Saturday

कुत्ते से करवाया गया कैदी का रेप

जुल्म की इंतहा, जिसे सुनकर पत्थर दिल भी कांप जाए। लीबिया की जेल में बंद रहे फलस्तीनी मूल के एक डॉक्टर ने अपने साथ किए गए भयावह टॉर्चर की जो कहानी कोर्ट के सामने पेश की, वह दुनिया में मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ने की गवाह है। कई बच्चों में एड्स फैलाने के आरोप में बंद डॉक्टर अशरफ अल-हजूज को अन्य भयानक पीड़ाएं तो दी ही गईं, उनका एक जर्मन शेफर्ड कुत्ते से रेप भी करवाया गया। हजूज के निर्ममतापूर्वक नाखून उखाड़े गए। उन्हें बिजली के शॉक भी दिए जाते थे। हजूज को आठ साल से भी ज़्यादा समय तक बुल्गारिया की पांच नर्सेस के साथ लीबिया की एक जेल में रखा गया था। इनमें से ज़्यादातर को मौत की सज़ा सुना दी गई थी। इन लोगों पर आरोप था कि इन्होंने 438 बच्चों को एड्स-संक्रमित खून चढ़ाकर उनमें यह बीमारी फैलाई। हजूज ने खुद को बेकसूर बताते हुए जज से कहा कि मैंने अपने ऊपर किए जा रहे टॉर्चर के चलते मान लिया कि मैंने बच्चों में एड्स फैलाए और सीआईए (अमेरिकी खुफिया एजंसी) और मोसाद (इसराइली खुफिया एजंसी) के साथ सहयोग किया। डर इतना था कि मैं कुछ भी मानने को तैयार था। यह तब हुआ, जब मेरे साथ कुत्ते वाला प्रकरण हो चुका था। इन छहों कैदियों पर टूटे सितम के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी प्रतिक्रिया हुई जिसकी वजह से लीबिया को इनकी मौत की सज़ा को उम्रकैद में तब्दील करना पड़ा। फ्रांस की पूर्व प्रथम महिला सेसिलिया सार्कोज़ी व अन्य की कोशिशों से आखिरकार इन छहों की दोज़ख की ज़िंदगी का अंत हुआ और जुलाई 2007 में ये छूटकर घर लौटे। हजूज ने यह भी कहा कि टॉर्चर के दौरान मेरी आंखों पर पट्टी बांध दी जाती थी। जेल में बिताए शुरुआती दिनों में मेरे साथ टॉर्चर ज़्यादा हुआ। मैं उस वक्त भी मौजूद रहता था बाकी कैदियों को यातना दी जाती थी। ये सभी छूटकर बुल्गारिया लौट आए।

5 comments:

pallavi trivedi said...

उफ़...सोचकर ही रूह कांप जाती है!

Lovely kumari said...

ye kaoun sa tarika hai dand dene ka ..kya wahan manawadhika aayog nahi hota?

nic_rikk said...

firangi saale....

Avinash Meena said...

manav adhikar kar aayog kya jhak marr raha tha...........

Umra Quaidi said...

लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

http://umraquaidi.blogspot.com/

उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
“उम्र कैदी”