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झीलों के शहर के प्यासे लोग

  • मंतोष कुमार सिंह

भोपाल यानी झीलों की नगरी। अगर यहां के लोग भी प्यासे रहने लगें तो इसे गंभीर चुनौती के रूप में देखा जाना चाहिए। जी हां भोपालवासी, पानी की एक-एक बूंद के लिए अभी से जद्दोजहद करने लगे हैं। अल्पवर्षा के कारण भोपाल की जीवन रेखा कहे जाने वाली बड़ी झील की प्यास नहीं बुझ पाई है। झील में केवल दो माह का पानी बचा है। जिसके कारण सरकार ने अगले साल मानसून आने तक लोगों की प्यास बुझाने के लिए एक दिन छोड़कर पानी सप्लाई करने का फैसला किया है।
पानी की समस्या के लिए प्रशासन, प्रकृति और भोपालवासी सभी जिम्मेदार हैं। इस प्रकार की समस्या १९८९ और २००२ में भी आ चुकी है, जब एक दिन छोड़कर पानी की सप्लाई करनी पड़ी थी। इसके बावजूद भी किसी ने सबक नहीं लिया। समस्या के निजाद के लिए कोई भी कारगर कदम नहीं उठाए गए। आज भी भोपाल में ४३ प्रतिशत पानी बेकार चला जाता है, जिसपर नगर निगम लगाम नहीं लगा सका है। अगर मात्र बेकार बह जाने वाले पानी पर ही रोक लग जाए तो ऐसी नौबत नहीं आती, लेकिन कौन जहमत उठाए। नर्मदा नदी जल योजना भी कछुवे की चाल चल रही है। कुल मिलाकर यहां के बाशिंदों से जल ही जीवन है का मतलब पूछा जाए तो वे बेहतर तरीके से बता सकते हैं।

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