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हरे सोने की खान 'शैवाल'

ईंधन के विकल्प के तौर पर जैव ईंधन में सम्भावनाएं बढ़ती ही जा रही हैं। जटरोफा (रतनजोग), नारियल व सोयाबीन से जैव ईंधन निकालने में सफलता मिलने के बाद अब तालाब व गड्ढ़े-नाले में जमने वाली काई (शैवाल) में भी वैज्ञानिक ईंधन की महक देख रहे हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक शैवाल का 50 फीसदी हिस्सा र्ईंधन होता है और इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यह निकट भविष्य में हरे सोने की खान साबित हो।इतना ही नहीं, वैज्ञानिक 'शैवाल र्ईंधन' को दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन का दर्जा दे रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इसमें पिछले जैव ईंधन के विकल्पों की तरह समस्याएं सामने नहीं आएंगी, जैसे कि विशेषज्ञों द्वारा जटरोफा से मिट्टी की उर्वरा शक्ति पर दूरगामी प्रतिकूल असर पडऩे की आशंका हो या फिर कृषि योग्य भूमि व सिंचाई के लिए जल की समस्या हो। क्योंकि, शैवाल बंजर जमीन पर गंदे-खारे पानी में ही उपजती है। साथ ही इसमें अन्य विकल्पों की बनस्पत प्रति हैक्टेयर छह से दस गुना अधिक र्ईंधन व ऊर्जा के उत्पादन की सम्भावना भी है। कार्बन डाई आक्साइड (सीओ2) के उत्सर्जन को कम करने व ऊर्जा के संतुलित विकल्प के लिए कार्य करने वाली ब्रिटेन की सरकारी अनुदान प्राप्त स्वायत्त संस्था 'कार्बन ट्रस्ट' ने शैवाल ईंधन के निर्माण की दिशा में पहल करते हुए लाखों पाउण्ड की परियोजना शुरू भी कर दी है। परियोजना का लक्ष्य सन् 2020 तक शैवाल को पेट्रोलियम ईंधन का एक बेहतर विकल्प बनाना है। ट्रस्ट के निदेशक मार्क विलियमसन के मुताबिक शैवाल ईंधन सडक़ व वायु परिवहन में पेट्रोलियम खपत के एक बड़े हिस्से की पूर्ति कर सकता है। साथ ही इससे हर वर्ष दुनिया भर में 16 करोड़ टन कार्बन डाई आक्साइड के उत्सर्जन को कम किया जा सकेगा। विशेषज्ञ यह भविष्यवाणी भी कर रहे हैं कि सन् 2030 तक यह विश्व की कुल विमान र्ईंधन खपत का 12 फीसदी हिस्सा पूरा कर सकता है। फिलहाल, वैज्ञानिकों के बीच इस बात पर चर्चा चल रही है कि व्यावसायिक जरूरतों को पूरा करने के लिए शैवाल ईंधन का उत्पादन औद्योगिक पैमाने पर कैसे किया जाए? साथ ही यह चुनौती भी है कि शैवाल र्ईंधन को अधिक से अधिक किफायती कैसे बनाया जाए? उल्लेखनीय है कि दुनिया भर में पेट्रोलियम संसाधन की घटती मात्रा व ईंधन की बढ़ती कीमत के मद्देनजर जैव ईंधन को भविष्य के एक बेहतर ऊर्जा विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। जैव ईंधन (बायो फ्यूल) को 'ग्रीन ऑयल' भी कहा जा रहा है और इसे टिकाऊ परिवहन ईंधन माना जा रहा है।

2 comments:

Udan Tashtari said...

जानकारी के लिए आभार!!

आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

अनुनाद सिंह said...

शुभ सूचना है. ऊर्जा के विकल्प मिलते रहेंगे तभी तक यह सभ्यता आगे बढेगी नही तो इसका भविष्य अंधकारमय है.