Total Pageviews

Tuesday

रेत में, रेत से,घर

  • मंतोष कुमार सिंह
सुनहरी यादों के
कुछ कंकड़
कुछ पत्थर
चुनकर बनाता हूं
एक घर
खड़ा करता हूं
उसका ढांचा
मेरा घर
जो अक्सर झूलता है
भावनाओं के झूले में
भावनाओं को
मूतॅ रूप देना
कितना किठना है
अभाओं से जुझते
इस मरूभूमि में
यादों से बाहर आकर
बार-बार हटाता हूं
रेत के ढेर को
अपने हाथों से
सोचता हूं
कैसे बन सकता है
रेत में
रेत से
घर

6 comments:

कामोद Kaamod said...

कैसे बन सकता है
रेत में
रेत से
घर

बहुत कुछ सीख लिया आपसे ..
बहुत बढिया..

MANVINDER BHIMBER said...

आपने बहुत अच्छा लिखा है....इसमे सच्चाई भी है...

pallavi trivedi said...

bahut sundar likh hai...shaili kaafi achchi hai aapki.

संगीता पुरी said...

बहुत ही अच्छा लिखा है।

venus kesari said...

पढ़ कर अच्छा लगा
अच्छी कविता है
कवि ने जो कहना चाहा वो स्पष्ट है


-----------------------------------
यदि कोई भी ग़ज़ल लेखन विधि को सीखना चाहता है तो यहाँ जाए

वीनस केसरी

सचिन मिश्रा said...

Bahut khub.