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बिहारी अस्मिता की रक्षा कौन करेगा

महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हमले के विरोध में बिहार के नेताओं ने जे.पी. आंदोलन के बाद पहली बार एकजुटता प्रदर्शित की थी लेकिन एक सप्ताह के भीतर ही वे न केवल एक दूसरे पर हमले करने लगे बल्कि आपस में उनकी राजनीतिक खींचतान शुरू हो गयी और उनकी एकजुटता बिखरने लगी। ऐसे में यह सवाल उठने लगा है कि बिहारी अस्मिता की रक्षा कौन करेगा।
27 अक्टूबर को पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार, रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव और केन्द्रीय इस्पात मंत्री रामविलास पासवान एक साथ बिहार के मुद्दे पर प्रधानमंत्री से मिले थे और उन्होंने इस तरह ‘बिहारी अस्मिता’ के सवाल पर एकजुटता दिखायी लेकिन सात दिन के भीतर ही वे एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी करने लगे और राजनीति की आंच में अपनी अपनी रोटियां सेंकने लगे।
राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि बिहार में आयी भयंकर बाढ के मुद्दे पर भी तीनों नेता एकजुट नही हुए थे, लेकिन राज ठाकरे के भडकाऊ बयानों एवं बिहारियों पर महाराष्ट्र में हमले ने उन्हें एकजुट कर दिया, लेकिन इस मुद्दे पर आगे निकलने की होड में वे एक दूसरे पर ही पिल पड़े और उनके कदमों को नौंटकी करार दिया।
जनता दल (यू) ने अपने लोकसभा सांसदों के इस्तीफे की घोषणा कर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और लोकजनशक्ति (लोजपा) को पीछे छोडने की कोशिश की। इस पर लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान ने जद.यू. की घोषणा को नौटंकी करार दिया। इसके बाद कल राजद प्रमुख लालू यादव ने बिहार के सभी जनप्रतिनिधियों के इस्तीफे की घोषणा की मांग कर नया राजनीतिक कार्ड खेला जिससे उनके विरोधी बौखला उठे।
श्री कुमार ने तो यहां तक कहा कि श्री यादव दरअसल बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाना चाहते है। उन्होंने यह भी कहा कि इस्तीफा देने से समस्या का समाधान नहीं हो जाता लेंकिन 31 अक्टूबर को जद।यू. अध्यक्ष शरद यादव ने खुद अपने लोकसभा सांसदों के इस्तीफे की धमकी दी थी। श्री कुमार ने यह जवाब नहीं दिया कि क्या जद.यू. के सांसदों के इस्तीफे से समस्या का समाधान हो जाता तब फिर जद (यू) अध्यक्ष श्रीयादव ने ऐसा बयान क्यों दिया।

2 comments:

Hindustani said...

क्या कहे मित्र.. इन बातों को सुन कर, टीवी पर देखा कर मन रोने को आता...
आज देश में हो रही इन घटनाओ के सामने स्वयं को बहुत बेबस और लाचार महसूस करता हूँ .
आज के नेताओ को तो बस अपने वोट से मतलब है मगर कल जब हमारी आने वाली पीढी हमसे पूछेगी कि जब ये सब हो रहा था तो हमने क्या किया ?
हमने इसे क्यूँ नहीं रोका तो हम क्या जवाब देंगे. दिल में तो आता हैं कि इन नेताओ का खून कर दूँ मगर अपनी जिम्मेदारियों के कारण विवश हूँ.
आज सरकार सवयम नेताओ के बल पर बनती है हमारे वोट की शक्ति बस कहने मात्र रह गई हैं

एक विवश नागरिक

raj said...

महाराष्ट्र या तमाम जगहों पर बिहार के लोगों के साथ जो सुलूक हो रहा है, हो सकता है इससे उन लोगों की आँखें खुले जो सिर्फ़ अपने वोट बैंक की चिंता में घुलते रहते हैं। राज ठाकरे से हिसाब वक़्त लेगा, लेकिन बिहार के नेताओं से भी सवाल होना चाहिए कि गन्दी, जात-पांत की सियासत भूलकर गरीब लोगों के भले की क्यों नहीं सोचते। ऐसा क्यों होता है कि अच्छी पढ़ाई से लेकर अच्छी नौकरी के लिए ही नहीं दो जून की रोटी के लिए भी बिहार के लोगों को दूसरे प्रदेशों का रुख करना पड़ता है? देश में कहीं भी नौकरी करने की बात और है पर परदेस तो परदेस ही होता है। बिहार के लोगों को बिहार में ही महाराष्ट्र, दिल्ली , लुधियाना या जालंधर की तरह ही रोजगार के अवसर क्यों नहीं मिलने चाहिए। किसी ठाकरे को लानत भेजने के साथ हमें लालू, नीतिश, पासवान जैसे नेताओं से सवाल भी करने चाहिए-पिछडों की राजनीति कर्णधार आप लोग बिहार के भले की कब सोचेंगें? कोशिश करें कि मुंबई जैसी स्थितियों का सामना करने को बिहार के किसी व्यक्ति को मजबूर न होना पड़े।