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वरदान बना बेटियों के लिए अभिशाप




स्कूली शिक्षा के दौरान कई कक्षाओं तक परीक्षाओं में एक निबंध अक्सर लिखने के लिए कहा जाता था, जिसका शीर्षक था विज्ञान, वरदान या अभिशाप । उस समय की अपनी समझ के अनुसार पढक़र, रटकर निबंध लिख लिया करता था। अब जब गुम होती बेटियों और उसके कारणों के बारे में धरातल पर तस्वीर देखी, तब उस निबंध का मतलब और महत्व समझ में आ रहा है। अल्ट्रासाउन्ड सोनोग्राफी मशीन का अविष्कार कर चिकित्सा जगत और गर्भवती माताओं तथा उनके पेट में पलने वाले बच्चों को जिंदगी का वरदान देने वाले स्काटलैंड के प्रोफेसर डॉ. इयान डोनाल्ड यदि धोखे से भी इस मशीन के भविष्य में भयावह दुरूपयोग होने की कल्पना कर लेते तो शायद वह अपने अविष्कार को नष्ट कर देते। संभवत: वह कभी नहीं चाहते कि उनका दिया वरदान बेटियों की मौत का अभिशाप बने। इस तकनीक से गर्भावस्था और शिशु की स्थिति को देख पाना संभव हो गया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान प्रसूति और गर्भस्थ शिशु के विकास के परीक्षण को लेकर प्रो. डोनाल्ड द्वारा विकसित अल्ट्रासाउन्ड सोनोग्राफी प्रणाली 1950 में दुनिया के सामने प्रकाश में आई, जब पेट के जानलेवा कैंसर से जूझती एक महिला का इस तकनीक से परीक्षण व अध्ययन करने के पश्चात उसकी क्षतिग्रस्त डिंब ग्रंथि को हटा दिया गया और महिला की जान बचा ली गई। उसके बाद उन्होंने एक बी-मोड अल्ट्रासाउन्ड स्कैनर का भी अविष्कार किया, जो जुड़वां गर्भावस्था का पता लगाने में सक्षम था। इस तकनीक के उपयोग से न सिर्फ बच्चे को देखा जा सकता है, बल्कि जन्म से पहले ही उसके लिंग का भी पता लगाया जा सकता है। यानी जन्म लेने वाला बच्चा लडक़ा है या लडक़ी , यह बात जन्म के कई महीने पहले ही ज्ञात हो सकती है। इस तकनीक की यही बात गर्भ में कई स्तरों पर बेटियों की जान की दुश्मन बन गई। कई दंपत्तियों में यह उत्सुकता रहती है कि शिशु का लिंग क्या है, लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं रहती कि लडक़ा पैदा होगा या लडक़ी । बड़ी संख्या में लोग लिंग परीक्षण करवाते ही इसीलिए हैं कि अगर गर्भ में कन्या भ्रूण पल रहा है, तो उसे जन्म लेने से पहले ही नष्ट करवा दिया जाए। हालांकि ंिलंग जांच के लिए कई तकनीक इस्तेमाल की जाती हैं। इनमें 1. एम्नियोर्सेटेसिस(गर्भ जल जांच तकनीक), 2. क्रोनिक बिल्लों बायोप्सी ( बीजाण्डासन की कोशिकाओं की जांच), 3अल्ट्रासोनोग्राफी ( ध्वनि तंरगों द्वारा की जाने वाली जांच , जिससे शरीर के अंदर की विकारों की तस्वीर देखी जाती है)। इनमें सर्वाधक प्रचलित तकनीक अल्ट्रासाउन्ड सोनोग्राफी है। 1980 के दशक की शुरूआत में अल्ट्रासाउन्ड से लिंग जांच करने वाली तकनीक की आसान पहुंच ने शिशु लिंग अनुपात की तीब गिरावट में अपना योगदान दिया है। लिंग जांच की एक और तकनीक की घुसपैठ पश्चिम मे ईजाद लिंग जांच की एक और तकनीक हिन्दुस्तान में कदम रख चुकी है। यह एक ऐसा जांंच उपकरण, जिसे कुरियर से बुलवा सकता है । कोई भी 30 से 35 हजार रूपए तक खर्च करके रक्त परीक्षण के माध्यम से जान सकता है कि महिला के गर्भ में बालक अथवा बालिका भ्रूण पल रहा है। इस आयातित उपकरण का पंजाब, हरियाणा जैसे सीमावर्ती राज्यों से देश में दाखिला हो चुका है और इस्तेमाल शुरू हो चुका है। मप्र में इंदौर में इस तकनीक से लिंग की जांच का दौर शुरू हो चुका है। अल्ट्रासाउन्ड सेंटर्स के संचालक इस तकनीक के आगमन की पुष्टि कर रहे हैं। जहां तक अल्ट्रासोनोग्राफी का सवाल है इस बारे में एक अभी तक यह धारणा पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो पाई है कि इसका इस्तेमाल कहां तक सुरक्षित है। हां, ये बात जरूर कही जाती है कि सोनोग्राफी सुविधा का इस्तेमाल नियमित रूप से नहीं करना चाहिए, इसे एक चिकित्सा विकल्प के रूप में ही अपनाया जाना चाहिए। हमने रीवा में कई अल्ट्रासोनोग्राफी सेंटर की पड़ताल के दौरान डाक्टरों से इस तकनीक के परिणामों के बारे में जानना चाहा तो कुछ विंदु सामने आये, उनमें एक तो यह कि इस तकनीक से किया की लिंग की जांच , इसकी कोई गारंटी नहीं है। गर्भवती स्त्री या गर्भस्थ शिशु के विकास एवं स्वास्थ्य पर इस तकनीक का कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा, इस बात की भी सुनिश्चितता नहीं है। गर्भपात से लेकर कम बजन का बच्चा होने जैसी कोई घटना हो भी सकती है। भोपाल में कुछ दिन पहले बेटी बचाओ अभियान के तहत मुख्यमंत्री निवास में जमा हुए चिकित्सा विशेषज्ञों से हमारी चर्चा का यही निष्कर्ष निकला कि अभी तक सोनोग्राफी मशीन से गर्भवती या गर्भस्थ शिशु को होने वाले नफा नुकसान के बारे में कोई एक मत नहीं है।

सुनील कुमार गुप्ता

3 comments:

MOHAMMAD IRSAD said...

sir you are right

vibha rani Shrivastava said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 19 मार्च 2016 को लिंक की जाएगी ....
http://halchalwith5links.blogspot.in
पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Bhavitavya Arya said...

क्या विज्ञान का जन्म पश्चिम में हुआ??
पाइथागोरस से पहले आर्यभट्ट, न्यूटन से पहले भास्कराचार्य!

जानने के लिए पूरा लेख पढ़ें:--

क्यों आत्मविस्मृत हुए हम??