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Sunday

बिना गिफ्ट शादी में मत जाना


एक बार की बात है कि गुप्ताजी, एक मारवाड़ी (बनिये) के यहां शादी में गए। शादी का पंडाल बड़ा भव्य था और उसमें अंदर जाने के लिए 2 दरवाजे थे।
एक दरवाजे पर रिश्तेदार, दूसरे पर दोस्त लिखा था।
गुप्ताजी, बड़े फख्र से दोस्त वाले दरवाजे से अंदर
गए।
आगे फिर 2 दरवाजे थे,
एक पर महिला, दूसरे पर पुरुष लिखा था।
गुप्ताजी पुरुष वाले दरवाजे से अंदर गए।
वहां भी 2 दरवाजे और थे,
एक पर गिफ्ट (gift) देने वाला,
दूसरे पर बिना गिफ्ट (without-gift) वाले लिखा था।
गुप्ताजी को हर बार अपनी मर्जी के दरवाजे से अंदर जाने में बड़ा मजा आ रहा था। उसने ऐसा इंतजाम पहली बार देखा था |
गुप्ताजी बिना-गिफ्ट (without-gift) वाले दरवाजे से अंदर चले गए।
जब अंदर जाकर देखा तो गुप्ताजी बाहर
गली में खड़े थे।
और वहॉं लिखा था… शर्म तो आ नहीं
रही होगी,
बनिये की शादी और मुफ्त (free) मे
रोटी खायेगा?
जा-जा बाहर जा और हवा खा।


Saturday

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं

नोबेल पुरस्कार विजेता स्पेनिश कवि पाब्लो नेरुदा की कविता  "You  Start  Dying  Slowly" का हिन्दी अनुवाद...

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं,
अगर आप
करते नहीं कोई यात्रा,
पढ़ते नहीं कोई किताब,
सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
करते नहीं किसी की तारीफ़।

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं,
जब आप :
मार डालते हैं अपना स्वाभिमान,
नहीं करने देते मदद अपनी और न ही करते हैं मदद दूसरों की।

 आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं,
अगर आप :
बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के,
चलते हैं रोज़ उन्हीं रोज़ वाले रास्तों पे,
नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार,
नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग, या
आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान।

 आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं,
अगर आप :
नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को,
और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को,
वे जिनसे नम होती हों आपकी आँखें,
और करती हों तेज़ आपकी धड़कनों को।

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं,
अगर आप :
नहीं बदल सकते हों अपनी ज़िन्दगी को,
जब हों आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से,
अग़र आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हों निश्चित को,
अगर आप नहीं करते हों पीछा किसी स्वप्न का,
अगर आप नहीं देते हों इजाज़त खुद को,
अपने जीवन में कम से कम एक बार,
किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की...।
तब आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं...!


Friday

तिल तिल कर मरा कर्ज के तले दबा किसान

छिंदवाड़ा जिले के ग्राम कचराम निवासी किसान श्याम यदुवंशी ने अपने खेत में कीटनाशक पीकर जान दे दी। किसान द्वारा आत्महत्या का मामला कोई सामान्य घटना नहीं है। जिन परिस्थितियों में किसान श्याम यदुवंशी ने आत्महत्या की वह दिल दहलाने वाली घटना है। श्याम को तिल-तिल मरने पर मजबूर किया गया। पहले बैंक के कर्मचारी और अधिकारी उसके घर गए, लोन की रकम चुकाने के लिए उस पर दबाव बनाया। तरह तरह की यातनाएं दी गईं। गांव वालों के सामने जलील किया गया। यहां तक बैंक अधिकारियों ने कह डाला कि अगर तुम लोन की रकम नहीं चुका सकते तो तुम्हें डूब मरना चाहिए। किसान श्याम यदुवंशी को यातनाएं देने का सिलसिला यहीं नहीं थमा। बिजली वितरण कंपनी के कर्मचारी बकाया बिजली बिल वसूले गए, किसान ने तुरंत बिजली बिल न दे पाने की असमर्थता जताई। बिजली वितरण कंपनी के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा भी उसे परेशान किया गया। घर से समान उठा ले जाने की धमकी दी गई है। 300000 से अधिक कर्ज ले चुका किसान ऐसे में क्या करता है। उसे कहीं भी उम्मीद की किरण नजर नहीं आई। अगर कहीं से भी उसे जिंदगी की आस दिखाई देती तो आज श्याम हमारे बीच होता मरता नहीं। कीटनाशक पीने के बाद गंभीर अवस्था में किसान श्याम को जिला अस्पताल छिंदवाड़ा लाया गया। जिला अस्पताल में भी अगर समुचित इलाज मिल जाता तो उसकी जान बच जाती। डॉक्टर ने इलाज तो दूर उसे देखना भी मुनासिब नहीं समझा। नर्सों के भरोसे गंभीर किसान को छोड़ दिया गया। आखिरकार किसान जिंदगी की जंग हार गया और उसकी सांसे टूट गईं और वह हमेशा के लिए इस दुनिया से विदा हो गया। किसान के सामने 12 महीने विपरीत परिस्थितियां होती हैं। महंगे बीज, खाद और अन्य पदार्थ लेकर वह खेती करता है। प्राकृतिक आपदा और अन्य विपरीत परिस्थितियों के बावजूद फसल तैयार करता है। जब फसल पक कर तैयार हो जाती है तो उसका उचित दाम नहीं मिलता। कई बार तो फसल की लागत भी किसान को नहीं मिल पाती है। व्यापारी भी मौके का फायदा उठाते हैं। बड़े पैमाने पर उत्पाद होने के कारण फसल की अच्छी कीमत नहीं देते। ऐसे में किसान को अपनी फसल औने-पौने दाम बेचनी पड़ती है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों को किसानों के लिए दीर्घकालीन योजना बनानी पड़ेगी ताकि किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिल सके और वह भी आम लोगों की तरह जीवन जी सके।

Tuesday

सर्जिकल सदमा


पाकिस्तान के साथ-साथ भारत के कुछ नेताओं को भी सर्जिकल स्ट्राइक का सदमा लग गया है। वे 'कथित कोमाÓ में चले गए हैं। 'कथित कोमाÓ  से पीडि़त व्यक्ति को न देश दिखता है और न ही देशभक्ति। इस प्रकार की बीमारी राजनीति में ज्यादा पायी जाती है। ऐसे लोग अपनी जुबान पर लगाम नहीं लगा पाते हैं। सत्तापक्ष के सभी निर्णय में ये लोग कमियां निकालते हैं। कमियां न मिले तो शब्द प्रहार करते हैं। उरी हमले के बाद भारतीय सेना द्वारा पीओके में सर्जिकल स्ट्राइक की खिलाफत करना 'कथित कोमाÓ की देन है। तभी तो भारतीय सेना द्वारा की गई कार्रवाई के सबूत मांग रहे हैं। मुझे लग रहा है कि आज पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ काफी खुश हुए होंगे, चलो कोई तो साथ देने वाला मिला।

Monday

मेरे मौजूदगी 


मेरे मौजूदगी का
शब्द एहसास कराते हैं
मन की बात
कैनवास पर उतर आते हैं
चुप रहता हूं
कलम से बोल निकल जाते हैं
मेरे मौजूदगी का
शब्द एहसास कराते हैं