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अज्ञात रावण

चित्रा मुद्गल
पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन, सामाजिक कार्यो में सहभागिता और अस्वस्थता के चलते नियमित रूप से साहित्यिक रचनाओं को पढ़ने का समय तो नहीं निकाल पाती हूं, फिर भी यथासंभव प्रयास करती हूं कि निश्चय 'शिड्यूल' बनाकर ही किसी रचना को पढ़ा जाए। पिछले दिनों भोपाल यात्रा के दौरान कुंवर नारायण की काव्य कृति 'वाजश्रवा के बहाने' पढ़ने का मौका मिला। उनकी यह विलक्षण रचना है। मैं इसे समकालीन हिंदी काव्य की उपलब्धि मानती हूं। इसमें नचिकेता की वापसी के बहाने, परिस्थितिजन्य विषमताओं और आंतरिक द्वंद्वों को नई संवेदनाओं के माध्यम से देखने की कोशिश की गई है। मुझे लगता है कि कुंवर जी के कविता लेखन की पराकाष्ठा है।
हाल में ही दिवंगत हुए पटकथा लेखक और कवि शब्द कुमार द्वारा रचित काव्य नाटक, 'अज्ञात रावण' अपनी तरह की विशिष्ट रचना है। इसमें रावण के उस व्यक्तित्व को नए ढंग से हमारे सम्मुख प्रस्तुत किया गया है जिसे सामान्यत: स्वीकार नहीं किया जाता है। मैं इसे 'अंधा युग' के समतुल्य कृति मानती हूं। हिंदी भाषा में लिखने वाले किसी भी मुस्लिम लेखक का अपने समय के साथ एक बहुआयामी जुड़ाव बहुत कम देखने को मिलता है, इस कमी को काफी हद तक दूर करते हुए मुशर्रफ आलम जौकी ने 'शाही गुलदान' कहानी लिखी है। इसमें गुजरात दंगों के माध्यम से वहां रहने वाले आम मुस्लिमों की दशा को एक मनुष्य के रूप में महसूस किया गया है। इसे पढ़कर मंटो की कहानी 'टोबा टेक सिंह' की याद आ गई। इसी तरह एक साध्वी के माध्यम से जैन समाज में व्याप्त धार्मिक कठमुल्लेपन का बेधड़क खुलासा करते हुए मधु कांकरिया ने 'सेज पर संस्कृत' उपन्यास लिखा है। मधु ने पूरी हिम्मत के साथ धार्मिक आडंबरों के व्यूह में फंसी स्त्री मन की व्यथा को उजागर करने की कोशिश की है।
जहां तक लेखन का सवाल है तो इन दिनों अपने एक उपन्यास 'एक काली एक सफेद' को अंतिम रूप दे रही हूं। यह शीघ्र ही पाठकों के समक्ष आ जाएगा। इसके अलावा डायरी लेखन के बहाने अपने पुराने अनुभवों और संस्मरणों को भी संकलित कर रही हूं। बच्चों के लिए भी कुछ कहानियां लिखी है जो प्रकाशनाधीन है।

1 comment:

Udan Tashtari said...

आभार इस आलेख को यहाँ प्रस्तुत करने का.