपयोग न करने वाले लोगों के देशों की सूची में यह देश पहले नंबर पर है। निश्चित है कि इस तरह की रिपोर्ट में यह देश के लिए एक चुनौती है। सवाल है कि महाशक्ति बनने की राह पर चल रहा भारत इस तरह के मामले में अपनी छवि कैसे सुधारेगा? इसके लिए कौन से कदम उठाए जाएंगे?

भारत में करीब 66 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके लिए शौचालयकी कोई सुविधा नहीं है और उन्हें खुले में मलत्याग के लिए जाना पड़ता है। इसतरह भारत के आधे लोगों के पास शौचालय की सुविधा नहीं है। ऐसे में सवाल यह भी है कि इस बड़ी आबादी को शौचालय की सुविधा किस तरह से मुहैया कराई जा सकती है। भारत जैसी स्थिति और भी देशों में है। इस रिपोर्ट में भारत के बाद इंडोनेशिया, इथोपिया और पाकिस्तान का नंबर आता है। इंडोनेशिया में लगभग छह करोड़ साठ लाख लोग शौचालय की सुविधा से वंचित हैं, इथोपिया में यह संख्या पांच करोड़ बीस लाख है और पाकिस्तान में पांच करोड़ लोगों को शौच घर नसीब नहीं है। इसी तरह नाइजीरिया में भी दो करोड़ और ब्राजील तथा बांग्लादेश में एक करोड़ अस्सी लाख लोग खुली जगहों में शौच जाने के लिए बाध्य हैं। इन सबके लिए क्या संयुक्त राष्ट्र स्वच्छता अभियान के लिए और सहयोग नहीं दे सकता। यह ऐसा मुददा है जो हर किसी से जुड़ा है लेकिन इस तरफ ध्यान किसका है? जहां कहीं गंदगी नजर आती है लोग एक-दूसरे को कोसते हुए आगे निकल जाते हैं। देश के हजारों-लाखों की भीड़ वाले स्वयंसेवी संगठन भी इस दिशा में गिने-चुने ही हैं। उन्हें भी आगे आने और इस दिशा में चलाए जा रहे भारत सरकार के कार्यक्रमों में सहयोग करना होगा ताकि उसका लाभ उन वंचित लोगों तक पहुंच सके और भारत की छवि में सुधार हो सके।

राष्ट्र संघ की ओर से वर्ष 2008 को अंतरराष्ट्रीय स्वच्छता वर्ष घोषित किया गया है और इसी कड़ी में जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि यह बात स्वच्छता के लिहाज से सबसे जोखिम भरा कदम है। गंदगी और मल से पटे स्थान बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक होते हैं क्योंकि इनसे तुरंत दस्त फैलता है। गौरतलब यह भी है कि पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में मृत्यु का यह सबसे बड़ा कारण है। यूनिसेफ के कार्यकारी निदेशक ऐन एम वेनेमैन ने भी माना है कि स्थिति यदि ऐसे ही रही तो दुनिया अपने सहस्त्राब्दि वर्ष के स्वच्छता के लक्ष्य से 70 करोड़ लोगों की संख्या से पिछड़ जाएगी। ऐसे में क्या उपाय हैं, उन सब पर गौर किए जाने की जरूरत है।

ऐसा नहीं है कि खुले में शौच जाने की परंपरा ही वर्षों से रही है। प्राचीन काल में भी शौचालयों का उल्लेख मिलता है। इसका इतिहास हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की संस्कृतियों जितनी पुरानी है। मुगलकाल में अकबर के राजभवन के अलावा राजस्थान के गोलकुंडा में भी इसके अवशेष प्राप्त हुए हैं और आज के जमाने में भी इसका महत्व बढ़ गया है। प्रसिध्द गायिका जेनिफर लोपेज को उनके पूर्व प्रेमी एफ्लेक ने उनके जन्मदिन पर मंहगा शौचालय उपहार में दिया था। थाइलैंड में हाथियों के लिए विशिष्ट शौचालय बने हैं। पेरिस में घरेलू कुत्ते, बिल्लियों के लिए भी शौचालय बनाए गए हैं। यह तो विश्व के तमाम उदाहरण भर है। भारत सरकार जानवरों के लिए तो नहीं लोगों के लिए ही कुछ सुविधाएं मुहैया करा दे तो उसका नाम उल्लेखनीय हो जाएगा।

यह जरूर है कि भारत में इस दिशा में काम करने वाले इने-गिने संस्थानों में सुलभ इंटरनेशनल का नाम आता है। इसने देशभर में सुलभ शौचालय कॉम्पलेक्स बनाए हैं लेकिन इसकी जरूरत वहां भी है जहां लोग खुले में सड़कों के किनारे, रेल पटरियों पर मलत्याग के लिए जाते हैं। क्या यह संस्थान उन क्षेत्रों को चिन्हित कर इस दिशा में काम करेगा? सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिदेश्वरी पाठक कहना है कि इस विषय पर कोई बात नहीं करना चाहता और इस काम में लगे लोगों को हीनभावना से देखा जाता है। शौचालय की सुविधा से वंचित लोगों की संख्या भारत में सर्वाधिक है जाहिर है भारत को स्वच्छता की दिशा में काफी प्रयास करने की जरूरत है तभी सहस्त्राब्दी लक्ष्य को पाया जा सकता है और वंचितों के आंकड़ों में कमी आ सकती है।
पश्चिमी एशिया के कुछ देशों ने वाकई इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। उन्होंने स्वच्छता सेवाओं में 84 प्रतिशत तक का सुधार किया है लेकिन नाइजर, चाड और घाना ने 10 प्रतिशत से भी कम सुधार किए हैं। जिन देशों ने में अभी तेजी से सुधार की दरकार है उनमें म्यामार, अरब रिपब्लिक, वियतनाम, ग्वातेमाला, फिलीपींस, अंगोला, पाकिस्तान और मैक्सिको जैसे गरीब देश शामिल हैं। भारत की स्थिति में अभी और सुधार की दरकार है तभी वह एशिया के इस आंकड़े को संतुलित करने में अपनी भागीदारी निभा सकेगा।
हम समवेत

1 comment:

Rama said...

स्वच्छता विकास की आधारशिला है और इसमें शौचालय अहम भूमिका निभाता है. भारत में प्रयास शुरू हैं और मध्यप्रदेश में तो समग्र स्वच्छता अभियान ही चल रहा है लेकिन हकीकत यह है कि खानापूर्ति और अधिकारियों की कमाई का जरिया बन कर रह गया है यह अभियान. इसके लिये जरूरी है कि लोग जागरूक हों.