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कौन हैं राजगुरु.. याद नहीं



  • हजारी लाल

अफसोस है जिस शख्स ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम देश को गुलामी की बेड़ियों से आजाद करवाया आज उसी को सभी ने भूला दिया।
अमर शहीद भगत सिंह के साथ कंधे से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता आंदोलन में प्राणों की आहुति देने वाले शहीद राजगुरु का जन्म शताब्दी समारोह रविवार को अंधेरे में गुजर गया। न तो किसी राजनीतिक दल को इनकी याद आई और न ही प्रशासन को। नतीजतन शहीद के सौवें जन्मदिवस पर किसी ने श्रद्धा के दो फूल चढ़ाने की भी जहमत नहीं उठाई।
हालांकि नौ दिन पहले ही आजादी दिवस पर देश के नेताओं व प्रशासनिक अधिकारियों ने शहीदों की कुर्बानियों को हमेशा याद रखने और उनके पद चिन्हों पर चलने की कसमें खाई लेकिन उनके ये वादे-कसमें बच्चों की तरह खेल-खेल में किए गए वादों की तरह टूट गए। विडंबना देखिए कि जन्मशताब्दी मनाने के लिए प्रशासनिक अधिकारी सरकार के पत्र का इंतजार करते रहे। जबकि सत्ता के नशे में चूर नेता राजनीतिक गलियारों में अपने खेल में उलझे रहे। कुछ दिन पहले शहीद भगत सिंह की प्रतिमा संसद में लगाए जाने को लेकर शोर-शराब कर रही बादल सरकार को उनके साथी राजगुरु की शहादत याद न रही है। नेताओं के इस भेदभाव से जहां क्षेत्रवाद की बू आती है वहीं महाराष्ट्र में जन्मे राजगुरु को प्रदेश भर में कहीं याद न करना शहीदों का घोर अपमान है।
इस संबंध में जब होशियारपुर के डीसी एन के वधावन ने बातचीत की गई तो उन्होंने कहा कि वह शहीद राजगुरु को नतमस्तक करते है। उन्हें इस संबंध में समारोह आयोजित करने संबंधी सरकार की तरफ से कोई पत्र नहीं आया था। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि शहीद सभी के लिए सम्माननीय है। जबकि फिरोजपुर के डीसी ने व्यक्तिगत तौर पर अफसोस जाहिर करते कहा कि वह बाढ़ के काम में इस तरह उलझे कि उन्हें याद ही नहीं रहा।
गौरतलब है कि शहीद राजगुरु का जन्म 24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र प्रदेश में हुआ था। वे देश को आजाद करवाने के लिए मात्र 22 साल, सात महीने, छह दिन की आयु में शहीद भगत सिंह व सुखदेव थापर के साथ फांसी के फंदे को हंसते-हंसते चूम लिया था। इतिहास गवाह है कि पिछले 61 वर्षो से सरकारी तंत्र शहीद भगत सिंह, शहीद सुखदेव व शहीद राजगुरु की याद में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री व तमाम मंत्री व प्रशासनिक अधिकारी हर साल हुसैनीवाला में शहीदों को प्रणाम करते जाते है और उन्हे न भूलने की कसमें खाते है। मगर वही शहीद राजगुरु की जन्म शताब्दी को मनाना ही भूल गए। किसी को ख्याल ही नहीं रहा कि शहीद राजगुरु की जन्म शताब्दी है।
कुछ याद उन्हे भी कर लो..
होशियारपुर जिले में न तो सरकारी तौर पर उनकी याद में कोई समारोह हुआ और न ही खुद को समाज का ठेकेदार कहलाने वालों को उनकी याद आई। इससे खफा होकर नाटककार अशोक पुरी ने अपनी टीम के कलाकार तिलक राज राजू, मनजीत सिंह, भूपिंदर पधियानवी, लाडी डडियाना के साथ यहां पर नुक्कड़ नाटक कर सरकार व प्रशासन की उदासीनता को उजागर किया। कलाकारों ने कटाक्ष किया कि बड़े अफसोस की बात है कि खून बहाकर आजादी दिलाने वाले सपूत को यह भूल गए।

जागरण

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