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ये अंगोछा-छाप नेता !

  • राजेन्द्र जोशी
जनस्वास्थ्य के लिए खतरा हैं झोला छाप डॉक्टर और प्रजातंत्र के लिए खतरा बने अंगोछा छाप नेता। जिस तरह न डिग्री, न डिप्लोमा, झोले में भरी जड़ी बूटी और दवाइयाँ, लटका लिए कांधो पर झोले और बन गये डॉक्टर। ठीक उसी तरह न नैतिकता, न सिध्दांत, न जनसेवा की भावना, न देश के प्रति प्रेम गले में ढांक लिया रंग-बिरंगा अंगोछा और बन गये नेता। झोला छाप डॉक्टर ने किसी रोगी का उपचार किया तो उस रोगी के जीवन का अंतिम प्रहर होता है ठीक उसी तरह अंगोछा-छाप नेताओं ने जहाँ भी अपनी कारस्तानी शुरू की तो समझ लेना उस रंग वाले झंडे की पार्टी का सत्यानाश ही होकर रहता है, जिस रंग में ये नेता अपना अंगोछा रंग लेते हैं।
गाँव-गाँव में शहर-शहर में खूब फैल गये हैं जैसे नीम हकीम डॉक्टर और ऐसे ही फैल गये है हुड़दंगबाज अंगोछा छाप नेता । आम सभाओं में, जलसों में जुलूसों में, उत्सवों में, पर्वों में, सड़कों पर बाजारों में, रेलों में, बसों में, हर जगह दिख जायेंगे ये अंगोछा छाप नेता। न ये मंत्री हैं, न विधायक हैं, पंच हैं, न सरपंच, न सहकारिता के चुनाव लड़े, न मुहल्ला कमेटी में। फिर भी ये नेता हैं, ये नेता क्यों हैं, किसने बनाया, काहें के लिए बनाया यह मामला अब गोपनीय नहीं रहा। सब कुछ खुलकर मैदान में आ गया। हकीकत सामने आ गई। जिनके पास कल तक पजामा-कमीज की सिलाई के पैसे नहीं थे। सिलाई मांगने के लिए दर्जी चक्कर लगाया करते थे, वे आज गले में अंगोछा डालकर जन-जन के भाग्य विधााता बनने की दौड़ में शामिल हो गये हैं।
किसको ज़रूरत है, इन अंगोछा छाप नेताओं की ! क्या देश को क्या समाज को, क्या सरकार को या खुद उनको। नहीं इनमें से किसी को इनकी जरूरत नहीं हैं। इनकी तो जरूरत पड़ती है, कतिपय बड़ी-बड़ी राजनैतिक पार्टियों के उन खूंखार इरादों वाले राजनेताओं को, जो धानबल और बाहुबल के दम पर सत्ता, संगठन और समाज में अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहते हैं। इनकी जरूरत हैं उन रहनुमाओं को जिनमें न तो क्षमता होती है सत्ता-संचालन की और न ही होती है भावना समाज सेवा की। इन अंगोछा छाप नेताओं का उपयोग तो होता है बर्र के छत्ते की तरह। मधुमक्खी पालने के व्यवसाय की तरह। कतिपय राजनेताओं और राजनैतिक पार्टियों द्वारा मधुमक्खी की तरह इनको पाला जाता है और समय-समय पर उन्हें उड़ा दिया जाता है जलसों, समारोहों और भीड़ में भगदड़ मचाने के लिए। जिस तरह मधुमक्खियाँ नहीं जानती कि वे क्या कर रही हैं, किसके बदन से लिपट रही है, किस किस को काट रही है या फिर किस तरह के आयोजन में घुस रही है। जब मधुमक्खियां उड़कर हुड़दंग मचवाना ही है तो फिर यह नहीं देखा जाता कि इसमें कौन प्रवाहित हो रहा है और उसे कितना नुकसान पहुंच रहा है। अंगोछा-छाप नेताओं का उपयोग अपनी राजनीति की धााक जमाने के लिए अति उत्तम सिध्द हो रहा है। जिस राजनैतिक पार्टी ने इन्हें अंगोछे वितरित किए है, उनके लिए ये नेता जमीन तैयार करने में खाद और बीज का काम करते हैं। जितना ज्यादा ये खाद-बीज का उपयोग करेंगे उसी के अनुसार ये लहलहाती फसलों का ख्वाब देखने लगते हैं।
आज का युग बाजारवाद का युग है। बाजार का भी खूब दिमाग चलता है। जहाँ उसे जरा सी गुंजाइश दिखती है, बाजार फट से बीच में कूद पड़ता है। राजनीति के इस 'मधुमक्खी-युध्द' में भी बाजार की पौ बारह हो रही है। दूकानों में खूब अंगोछे बिक रहे हैं। बजार कुर्ता पाजामा के कपड़ों के थान के थान बेचने में व्यस्त है और दर्जी की सिलाई मशीन की 12 बजे रात तक भी आवाज बंद नहीं होती है। खूब नाप लिए रहे हैं। कपड़ा बाजार की चांदी हो रही है। पहले भी थी, अब भी है। पहले टोपियों के कपड़े बिकते थे, टोपियां सिलती थी, अब अंगोछे के कपड़े बिक रहे हैं, अंगोछे की किनारे प्रिंट हो रही हैं।
अंगोछा छाप नेताओं की आई बाढ़ को देखकर पहले आम जनता आश्चर्य करती थी। सोचती थी-आज देश में हर आदमी नेता बन रहा है, सेवा के क्षेत्र में उतर रहा है, देश सचमुच आगे बढ़ रहा है, विकास होगा और खूब जमकर विकास होगा। नेताओं में देशप्रेम की भावना का ज्वार उमड़ पड़ा है। अब इन अंगोछाधारी नेताओं की बढ़ती फौज की हकीकत छुप नहीं रही है। जनता समझ गई है। ये अंगोछाधारी फौज न जाने कब कहा एकदम से हमला बोल देगी। पर्व, उत्सव, त्यौहार और यहाँ तक कि निजी-पारिवारिक और शादी-ब्याह के समारोह भी सुरक्षित नहीं रहे। कभी भी अंगोछाधारियों की फौज कही भी घुसकर किसी का भी खाना खराब करने में देर नहीं लगाती है।
लोग नववर्ष की पार्टियां मनाते है। दुनियादारी से दूर रहकर नाचते हैं, गाते हैं, मौज-मस्ती करते हैं। युवा प्रेमी जन वेलेन्टाइन डे मनाते हैं, फिल्मी नाइटें होती हैं, होटलों में व्यंजन समारोह होते हैं। ऐसे आयोजनों में ये अंगोछाधारी नेता भी घुस घुसकर अपनी ही तरह का जश्न मनाते हैं पर इनके जश्न मनाने का तरीका वो नहीं होता जो सबका होता है। इन अवसरों पर वे भी खूब धींगामस्ती करते हैं, हुड़दंग मचाते हैं और आयोजनों में विघ्न डालते हैं। उत्साहपूर्वक जश्नों और जलसों में शामिल होकर अपनी वह भूमिका निभाते हैं जो उन्हें अपनी राजनैतिक पार्टी के रिंग मास्टरों द्वारा दी जाती है। जब आम चुनाव आने लगते हैं, अंगोछाधारियों की पूछ परख बढ़ने लगती है। मतदान केन्द्र बनते हैं उनकी देखरेख के लिए राजनैतिक पार्टियां इनको जवाबदारियां सौंपती हैं। ट्रेनिंग देती हैं कैसे मतदाता को मतदान केन्द्र तक लाया जाय और किस बटन को दबाने के लिए मतदाता को कैसे भयग्रस्त कर दिया जाय। मतदाताओं में सभी मतदाता साहसी, पराक्रमी और चतुर नहीं होते। बेचारे दब जाते हैं। जो नहीं दब पाते, न दबे, फर्क नहीं पड़ता। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को उठाकर ले जाना भी इन्हें आता है।
भले ही आपके काम के, समाज के काम के और देश के काम के लिए इन अंगोछा छाप नेताओं की जरूरत न हों उनकी बला से। उनकी तो जरूरत है उन राजनैतिक दलों को जो भीड़ में भगदड़ मचवाकर, धाधाक रही नैतिकता की आंच में तवा चढ़ाकर अपनी रोटी सेंकने में सिध्दहस्त हो गये हैं। बढ़ती बेरोजगारी की अब किसी को चिंता कतई नहीं करना चाहिए। भले ही नौकरियां न हो सरकारों में, भले ही वेकेंसी न हो टाटा, बिड़ला, अंबानी, मित्तल की कंपनियों में राजनीति के बाजार में आज भी जरूरत है हुड़दंग मचाने के लिए सब तरफ से धाकियाये कहे जवानों की। कुछ नहीं करना है आपको, डिग्री या डिप्लोमा हो न हो आपके पास में। आपको तो सामने जाकर खड़ा हो जाना है। अंगोछा तो डाल ही देंगे कांधो पर अपनी राजनीति कराने वाले।
हम समवेत

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