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अरविंद अडिगा पर है देश को नाज

बुकर पुरस्कार विजेता अरविंद अडिगा की उपलब्धि पर पूर देश को गर्व है। अडिगा कहते है कि अपने उपन्यास व्हाइट टाइगर के जरिए मैं देश की गरीब जनता के दुख-तकलीफ और भावनाओं को चित्रित करना चाहता था। जिस भारत को मैं जानता हूं, जिस भारत में मैं रहता हूं, उस भारत को मैंने अपने उपन्यास में पेश किया है। वह इस बात से इंकार करते है कि अपने उपन्यास में उन्होंने भारतीय समाज की आलोचना की है। अडिगा कहते है कि मैं गरीबी और अन्य सामाजिक विषमताओं की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहता था, लेकिन पाठकों को बांधे रखना भी मेरा उद्देश्य था। मुझे ऐसी पुस्तकें पसंद है, जो पाठकों की चेतना को प्रभावित कर सकें।
अडिगा के अनुसार जल्द ही पाठकों को उनका अगला उपन्यास पढ़ने का मौका मिलेगा। उनका अगला उपन्यास प्रकाशन के लिए बिल्कुल तैयार है। वह यह कहने में संकोच नहीं करते कि मैं उन लोगों के बारे में लिखना चाहता हूं, जिनके बारे में कभी लिखा नहीं गया।
[यूं लिखा पहला उपन्यास]
अडिगा बताते है कि द व्हाइट टाइगर उपन्यास मैंने टुकड़ों में लिखा था। वर्ष 2005 में मैंने उपन्यास का पहला भाग लिखा और उसे अलग रख दिया। दरअसल मैं स्वयं को ही नहीं समझ पा रहा था। विदेश में लंबा समय बिताने के बाद दिसंबर 2006 में जब मैं भारत लौटा, तो मैंने उपन्यास का प्रथम भाग खोला और उसे दोबारा नए सिरे से लिखना आरंभ किया। इस बार मैंने उपन्यास पूरा करके ही विश्राम लिया। जनवरी 2007 में मेरा उपन्यास पूर्ण हुआ।
[लेखन पर प्रभाव]
अडिगा कहते है कि मुझे लगता है कि मेरे प्रथम उपन्यास लेखन पर तीन अश्वेत अमेरिकी लेखकों राल्फ एलीसन, जेम्स बाल्डविन एवं रिचर्ड राइट का प्रभाव पड़ा है। हालंकि मैंने सालों से उनके कोई उपन्यास नहीं पढ़े। करीब दस साल पहले मैंने एलीसन का उपन्यास इनविजीबिल मैन पढ़ा था। यह उपन्यास मैंने दोबारा कभी नहीं पढ़ा, पर मुझे लगता है कि अप्रत्यक्ष रूप से उनका प्रभाव मेर लेखन पर पड़ा है। वैसे मैं किसी पहचान से बंधा नहीं हूं।
जागरण

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