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अभिशाप का दोषी कौन

  • हिमवंत
कोसी को बांधने की कोशिश खतरनाक पोस्ट पर हिमवंत जी ने आपनी बात बहुत ही शानदार तरीके से रखी है उनकी टिप्पणी उसी रूप में पोस्ट कर रहा हू

काम का विशेषज्ञ वो है जो ईस अभिशाप को वरदान मे बदलने की तरकीब बताए। जल संशाधन हमारे लिए वरदान है, लेकिन आज यह अभिशाप बना हुआ है। कौन है दोषी इसके लिए? जब भी जल संशाधनो के व्यवस्थापन की बात चलती है, नेपाल के छद्म राष्ट्रवादी और भारत मे मेघा पाटकर सरीखे लोग विरोध शुरु कर देते है। भारत में अटल जी के समय बाढ की समस्या से छुटकारा पाने के लिए नदीयों को जोडने की बात चली थी तो मेघा पाटकर नेपाल पहुंच गई और लोगो को भारत की योजना के विरुद्ध भडकाने लगी। नेपाल मे भारत जब भी तटबन्ध निर्माण या मरम्मत की कोशिश करता है तो नेपाल मे भारत विरोधी ईसे नेपाल की राष्ट्रिय अस्मिता से जोड कर अंनर्गल दुष्प्रचार शुरु कर देते है। नेपाल मे भारत द्वारा तटबन्ध के मरम्मत मे अडचन एवम असहयोग भी प्रमुख कारक रहा है तराई की इस त्रासदी के लिए। नेपाल मे तटबन्धो मे पत्थरो को बांधने वाले गैबिन वायर (तार) तक चुरा लिए गए थे। नेपाल सरकार तटबन्धो की सुरक्षा के प्रति गम्भीर नही थी। तटबन्ध के टुटने के कई कारणो मे पत्थरो को बांधने वाले तारो की चोरी भी प्रमुख कारण है। जो भी हो, कोशी के इस कहर से सब को सबक लेना जरुरी है। भारत और नेपाल के बीच जल सन्धि को मजबुत किया जाना चाहिए। जल संशाधनो के विकास मे अविश्वास के वातावरण को समाप्त किया जाना चाहिए। नेपाल के नव निर्वाचित प्रधानमंत्री प्रचण्ड ने बिना सोचे समझे कोशी नदी के सम्झौते को एतिहासिक भुल तक कह डाला, एसे बयानो से अविश्वास बढेगा यो दोनो देशो के लिए प्रत्युपादक है। काठमांडौ मे भारत के राजदुत हर महिने नेपाल के प्रधानमंत्री से मिलते थे, लेकिन कोशी के तटबन्ध की सुरक्षा उनकी प्राथमिकता मे नही होती थी। वे तो महारानी सोनिया को खुश करने के लिए प्रधानमंत्री को ईस बात के लिए मनाते है की हिन्दु राष्ट्र समाप्त कर धर्म निर्पेक्ष बनाया जाए नेपाल को। नेपाल मे भारत के राजनयिको को राजनैतिक गतिविधियो की बजाए जन सरोकार के विषयों मे अधिक ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

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