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यह नहीं है मेरा गांव

  • मंतोष कुमार सिंह
बरसों बाद गया गांव
गलियों से हो गया अंजान
बदल गया था नक्शा
गांव का
पगडंडिया, खरंजे, खेतों के मेढ़
सबकी बदल गई थी तस्वीर
अलकतरे की लेप पर चलते हैं लोग
अब पप्पू, सोनू, मोनू और गोलू
नहीं खेलते ओल्हा-पत्ती
बगीचों में खड़ी हैं बिल्डिंगें
नहीं होता गुल्ली-डंडा
नहीं होता डागा दौड़
क्रिकेट होता चारो ओर
काकी, ईया, काका, बाबा
नहीं दिखते खाट पर
टांगा और बैल गाड़ी
नहीं दौड़ती सडक़ों पर
डाकिया भी नहीं दिखता
झोले में संदेशा लेकर
हर हाथ में मोबाइल
हर गलियों में मोटरसाइकिल
यह नहीं है मेरा गांव

1 comment:

Udan Tashtari said...

वाह!! क्या चित्रण किया है..बधाई.