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सच हुआ प्रीति का सपना

  • मुकुल श्रीवास्तव
जब मैं वक़्त की गर्दिश में बिखर जाऊँ
जब मैं ख़ुद को ख़ुद से ही दूर पाऊं
तुम साथ निभाने आना
मुझसे दूर न जाना मेरी माँ...
ये प्रीति के पहले संगीत एलबम के गाने की पंक्तियाँ हैं. प्रीति एक आम हिंदुस्तानी लड़की है जो सपने देखती है और उन्हें पूरा करना चाहती है.
लेकिन प्रीति उन आम हिंदुस्तानी लड़कियों की तरह ख़ुशकिस्मत नहीं है जिनको बचपन से अपने माता-पिता का प्यार और साथ मिलता है,जिनके अभिवावक अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने जाते हैं, गर्मी की छुटियों में घुमाने ले जाते हैं. बच्चे रूठ जाते हैं तो उन्हें मनाते भी हैं.
प्रीति के जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, फिर भी वह ख़ास है.
प्रीति जब महज़ पाँच साल की थी तब उसकी माँ ने उसे लखनऊ के एक बाल गृह में छोड़ दिया था.
पॉँच साल की इस मासूम बच्ची ने ज़िंदगी की इस कड़वी सच्चाई को स्वीकारा और हालात से समझौता करने के बजाय उनसे दो-दो हाथ करने का फ़ैसला किया.
प्रीति के हौसले और प्रतिभा का नतीजा है उसके गानों का यह पहला एलबम, जो जल्द ही रिलीज़ होने जा रहा है. प्रीति के इस एलबम के तीन गानों की रिकॉर्डिंग हो चुकी है.
इस एलबम को उसने अपनी मां को समर्पित किया है जिसका धुंधला चेहरा उसकी यादों मैं कहीं आज भी बसा है और जिसकी याद उसकी आंखों को नम कर जाती है।

प्रीति ने होश संभालते ही यह बात अच्छी तरह समझ लिया था कि वो एक ऐसी जगह है जहाँ से एक बेहतर भविष्य का सपना नहीं देखा जा सकता.
ये बात उसे अक्सर कचोटती भी थी. अपना दर्द हल्का करने के लिए वह कुछ गुनगुना लिया करती थी. उसके गाने का यह शौक परवान चढ़ा उसी बालगृह में जहाँ स्कूल से लौटने के बाद संगीत सिखाने की भी व्यवस्था थी. बालगृह में ही उसने थोड़ा बहुत संगीत सीखा.
प्रीति ने कक्षा छह से 12 तक संगीत की पढ़ाई एक विषय के रूप में की है.
कहते हैं कि गाना गले से नहीं, दिल से गाया जाता है और जब प्रीति गाती है तो उसकी आवाज़ आत्मा तक उतर जाती है.
कम बोलने और गुमसुम सी रहनी वाली प्रीति को कभी यह भरोसा नहीं था कि वो गा सकती है लेकिन जब लखनऊ के स्थानीय प्रतिभा खोज कार्यक्रम में एक स्थानीय निवासी ने उसका गाना सुना तो उन्हें लगा कि प्रीति के पास प्रतिभा है और इसे आगे लाने की ज़रुरत है.
उनका प्रयास रंग लाया और मदद के कई हाथ आगे आए जिसका नतीजा है यह एलबम जिसके कुछ गाने लखनऊ के मशहूर इतिहासकार और गीतकार योगेश प्रवीण ने लिखें हैं.
माइक्रो फ़ोन के सामने खड़े होकर गाने को प्रीति अदभुत अनुभव मानती है।

संगीत शिक्षिका मंजुला पाण्डेय कहती हैं कि प्रीति को रियाज़ की बहुत ज़रूरत है.
प्रीति को रियाज़ का मौका ज़्यादा नहीं मिल पाता. पढ़ाई के बाद जो वक्त मिलता है उसमें बाल गृह के नियमानुसार वहां के काम भी उसे करने पड़ते हैं. लेकिन प्रीति का जज़्बा और जुनून है कि कपड़े धोते वक्त या खाना बनाते वक्त वह रियाज़ करती है.
प्रीति कहती है कि उसे लता मंगेशकर और सोनू निगम की आवाज़ बहुत पसंद है. संगीत को अपना सब कुछ मानने वाली प्रीति संगीत के क्षेत्र में ही अपना भविष्य सवाँरना चाहती है जिससे वो अपने जैसे बच्चों के लिए कुछ कर सके.
सबके दर्द को अपना मानने वाली प्रीति कहती है कि ये बालगृह एक परिवार है यहाँ किसी को कुछ भी होता है तो दुःख सबको होता है.
प्रीति ग्रेजूएशन के पहले वर्ष में पढ़ती है। अपने दिल में माँ से मिल पाने की ख़्वाहिश और कुछ कर दिखने का जज़्बा ही है जो प्रीति को हालात से लड़ने की ताक़त देता है. वह कहती है कि उसका संघर्ष अभी जारी है.

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम

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