Saturday

कलयुगी द्रोपदी कहां जाए...

औरत पर जुल्म जारी है। द्वापर में पांडवों ने द्रोपदी को दांव पर लगाया था। वह सिलसिला शायद थमा नहीं है। उत्तर प्रदेश के मुज्जफरनगर के एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को जुए की भेंट चढा दिया। पत्नी को दांव पर लगाने वाले सोकेन्द्र कुमार को अपने दो मासूमों का भी ख्याल नहीं आया। उसकी पत्नी को इसका पता तब चला, जब बीते 19 दिसम्बर को चार लोग उसके घर आए। तब उसके पति ने कहा कि वह पत्नी को जुए में हार गया है। चारों लोग पीडिता को जबरन ले जाने लगे। महिला की चीख सुनकर पडोसियों ने बीच—बचाव किया। मामला बिगडते देख आरोपी भाग गए। लेकिन, उनके जाने के बाद सोकेन्द्र ने अपनी पत्नी को डांटा और कहा कि छोटी सी बात के लिए हंगामा नहीं करना चाहिए था।

थाना भवन के पुलिस अधिकारी विजय कु मार ने बताया कि पीडित महिला थाने आई थी। लेकिन, तफ्तीश के बाद केवल घरेलू विवाद की बात सामने आई और महिला वापस घर चली गई। जबकि, इलाके के लोगों का कहना है कि घटना के बाद से महिला गायब है। क्योंकि, उसे डर है कि अगर वह दोबारा दिखी तो जुए में जीते लोग उसके पति को पीटेंगे। कुछ पडोसियों को मालूम है कि वह कहां है। लेकिन, महिला को डर है कि उसके पति के दोस्त उसे अगवा कर लेंगे। उधर सुकेन्द्र की मां ने भी बेटे पर जुआरी और शराबी का आरोप लगाते हुए कहा कि उनके बेटे ने आजीविका का सहारा चार बीघा जमीन को बेच कर मिले पैसे जुए और शराब में उडा दिए। उसने घर के बर्तन भी बेच दिए।

पत्रिका से साभार

Wednesday

शहादत पर सियासत उचित या अनुचित

मुम्बई में हुए आतंकी हमले में शहीद हुए एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे की शहादत पर भी अब सियासत होने लगी है। केन्द्रीय अल्पसंख्यक मंत्री एआर अंतुले ने करकरे की मौत संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया है। ऐसी गंदी राजनीति देश को कहा ले जाएगी। यह एक बहुत ही ज्वलंत विषय बनाता जा रहा है। इस पर आपकी क्या राय है। अपनी टिप्पणी से देश को अवगत कराएं।

Friday

दिल्ली में उल्लू के पट्ठे

सुना है कि दिल्ली में उल्लू के पट्ठे
रगे गुल से बुलबुल के पर बांधते हैं

मुझे नहीं मलूम यह शेर किसका है। मैंने बचपन में सुना था। इसका मतलब यह है कि दिल्ली शहर में कुछ उल्लू लोग फूलों के रेशों से बुलबुल के पर बांधते हैं। यानी कि असंभव काम करने की बात करते हैं। यह शेर आज अचानक दाढ़ी बनाते हुए मुझे याद आ गया। टीवी पर खबरें आ रही थीं कि मोहतरमा कोंडोलीजा राइस ने दिल्ली आकर कह दिया कि पाकिस्तान को अपने आतंकवादियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करके दिखानी होगी।

लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या पाकिस्तान में आतंकवादियों के अड्डों पर भारत के हमलों का वह समर्थन करेंगी तो उन्होंने गोलमोल सा जवाब दिया। यानी अमेरिका को तो यह अख्तियार है कि वह अफगानिस्तान के साथ लगने वाली पाकिस्तानी सीमा में घुसकर तालिबानी-आतंकवादियों को मारे , लेकिन भारत को ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे हालात और बिगड़ जाएं। वाह! ' हम हैं ना जी। हम डालेंगे पाकिस्तान पर दबाव। ना भैया ऐसा नहीं करते। कित्ती बुरी बात है। ऐसा करते हैं राजा बेटे ? कराची से मुंबई जाकर ऐसा टंटा-फसाद करना। अच्छा बताओ किसने किया। चलो सच-सच बता दो। मैं मार थोड़े ही रही हूं। चलो बोलो भी अब बच्चे। नाम तो बताओ। अच्छा ऐसा है नाम नहीं बताते तो मत बताओ। चलो भारत को सॉरी बोलो। कहो आगे ऐसा नहीं होगा। '

यह सब सोचते-सोचते मुझे हंसी आ गई। क्या एकजुटता दिखाई जा रही है! आतंकवादियों को दंडित करने से ज्यादा जरूरी है , आगे होने वाले हमलों को रोकना। क्या दलील है! क्या दिलासा है! हम सब चिंतित हैं बाबू मोशाय। हम पाकिस्तान के पश्चिमी मोर्चे पर जो काम फौज के जरिए करते हैं , वह उसके पूर्वी मोर्चे पर कूटनीति से करेंगे। दबाव डालेंगे। जबर्दस्त दबाव। समझाएंगे ज़रदारी को। आप बाबू मोशाय भरोसा रखें। शांति रखें। ठंड रखें , हम मना लेंगे। समझा लेंगे। अब ऐसा नहीं करना है। वैसे भी ज़रदारी बेचारे का एक पांव तो अपनी पश्चिमी सीमा पर फंसकर फीलपांव हो गया है। समझा करो जी। देखो कैसा सांय सांय कर रहा है बेचारा मिस्टर ज़रदारी। बेनजीर का हरियाला बन्ना। हंसते-हंसते मैंने अपनी नाक छील ली। नथुने के पास खून चमकने लगा जो सुबह अखबार पढ़कर उबल रहा था। ज़रदारी ने कहा था , हम भारत द्वारा मांगे गए बीस मोस्ट वांटेड लोगों को उसे वापस नहीं सौंपेंगे। अगर कोई दोषी पाया गया तो खुद उस पर मुकदमा चलाएंगे और सजा देंगे। हमें नहीं लगता कि भारत ने जो आतंकवादी पकड़ा है , उसका पाकिस्तान से कोई ताल्लुक है। पाकिस्तान पर क्यों उंगली उठा रहे हो ?
मैंने सोचा अरे यह ज़रदारी बेचारा कैसा सत का सीता है। टेन परसेंट तो सच बोलता ही होगा। सद्भावना से भरपूर। मनमोहन सिंह को आधुनिक भारत का राष्ट्रपिता कहने वाला उदारमना मानवीय। भारत पर पहले परमाणु हमला न करने वाला शांतिकामी। आईएसआई की राजनैतिक शाखा को बंद करानेवाला मिखाइल गोर्बाचौफ। पाकिस्तान में ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोइका का मंतर मारनेवाला जम्हूरियत का जगमगाता जुगनू। सही कह रहा है बेचारा। इस पर यकीन करना चाहिए- तरस खाकर।
तो लो जी हंसी-हंसी में खून बहने लगा। इस दाढ़ी-चिंतन से मैं फटाफट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि पाकिस्तान तो ऐसा कर ही नहीं सकता। वैसे भी वहां जम्हूरियत है और वह खुद आए दिन आतंकवाद की आग में झुलस रहा है। अगर मान लो उससे मजबूरन या आदतन कोई गलती हो भी गई हो तो भारत को बड़ा दिल दिखाना चाहिए। कोंडोलीजा जी तो दौड़ी-दौड़ी आ ही गई हैं। क्या तत्परता दिखाई है देवी भगवती ने। जिम्मेदारी का भकभकाता भाव चेहरे से कैसा फूट रहा है। इसे कहते हैं निष्काम कर्म। पाकिस्तान को समझाएंगी। उस पर दबाव बनाएंगी। गीत गाने की बजाय पंख फड़फड़ाती और चोंच मारती पाकिस्तानी बुलबुल के पंखों को वह फूलों के रेशों से बांधने आई हैं। कैसा सुंदर कूटनीतिक प्रयास है।
नवभारत टाइम्स

Thursday

जर्मनी में एड्स के मरीज का सफल इलाज

जर्मनी में एक चिकित्सक ने एड्स के एक मरीज का इलाज कर असम्भव को संभव कर दिखाया है। गेरो ह्यूटर नाम के इस चिकित्सक ने अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण (बोनमेरो ट्रांसप्लांट) के जरिए 42 वर्षीय एक एड्स के मरीज का ठीक कर दिया। यह प्रत्यारोपण एक खतरों से भरी उपचार प्रणाली है जिसका प्रयोग आमतौर ल्यूकेमिया में किया जाता है।
ह्यूटर ने बताया कि मरीज अमरीकी नागरिक है और अब बर्लिन में रह रहा है। मरीज का दो वर्ष पहले यह प्रत्यारोपण किया गया था। बर्लिन के चैरिटी अस्पताल में हुए इलाज के बाद मरीज को स्वस्थ घोषित कर दिया गया। उधर, इस सम्बन्ध में मायो क्लीनिक के निदेशक एंड्रयू बैडले का कहना है कि किसी एक मामले से अभी किसी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। अमरीका के एलर्जी एंड इंफैक्शियस डीसीसेज के निदेशक एंटनी फॉसी ने चेतावनी दी है कि यह पद्धति महंगी और प्राथमिक इस्तेमाल के लिए जोखिम भरी भी है।

इंटरनेट की लत 'रोग' की श्रेणी में!

चीन दुनिया का पहला ऐसा देश बनने की तैयारी में है, जहां इंटरनेट की लत को आधिकारिक तौर पर एक 'रोग' घोषित किया जाने वाला है। चीन के लोगों द्वारा रोज इंटरनेट पर बिताए जाने वाले समय में वृद्धि के मद्देनजर यह कदम उठाया जा रहा है। इस बीच राजधानी बीजिंग में चिकित्सकों ने इंटरनेट के अत्यधिक इस्तेमाल से होने वाली मनोवैज्ञानिक व शारीरिक समस्याओं पर एक रिपोर्ट भी पेश की है। रिपोर्ट इंटरनेट पर चैट करने वाले 1,300 लोगों के अध्ययन पर आधारित है। रिपोर्ट के अनुसार इंटरनेट की लत से मानसिक व शारीरिक तनाव, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा व एकाग्रचितता में कमी जैसी समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। रिपोर्ट में इंटरनेट पर हर दिन छह घण्टे से अधिक समय बिताने व पिछले तीन महीने के दौरान किसी अनियमितता के लक्षण दिखने को व्यसन की श्रेणी में रखा गया है। उल्लेखनीय है कि 2.53 करोड़ इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं के साथ चीन दुनिया का सर्वाधिक ऑनलाइन आबादी वाला देश बन चुका है और इसमें काफी तेजी से इजाफा हो रहा है।

Tuesday

साढ़े सात घंटे से कम नींद घातक

पर्याप्त मात्रा में नींद ने लेना सेहत के लिए घातक है। नींद का एक नियमित चक्र होता है, जिसके कम या ज्यादा होने पर शारीरिक संतुलन बिगड़ जाता है। इसके बावजूद आधुनिक जीवन शैली में लोगों के सोने की अवधि कम हो रही है और लोग देर रात तक जागने लगे हैं। अनियमित नींद की हानियों को उजागर करने के क्रम में जापान के जिची मेडिकल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक ताजा अध्ययन में सामने आया है कि हर रात साढ़े सात घण्टे से कम नींद लेने पर हृदयाघात का खतरा चार गुना तक बढ़ सकता है। यह निष्कर्ष पिछले वर्ष किए गए एक अन्य अध्ययन रिपोर्ट की पुष्टि करता है, जिसमें साबित हुआ था कि सात घण्टे से अधिक नींद लेने पर हृदयाघात का खतरा कम
होता है। शोध में उच्च रक्तचाप से औसतन पिछले 23 महीने से पीडि़त 1,255 मरीजों का अध्ययन किया गया। ये मरीज 33 से 97 आयु वर्ग के थे और इनकी औसत आयु 70 वर्ष थी। इनमें 1,007 मरीज 7.5 घण्टे से अधिक समय की नींद लेते थे, जबकि इससे कम नींद लेने वाले मरीजों की सख्या 248 थी। लगभग 50 महीने तक चले इस अध्ययन में पाया गया कि 7.5 घण्टे से कम सोने वाले मरीजों में हृदयाघात व सदमें का खतरा 27 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। अध्ययन में यह भी साबित हुआ कि जिन मरीजों का रक्तचाप रात में बढ़ जाता था, उनके लिए कम नींद लेने पर स्थिति और भी खतरनाक हो जाती है। अध्ययन रिपोर्ट 'आर्किव्स ऑफ इंटरनल मेडीसिनÓ नामक जर्नल में प्रकाशित किया गया है।

Monday

बांझ महिला बनेगी मां!

ब्रिटेन में जल्द ही एक बांझ महिला मां बनने जा रही है। मां बनने के साथ ही वह अण्डाशय प्रत्यारोपण से शिशु को जन्म देने वाली दुनिया की पहली महिला बन जाएगी। 38 वर्षीय इस महिला को किशोरावस्था में ही चिकित्सकों ने बांझ घोषित कर दिया था। लेकिन पिछले साल चिकित्सकों ने एक क्रान्तिकारी प्रक्रिया के तहत इस महिला के शरीर में उसकी जुड़वा बहन का अण्डाशय प्रत्यारोपित करने में कामयाबी हसिल की। इसके बाद वह गर्भवती हुई और इस सप्ताह ही मां बनने वाली है। चिकित्सा जगत की इस उपलब्धि से हजारों बांझ महिलाओं के मां बनने की उम्मीद जगी है। शोध से जुड़े प्रमुख चिकित्सक शर्मन सिल्बर के अनुसार यह दुनिया में अपनी तरह का पहला अवसर है, जिसमें अण्डाशय प्रत्यारोपण से एक बांझ महिला गर्भवती हुई है।

Saturday

मेरठ में ब्लास्ट, चार की मौत

उत्तरप्रदेश के मेरठ शहर के निसारी गेट इलाके में ब्लास्ट हुआ है। धमाके की चपेट में आने से चार लोगों की मौत हो गई है। आधे दर्जन से ज्यादा लोगों के घायल होने की खबर है। हालांकि, पुलिस ने अभी तक आधिकारिक रूप से मृतकों और घायलो की संख्या नहीं बताई है। धमाका क्यों हुआ है, इसका खुलासा अभी नहीं हो पाया है।

जानकारी के मुताबिक मेरठ के निसारी गेट थाना क्षेत्र के लखीपुरा में कूडे के ढेर में जोरदार धमाका हो गया। यहां पर असम से आए लोगों की बस्ती है। आसपास के इलाके में भारी संख्या में झुग्गी—झोपडियां हैं। बताया गया कि धमाके चपेट में वे लोग आए हैं, जो कूडे के ढेर से पन्नियां बिन रहे थे। पुलिस ने घटनास्थल को चारों ओर से घेर लिया है। आसपास के इलाकों में भी नाकेबंदी कर दी गई है। धमाके के बाद घटनास्थल पर हजारों लोग जुट गए हैं। भीड को संभालने के लिए पुलिस को लाठियां भी भांजनी पड रही हैं।

Monday

बिहारी अस्मिता की रक्षा कौन करेगा

महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हमले के विरोध में बिहार के नेताओं ने जे.पी. आंदोलन के बाद पहली बार एकजुटता प्रदर्शित की थी लेकिन एक सप्ताह के भीतर ही वे न केवल एक दूसरे पर हमले करने लगे बल्कि आपस में उनकी राजनीतिक खींचतान शुरू हो गयी और उनकी एकजुटता बिखरने लगी। ऐसे में यह सवाल उठने लगा है कि बिहारी अस्मिता की रक्षा कौन करेगा।
27 अक्टूबर को पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार, रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव और केन्द्रीय इस्पात मंत्री रामविलास पासवान एक साथ बिहार के मुद्दे पर प्रधानमंत्री से मिले थे और उन्होंने इस तरह ‘बिहारी अस्मिता’ के सवाल पर एकजुटता दिखायी लेकिन सात दिन के भीतर ही वे एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी करने लगे और राजनीति की आंच में अपनी अपनी रोटियां सेंकने लगे।
राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि बिहार में आयी भयंकर बाढ के मुद्दे पर भी तीनों नेता एकजुट नही हुए थे, लेकिन राज ठाकरे के भडकाऊ बयानों एवं बिहारियों पर महाराष्ट्र में हमले ने उन्हें एकजुट कर दिया, लेकिन इस मुद्दे पर आगे निकलने की होड में वे एक दूसरे पर ही पिल पड़े और उनके कदमों को नौंटकी करार दिया।
जनता दल (यू) ने अपने लोकसभा सांसदों के इस्तीफे की घोषणा कर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और लोकजनशक्ति (लोजपा) को पीछे छोडने की कोशिश की। इस पर लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान ने जद.यू. की घोषणा को नौटंकी करार दिया। इसके बाद कल राजद प्रमुख लालू यादव ने बिहार के सभी जनप्रतिनिधियों के इस्तीफे की घोषणा की मांग कर नया राजनीतिक कार्ड खेला जिससे उनके विरोधी बौखला उठे।
श्री कुमार ने तो यहां तक कहा कि श्री यादव दरअसल बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाना चाहते है। उन्होंने यह भी कहा कि इस्तीफा देने से समस्या का समाधान नहीं हो जाता लेंकिन 31 अक्टूबर को जद।यू. अध्यक्ष शरद यादव ने खुद अपने लोकसभा सांसदों के इस्तीफे की धमकी दी थी। श्री कुमार ने यह जवाब नहीं दिया कि क्या जद.यू. के सांसदों के इस्तीफे से समस्या का समाधान हो जाता तब फिर जद (यू) अध्यक्ष श्रीयादव ने ऐसा बयान क्यों दिया।

Sunday

सूर्योपासना का महापर्व छठ आरंभ


सूर्योपासना का चार दिवसीय महापर्व छठ रविवार से शुरू हो गया। लोक आस्था के इस महापर्व के पहले दिन (नहाय खाय) के साथ पूरे देश में सुबह छठ व्रतियों ने विभिन्न नदियों और तालाबों में स्नान किया। इसके बाद घर में बनी लौकी, चना, दाल और अरवा चावल से बने प्रसाद को भगवान भास्कर को अॢपत करने के बाद ग्रहण किया। इस महापर्व के दूसरे दिन सोमवार को श्रद्धालु पूरे दिन बिना जलग्रहण किए उपवास रखेंगे। इसके बाद सूर्यास्त होने के बाद सभी व्रती भगवान भास्कर की पूजा करने के बाद एक बार ही दूध और गुड़ से बनी खीर को ग्रहण करेंगे तथा चांद के आकाश में नजर आने पर जल ग्रहण करेंगे। जिसके बाद उनका करीब ३६ घंटे का निराहार व्रत शुरू होगा। महापर्व के तीसरे दिन व्रतधारी अस्ताचलगामी सूर्य को नदी और तालाब में खड़ा होकर प्रथम अध्र्य अॢपत करते हैं। व्रतधारी डूबते हुए सूर्य को फल और कंद मूल से अध्र्य अॢपत करते हैं। छठ पर्व के चौथे और अंतिम दिन फिर नदियों और तालाबों में व्रतधारी उदीयमान सूर्य को दूसरा अध्र्य देते हैं। दूसरा अध्र्य अॢपत करने के बाद ही श्रद्धालुओं का ३६ घंटे का निराहार व्रत समाप्त होता है और वे अन्न ग्रहण करते हैं।

बुद्धदेव और पासवान बाल-बाल बचे

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य और केंद्रीय इस्पात, उर्वरक एवं रसायन मंत्री रामविलास पासवान रविवार को उस समय बाल-बाल बच गए जब पश्चिम मिदनापुर जिले में संदिग्ध माओवादियों ने उनके काफिले के एक पुल से गुजरने के दौरान उसके नीचे विस्फोट कर दिया। पुलिस ने बताया कि विस्फोट में पासवान के काफिले की अंतिम कार के ड्राइवर समेत पांच पुलिसकर्मी घायल हो गए। यह घटना मिदनापुर से आठ किलोमीटर दूर सालबोनी थानाक्षेत्र के कलाइचांदी खाल में राष्ट्रीय राजमार्ग-60 पर हुई। पुलिस के अनुसार भट्टाचार्य के काफिले के पीछे पासवान का काफिला चल रहा था। पासवान के काफिले ने जैसे ही पुल को पार किया तो एक जबर्दस्त विस्फोट हुआ और उसकी चपेट में काफिले की अंतिम कार आ गई।

Saturday

पराए पति से प्रीति

लिव इन संबंधों को नए कानून के जरिए कानूनी मान्यता प्रदान करने के महाराष्ट्र सरकार के ताजा प्रयास के क्रम में एक बार फिर यह मुद्दा सुर्खियों में है। फिलहाल लिव इन संबंधों पर प्रस्तावित कानून का प्रारूप विचार के लिए महिला आयोग के पास है। प्रस्तावित कानून सिर्फ लिव इन संबंधों को वैधता प्रदान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ शादीशुदा पुरुष के साथ किसी महिला के लिव इन संबंध से उपजे कुछ अन्य ज्वलंत सवाल भी जुड़े है।

अन्य क्षेत्रों की तुलना में बॉलीवुड की एक खास सिफत है। वह यह कि यहां पर आपको आकर्षक और कलात्मक प्रतिभा के धनी प्रतिभाशाली पुरुष और महिलाएं कहीं ज्यादा मिलेंगी। इन लोगों का मिजाज कुछ ज्यादा ही रोमांटिक होता है। बॉलीवुड के पुरुष और महिलाएं शूटिंग के सिलसिले में काफी वक्त साथ बिताते है। इस सूरतेहाल में उनके बीच प्रेम-प्रकरण पनप जाता है या वे आपस में शारीरिक आकर्षण के मायाजाल में फँस जाते है। बॉलीवुड में ऐसे अनेक विवाहित एवं अविवाहित अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के उदाहरण मौजूद है, जिन्होंने शादी किए बगैर लंबे समय तक प्रेम प्रसंग अथवा लिव इन संबंध कायम रखे। कुछ युगलों ने शादीशुदा होने के बावजूद अपने लिव इन पार्टनर के साथ कानून की नजर में अमान्य दूसरी शादी भी रचायी। इस संदर्भ में ताजा उदाहरण बॉलीवुड की स्वप्न सुंदरी अर्थात हेमामालिनी का दिया जा सकता है। हेमामालिनी ने राज्यसभा के आधिकारिक रिका‌र्ड्स में अपना जो बॉयोडेटा पेश किया, उसमें पति के नाम के आगे उन्होंने धर्मेन्द्र लिखा है। गौरतलब है कि उनके पति धर्मेन्द्र भी लोकसभा के सदस्य है। धर्मेन्द्र ने आधिकारिक रूप से अपना जो बॉयोडेटा पेश किया है, उसमें उन्होंने अपनी पहली पत्नी प्रकाश के साथ विवाहित होने की बात कही है। सरकारी या आधिकारिक दस्तावेजों में यह एक विलक्षण मामला है। बहरहाल हॉलीवुड में कई ऐसी अभिनेत्रियां रही है, जिन्होंने अन्य महिलाओं के पतियों के साथ रोमांस किया। इनमें से कुछ ने दूसरी महिलाओं के पतियों के साथ अंतत: शादी भी रचायी। इस संदर्भ में श्रीदेवी, सारिका और कथित रूप से रानी मुखर्जी आदि के चंद महत्वपूर्ण उदाहरण पेश किए जा सकते है। ऐसी चर्चा है कि रानी मुखर्जी यशराज फिल्म्स के प्रमुख और निर्माता-निर्देशक आदित्य चोपड़ा के साथ रोमांस कर रही हैं।

जागरण से साभार

Friday

एक खुला खत आतंकवादियों के नाम

प्रिय महानुभावो, इस खत का मकसद उन गलतफहमियों को दूर करना है जो हमारे और आपके बीच हैं। जयपुर, बेंगलुरु, अहमदाब

ाद, दिल्ली और अब गुवाहाटी - हाल के इन आतंकी हमलों से यह एकदम साफ है कि आपके दिलों में बेहद गुस्सा है। गुस्सा हमारे दिलों में भी बहुत है। पिछले छह दशकों से हर पांचवें साल चुनाव के कुछ हफ्तों के दौरान हमारे इस गुस्से की वजहें भूख, बेरोजगारी, बिजली, सड़क आदि मुद्दों के रूप में सामने आती रही हैं। लेकिन, यह चर्चा फिर कभी।

सच बताएं तो कटे-फटे शरीर, बिखरे खून की तस्वीरें हमें विचलित कर देती हैं। यह खून आम आदमी का होता है, जो हर पांच साल के बाद आने वाले उस एक दिन के लिए जीता है, जब वह लंबी कतारों में खड़े होकर शांति से वोट देने के लिए अपनी बारी का इंतजार करता है। बाकी के दिन वह गलियों में रेंगता रहता है, क्योंकि मुख्य सड़कें प्राय: उन लोगों के काफिलों के लिए रिज़र्व रहती हैं जिन्हें वोट देकर वह सत्ता में पहुंचाता है।

मुझे पक्का यकीन है कि आपलोग हमारे ही आसपास के होंगे। आप भी उन स्कूलों में से किसी में जरूर गए होंगे जिन पर इस देश को इतना नाज़ है। जहां, शिक्षक अगर हों तो वे ऊंघते होते हैं, फर्नीचर हो तो वह टूटा-फूटा होता है, खाना हो तो वह सड़ा-गला होता है और मकान हो तो वह जर्जर होता है। उससे पहले आप लोग भी हमारे बीच ही पल-बढ रहे होंगे, जब नफरत ने आपको जकड़ लिया और आप वह बन गए जो कि आज आप हैं।

आश्चर्य नहीं कि आप हमारे बारे में इतनी सारी बातें इतने अच्छे से जानते हैं। लेकिन, मैं आपको एक जरूरी बात बताना चाहता हूं। आप गलत लोगों को निशाना बना रहे हैं। हम लोग नाचीज़ हैं। हमारे खून का कोई रंग नहीं। हमारी जिंदगी का भी कोई मोल नहीं है। जिस दिन हम अपना प्रतिनिधि चुन लेते हैं, बस उसी दिन से हम जीना छोड़ देते हैं। उसके बाद से हमारे प्रतिनिधि ही जीते हैं। हालांकि, हम मरते नहीं, क्योंकि हमें पांच साल के बाद फिर वोट देना होता है और इस दौरान तरह-तरह के टैक्स भी चुकाते रहना होता है।

हमारी कोई सुरक्षा नहीं, लेकिन हमारे प्रतिनिधि चौबीसो घंटे कड़ी सुरक्षा में रहते हैं। हम अपना प्रतिनिधि इसलिए चुनते हैं ताकि वे हमारी शिकायतें सुन सकें। अगर आपको हम आम लोगों से कोई शिकायत है तो कृपया उनसे मुखातिब हों। उनका पता? सबसे आलीशान इलाकों की सबसे आलीशान इमारतें।

अग्रिम धन्यवाद
एक आम आदमी
साभार-नवभारतटाइम्स.कॉम

Thursday

यह नहीं है मेरा गांव

  • मंतोष कुमार सिंह
बरसों बाद गया गांव
गलियों से हो गया अंजान
बदल गया था नक्शा
गांव का
पगडंडिया, खरंजे, खेतों के मेढ़
सबकी बदल गई थी तस्वीर
अलकतरे की लेप पर चलते हैं लोग
अब पप्पू, सोनू, मोनू और गोलू
नहीं खेलते ओल्हा-पत्ती
बगीचों में खड़ी हैं बिल्डिंगें
नहीं होता गुल्ली-डंडा
नहीं होता डागा दौड़
क्रिकेट होता चारो ओर
काकी, ईया, काका, बाबा
नहीं दिखते खाट पर
टांगा और बैल गाड़ी
नहीं दौड़ती सडक़ों पर
डाकिया भी नहीं दिखता
झोले में संदेशा लेकर
हर हाथ में मोबाइल
हर गलियों में मोटरसाइकिल
यह नहीं है मेरा गांव

Wednesday

घृणा की राजनीति की बलि चढ़ा धर्मदेव

उत्तर प्रदेश के पिछड़े संतकबीर नगर जिले से रोजी रोटी की तलाश में मुम्बई गए धर्मदेव राय को क्या पता था कि वह घृणा की राजनीति की भेंट चढ़ेगा और दीपावली और छठ पर्व के लिये घर जाने निकले उस युवक की यात्रा श्मशान घाट पर खत्म होगी। तीन दिन पहले मुम्बई में कथित पुलिस मुठभेड़ में बिहार की राजधानी पटना के राहुल राज की मौत की हलचल खत्म भी नहीं हो पायी थी कि नवी मुम्बई के वाशी इलाके में रहने वाला धर्मदेव की पिटाई से हुई मौत से घृणा के भाव को कुछ और बढ़ा दिया। राहुल राज की कथित मुठभेड़ पर मुम्बई पुलिस ने अपना पीठ थपथपाई थी तथा महाराट्र के राजनीतिक दलों ने भी इसे सही कदम ठहराया था लेकिन अब धर्मदेव की हत्या के मामले में कोई भी कुछ बोलने को तैयार नहीं है। न तो मुम्बई पुलिस और न शिवसेना या महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना जैसे घृणा की राजनीति करने वाले दल। धर्मदेव मंगलवार को अपने घर आने के लिये ट्रेन पकडऩे लोकमान्य तिलक टॢमनस आ रहा था। मुम्बई की जीवन रेखा कही जाने वाली लोकल ट्रेन के जिस डिब्बे में वह सवार था उसमें कुछ ऐसे तत्व भी बैठे थे जो कुछ राजनीतिक दल और नेताओं के इशारे पर उत्तरभारतीयों को अपना दुश्मन मान रहे थे। बात-बात में उन सभी लोगों ने उसकी तथा उसके तीन और साथियों की पिटाई शुरू कर दी। धर्मदेव को इतना पीटा गया कि उसकी मौत हो गयी तथा उसके तीनों दोस्त बुरी तरह से जख्मी हो गये। दुखदायी तो यह था कि धर्मदेव के परिवार वालों को उसका शव देखना भी नसीब नहीं हुआ। उसके दोस्तों तथा कुछ और लोगों ने उसका कल मुम्बई में ही अंतिम संस्कार कर दिया। धर्मदेव के बड़े भाई ब्रहम्देव राय ने कहा कि उसके मौत की खबर आने के बाद मां बाप और उसकी पत्नी सन्न है। धर्मदेव की पत्नी दीपमाला की आंखों से तो आंसू रूकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। वह गर्भवती भी है। उन्होंनें कहा कि मेरे भाई की हत्या से मुम्बई में काम करने वाले उत्तर प्रदेश के लोगों में दहशत फैल गयी है और सब अपने आप को मौत के बीच घिरा पा रहे हैं। केन्द्र सरकार यह साफ करे कि वह क्या चाहती है। यदि वह मुम्बई में रहने वाले उत्तर भारतीयों की सुरक्षा नहीं कर सकती है तो मुम्बई समेत पूरे महाराष्ट्र में जाने वाले उत्तर भारतीयों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिये। उन्होंनें कहा कि धर्मदेव के साथ जिन तीन लोगों की पिटाई की गयी वह सभी संतकबीर नगर जिले के ही रहने वाले हैं। धर्मदेव का अंतिम संस्कार भी उन तीनों ने अन्य लोगों की मदद से किया।

Monday

ऐसे पाएं मां लक्ष्मी की कृपा

दीपावली पूजन के समय मां लक्ष्मी की एक पुरानी तस्वीर पर महिलाएं अपने हाथ से संपूर्ण सुहाग सामग्री अर्पित करें। अगले दिन स्नान के बाद पूजा करके उस सामग्री को मां लक्ष्मी का प्रसाद मानकर स्वयं प्रयोग करें तथा मां लक्ष्मी से अपने घर में स्थायी वास की प्रार्थना करें। इससे मां लक्ष्मी की कृपा सदा बनी रहती है।

आर्थिक स्थिति में उन्नति के लिए दीपावली की रात सिंह लग्न में श्रीसूक्त का पाठ करें। श्रीसूक्त में 15 ऋचाएं हैं। प्रत्येक ऋचा अति शक्तिशाली होती है। सिंह लग्न मध्य रात्रि में होता है। उस समय लाल वस्त्र धारण करके लाल आसन पर बैठ कर लक्ष्मी जी की तस्वीर के सामने शुद्ध घी का बड़ा दीपक जलाएं। श्रीसूक्त का 11 बार पाठ करें। फिर हवन कुंड में अग्नि प्रज्वलित करें और श्रीसूक्त की प्रत्येक ऋचा के साथ आहुति दें। तत्पश्चात् थोड़ा जल आसन के नीचे छिड़कें और उस जल को माथे पर लगाएं।

दीपक को दोनों हाथों में लेकर अपने निवास स्थान के ऐसे स्थान पर आ जाएं , जहां से आकाश दिखाई देता हो। वहां मां लक्ष्मी से अपने घर की समृद्धि के लिए प्रार्थना करें। फिर उस दीपक को लेकर पूरे घर में घूम जाएं और अन्त में उसे पूजा स्थल में रख दें। इस प्रयोग से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं। इसके बाद प्रत्येक शुक्ल पक्ष की पंचमी को श्रीसूक्त से हवन करें।

लक्ष्मी विष्णुप्रिया हैं। दीपावली पूजन के समय गणेश - लक्ष्मी के साथ विष्णु जी की स्थापना अनिवार्य है। लक्ष्मी जी के दाहिनी ओर विष्णु जी तथा बाईं ओर गणेश जी को रखना चाहिए।

दीपावली के दिन पीपल का एक अखंडित पत्ता वृक्ष से प्रार्थना करके तोड़ लाएं और इसे पूजाघर अथवा किसी अन्य पवित्र स्थान पर रख दें। फिर प्रत्येक शनिवार को नया पत्ता तोड़कर उस स्थान पर रखें और पुराने पत्ते को पेड़ के नीचे रख आएं , घर में लक्ष्मी का स्थायी वास होगा।

लक्ष्मी समुद्र से उत्पन्न हुई हैं। समुद्र से ही उत्पन्न दक्षिणावर्ती शंख , मोती शंख , कुबेर पात्र , गोमती चक्र आदि उनके सहोदर अर्थात भाई - बंधु हैं। इनकी आपके घर में उपस्थिति हो , तो लक्ष्मी जी प्रसन्न होकर घर आती हैं। अत : दीपावली पूजन में इन वस्तुओं में से जो भी संभव हो , उसे घर में रखें। लक्ष्मीजी की कृपा प्राप्त होगी।
नवभारत टाइम्स

Sunday

दीपावली की हार्दिक शुभकामानायें


ये दिवाली आपके जीवन में सुख समृद्धि लाये, हर तरफ हरियाली हो, हर तरफ प्यार की बरसात हो,भाईचारा बना रहे

Saturday

हरे सोने की खान 'शैवाल'

ईंधन के विकल्प के तौर पर जैव ईंधन में सम्भावनाएं बढ़ती ही जा रही हैं। जटरोफा (रतनजोग), नारियल व सोयाबीन से जैव ईंधन निकालने में सफलता मिलने के बाद अब तालाब व गड्ढ़े-नाले में जमने वाली काई (शैवाल) में भी वैज्ञानिक ईंधन की महक देख रहे हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक शैवाल का 50 फीसदी हिस्सा र्ईंधन होता है और इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यह निकट भविष्य में हरे सोने की खान साबित हो।इतना ही नहीं, वैज्ञानिक 'शैवाल र्ईंधन' को दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन का दर्जा दे रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इसमें पिछले जैव ईंधन के विकल्पों की तरह समस्याएं सामने नहीं आएंगी, जैसे कि विशेषज्ञों द्वारा जटरोफा से मिट्टी की उर्वरा शक्ति पर दूरगामी प्रतिकूल असर पडऩे की आशंका हो या फिर कृषि योग्य भूमि व सिंचाई के लिए जल की समस्या हो। क्योंकि, शैवाल बंजर जमीन पर गंदे-खारे पानी में ही उपजती है। साथ ही इसमें अन्य विकल्पों की बनस्पत प्रति हैक्टेयर छह से दस गुना अधिक र्ईंधन व ऊर्जा के उत्पादन की सम्भावना भी है। कार्बन डाई आक्साइड (सीओ2) के उत्सर्जन को कम करने व ऊर्जा के संतुलित विकल्प के लिए कार्य करने वाली ब्रिटेन की सरकारी अनुदान प्राप्त स्वायत्त संस्था 'कार्बन ट्रस्ट' ने शैवाल ईंधन के निर्माण की दिशा में पहल करते हुए लाखों पाउण्ड की परियोजना शुरू भी कर दी है। परियोजना का लक्ष्य सन् 2020 तक शैवाल को पेट्रोलियम ईंधन का एक बेहतर विकल्प बनाना है। ट्रस्ट के निदेशक मार्क विलियमसन के मुताबिक शैवाल ईंधन सडक़ व वायु परिवहन में पेट्रोलियम खपत के एक बड़े हिस्से की पूर्ति कर सकता है। साथ ही इससे हर वर्ष दुनिया भर में 16 करोड़ टन कार्बन डाई आक्साइड के उत्सर्जन को कम किया जा सकेगा। विशेषज्ञ यह भविष्यवाणी भी कर रहे हैं कि सन् 2030 तक यह विश्व की कुल विमान र्ईंधन खपत का 12 फीसदी हिस्सा पूरा कर सकता है। फिलहाल, वैज्ञानिकों के बीच इस बात पर चर्चा चल रही है कि व्यावसायिक जरूरतों को पूरा करने के लिए शैवाल ईंधन का उत्पादन औद्योगिक पैमाने पर कैसे किया जाए? साथ ही यह चुनौती भी है कि शैवाल र्ईंधन को अधिक से अधिक किफायती कैसे बनाया जाए? उल्लेखनीय है कि दुनिया भर में पेट्रोलियम संसाधन की घटती मात्रा व ईंधन की बढ़ती कीमत के मद्देनजर जैव ईंधन को भविष्य के एक बेहतर ऊर्जा विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। जैव ईंधन (बायो फ्यूल) को 'ग्रीन ऑयल' भी कहा जा रहा है और इसे टिकाऊ परिवहन ईंधन माना जा रहा है।

हेलमेट पहना तो गुलाब, नहीं तो...

उड़ीसा की राजधानी में अब हेलमेट पहनना काफी फायदेमंद साबित होने वाला है क्योंकि अब हेलमेट पहनने वालों को एक खूबसूरत लड़की से गुलाब मिलेगा। वहीं जिन लोगों को हेलमेट के बिना पकड़ा गया उन्हें वो लड़की राखी बांधकर भैया बना लेगी।
ये उड़ीसा की ट्रैफिक पुलिस की एक नई स्कीम है जो इसके जरिए हेलमेट पहनने की महत्ता को उजागर करना चाहती है।
इस नेक काम के लिए आगे आएं हैं वहां के इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र और छात्राएं। ये सभी हेलमेट लगाए लोगों को गुलाब का फूल देंगे। वहीं जिन लोगों को बिना हेलमेट के पाया जाएगा उन्हें फूल के बजाए अपने हाथ पर लड़कियों से राखी बंधवानी पड़ेगी।
ऐसे ही एक व्यक्ति रवींद्र मोहंती ने कहा कि अब मैं जरूर हेलमेट पहनूंगा। दरअसल रवींद्र को शहर के राजमहल स्क्वॉयर पर बिना हेलमेट के स्कूटर चलाते हुए पकड़ा गया था और उसके बाद एक लड़की से उनके हाथ पर राखी बंधवाई गई थी।
रवींद्र कहते हैं कि अगर अगली बार भी मैं उसी लड़की के सामने पकड़ा गया तो मुझे काफी बुरा लगेगा इसलिए मैंने हेलमेट पहनना शुरू कर दिया है।
20 साल के अभिमन्यु मोहपात्रा कहते हैं कि लड़की द्वारा गुलाब का फूल मिलने की बात से मैं पहले काफी डर गया था लेकिन बाद में काफी अच्छा लगा। एक खूबसूरत लड़की ने मुझे एक गुलाब का फूल दिया क्योंकि मैंने हेलमेट पहना था।
इस ट्रैफिक नियम का पालन महिलाओं के लिए भी लागू किया गया है। इनके साथ पुरुष इन्हें फूल देंगे या फिर राखी बांधेंगे।
रुक्मिनी साहू बताती हैं कि मुझे उस वक्त बहुत शर्म आई जब एक लड़के ने मेरी कलाई पर राखी बांधी। आगे से ऐसे शर्मनाक हालात से बचने के लिए मैं हमेशा हेलमेट पहनूंगी।
मालूम हो कि उड़ीसा में सड़क हादसों की दर सबसे अधिक है। अधिकारियों के मुताबिक हर रोज राज्य में सड़क हादसों में कम से कम 10 लोगों की मौत होती है।
पुलिस का कहना है कि कई बार फाइन लगने के बावजूद लोग हेलमेट नहीं पहनते इस वजह से उन्हें इस नायाब तरीके के बारे में सोचना पड़ा।
भुवनेश्वर-कटक पुलिस कमिश्नर बी के शर्मा का कहना है कि ट्रैफिक पुलिस हर रोज दो सौ से तीन सौ लोगों ने 100 रुपए फाइन वसूलती है लेकिन फिर भी लोग हेलमेट का इस्तेमाल नहीं करते। कुछ तो फैशन के चक्कर में और कुछ आदत न होने के कारण ऐसा करते हैं।
पहले दिन यानी गुरुवार को ही लड़कियों ने करीब 4 हजार गुलाब के फूल दिए और 2 हजार के करीब राखियां भी बांधी।

Friday

छठ पर रात 10 बजे तक बजेंगे लाउडस्पीकर

सुप्रीम कोर्टने मुंबईमें छठ पर्व के दौरान रात 10 बजे तक लाउडस्पीकर के इस्तेमाल की इजाजत दे दी है। बिहारी संघ की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने मुंबई के जुहू तट पर रात 10 बजे तक लाउडस्पीकर बजाने की अनुमति दे दी है। उल्लेखनीय है कि पिछले साल 19 अक्टूबर को मुंबई हाईकोर्ट ने छठ पर्व पर लाउडस्पीकरों के प्रयोग पर रोक लगा दी थी। हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ बिहारी संघ ने पिछले साल ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। हालांकि, उस दौरान इस पर सुनवाई नहीं हो सकी। जिसके बाद सुप्रीम कोर्टमें इस संदर्भ में एक ताजा याचिका दायर की गई थी।

Tuesday

अब इम्फाल में धमाका, 14 मरे

तमामा उपायों और भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच भी देश में बम धमाके रूकने का नाम नहीं ले रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की सारी तैयारियां धरी की धरी रह जा रही हैं और आतंकी अपने मंशुबों में आसानी से कामयाब होते जा रहे हैं। कब, कहां धमाका हो जाए, यह आतंकियों को छोडक़र किसी को भी पता नहीं है। मंगलवार को आतंकियों की नापाक इरादों की शिकार मणिपुर की राजधानी इम्फाल हुई।
बम विस्फोट में 14 लोगों की मौत हो गई और 16 अन्य घायल हो गए। विस्फोट रात करीब 8।00 बजे हुआ। पुलिस के अनुसार धमाक शहर के बेहद सुरक्षा वाले इलाके में हुआ तथा विस्फोट बेहद शक्तिशाली था। विस्फोट पुलिस कमाण्डो प्रशिक्षण के प्रशिक्षुओं के लिए बने घरों के पास हुआ, हालांकि मरने वालों में सभी आम नागरिक हैं। 11 लोगों की मौत घटनास्थल पर ही हो गई, जबकि तीन अन्य ने अस्पताल में दम तोड़ा। घयलों को नजदीक के अस्पताल में भर्ती कराया गया है। पुलिस विस्फोटक की जांच कर रही है। अभी तक किसी संगठन ने विस्फोट की जिम्मेदारी नहीं ली है। विस्फोट के बाद पूरे राज्य में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। उल्लेखनीय है कि यह पूर्वोत्तर राज्यों में पिछले तीन महीनों में दूसरा बड़ा विस्फोट है। इसके पहले आतंकियों ने अगरतला को निशाना बनाया था। माना जा रहा है कि मंगलवार इम्फाल में हुए धमाके का उद्देश्य सुरक्षा बलों को निशाना बनाना था।

Monday

अज्ञात रावण

चित्रा मुद्गल
पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन, सामाजिक कार्यो में सहभागिता और अस्वस्थता के चलते नियमित रूप से साहित्यिक रचनाओं को पढ़ने का समय तो नहीं निकाल पाती हूं, फिर भी यथासंभव प्रयास करती हूं कि निश्चय 'शिड्यूल' बनाकर ही किसी रचना को पढ़ा जाए। पिछले दिनों भोपाल यात्रा के दौरान कुंवर नारायण की काव्य कृति 'वाजश्रवा के बहाने' पढ़ने का मौका मिला। उनकी यह विलक्षण रचना है। मैं इसे समकालीन हिंदी काव्य की उपलब्धि मानती हूं। इसमें नचिकेता की वापसी के बहाने, परिस्थितिजन्य विषमताओं और आंतरिक द्वंद्वों को नई संवेदनाओं के माध्यम से देखने की कोशिश की गई है। मुझे लगता है कि कुंवर जी के कविता लेखन की पराकाष्ठा है।
हाल में ही दिवंगत हुए पटकथा लेखक और कवि शब्द कुमार द्वारा रचित काव्य नाटक, 'अज्ञात रावण' अपनी तरह की विशिष्ट रचना है। इसमें रावण के उस व्यक्तित्व को नए ढंग से हमारे सम्मुख प्रस्तुत किया गया है जिसे सामान्यत: स्वीकार नहीं किया जाता है। मैं इसे 'अंधा युग' के समतुल्य कृति मानती हूं। हिंदी भाषा में लिखने वाले किसी भी मुस्लिम लेखक का अपने समय के साथ एक बहुआयामी जुड़ाव बहुत कम देखने को मिलता है, इस कमी को काफी हद तक दूर करते हुए मुशर्रफ आलम जौकी ने 'शाही गुलदान' कहानी लिखी है। इसमें गुजरात दंगों के माध्यम से वहां रहने वाले आम मुस्लिमों की दशा को एक मनुष्य के रूप में महसूस किया गया है। इसे पढ़कर मंटो की कहानी 'टोबा टेक सिंह' की याद आ गई। इसी तरह एक साध्वी के माध्यम से जैन समाज में व्याप्त धार्मिक कठमुल्लेपन का बेधड़क खुलासा करते हुए मधु कांकरिया ने 'सेज पर संस्कृत' उपन्यास लिखा है। मधु ने पूरी हिम्मत के साथ धार्मिक आडंबरों के व्यूह में फंसी स्त्री मन की व्यथा को उजागर करने की कोशिश की है।
जहां तक लेखन का सवाल है तो इन दिनों अपने एक उपन्यास 'एक काली एक सफेद' को अंतिम रूप दे रही हूं। यह शीघ्र ही पाठकों के समक्ष आ जाएगा। इसके अलावा डायरी लेखन के बहाने अपने पुराने अनुभवों और संस्मरणों को भी संकलित कर रही हूं। बच्चों के लिए भी कुछ कहानियां लिखी है जो प्रकाशनाधीन है।

Sunday

राहुल ने मेरे सपने चकनाचूर कर दिए

राहुल महाजन से तलाक के बाद उनकी पूर्व पत्नी श्वेता ने अपने विवादास्पद वैवाहिक जीवन पर पहली बार चुप्पी तोड़ी। उन्होंने रविवार को कहा कि राहुल ने उनके सुखी वैवाहिक जीवन के सपनों को चकनाचूर कर दिया।
टीवी चैनल आईबीएन-7 को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, 'हर लड़की चाहती है कि वह अपने पसंद के लड़के के साथ शादी करे और उसके साथ सुखी जीवन बिताए। लेकिन, हमारी शादी के संबंध में ऐसा नहीं हो सका। मेरे सभी सपने टूट गए।'
गौरतलब है कि बीजेपी के स्वर्गीय नेता प्रमोद महाजन के बेटे राहुल और श्वेता की तब से जान पहचान थी जब वे अमेरिका में फ्लाइंग कोर्स की ट्रेनिंग ले रहे थे। श्वेता और राहुल की शादी काफी चर्चा में रही। शादी से कुछ समय पहले राहुल को ड्रग्स के ओवरडोज लेने के कारण अस्पताल में भी भर्ती होना पड़ा। ऐसे वक्त पर राहुल से शादी करने के निर्णय के बारे में श्वेता ने कहा, 'उस समय वे अकेले थे और कोई भी उनके साथ नहीं खड़ा था। इसलिए मैंने अच्छी दोस्त होने के नाते उनका साथ देने का फैसला किया।'

Saturday

पांच जवान बच्चे, फिर भी जिंदगी लावारिस

  • आशुतोष झा
जब मां-बाप बच्चों का पालन पोषण करते हैं तो उनके मन में यही बात रहती है कि बड़े होकर यही बच्चे उनका नाम रोशन करेंगे और बुढ़ापे का सहारा बनेंगे। लेकिन आज नई पीढ़ी में मां-बाप के प्रति संवेदना समाप्त होती जा रही है। कभी-कभी तो वे बुजुर्ग माता-पिता से पल्ला झाड़ने के लिए उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर कर देते हैं। ऐसी ही कहानी है 76 वर्षीय हंसराज मलिक की।
दक्षिणी दिल्ली के आश्रम इलाके के हरीनगर निवासी हंसराज मलिक की पत्नी सालों पहले चल बसीं। उन्हें भरोसा था कि पांच बच्चे हैं, उनके सहारे बुढ़ापा आराम से कट जाएगा। मगर, तीन जवान बेटों व दो बेटियों के रहते वे चार दिनों से गली के फुटपाथ पर पड़े हैं। उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। गली में पड़े अपनों का इंतजार कर रहे हंसराज मलिक की यह दशा देखकर कोई सोच भी नहीं सकता कि वे कभी शहर के ठीकठाक कपड़ा व्यापारी हुआ करते थे।
कम उम्र में पत्नी की मौत के बाद भी उन्होंने अपने तीनों बेटों आलोक, अजय, संजय व बेटी नीना व सोनिया के परवरिश में कोई कमी नहीं छोड़ी। आलोक व अजय आज फाइनेंस के धंधे में हैं। आलोक फरीदाबाद में अपने परिवार के साथ तो अजय रोहिणी में अपने परिवार के साथ रह रहे हैं। तीसरा बेटा संजय बनारस में नौकरी कर रहा है। वह वहीं बस गया है। दो बेटियों में बड़ी नीना भी शादी के बाद गाजियाबाद में अपने पति के साथ रह रही है। हंसराज मलिक कुछ दिनों से अपनी सबसे छोटी बेटी सोनिया के साथ हरीनगर में रह रहे थे। चार दिन पहले पिता से पिंड छुड़ाने के लिए सोनिया भी अपने फ्लैट में ताला लगाकर कहीं चली गई और हंसराज मलिक पांच जवान बच्चों के रहते फुटपाथ पर आ गए। चार दिनों से हरीनगर की गली में फटे पुराने कपड़ों के बीच रह रहे मलिक अपने बच्चों को दोष देने के बजाय कहते हैं कि शायद उनकी परवरिश में ही कोई कमी रह गई थी। वे अपनी किस्मत को भी कोस रहे हैं। आस-पड़ोस के लोग हंसराज की हालत पर तरस खाते हुए उन्हें कुछ न कुछ खाने को दे देते हैं।
कुछ लोगों ने उनके बेटों से टेलीफोन पर संपर्क किया तो पहले नाम पता पूछा। जैसे ही उन्हें बताया गया कि उनके पिता सड़क पर लावारिस हालत में पड़े हैं तो रांग नंबर कहकर फोन काट दिया। पड़ोसी ओम प्रकाश सिंघल ने बताया कि हंसराज मलिक 13 अक्टूबर से गलियों में पड़े हैं। वह बीमारी के चलते चलने-फिरने में भी सक्षम नहीं हैं। बृहस्पतिवार सुबह मोहल्ले के लोगों ने सौ नंबर पर फोन कर पुलिस को बुजुर्ग की हालत के बारे में बताया तो कुछ देर बाद दो पुलिस वाले आए। लेकिन उन्हें भी बुजुर्ग की हालत पर तरस नहीं आया। वह थोड़ी देर में आने की बात कह चलते बने। किसी ने टेलीफोन से जब इसकी सूचना सीनियर सिटीजन सेल को दी तो वहां से भी निराशा हाथ लगी।
इस संबंध में जब 'जागरण' ने सीनियर सिटीजन सेल से बात की तो कहा गया, जब बुजुर्गो की सहायता के लिए टोल फ्री नंबर 1291 पर सूचना मिलती है तो उसका काम बस इतना है कि सूचना पुलिस को दे दे। जिससे पुलिस को आगे की कार्रवाई करने में आसानी हो।

प्यार एक बीमारी है, इलाज है सेक्स

सुनने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन यही सच है। डॉक्टरों ने मान लिया है कि प्यार एक बीमारी है और इसका इलाज सेक्स है। यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल की डॉ। लेसेल डॉसन ने एक रिसर्च के आधार पर यह नतीजा निकाला है। उनका कहना है कि प्यार नामक यह बीमारी तब ज़्यादा महसूस होती है जब लोगों को अपना प्यार ज़ाहिर करने का मौका नहीं मिलता। इसकी वजह से गुस्सा, फ्रस्ट्रेशन और यहां तक कि मानसिक रोग भी हो सकते हैं। डॉ. डॉसन के मुताबिक एक अमीर आदमी को एक नौकर से प्यार हो गया, लेकिन उन्हें यह प्यार ज़ाहिर करने की इजाज़त नहीं थी, तो लव सिकनेस साफ नज़र आई। डॉ. डॉसन के नतीजे एक किताब में छपे हैं, जिसका नाम है - लव सिकनेस ऐंड जेंडर इन अर्ली मॉडर्न इंग्लिश लिटरेचर। डॉ. डॉसन ने कहा कि सेक्स के ज़रिए प्यार करने वालों के शरीर से नुकसानदायक तत्व बाहर निकल जाते हैं। यही नुकसानदायक तत्व बीमारियों की वजह बनते हैं। नवभारतटाइम्स.कॉम

Friday

अरविंद अडिगा पर है देश को नाज

बुकर पुरस्कार विजेता अरविंद अडिगा की उपलब्धि पर पूर देश को गर्व है। अडिगा कहते है कि अपने उपन्यास व्हाइट टाइगर के जरिए मैं देश की गरीब जनता के दुख-तकलीफ और भावनाओं को चित्रित करना चाहता था। जिस भारत को मैं जानता हूं, जिस भारत में मैं रहता हूं, उस भारत को मैंने अपने उपन्यास में पेश किया है। वह इस बात से इंकार करते है कि अपने उपन्यास में उन्होंने भारतीय समाज की आलोचना की है। अडिगा कहते है कि मैं गरीबी और अन्य सामाजिक विषमताओं की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहता था, लेकिन पाठकों को बांधे रखना भी मेरा उद्देश्य था। मुझे ऐसी पुस्तकें पसंद है, जो पाठकों की चेतना को प्रभावित कर सकें।
अडिगा के अनुसार जल्द ही पाठकों को उनका अगला उपन्यास पढ़ने का मौका मिलेगा। उनका अगला उपन्यास प्रकाशन के लिए बिल्कुल तैयार है। वह यह कहने में संकोच नहीं करते कि मैं उन लोगों के बारे में लिखना चाहता हूं, जिनके बारे में कभी लिखा नहीं गया।
[यूं लिखा पहला उपन्यास]
अडिगा बताते है कि द व्हाइट टाइगर उपन्यास मैंने टुकड़ों में लिखा था। वर्ष 2005 में मैंने उपन्यास का पहला भाग लिखा और उसे अलग रख दिया। दरअसल मैं स्वयं को ही नहीं समझ पा रहा था। विदेश में लंबा समय बिताने के बाद दिसंबर 2006 में जब मैं भारत लौटा, तो मैंने उपन्यास का प्रथम भाग खोला और उसे दोबारा नए सिरे से लिखना आरंभ किया। इस बार मैंने उपन्यास पूरा करके ही विश्राम लिया। जनवरी 2007 में मेरा उपन्यास पूर्ण हुआ।
[लेखन पर प्रभाव]
अडिगा कहते है कि मुझे लगता है कि मेरे प्रथम उपन्यास लेखन पर तीन अश्वेत अमेरिकी लेखकों राल्फ एलीसन, जेम्स बाल्डविन एवं रिचर्ड राइट का प्रभाव पड़ा है। हालंकि मैंने सालों से उनके कोई उपन्यास नहीं पढ़े। करीब दस साल पहले मैंने एलीसन का उपन्यास इनविजीबिल मैन पढ़ा था। यह उपन्यास मैंने दोबारा कभी नहीं पढ़ा, पर मुझे लगता है कि अप्रत्यक्ष रूप से उनका प्रभाव मेर लेखन पर पड़ा है। वैसे मैं किसी पहचान से बंधा नहीं हूं।
जागरण

Thursday

जेट से निकाले गए कर्मचारी बहाल होंगे

एक बेहद नाटकीय डेवलपमंट के तहत जेट एयरवेज ने अपने सभी निकाले गए कर्मचारियों को
दोबारा काम पर बुलाने का फैसला किया है। जेट एयरवेज के चेयरमैन नरेश गोयल ने गुरुवार देर रात एक प्रेस कॉन्फरन्स में इस बात का ऐलान करते हुए कहा कि जेट के सभी कर्मचारी मेरे परिवार का हिस्सा हैं। बेहद भावुक हो चुके गोयल ने कहा कि मैं अपने लोगों का दर्द समझता हूं। मैं भी जवानी में इस दौर से गुजर चुका हूं। नरेश गोयल ने कहा कि मैंने यह फैसला किसी दबाव में नहीं लिया है। गोयल ने कहा कि इस छटनी और फिर बहाली का किंगफिशर के साथ गठजोड़ से कोई ताल्लुक नहीं है। नरेश गोयल ने कहा कि मुझे किसी सियासी पार्टी या नेता का डर नहीं है, मुझे सिर्फ भगवान और परिवार की फिक्र है। उन्होंने कहा कि मैं दो दिनों से कहीं बाहर था, लेकिन जब मैं वापस आया तो मुझे सारी बात पता चली, जिससे मुझे काफी दुख हुआ। उन्होंने कहा कि मुझे मैनिजमंट ने इस फैसले के बारे में पूरी जानकारी नहीं दी थी। उन्होंने कहा कि मैं अंकगणित, नफा-नुकसान और अर्थशास्त्र के बारे में ज़्यादा नहीं जानता। उन्होंने कहा कि मैं इमोशनल आदमी हूं। मैं अपने परिवार में किसी को भी रोते हुए नहीं देख सकता। सभी कर्मी मेरे बच्चे की तरह हैं। मेरी बेटी 19 साल की है। वह सभी 19-21 साल के हैं। हम सभी उड़ना चाहते हैं। कोई भी ज़मीन पर नहीं आना चाहता है।
नवभारतटाइम्स

पागल बना देती है पायल

कभी पागल बना देती है पायल
कभी घायल कर देती है पायल
जो झनकती है कानों में
दिल में उतर जाती है
मेरी हसरत को
दिवाना बना देती है पायल
न सुनू खन से खनकना
तो सुकून नहीं मिलती
मेरी नजरों में हर पल
रुसवाई बन जाती है पायल
कभी पागल
कभी घायल
बना देती है पायल

मंतोष कुमार सिंह

न्यायमूर्ति हाजिर हो.....

  • महेश परिमल
न्याय और अन्याय के बीच अधिक अंतर नहीं होता। जिसे न्याय मिलता है, उसका प्रतिद्वंद्वी यही मानता है कि उसके साथ अन्याय हुआ है। न्यायाधीश का निर्णय कभी निष्पक्ष नहीं हो सकता। जिसे न्याय मिला, वह भी तो एक पक्ष है, फिर यह निर्णय निष्पक्ष कैसे हुआ? जितना अंतर न्याय और अन्याय के बीच है, उतना ही अंतर कामयाब और नाकामयाब के बीच है। अन्याय को लेकर हमेशा बड़ों पर ऊँगली उठती है। पर अब हमारे देश में न्याय को लेकर भी ऊँगलियाँ उठने लगी हैं। अब पंच परमेश्वर वाली बात केवल कहानियों तक ही सिमट गई है। हाल ही में देश के कुछ न्यायाधीशों की गलत हरकतों से यह साफ हो गया कि अब वे अन्याय को न्याय में बदलने के लिए अपने को बदलने के लिए तैयार हैं।
आज देश के समग्र न्यायतंत्र पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप की काली छाया मँडराने लगी है। सामान्य मनुष्य का अपराध एक बार माफ किया जा सकता है, किंतु सरकार ने जिन्हें न्यायाधीश की कुर्सी पर बिठाया है, वे यदि अपराध करते हैं, तो उन्हें किस तरह से माफ किया जाए? इन दिनों देश की अदालतों में न्यायमूर्तियों पर भ्रष्टाचार का एक नहीं, बल्कि तीन गंभीर मामलों की जमकर चर्चा है। इन तीन मामलों के कारण देश की न्यायतंत्र की प्रतिष्ठा दाँव पर लग गई है।
पहला मामला कोलकाता हाईकोर्ट के जज सौमित्र सेन द्वारा 32 लाख रुपए हड़प लेने का है। इस मामले में जज ने अपना इस्तीफा नहीं देने का निर्णय लिया है। किंतु उन्हें बर्खास्त करने के लिए सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस ने केंद्र सरकार को संसद में इंपिचमेंट का मोशन लाने का अनुरोध किया है। दूसरा मामला पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जज निर्मल यादव का है, जिन पर 15 लाख रुपए की रिश्वत लेने के आरोप के तहत पूछताछ करने की अनुमति सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस ने दे दी है। तीसरा मामला तो और भी गंभीर है, जो गाजियाबाद का है। यहाँ की अदालत में चतुर्थ वर्ग के कर्मचारियों के प्रोविडंट फंड के खातों में से निकाले गए 23 करोड़ रुपए फर्जी वाउचरों के माध्यम से निकाले गए। इस धनराशि का उपयोग तत्कालीन 36 यूडिशियल ऑफिसरों के लिए विविध ऐश्वर्यशाली वस्तुएँ खरीदने में किया गया। इस मामले में सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट के 11 जजों को लिखित रूप से आरोपों का जवाब देने के लिए कहा है। यह काम उत्तरप्रदेश पुलिस को सौंपा गया है।
गाजियाबाद की कोर्ट की तिजोरी से जिस तरह से 23 करोड़ रुपए निकाले गए और उसका उपयोग जजों के लिए घरों के सामान खरीदने के लिए किया गया, उसके कारण देवतास्वरूप न्यायमूर्तियों के आचरण को लेकर कुछ सोचने के लिए विवश कर दिया। गाजियाबाद की एडीशनल सेशन्स जज श्रीमती रमा जैन को खयाल आया कि इस वर्ष फरवरी माह में अदालत की तिजोरी से फर्जी वाउचरों के माध्यम से 23 करोड़ रुपए निकाले गए हैं। उन्होंने तुरंत ही इसकी सूचना गाजियाबाद पुलिस को दी और एफआईआर दर्ज कराया। इसके बाद गाजियाबाद के एसएसपीए ने इस मामले की जाँच शुरू की।
पुलिस जाँच में यह सामने आया कि इस मामले के मुख्य सूत्रधार राजीव अस्थाना हैं। जिसने विभिन्न डिस्ट्रिक्ट जजों की सूचना से 2001 और 2007 के बीच अदालत की तिजोरी में से 23 करोड़ रुपए हड़प लिए थे। पुलिस के सामने अपने बयान में उसने इस बात को स्वीकार किया था कि इन रुपयों का उपयोग उसने अनेक जजों के लिए उनकी घर-गृहस्थी के सामान को खरीदने में किया था, जिसमें सुप्रीमकोर्ट के एक जज और इलाहाबाद हाईकोर्ट के 11 जज भी शामिल थे। अस्थाना ने यह भी दावा किया था कि गाजियाबाद के भूतपूर्व डिस्ट्रिक्ट जज आर।एस. चौबे के कहने पर उसने सुप्रीमकोर्ट के एक वर्तमान न्यायमूर्ति के घर भी टॉवेल, बेड-शीट, क्रॉकरी आदि चीजें पहुँचाई थीं। बाद में अस्थाना ने गाजियाबाद के एडिशनल चीफ युडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने भी इस प्रकार का बयान दिया था। गाजियाबाद की कोर्ट में काम करने वाले तृतीय और चतुर्थ वर्ग के कर्मचारियों के वेतन में से जो राशि प्रोविडन्ट फंड और ग्रेयुटी के रूप में काट ली जाती है, उसे अदालत की तिजोरी में जमा कर लिया जाता है। अस्थाना के अनुसार उसने इन खातों में से गलत बाउचर बनाकर 23 करोड़ रुपए हड़प लिए थे। इन रुपयों में से कोलकाता हाईकोर्ट के एक वर्तमान जज के घर उसने टी.वी., फ्रिज और वॉशिंग मशीन जैसे उपकरण भी खरीद कर पहुँचाए थे। अस्थाना ने ऐसा दावा किया है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के कम से कम सात सिटींग जजों को भी इन रुपयों में से लाभ मिला है। इनके लिए भी कम्प्यूटर, मोबाइल फोन, फर्नीचर आदि वस्तुएँ खरीदी गई थीं। गाजियाबाद के एसएसपी ने इन जजों से पूछताछ करने की अनुमति सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस से माँगी हैं। उन्हें इस संबंध में मात्र लिखित प्रश्न पूछने की ही छूट दी गई है। गाजियाबाद के एसएसपी दीपक रतन का कहना है कि इस संबंध में उन्हें 36 न्यायमूर्तियों को पूछने के लिए प्रश्नों की सूची तैयार कर राय सरकार को भेजी है। इन सवालों की एक बार सुप्रीमकोर्ट भी जाँच करेगी, उसके बाद ही सवालों को संबंधित न्यायाधीशों को भेजा जाएगा। इस मामले में अब तक राजीव अस्थाना समेत 83 लोगों के खिलाफ फौजदारी मामला फाइल किया गया। इनमें से 64 की धारपकड़ की गई है। अस्थाना ने यह स्वीकार किया है कि इस मामले में 36 न्यायमूर्ति भी शामिल हैं। इस मामले को एक तरफ राय सरकार रफा-दफा करने की कोशिश कर रही है, दूसरी तरफ भारत के पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण ने सुप्रीमकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर इस मामले की निष्पक्षता से जाँच की माँग की है। इनका साथ गाजियाबाद बार एसोसिएशन और ट्रांसपरंसी इंटरनेशनल नाम की संस्थाओं ने भी किया है। इसके पूर्व सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस के.जी. बालकृष्णन की इच्छा इन याचिकाओं की सुनवाई बंद दरवाजे में करने की थी, पर शांतिभूषण ने यह आरोप लगाया कि सरकार इस मामले को दबाना चाहती है, इसलिए ऐसा किया जा रहा है। इसके मद्देनजर अब इस मामले की सुनवाई खुली कोर्ट में की जा रही है। हमारे देश में हाईकोर्ट या फिर सुप्रीमकोर्ट के कोई भी सिटिंग जज भ्रष्टाचार करे, तो उनके खिलाफ जाँच करने का कोई कानून ही नहीं है। अभी इस मामले की जाँच सुप्रीमकोर्ट जज द्वारा चयन की गई तीन जजों की समिति कर रही है, पर इनकी कार्रवाई अत्यंत गुप्त रखी जा रही है। इस मामले में सरकार की नीयत भी ठीक दिखाई नहीं दे रही है, क्योंकि जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच के लिए संसद में दिसम्बर 2006 में जजीस इंक्वायरी बिल पेश किया गया था, पर सरकार न्यायपालिका के साथ किसी प्रकार का पंगा नहीं लेना चाहती, इसलिए इस प्रस्ताव को ताक पर रख दिया गया। बहरहाल इस मामले का जो भी फैसला आए, पर सच तो यह है कि इस मामले ने जजों को भी संदेह के दायरे में खड़ा कर दिया है। देश के न्यायमूर्तियों को स्वच्छ होना ही नहीं, बल्कि स्वच्छ दिखना भी चाहिए। आज न्याय को लेकर कानून अपने हाथ में लेने से भी लोग नहीं चूक रहे हैं। कानून हाथ में लेना आम बात हो गई है। जो दमदार हैं, उन्हें मालूम है कि न्याय को किस तरह से अपने पक्ष में किया जा सकता है। इस मामले में यदि आरोपी न्यायाधीशों पर किसी प्रकार की ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो निश्चित ही लोगों न्याय पर से विश्वास उठ जाएगा और यह स्थिति बहुत ही भयावह होगी, यह तय है।
हम समवेत

Tuesday

अब कानपुर में धमाका

कानपुर में कर्नलगंज क्षेत्र के बजरिया थाना इलाके में आज हुए एक धमाके में पांच लोग के घायल हो गए है। घायलों में दो की हालत नाजुक बताई गई है। धमाका शाम को लगभग 6.30 बजे एक दुकान के बाहर लावारिस पडी साइकिल में हुआ। पुलिस में बताया कि साइकिल पर एक बैग रखा था, जिसमें संभवत: विस्फोटक था। आज शाम अचानक ही विस्फोट हुआ और चारों ओर धुंआ फैल गया। विस्फोट के बाद साइकिल के परखच्चे उड गए। धमाके में पांच लोग घायल हुए हैं। घायलों को पास ही के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। सूत्रों ने बताया कि घायलों में तीन बच्चे और दो महिलाएं शामिल हैं। घायलों में दो की हालात गभीर बताई गई है। पुलिस ने बताया है कि यह आतंककारी हमला नहीं है। एडीजी कानपुर ने कहा कि धमाका देसी बम से हुआ है। कर्नलगंज इलाका कानपुर में भारी आबादी वाला क्षेत्र है। विस्फोट के बाद इलाके में अफरा तफरी का माहौल फै ल गया। चारों तरफ भागदौड मच गई। धमाके के बाद पुलिस ने एहितायत के तौर पर पूरा इलाका सील कर दिया है। पुलिस सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद करने में जुटी हुई है। फिलहाल इलाके की परिवहन व्यवस्था को वैकल्पिक मार्गों से चलाया जा रहा है।

ज्यादा पीने से सिकुड़ जाता है दिमाग

शराब को गले लगाने वालों के लिए एक नया शोध चिंता पैदा करने वाला है जिसके मुताबिक ज्यादा पीने से दिमाग सिकुड़ जाता है।
अमेरिका में मेसाच्युसेट्स स्थित वेलेसले कॉलेज के वैज्ञानिक केरोल आन पेन की अगुआई में किए गए शोध में यह बात सामने आई है। शोध में पता चला है कि सीमित मात्रा में काफी लंबे समय तक शराब पीने से भी दिमाग सिकुड़ जाता है जबकि काफी अधिक मात्रा में शराब पीने वालों का दिमाग कम समय में ही सिकुड़ जाता है।
इतना ही नहीं महिलाओं में यह खतरा पुरुषों की तुलना में कुछ ज्यादा ही होता है। इसलिये महिलाओं के लिये शराब पीना ज्यादा जोखिम भरा शौक हो सकता है। डॉ. पेन ने बताया कि आमतौर पर महिलाओं का दिमाग पुरुषों की तुलना में छोटा होता है और एल्कोहल के प्रभाव के मामले में महिलाएं ज्यादा संवेदनशील होती हैं इसलिये इनके लिए यह शौक जोखिमभरा कहा जा सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक सप्ताह में एक से सात गिलास तक शराब पीना सेफ माना जा सकता है लेकिन लगभग जीवनभर यह आदत पालकर रखना दिल के लिए भले ही फायदेमंद हो दिमाग के लिहाज से यह नुकसानदायक हो सकती है। जबकि शोध के मुताबिक सात से 14 गिलास शराब सप्ताह में पीना जोखिम के दायरे में आता है। यह जोखिम दिल और दिमाग के अलावा यकृत और अन्य अंगों को भी अपने दायरे में ले लेता है।
आईबीएन-7

Monday

झीलों के शहर के प्यासे लोग

  • मंतोष कुमार सिंह

भोपाल यानी झीलों की नगरी। अगर यहां के लोग भी प्यासे रहने लगें तो इसे गंभीर चुनौती के रूप में देखा जाना चाहिए। जी हां भोपालवासी, पानी की एक-एक बूंद के लिए अभी से जद्दोजहद करने लगे हैं। अल्पवर्षा के कारण भोपाल की जीवन रेखा कहे जाने वाली बड़ी झील की प्यास नहीं बुझ पाई है। झील में केवल दो माह का पानी बचा है। जिसके कारण सरकार ने अगले साल मानसून आने तक लोगों की प्यास बुझाने के लिए एक दिन छोड़कर पानी सप्लाई करने का फैसला किया है।
पानी की समस्या के लिए प्रशासन, प्रकृति और भोपालवासी सभी जिम्मेदार हैं। इस प्रकार की समस्या १९८९ और २००२ में भी आ चुकी है, जब एक दिन छोड़कर पानी की सप्लाई करनी पड़ी थी। इसके बावजूद भी किसी ने सबक नहीं लिया। समस्या के निजाद के लिए कोई भी कारगर कदम नहीं उठाए गए। आज भी भोपाल में ४३ प्रतिशत पानी बेकार चला जाता है, जिसपर नगर निगम लगाम नहीं लगा सका है। अगर मात्र बेकार बह जाने वाले पानी पर ही रोक लग जाए तो ऐसी नौबत नहीं आती, लेकिन कौन जहमत उठाए। नर्मदा नदी जल योजना भी कछुवे की चाल चल रही है। कुल मिलाकर यहां के बाशिंदों से जल ही जीवन है का मतलब पूछा जाए तो वे बेहतर तरीके से बता सकते हैं।

Saturday

रहने दो खुशियों के घर में

अंधेरे में हमने, जीवन गुजारा
उजाले से कैसे, दोस्ती करूंगा
बचपन कटा है, घरौंदों में जिसका
महलों की महफिल, कैसे सजेगी
अंधेरे में -----------------
दिल में न था, गम का किनार
मोहब्बत के दीये, कैसे जलेंगे
अंधेरे में -----------------
उन्हें क्या पता, क्यों हम हैं खफा
मनाते जो हमको, कैसे मनाते
अंधेरे में -----------------
रहने दो हमको, खुशियों के घर में
गांवों की गलियां, कैसे सजेगी
अंधेरे में हमने, जीवन गुजारा
उजाले से कैसे, दोस्ती करूंगा

  • मंतोष कुमार सिंह

Friday

पालना नहीं था तो पैदा क्यों किया मां?

साइबर सिटी गुड़गांव में एक बार फिर एक बच्चे को अस्पताल में छोड़ने की घटना सामने आई है। गुड़गांव के पारस अस्पताल में इसी महीने के 2 अक्टूबर को पैदा हुए इस बच्चे को उसके मां-बाप बेसहारा छोड़कर चले गए। बच्चा अभी भी इसी अस्पताल के ICU में भर्ती है। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
पुलिस के मुताबिक इस बच्चे का जन्म समय से तीन महीने पहले ही हो गया है जिसके कारण इसकी हालत काफी नाजुक बनी हुई है। अस्पताल में इस बच्चे के मां-बाप ने जो पता लिखवाया था वो भी गलत निकला।
पुलिस ने IPC की धारा 337 के तहत मामला दर्ज कर लिया है और वह मासूम के मां-बाप की तलाश कर रही है। दिल्ली से सटे गुड़गांव में पिछले 15 दिनों में बच्चों के छोड़े जाने की ये दूसरी घटना है। दोनों ही घटनाओं में अब तक बच्चों के मां-बाप का पता नहीं चल पाया है। ऐसे में अस्पताल ही इनके लिए एक सहारा है।
आईबीएन-7

Thursday

रावण की भी होती है पूजा

इंद्रधनुषी संस्कृति के देश भारत में मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में राम तो पूजे ही जाते हैं लेकिन कुछ ऐसी जगहें भी हैं जहाँ रावण की पूजा की जाती है और धीरे-धीरे बुराई के इस प्रतीक के समर्थकों की संख्या बढ़ रही है।हाल ही में झारखंड के मुख्यमंत्री शिबु सोरेन ने रावण के पुतले का दहन करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि यह राक्षसराज उनके कुलगुरु हैं जिसके बाद राजनीतिक विवाद भी पैदा हो गया। हालाँकि बिहार से अलग होकर झारखंड के गठन के बाद से वर्ष 2000 से ही राज्य के मुख्यमंत्री रावण का पुतला दहन करते रहे हैं।माना जाता है कि राम ने विजया दशमी के दिन ही रावण का वध किया था जो बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में देश में त्योहार के रूप में मनाया जाता है।
देश में सोरेन अकेले व्यक्ति नहीं हैं जो रावण का सम्मान करते हैं। मध्य प्रदेश के दमोह नगर में एक परिवार ऐसा भी है जो आज भी लंका नरेश रावण को अपना ईष्ट मानता है।दमोह के सिन्धी कैम्प में रहने वाला यह सिन्धी परिवार पीढ़ियों से अपने ईष्ट रावण को पूजता आ रहा है। इस परिवार के सदस्य 32 वर्षीय हरीश नागदेव पूरे जिले में लंकेश के नाम से मशहूर है। वह अपने पूरे परिवार के साथ प्रतिदिन अपने ईष्ट दशानन की पूजा विधि विधान से करते हैं। स्वयं मंत्रों का उच्चारण कर दशानन की मूर्ति को स्नान कराके वस्त्र पहनाते हैं एवं आरती के बाद प्रसाद चढ़ाकर सभी को बाँटते हैं। यह कार्य उनकी दिनचर्या में शामिल है। दशहरा पर दामोह का नागदेव परिवार समूचे उल्लास के साथ शहर के घंटाघर पर रावण के स्वरूप की आरती उतारकर मंगल कामना करता है। नागदेव परिवार ने विशाल लंकेश मंदिर बनाने की वृहद योजना तैयार की है और शासन से जमीन की भी माँग की है।उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, पंजाब, दिल्ली और हरियाणा सहित उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में दशहरा का त्योहार मनाया जाता है और रावण का पुतला दहन होता है। लेकिन महाराष्ट्र के ही आदिवासी बहुल मेलघाट (अमरावती जिला) और धरोरा (गढ़चिरौली जिला) के कुछ गाँवों में रावण और उसके पुत्र मेघनाद की पूजा होती है।यह परंपरा विशेष तौर पर कोर्कू और गोंड आदिवासियों में प्रचलित है जो रावण को विद्वान व्यक्ति मानते हैं और पीढ़ियों से वे इस परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। हर साल होली के त्योहार के समय यह समुदाय फागुन मनाता है जिसमें कुर्कू आदिवासी रावण पुत्र मेघनाद की पूजा करते हैं।मध्यप्रदेश में विदिशा के हजारों कान्यकुब्ज ब्राह्मण रावण मंदिर में पूजा करते हैं। कई क्षेत्रों में दशहरे पर रावण का श्राद्ध भी किया जाता है। उत्तरप्रदेश में कानपुर के निकट भी एक रावण मंदिर है जो दशहरे के मौके पर साल में एक दिन के लिए खुलता है। कर्नाटक के कोलार जिले में भी लोग फसल महोत्सव के दौरान रावण की पूजा करते हैं और इस मौके पर जुलूस निकाला जाता है। ये लोग रावण की पूजा इसलिए करते हैं क्योंकि वह भगवान शिव का भक्त था। लंकेश्वर महोत्सव में भगवान शिव के साथ रावण की प्रतिमा भी जुलूस की शोभा बढ़ाती है। इसी राज्य के मंडया जिले के मालवल्ली तालुका में रावण को समर्पित एक मंदिर भी है। राजस्थान में जोधपुर से करीब 32 किलोमीटर दूर मंदोर में ही रावण का विवाह होने की कथा है। रावण की एक पत्नी का नाम मंदोदरी था और दावा किया जाता है कि इसी स्थान के नाम पर उसका यह नाम पड़ा। इसी क्षेत्र के दवे ब्राह्मण दशहरा पर रावण पूजा करते हैं। कुछ साल पहले इन लोगों ने जोधपुर में रावण मंदिर की स्थापना की घोषणा भी की थी।कथाओं के अनुसार रावण ने आंध्रप्रदेश के काकिनाड़ में एक शिवलिंग की स्थापना की थी और इसी शिवलिंग के निकट रावण की भी प्रतिमा स्थापित है। यहाँ शिव और रावण दोनों की पूजा मछुआरा समुदाय करता है।रावण को लंका का राजा माना जाता है और श्रीलंका में कहा जाता है कि राजा वलगम्बा ने इला घाटी में रावण के नाम पर गुफा मंदिर का निर्माण कराया था।रावण के बारे में जो कथाएँ प्रचलित हैं उनके अनुसार वह ब्राह्मण ऋषि और राक्षण कुल की कन्या की सन्तान था। उसके पिता विशरवा पुलस्त्य ऋषि के पुत्र थे जबकि माता कैकसी राक्षसराज सुमाली की पुत्री थी। कुछ लोगों का यह भी दावा है कि रावण का जन्म उत्तरप्रदेश के एक गाँव में हुआ था।उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद में कटरा का रामलीला शुरू होने पर पहले दिन हर साल रावण जुलूस निकाला जाता है और स्थानीय निवासियों का दावा है कि यह परंपरा पाँच सौ साल पुरानी है। इन लोगों का कहना है कि इसी संगम नगरी में भारद्वाज ऋषि की कुटिया थी और उनकी शिक्षा है कि ब्राह्मणों की पूजा की जानी चाहिए। भारद्वाज ऋषि की इसी शिक्षा को इलाहाबाद में रावण जुलूस का आधार बताया जाता है।

Monday

शर्मा की शहादत का मजाक

राजधानी के जामिया नगर इलाके में बाटला हाउस में पिछले महीने हुए एनकाउंटर में शहीद हुए इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा के परिवार वालों ने समाजवादी पार्टी (सपा) के महासचिव अमर सिंह की ओर से भेजी गई सहायता राशि को लेने से इनकार कर दिया है। शर्मा की शहादत पर उठाए गए सवालों से आहत परिवार ने अमर सिंह का 10 लाख रूपए के चेक को ठुकरा दिया है। मोहन चंद शर्मा की पत्नी माया शर्मा ने कहा कि यह उनके पति की शहादत का मजाक उडाने जैसी बात है।
एनकाउंटर में शर्मा की मौत के बाद अमर सिंह और जामा मस्जिद के शाही इमाम समेत कई नेताओं ने शर्मा के वहां जाने पर सवाल खडे किए थे। अमर सिंह ने कहा था कि "आखिर शर्मा वहां क्या करने गए थे।" उन्होंने इस मामले की न्यायिक जांच कराए जाने की भी मांग की थी।अमर सिंह के बयान से आहत माया शर्मा ने चेक को ठुकराते हुए कहा कि बेटे के गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती होने के बावजूद इंस्पेक्टर शर्मा देश के लिए जान देने चले गए। उन्होंने कहा कि "आखिर कितने लोग ऎसे हैं, जो घर में बूढे मां-बाप और अबोध बच्चों और पत्नी को छोडकर देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर सकते हैं।" उल्लेखनीय है कि राजधानी में गत 13 मई को हुए पांच धमाकों के सिलसिले में आतंकियों को पकडने के दौरान बटाला हाउस में पुलिस और आतंककारियों के बीच हुई मुठभेड में इंस्पेक्टर शर्मा की मौत हो गई थी। इस एंकाउंटर में दो आतंककारी भी मारे गए थे। मुठभेड को लेकर कई सवाल खडे किए गए थे।

Tuesday

आ गइल 'महतारी'

अपनी लोगन के बिछड़ला के केतना दुख होला सबके पता बा। दुख वो समय अउरी बढ़ जाला, जब अपनी 'महतारी' के लोग भुला जाला, अपनी भाषा के बिसरा देला, सांस्कृति से दूर हो जाला, अपनी माटी के महक से अंजान हो जाला। अपनी देश में भी करोड़ों लोग एइसन बाड़ें जे ये तरह के गलती करत बाडऩ। कहे के मतलब बा कि सात समंदर पार रही के भी जनम धरती और भाषा के नाहीं भुलाए के चाहीं। काहें कि इहे आपन जीवन ह, महतारी है। एही लोगन के सजग करे के खातिर हम 'महतारी' ब्लाग लेके आइल बानी। 'महतारी' मतलब अपनी भाषा में आपन बात। 'महतारी' में भोजपुरी से जुड़ल सब जानकारी देवे के कोशिश कइले बानी। उम्मीद बा कि अउरा सभे के 'महतारी' पसंद आई। सुझाव के इंतजार रही।

ब्लाग-http://www.mahtari.blogspot.com
Email- mantosh11@gmail.com

पहिला रचना पेश बा-------

कइसे रहबअ, तोर बिन संघतिया
मंतोष सिंह

जात रहनी बहरा, रुआंसु भइल अंखिया
कइसे रहबअ, तोर बिन संघतिया।।
माई छुटली, बाप अउरी घरवा दुअरिया
जिनगी अंहार भइल, गइल अंजोरिया
जिया में डसेला, परदेस वाली रतिया
कइसे रहबअ, तोर बिन संघतिया।।
गंउवा के खेतवा में, बइठे ना कोयलिया
सरसो ना जौ, गेंहू, लौउके ना बलिया
चारू ओर पसरल बा, दिन में अंहरिया
कइसे रहबअ, तोर बिन संघतिया।।
शादी-बियाह में लौउके नाहीं डोली
छठ, जिऊतिया, तीज होखे नाहीं होली
फुरसत ना बा इंहा, बाटे ना बटोहिया
कइसे रहबअ, तोर बिन संघतिया।।
मन नाहीं लागताअ, लिखतानी पतिया
हमके भेजा दअ यार, गंवई से गडिय़ा
अब ना सहाताअ, परदेस में दरदिया
कइसे रहबअ, तोर बिन संघतिया।।

Friday

महिलाओं को सेना में स्थायी कमीशन

दर्पण में 23.4.08 को खबर प्रकाशिक की गई थी कि महिलाओं को मिलेगा स्थायी कमीशन! जिसपर 26.9.08 को मोहर लग गई पूरी खबर पढीए


सेना के तीनों प्रमुखों की समिति ने महिलाओं को फौज में स्थायी कमीशन देने की सिफारिश के बाद रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने शुक्रवार को इस एतिहासिक फैसले पर मुहर लगा दी।

सैन्य प्रमुखों की समिति ने सशस्त्र बलों में शिक्षा और न्यायिक शाखा में महिलाओं को पुरुषों की तरह स्थायी कमीशन देने की सिफारिश की थी। हालांकि महिलाओं को अभी भी लड़ाकू भूमिका में नहीं रखा जाएगा।

रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी विज्ञप्ति में इस फैसले की पुष्टि करते हुए बताया गया कि एंटनी ने इस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है। गौरतलब है कि अभी तक महिलाओं को सशस्त्र सेनाओं में अस्थायी तौर पर ही लिया जाता था और उनकी नौकरी 15 साल से कम होती है। इसी कारण महिला अधिकारियों को लेफ्टीनेंट कर्नल रैंक से ऊपर का दर्जा नहीं मिल पाता है।
रक्षा मंत्रालय के नियमों के तहत महिलाओं को स्थायी कमीशन देने के मुद्दे को कैबिनेट के पास ले जाने की आवश्यकता नहीं है और रक्षा मंत्रालय मंत्री के स्तर पर यह फैसला लेने के लिए सक्षम हैं। यह महत्वपूर्ण फैसला पिछले एक साल से लंबित था।

हाल ही में एंटनी ने संसद में कहा था कि इस मामले पर सक्रियता से विचार किया जा रहा है और लड़ाई के मोर्चे के अलावा महिलाओं को स्थायी कमीशन दिया जाएगा। इस फैसले के बाद राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और भारतीय सैन्य अकादमी जैसे संस्थानों के द्वार भी महिलाओं के लिए खुल जाएंगे। लेकिन सूत्रों ने बताया कि इस निर्णय से मौजूदा शार्ट सर्विस कमीशन प्राप्त महिला अधिकारियों को लाभ नहीं होगा क्योंकि इससे अनेक तरह की जटिलताएं पैदा होने की संभावना है।

महिलाओं को स्थायी कमीशन के जरिये परिवहन विमान और हेलीकाप्टर तक के पायलट के तौर पर सैन्य बलों में नौकरी मिलती रही है। इसके अलावा मेडिकल, डेंटल और नर्सिग में उन्हें स्थायी कमीशन मिलता रहा है।

पुरुष वर्चस्व की मानसिकता के कारण महिलाओं को स्थायी कमीशन देने की यह सिफारिश काफी ना-नुकर के बाद शीर्ष तक पहुंची है। अलबत्ता अब भी ऐसे सैन्य अधिकारियों की कमी नहीं है जिनके गले महिलाओं को स्थायी कमीशन देने का निर्णय उतर नहीं पा रहा है।

Tuesday

कोई मेरे बच्चे को गोद ले लो

बिहार में बाढ़ ने लाखों लोगों को बर्बाद कर दिया। इस बर्बादी का एक पहलू हम आपको बताने जा रहे हैं। जिसे सुनकर शायद आप अपने आप को रोक न सके। एक मां चाहती है कि कोई उसके बच्चों को गोद ले ले। पुर्णिया के निदान राहत शिविर में अपने चार दुध मुंहे बच्चे को लेकर बैठी एक औरत।

मधेपुरा के रतन पट्टी इलाके की रहने वाली एक औरत के घर में बाढ़ आने तक सब कुछ ठिक चल रहा था। लेकिन बाढ़ आने के बाद घर से पती और बच्चों के साथ निकली सुखीया देवी का बाढ़ के पानी के धार नें सब कुछ छीन लिया। अब सुखीया अपने चारों बच्चों को लेकर दर-दर भटकने को मजबुर है। वो चाहती है की इसके बच्चे को कोई गोद लेले । एक अपने कलेजे के टुकड़ों को अपने से जुदा करना चाहती है। दुनिया में भला कौन सी मां होगी जो अपने बच्चों को ही अपने से दूर करना चाहती है। लेकिन एक ऐसी मां है जो चाहती है ऐसा करना। वो लाचार है, मजबूर है। आपको और हमें इसके दुखों का अंदाजा नहीं हो सकता क्योंकि हमारे पास रहने को पक्के छत का एक घर है। इस मां के पास प्लास्टिक की छत है जिसमें किसी तरह वक्त गुजरता है। हमारे पास बदन छुपाने के लिए अच्छे कपड़े हैं लेकिन इस मां के पास अपने बच्चों और खुद के लिए तन ढकने के लिए कपड़े तक नहीं। हम अपने घरों और होटलों में लजीज खाना खाते हैं इस मां के बच्चे उबले चावल खाकर अपना पेट भरते हैं।दरअसल बाढ़ आने के बाद सुखिया अपने पति और बच्चों के साथ घर से निकली थी। उस वक्त सड़क पर पानी कम होने की वजह से सुखिया अपने तीन बच्चों को लेकर बाहर तो आ गई, लेकिन एक बच्चा पानी में फंस गया। अपने बेटे को बचाने के लिए सुखिया का पति लौटा। लेकिन पानी की तेज धार सुखिया के पति को अपने साथ बहा ले गयी। पिता की लाश नहीं मिली। परंम्परा के मुताबिक पिता की कठपुतली बनाकर बेटे ने उसे आग दी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि कौन पालेगे इन मासूमों को। इस मां की बेबसी देखकर कुछ मदद के लिए आगे जरूर आए हैं। लेकिन वो मदद कुछ दिनों के लिए ही काफी है। इन मासूमों के सामने पूरी जिंदगी पड़ी है। कैसे पालेगी इनको ये वो सवाल है जिसका जवाब ये मां हम सभी की आंखों में तलाश रही है।

आईबीएन-7

Sunday

पापा क्यों वादा तोड़ गए

संजय राय
आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब देते वक्त शहीद हो गए दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा के बेटे दिव्यांशु की आंखों से अब आंसू थम ही नहीं रहे हैं। शुक्रवार की रात तक दिव्यांशु यह सोचकर खुश था कि शनिवार को उसे अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी और वह परिजनों से जाकर मिल सकेगा, लेकिन पिता की शहादत की खबर पाकर उसकी प्रसन्नता काफूर हो गई।
उसकी खुशी गम में बदल गई और पैरों तले से जमीन खिसक गई। दिव्यांशु अब तक नहीं समझ पा रहा है कि उससे मिलने का वादा करने वाले पापा अपना वादा कैसे भूल गए हैं? ज्ञात हो कि दिव्यांशु को यह खबर शुक्रवार तक नहीं दी गई थी कि उसके पिता शहीद हो गए हैं। हालांकि कीर्ति नगर स्थित कालरा अस्पताल में शनिवार की सुबह उस समय अजीब स्थिति पैदा हो गई, जब दिव्यांशु को तीन दिन तक भर्ती रहने के बाद अस्पताल से 'रिलीव' कर दिया गया। उसे घर ले जाने अस्पताल पहुंचे परिजन यही सोचने लगे कि दिव्यांशु को पिता की शहादत की जानकारी कौन दे? यूं तो, सुबह साढ़े छह बजे परिजनों के साथ भारी संख्या में पुलिस मौजूद देखकर दिव्यांशु को शक हुआ, लेकिन चंद सेकेंड बाद जब पिता की शहादत की सूचना मिली, तो वह जैसे बुत में तब्दील हो गया। भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच दिव्यांशु को द्वारका सेक्टर-चार स्थित ओम सत्यम अपार्टमेंट ले जाया गया। यहां कुछ देर बाद ही शहीद मोहन चंद का पार्थिव शरीर लाया गया। पिता का शव देखकर दिव्यांशु मां से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगा। कालरा अस्पताल के सीईओ डॉ। आरएन कालरा ने बताया कि शनिवार की सुबह छह बजे दिव्यांशु के स्वास्थ्य की जांच की गई थी। वह पूरी तरह से स्वस्थ हो चुका है। उसके शरीर में तब एक लाख, 70 हजार प्लेटलेट्स थे। दिव्यांशु को 17 सितंबर को कालरा अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह डेंगू से पीड़ित था। उसके रक्त में प्लेटलेट्स की संख्या खतरनाक स्तर तक पहुंच गई थी। उसे 17 यूनिट से अधिक प्लेटलेट्स चढ़ाया गया था।



साभार. जागरण

Saturday

जाबांज़ शर्मा को आखिरी सलामी

आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हुए दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा का शाम करीब साढ़े चार बजे निगमबोध घाट पर अंतिम संस्कार कर दिया गया। उनकी चिता को उनके बेटे देवेंशु ने मुखाग्नि दी।
देश के इस जांबाज़ की अंतिम यात्रा में उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए निगमबोध घाट पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित समेत कई नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। गौरतलब है कि शर्मा लगभग 19 साल से दिल्ली पुलिस में थे। वह शुक्रवार को आतंकवादियों के साथ हुई भीषण मुठभेड़ में गोलियां लगने से घायल हो गए थे, लेकिन बाद में अस्पताल में उनका निधन हो गया। मुठभेड़ विशेषज्ञ के रूप में जाने जाने वाले और आतंकवाद विरोधी दस्ते की विशेष शाखा में तैनात शर्मा बहादुरी के लिए राष्ट्रपति पदक सहित सात बहादुरी पदक हासिल कर चुके थे।

नवभारतटाइम्स.कॉम

Friday

जांबाज इंस्पेक्टर एमसी शर्मा नहीं रहे

दिल्ली के जामिया नगर में उग्रवादियों के साथ मुठभेड़ में ज़ख्मी हुए स्पेशल सेल के दो पुलिस कर्मियों में से एक इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा की मौत हो गई है शर्मा को तीन गोलियां लगी थीं। मुठभेड़ में पुलिस में दो आतंकियों को मार गिराया था, जबकि एक आतंकी को हिरासत में लिया था। पुलिस इंस्पेक्टर शर्मा को कई बहादुरी पुरस्कार मिल चुके हैं। उन्हें चार बार राष्ट्रपति सम्मान से नवाजा गया। सात बार उन्हें पुलिस का मेडल भी मिला है। दिल्ली पुलिस के जांबाज शहीद इंस्पेक्टर महेश चंद्र शर्मा पिछले चार दिनों से ऑपरेशन एल-18 पर खुद नजर रख रहे थे, वे अपने फर्ज के प्रति कितने ईमानदार थे इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इन चार दिनों में वे अपने घर नहीं गए, वो भी तब जबकि उनका एकमात्र पुत्र गंभीर रूप से बीमार और अस्पताल में भर्ती है। 1989 को दिल्ली पुलिस सेवा में बतौर सब इंस्पेक्टर भर्ती स्पेशल सेल के ऑफिसर शर्मा 35 आतंककारियों को अपनी गोलियों का निशाना बनाने के साथ ही 81 को सींखचो के पीछे पहुंचा चुके थे। अपराध के प्रति बेहद सख्त शर्मा ने 40 गैंगस्टरों को मार गिराया जबकि 129 उनके कारण गिर्फ्तार किए गए।

Thursday

कोई लौटा दे सिमरन के बीते हुए दिन...


हर बार की तरह इस बार फिर धमाके हुए। दो दिन बीते नहीं की हम उसे भूलने लगे। लेकिन एक मासूम की दास्तां आपको ये धमाके भूलने नहीं देगा।ये दास्तां है बेटी सिमरन की। दिल्ली बम धमाके में सिमरन के साथ जो हुआ भगवान न करे किसी के साथ हो। छोटी सी बच्ची ने धमाके में अपने पिता, दादा और बुआ को खो दिया। उसकी मां अस्पताल में भर्ती है। अब हालत ये है कि सिमरन बुखार से तड़प रही है।।न कुछ खाती है,ना पीती है।

अब तो लगता है कुदरत भी सिमरन पर तरस नहीं खा रही। बारिश की वजह से सिमरन का घर उजड़ गया है और वो तेज बुखार में फुटपाथ पर रह रही है।

गफ्फार मार्केट में हुए बम धमाके ने सिमरन की हंसी छीन ली। पिता छीन लिया, दादा का प्यार छीन लिया और बूआ की पुचकार छीन ली। औऱ अब सिमरन को तो मां की गोद भी नसीब नहीं।

धमाके में घायल होने की वजह से मां अस्पताल में है।.अब तो सिमरन की हालत इतनी दर्दनाक हो गई है कि उसके सिर पर छत तक मयस्सर नहीं। पहले धमाके की वजह से सब कुछ तहस-नहस हो गया और अब बारिश ने अपना कहर ढाना शुरू कर दिया है। बंजारा परिवार सड़क के किनारे पेड़ के नीच रहता था। लेकिन अब बारिश की वजह से अब खुले आसमान के नीचे फुटपाथ पर रहने को मजबूर है।

सिमरन की आंखे जब भी खुलती हैं तो अपने पापा को ढूंढ़ती है। अपने दादा और बूआ की पुकार सुनने को बेताब रहती है। पता नहीं उसे ये अंदाजा भी है या नहीं कि इनमें से अब कोई नहीं आएगा। सिमरन की मां ने जब अपनी बेटी की हालत के बारे में सुना तो वो रह न सकी। बेटी फुटपाथ पर बुखार में तड़पती रही और वो अस्पताल के बिस्तर पर अपना इलाज करवाए। मां का दिल तड़प उठा। अपना इलाज अधूरा छोड़कर वो बेटी के पास चली गई।

लेकिन मां-बेटी का मिलन ज्यादा वक्त तक नहीं हो सका। सड़क पर अपना आसरा बनाए सिमरन का परिवार बारिश की मार झेल नहीं पाया। मजबूरन कमलेश को वापस अस्पताल भेजना पडा। सिमरन तो मानो टूट ही गयी। बुधवार रात तक उसका बुखार चढ़ गया सिमरन का परिवार अपनी लाडली की मुस्कान वापस लाना चाहता है। लाखों जतन किए, लेकिन सिमरन तो गुमसुम है। ना कुछ खाती है और नी ही कुछ पीती है।सरकार ने तो ब्लास्ट पीड़ितों के लिए मुवाअवजे की घोषणा करके खानापूर्ति कर ली। लेकिन जो दर्द सिमरन और उस जैसे सैकड़ों लोग सह रहे हैं उसे कौन दूर करेगा?

आईबीएन-7

Tuesday

उनके आने से सुकून मिलता है

  • मंतोष कुमार सिंह
उनके आने से सुकून मिलता है
जख्मों पर मरहम लगाने से सुकून मिलता है
दरद ए बयार में कोई जो अपना पूकारे
धूप में भी छांव मिलता है
उनके आने से सुकून मिलता है
कभी आप भी दरद लेकर देखना
अपनों को करीब रखकर देखना
गम में भी खुशी मिलती है
उनके आने से सुकून मिलता है

Monday

फतवा... फतवा... फतवा...

अवध के नवाब अमजद अली शाह के वंशज नवाब सैय्यद बदरुल हसन उर्फ पप्पू पोलिस्टर द्वारा कई धार्मिक सीरियलों में भगवान नंदी का किरदार निभाए जाने से कई कट्टरपंथी मौलाना खफा हो गए हैं। इन मौलानाओं ने हसन के खिलाफ कलमा पढ़कर दोबारा मुसलमान बनाने का फरमान तक जारी कर दिया है। एक मुसलमान होने के नाते हिन्दू देवी-देवताओं के किरदार निभाने पर मौलानाओं की तल्ख टिप्पणियों से नवाब बदरुल हसन बुरी तरह आहत और परेशान हैं।
नवाब बदरुल हसन उर्फ पप्पू पोलिस्टर ने कई धार्मिक सीरियलों मसलन ' ओम नमः शिवाय ' , ' संतोषी माता ' , ' जय हनुमान ' और ' सत्यनारायण की कथा ' में नंदी का किरदार निभाया है। उनके बेटे अमन पोलिस्टर ने भी एक सीरियल में भगवान गणेश का किरदार निभाया है। पोलिस्टर ने बताया कि दारुल उलूम ने मेरे किरदार को गैर इस्लामिक काम बताते हुए फतवा जारी किया है। मौलानाओं के व्यवहार से बुरी तरह आहत नवाब ने कहा कि वह कि वह खुदा और उसके रसूल को न सिर्फ मानते हैं बल्कि उनके बताए रास्ते पर भी चलते हैं और सच्चे मुसलमान हैं। उन्होंने कहा कि मैं एक सच्चे मुसलमान के साथ-साथ एक कलाकार भी हूं और अपने पेशे के रूप में अगर भगवान गणेश और नंदी का रोल करता हूं तो कटटरपंथी मुस्लिम उलेमाओं और धर्मगुरुओं की त्यौरियां चढ़ना गैर वाजिब है। नवाब हसन ने बताया कि उनके बेटे अमन पोलिस्टर के एक सीरियल में भगवान गणेश का रोल करने से कुछ उलेमा इतने खफा हो गए कि उन्होंने फोन पर धमकियां देना शुरू कर दिया। एक मौलाना ने तो यहां तक कहा कि सीरियल में गणेश के रूप में तुम्हारे बेटे का सिर कटा था, हम घर आकर उसका सिर काटेंगे। एक साल पहले इसकी रिपोर्ट मुंबई के अंधेरी ईस्ट स्थित मेगवाड़ी थाने में दर्ज कराई गई थी। इतना ही नहीं नवाब हसन के सगे चाचा विलायत हुसैन ने यह कहते हुए पुश्तैनी सम्पति देने से मना कर दिया है कि खुद तो भगवान बन गए, लड़के को भी भगवान बना दिया। यह इस्लाम धर्म विरुद्ध आचरण है। पप्पू पोलिस्टर बताते हैं कि शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे बेटे अमन के गणेश के किरदार और बोले गए संस्कृत श्लोकों व संवादों से इतने प्रभावित हुए कि वह हमारे घर आए और कहा कि मुस्लिम होकर तुम्हारा बेटा जितनी शुद्ध संस्कृत बोलता है उतना तो मेरा बेटा भी नहीं बोल सकता। भगवान के किरदारों से मिली शोहरत पर फख्र करते हुए नवाब हसन कहते हैं कि हिन्दुस्तान में हिन्दुओं ने जितनी बेपनाह मोहब्बत दी, उतनी मुस्लिम समाज से नहीं मिली। इसका मुझे और मेरे परिवार को जीवन भर अफसोस रहेगा।
नवभारत टाइम्स

Friday

धन कमाने में बिक गई नींद हमारी

  • डॉ।महेश परिमल
बरसों पहले कृश्न चंदर की उपन्यास पढ़ी थी 'बम्बई रात की बाँहों में'। तब उम्र छोटी थी, इसलिए उसके कथानक को समझ नहीं पाया, आज जब यह मायानगरी हमारे सामने मुम्बई बनकर आई है, तब से यह सपनों का शहर बनकर रह गई है। हर आदमी यहाँ एक सपना लेकर आता है। सपने का संबंध नींद से है, पर यहाँ के लोग अब अपनी नींद बेचकर धन कमाने में लगे हैं। लोग दिन में सपने देखते हैं और रात में उसे पूरा करने के लिए परिश्रम करते हैं। केवल मुम्बई ही नहीं, आज हर महानगर इसकी चपेट में है। हर शहर अब रात को और अधिक रंगीला होने लगा है। लोगों को अब शहर की रातें लुभाने लगी हैं। आपने घ्यान दिया होगा कि अब लोग रात का सफर करने में अधिक दिलचस्पी लेने लगे हैं। यात्रा चाहे ट्रेन की हो, बस को हो या फिर प्लेन की। एक तरह से आज की प्रतिस्पर्धा वाली इस जिंदगी में लोग अपनी स्वाभाविक नींद को तिलांजलि देकर धन कमाने में लग गए हैं।
पहले बिजली नहीं थी, तब लोग रात का समय सोने में ही निकालते थे। इससे न केवल शारीरिक क्रियाएँ, बल्कि स्वास्थ्य की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती थी। आज समय सबसे आगे निकल जाने का है। सबके पास समय की कमी है। किसी को किसी से बात करने का समय नहीं है। विज्ञान के इस युग में मोबाइल और लेपटाप ने पूरी दुनिया को ऊँगलियों में समा दिया है। लोग अब ऑफिस से ही देर से लौटते हैं, साथ में काम भी लेते आते हैं, इसलिए रात जागकर काम पूरा करने में लग जाते हैं। स्वभाविक है इससे नींद को अपने से दूर करना होता है। नींद दूर करने के साधनों में व्यसन एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। आजकल कार्पोरेट कल्चर के अंतर्गत लोगों को 247 की डयूटी करनी पड़ती है। याने आप सातों दिन डयूटी पर होते हैं, आपको कभी भी ऑफिस बुलाया जा सकता है। आखिर मोटी तनख्वाह अपना असर कहीं तो दिखाएगी! अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं है, जरा अपने बच्चों की दिनचर्या पर ही नजर डाल लें, आप पाएँगे कि उनके पास केवल नींद का समय नहीं है, बाकी सब के लिए समय है। घंटों मोबाइल पर बातें हो सकती हैं, कंप्यूटर पर घंटों बैठकर चेटिंग की जा सकती है, देर रात के फिल्म शो देखे जा सकते हैं, पार्टियाँ अटेंड की जा सकती है, पर सोने के लिए समय नहीं है। शरीर थककर चूर हो रहा है, पर काम का बोझ इतना है कि नींद भगाने के लिए सिगरेट, शराब, ड्रग्स आदि का सहारा लेना पड़ रहा है। यही हाल व्यापारियों का है, लोग अब रात की शापिंग अधिक करने लगे हैं, इसलिए उनकी दुकान रात के एक-दो बजे बंद होने लगी है, देर रात घर लौटकर भोजन करना, फिर टीवी पर फिल्में देखना या फिर कोई विशेष दिलचस्प कार्यक्रम देखकर सुबह चार बजे तक सोना हो पाता है। ऐसे में शरीर की सारी मशीनरी को काफी मेहनत करनी पड़ती है। शरीर का समय-चक्र बदल जाता है। इन सबका असर स्वास्थ्य पर किस तरह पड़ रहा है, यह जानने की जरूरत नहीं है। आज युवा इसका प्रतिस्पर्धी युग का सबसे पहला शिकार है। कम समय में काफी कुछ पा लेने की चाहत उसे भटका रही है। आश्चर्य इस बात का है कि इसे आज के पालक भी नहीं समझ पा रहे हैं। आज स्वास्थ्य गौण हो गया है, धन ही सब-कुछ हो गया है।धन ही सब-कुछ हो गया है। नीतिशास्त्र में कहा गया है कि जो रात को जल्दी सो जाते हैं और सुबह जल्दी उठते हैं, वे वीर बनते हैं, उनकी विद्या, बुद्धि, धन में वृद्धि होती है और शरीर के साथ-साथ जीवन भी सुखी होता है। उधर, आज के लोगों को वीर बनना है, विद्या प्राप्त करनी है, धन कमाना है, बुध्दिमान बनना है, जीवन को सुखी बनाना है, पर रात को जल्दी सोना नहीं है और सुबह जल्दी उठना नहीं है। आज की पीढ़ी नींद की व्याख्या कुछ अलग ही तरीके से करती है। उनकी तमाम कामयाबी के पीछे नींद के लिए कोई जगह नहीं है। उनका तो यहाँ तक कहना है कि दिन-रात मिलकर केवल 24 घंटे के ही क्यों होते हैं, यदि ये 30 या 36 घंटे के होते, तो भी हमें कम ही पड़ते। नींद बेचकर जागने की नई पीढ़ी की यह आदत उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। एशियन हार्ट इंस्टीटयूट के नींद के विशेषज्ञ डॉ। शेखर घमंडे कहते हैं कि मानव शरीर को रोज 6 से 8 घंटे की नींद की आवश्यकता होती है। नींद में कटौती करना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है। दूसरी ओर हिंदुजा अस्पताल के नींद विशेषज्ञ डॉ1 अशोक महासौर का कहना है कि कम नींद लने से शरीर की प्रतिरोधात्मक शक्ति घट जाती है। फलस्वरूप उसका काम भी प्रभावित होता है। यदि व्यक्ति एक वर्ष तक ही कम नींद लेना शुरू कर दे, तो उसके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ेगा ही। आज पति के पास इतना समय नहीं है कि पत्नी से दो मीठे बोल बोल सके। नींद कम लेने से लोगों के आपसी संबंध बिगड़ने लगे हैं, लोग चिड़चिड़े होने लगे हैं। प्रकृति के बनाए नियमों को तोड़कर हम खुशियाँ प्राप्त नहीं कर सकते। देर रात भोजन करने से पाचन शक्ति का नाश होता है। आयु कम होती है। हमें यह तय कर लेना चाहिए कि हमारी प्राथमिकता क्या है स्वास्थ्य या पैसा? पैसा कमाने के लिए स्वास्थ्य की बलि देना कहाँ की समझदारी है?
हम समवेत

Tuesday

रेत में, रेत से,घर

  • मंतोष कुमार सिंह
सुनहरी यादों के
कुछ कंकड़
कुछ पत्थर
चुनकर बनाता हूं
एक घर
खड़ा करता हूं
उसका ढांचा
मेरा घर
जो अक्सर झूलता है
भावनाओं के झूले में
भावनाओं को
मूतॅ रूप देना
कितना किठना है
अभाओं से जुझते
इस मरूभूमि में
यादों से बाहर आकर
बार-बार हटाता हूं
रेत के ढेर को
अपने हाथों से
सोचता हूं
कैसे बन सकता है
रेत में
रेत से
घर

Monday

कभी तो मिलते अकेले में

  • मंतोष कुमार सिंह
दिल के अरमान, दिल में दफन हो गए
उनसे मिले बरसो हो गए
कभी तो मिलते अकेले में
बाते करते अकेले में
मेरे आंसुओं पर अब तरस नहीं आती
उनको कभी मेरी याद नहीं आती
कभी तो याद करते अकेले में
बाते करते अकेले में

Sunday

अभिशाप का दोषी कौन

  • हिमवंत
कोसी को बांधने की कोशिश खतरनाक पोस्ट पर हिमवंत जी ने आपनी बात बहुत ही शानदार तरीके से रखी है उनकी टिप्पणी उसी रूप में पोस्ट कर रहा हू

काम का विशेषज्ञ वो है जो ईस अभिशाप को वरदान मे बदलने की तरकीब बताए। जल संशाधन हमारे लिए वरदान है, लेकिन आज यह अभिशाप बना हुआ है। कौन है दोषी इसके लिए? जब भी जल संशाधनो के व्यवस्थापन की बात चलती है, नेपाल के छद्म राष्ट्रवादी और भारत मे मेघा पाटकर सरीखे लोग विरोध शुरु कर देते है। भारत में अटल जी के समय बाढ की समस्या से छुटकारा पाने के लिए नदीयों को जोडने की बात चली थी तो मेघा पाटकर नेपाल पहुंच गई और लोगो को भारत की योजना के विरुद्ध भडकाने लगी। नेपाल मे भारत जब भी तटबन्ध निर्माण या मरम्मत की कोशिश करता है तो नेपाल मे भारत विरोधी ईसे नेपाल की राष्ट्रिय अस्मिता से जोड कर अंनर्गल दुष्प्रचार शुरु कर देते है। नेपाल मे भारत द्वारा तटबन्ध के मरम्मत मे अडचन एवम असहयोग भी प्रमुख कारक रहा है तराई की इस त्रासदी के लिए। नेपाल मे तटबन्धो मे पत्थरो को बांधने वाले गैबिन वायर (तार) तक चुरा लिए गए थे। नेपाल सरकार तटबन्धो की सुरक्षा के प्रति गम्भीर नही थी। तटबन्ध के टुटने के कई कारणो मे पत्थरो को बांधने वाले तारो की चोरी भी प्रमुख कारण है। जो भी हो, कोशी के इस कहर से सब को सबक लेना जरुरी है। भारत और नेपाल के बीच जल सन्धि को मजबुत किया जाना चाहिए। जल संशाधनो के विकास मे अविश्वास के वातावरण को समाप्त किया जाना चाहिए। नेपाल के नव निर्वाचित प्रधानमंत्री प्रचण्ड ने बिना सोचे समझे कोशी नदी के सम्झौते को एतिहासिक भुल तक कह डाला, एसे बयानो से अविश्वास बढेगा यो दोनो देशो के लिए प्रत्युपादक है। काठमांडौ मे भारत के राजदुत हर महिने नेपाल के प्रधानमंत्री से मिलते थे, लेकिन कोशी के तटबन्ध की सुरक्षा उनकी प्राथमिकता मे नही होती थी। वे तो महारानी सोनिया को खुश करने के लिए प्रधानमंत्री को ईस बात के लिए मनाते है की हिन्दु राष्ट्र समाप्त कर धर्म निर्पेक्ष बनाया जाए नेपाल को। नेपाल मे भारत के राजनयिको को राजनैतिक गतिविधियो की बजाए जन सरोकार के विषयों मे अधिक ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

कोसी को बांधने की कोशिश खतरनाक

जल संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाले प्रख्यात पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र का कहना है कि कोसी पर बैराज और तटबंध बनाकर उसे बांधने की कोशिश आगे और तबाही का सबब बन सकती है।
मिश्र ने बताया कि गाद से भरी कोसी पर अगर तटबंध बना दिए जाएं तो यह एक बार फिर पूर्व-पश्चिम की ओर अपनी दिशा बदलेगी और क्षेत्र की भौगोलिक बनावट के विपरीत बहाव के साथ दोबारा तबाही का कारण बनेगी। जल व्यवस्था और पारंपरिक जल संरक्षण पर अनेक किताबें लिखने वाले मिश्र ने कहा, 'कोसी की सात धाराओं को नहीं बांधा जा सकता।
मैदानी इलाकों में नदी में गाद जमा होने के कारण पानी दिशा बदल रहा है। यह नदी 20 हजार साल पुरानी है। पिछले 200 साल में ये अपने असली रास्ते से करीब 120 किलोमीटर विचलित हुई है।
उन्होंने बताया कि भारत-नेपाल सीमा पर बनाया गया बैराज इसके पानी को नियंत्रित नहीं कर पाया है, जबकि इससे नदी की दिशा जरूर बदल गई है। मिश्र ने कहा कि बैराज और तटबंध उन नदियों में कारगर सिद्ध हो सकते है जिनमें गाद कम होता है और जिनकेबहाव की गति धीमी है।
उल्लेखनीय है कि अपनी किताब 'साफ माथे का समाज' में मिश्र ने उत्तरी बिहार की नदियों, समाज पर उनके प्रभाव और बाढ़ तथा उसके प्रबंधन का जिक्र किया है।

Saturday

ये अंगोछा-छाप नेता !

  • राजेन्द्र जोशी
जनस्वास्थ्य के लिए खतरा हैं झोला छाप डॉक्टर और प्रजातंत्र के लिए खतरा बने अंगोछा छाप नेता। जिस तरह न डिग्री, न डिप्लोमा, झोले में भरी जड़ी बूटी और दवाइयाँ, लटका लिए कांधो पर झोले और बन गये डॉक्टर। ठीक उसी तरह न नैतिकता, न सिध्दांत, न जनसेवा की भावना, न देश के प्रति प्रेम गले में ढांक लिया रंग-बिरंगा अंगोछा और बन गये नेता। झोला छाप डॉक्टर ने किसी रोगी का उपचार किया तो उस रोगी के जीवन का अंतिम प्रहर होता है ठीक उसी तरह अंगोछा-छाप नेताओं ने जहाँ भी अपनी कारस्तानी शुरू की तो समझ लेना उस रंग वाले झंडे की पार्टी का सत्यानाश ही होकर रहता है, जिस रंग में ये नेता अपना अंगोछा रंग लेते हैं।
गाँव-गाँव में शहर-शहर में खूब फैल गये हैं जैसे नीम हकीम डॉक्टर और ऐसे ही फैल गये है हुड़दंगबाज अंगोछा छाप नेता । आम सभाओं में, जलसों में जुलूसों में, उत्सवों में, पर्वों में, सड़कों पर बाजारों में, रेलों में, बसों में, हर जगह दिख जायेंगे ये अंगोछा छाप नेता। न ये मंत्री हैं, न विधायक हैं, पंच हैं, न सरपंच, न सहकारिता के चुनाव लड़े, न मुहल्ला कमेटी में। फिर भी ये नेता हैं, ये नेता क्यों हैं, किसने बनाया, काहें के लिए बनाया यह मामला अब गोपनीय नहीं रहा। सब कुछ खुलकर मैदान में आ गया। हकीकत सामने आ गई। जिनके पास कल तक पजामा-कमीज की सिलाई के पैसे नहीं थे। सिलाई मांगने के लिए दर्जी चक्कर लगाया करते थे, वे आज गले में अंगोछा डालकर जन-जन के भाग्य विधााता बनने की दौड़ में शामिल हो गये हैं।
किसको ज़रूरत है, इन अंगोछा छाप नेताओं की ! क्या देश को क्या समाज को, क्या सरकार को या खुद उनको। नहीं इनमें से किसी को इनकी जरूरत नहीं हैं। इनकी तो जरूरत पड़ती है, कतिपय बड़ी-बड़ी राजनैतिक पार्टियों के उन खूंखार इरादों वाले राजनेताओं को, जो धानबल और बाहुबल के दम पर सत्ता, संगठन और समाज में अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहते हैं। इनकी जरूरत हैं उन रहनुमाओं को जिनमें न तो क्षमता होती है सत्ता-संचालन की और न ही होती है भावना समाज सेवा की। इन अंगोछा छाप नेताओं का उपयोग तो होता है बर्र के छत्ते की तरह। मधुमक्खी पालने के व्यवसाय की तरह। कतिपय राजनेताओं और राजनैतिक पार्टियों द्वारा मधुमक्खी की तरह इनको पाला जाता है और समय-समय पर उन्हें उड़ा दिया जाता है जलसों, समारोहों और भीड़ में भगदड़ मचाने के लिए। जिस तरह मधुमक्खियाँ नहीं जानती कि वे क्या कर रही हैं, किसके बदन से लिपट रही है, किस किस को काट रही है या फिर किस तरह के आयोजन में घुस रही है। जब मधुमक्खियां उड़कर हुड़दंग मचवाना ही है तो फिर यह नहीं देखा जाता कि इसमें कौन प्रवाहित हो रहा है और उसे कितना नुकसान पहुंच रहा है। अंगोछा-छाप नेताओं का उपयोग अपनी राजनीति की धााक जमाने के लिए अति उत्तम सिध्द हो रहा है। जिस राजनैतिक पार्टी ने इन्हें अंगोछे वितरित किए है, उनके लिए ये नेता जमीन तैयार करने में खाद और बीज का काम करते हैं। जितना ज्यादा ये खाद-बीज का उपयोग करेंगे उसी के अनुसार ये लहलहाती फसलों का ख्वाब देखने लगते हैं।
आज का युग बाजारवाद का युग है। बाजार का भी खूब दिमाग चलता है। जहाँ उसे जरा सी गुंजाइश दिखती है, बाजार फट से बीच में कूद पड़ता है। राजनीति के इस 'मधुमक्खी-युध्द' में भी बाजार की पौ बारह हो रही है। दूकानों में खूब अंगोछे बिक रहे हैं। बजार कुर्ता पाजामा के कपड़ों के थान के थान बेचने में व्यस्त है और दर्जी की सिलाई मशीन की 12 बजे रात तक भी आवाज बंद नहीं होती है। खूब नाप लिए रहे हैं। कपड़ा बाजार की चांदी हो रही है। पहले भी थी, अब भी है। पहले टोपियों के कपड़े बिकते थे, टोपियां सिलती थी, अब अंगोछे के कपड़े बिक रहे हैं, अंगोछे की किनारे प्रिंट हो रही हैं।
अंगोछा छाप नेताओं की आई बाढ़ को देखकर पहले आम जनता आश्चर्य करती थी। सोचती थी-आज देश में हर आदमी नेता बन रहा है, सेवा के क्षेत्र में उतर रहा है, देश सचमुच आगे बढ़ रहा है, विकास होगा और खूब जमकर विकास होगा। नेताओं में देशप्रेम की भावना का ज्वार उमड़ पड़ा है। अब इन अंगोछाधारी नेताओं की बढ़ती फौज की हकीकत छुप नहीं रही है। जनता समझ गई है। ये अंगोछाधारी फौज न जाने कब कहा एकदम से हमला बोल देगी। पर्व, उत्सव, त्यौहार और यहाँ तक कि निजी-पारिवारिक और शादी-ब्याह के समारोह भी सुरक्षित नहीं रहे। कभी भी अंगोछाधारियों की फौज कही भी घुसकर किसी का भी खाना खराब करने में देर नहीं लगाती है।
लोग नववर्ष की पार्टियां मनाते है। दुनियादारी से दूर रहकर नाचते हैं, गाते हैं, मौज-मस्ती करते हैं। युवा प्रेमी जन वेलेन्टाइन डे मनाते हैं, फिल्मी नाइटें होती हैं, होटलों में व्यंजन समारोह होते हैं। ऐसे आयोजनों में ये अंगोछाधारी नेता भी घुस घुसकर अपनी ही तरह का जश्न मनाते हैं पर इनके जश्न मनाने का तरीका वो नहीं होता जो सबका होता है। इन अवसरों पर वे भी खूब धींगामस्ती करते हैं, हुड़दंग मचाते हैं और आयोजनों में विघ्न डालते हैं। उत्साहपूर्वक जश्नों और जलसों में शामिल होकर अपनी वह भूमिका निभाते हैं जो उन्हें अपनी राजनैतिक पार्टी के रिंग मास्टरों द्वारा दी जाती है। जब आम चुनाव आने लगते हैं, अंगोछाधारियों की पूछ परख बढ़ने लगती है। मतदान केन्द्र बनते हैं उनकी देखरेख के लिए राजनैतिक पार्टियां इनको जवाबदारियां सौंपती हैं। ट्रेनिंग देती हैं कैसे मतदाता को मतदान केन्द्र तक लाया जाय और किस बटन को दबाने के लिए मतदाता को कैसे भयग्रस्त कर दिया जाय। मतदाताओं में सभी मतदाता साहसी, पराक्रमी और चतुर नहीं होते। बेचारे दब जाते हैं। जो नहीं दब पाते, न दबे, फर्क नहीं पड़ता। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को उठाकर ले जाना भी इन्हें आता है।
भले ही आपके काम के, समाज के काम के और देश के काम के लिए इन अंगोछा छाप नेताओं की जरूरत न हों उनकी बला से। उनकी तो जरूरत है उन राजनैतिक दलों को जो भीड़ में भगदड़ मचवाकर, धाधाक रही नैतिकता की आंच में तवा चढ़ाकर अपनी रोटी सेंकने में सिध्दहस्त हो गये हैं। बढ़ती बेरोजगारी की अब किसी को चिंता कतई नहीं करना चाहिए। भले ही नौकरियां न हो सरकारों में, भले ही वेकेंसी न हो टाटा, बिड़ला, अंबानी, मित्तल की कंपनियों में राजनीति के बाजार में आज भी जरूरत है हुड़दंग मचाने के लिए सब तरफ से धाकियाये कहे जवानों की। कुछ नहीं करना है आपको, डिग्री या डिप्लोमा हो न हो आपके पास में। आपको तो सामने जाकर खड़ा हो जाना है। अंगोछा तो डाल ही देंगे कांधो पर अपनी राजनीति कराने वाले।
हम समवेत

Friday

थर थर कांपे रोज अंगनवा

स्कंद पुराण बाल्मीकि रामायण जैसे पौराणिक ग्रंथों तथा प्रसिद्ध आंचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु की परती परिकथा में कोसी के रौद्र रूप तथा नदी के कारण होने वाले विनाश और पुनर्निर्माण का उल्लेख मिलता है।
प्रसिद्ध आंचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु ने अपनी कृति परती परिकथा में कोसी के रौद्र रूप तथा इसके कारण होने वाले विनाश और निर्माण को सजीव ढंग से प्रस्तुत किया है। रेणु ने परती परिकथा की शुरूआत धूसर वीरान परती जमीन विशेषण से की है जो उसके रौद्र रूप को अभिव्यक्त करती है। उन्होंने आंचलिक लोकगीत के जरिये भी इसे बड़े ही सजीव ढंग से पेश किया है। रेणु कहते हैं-
थर थर कांपे रोज अंगनवा, रोये जी आकास।
घड़ी घड़ी पर मूर्छा लागे बेर बेर पियास।
घाट न सूझे बाट न सूझे, सूझे अप्पन हाथ।
रेणु ने परती परिकथा में लिखा है कि कोसी की शादी के बाद उनका संबंध ससुराल वालों के साथ अच्छा नहीं रहा। उनकी ननद जोगवंती और गुणवंती उन्हें काफी सताती थी। इसके कारण एक दिन वह घर छोड़ कर निकल जाती हैं।
कोसी को घर छोड़ कर जाता देख गुणवंती तंत्र साधना कर उन्हें रोकने का प्रयास करती है जबकि जोगवंती आंधी तूफान उत्पन्न कर उनका मार्ग अवरुद्ध करने का प्रयास करती हैं। दूसरी तरफ कोसी की सौतेली बहन दुलारी ने पौष पूर्णिमा के दिन उनकी याद में बररिया घाट पर दिया जलाया था। आज भी लोग घाट पर दिया जलाने की इस परंपरा को कायम रखे हुए हैं।
इसके बाद कोसी क्षेत्र के लोगों को विनाश का श्राप दे देती हैं लेकिन बाद में उनका मन पिघल जाता है। लोगों के दुख के क्षुब्ध कोसी कहती हैं-
जहां जहां बैठ कर मैं रोयी वहां खुशहाली और जबर्दस्त हरियाली होगी।
कोसी क्षेत्र में इस महा जल प्रलय के बाद लोगों को उम्मीद है कि गंगा से मिलन के बाद इस क्षेत्र में खुशहाली जरूर लौटेगी। स्कंद पुराण में कोसी का शिव-पार्वती की पुत्री के रूप में उल्लेख किया गया है। इस लिहाज से उन्हें गणेश और गंगा की बहन भी कहा गया है। इसमें कहा गया है कि कोसी का ब्याह एक ऋषि के साथ हुआ था जिनकी असमय मृत्यु हो गई। ऋषि की असमय मृत्यु से कोसी को काफी दुख हुआ। इसके बाद जब भी उन्हें अपने परिवार के लोगों की याद आती है तो वह रौद्र रूप धारण कर लेती है और अपनी बहन गंगा के मिलने के बाद शांत हो जाती है। इसके बाद क्षेत्र में खुशहाली का भी उल्लेख मिलता है। स्कंद पुराण में कोसी नदी का उल्लेख कोसिका मैया के रूप में मिलता है। कोसी क्षेत्र में गणेश चतुर्थी के अवसर पर कोसी नदी के घाट पर पूजा अर्चना की जाती है। इसके अलावा इसी समय चौड़-चंद्र के दौरान भी कोसी नदी की पूजा की जाती है। कोसी नदी का उल्लेख बाल्मीकि रामायण में भी मिलता है। जहां उन्हें विश्वामित्र की बहन बताया गया है।
जागरण

दिलों को दूर करती दौलत

  • महेश परिमल
जो जीवन में केवल सम्पत्ति को ही सब कुछ मानते हैं, उनके लिए बुरी खबर। जीवन में धन ही सब-कुछ नहीं है। इससे बढ़कर भी दुनिया में ऐसा बहुत-कुछ है, जिसे पाकर हम खुश हो सकते हैं, गर्व का अनुभव कर सकते हैं। निश्चय ही आप सोच रहे होंगे कि यह तो उचित नहीं है। लेकिन सच तो यही है कि आज जितना महत्व धन का है, उससे अधिक महत्व सुख का है। अब यह बात अलग है कि हमने ही इन सुखों को दो भागों में विभाजीत कर एक मायावी सुख की लालसा में रहते हैं। आज लोग जिस सुख के पीछे भाग रहे हैं, वह क्षणिक है। इसे समझना हो, तो उस दम्पति की व्यथा से समझा जा सकता है, जब वे गरीबी के बीच अपना जीवन गुजार रहे थे, अचानक उन्हें जैकपॉट में बेतहाशा धन मिला। इस धन से उन्होंने तमाम भोतीक सुख की प्राप्ति कर ली, पर जो फाके-मस्ती वाले जीवन में था, वह बेशुमार धन के ढेर पर बैठकर नहीं मिला।
आज हमने सुख को विभाजीत कर दिया है। एक भौतिक सुख दूसरा आत्मिक सुख। इसे हम एसी की ठंडी हवा और नीम के पेड़ के नीचे बैठकर ठंडी हवा के झोंके की संज्ञा दे सकते हैं। जिन्होंने इन दोनों ही तरह की हवा के मो लिए हैं, वे अच्छी तरह से जानते हैं कि किस तरह की हवा अच्छी लगती है। देखा जाए, तो आत्मिक सुख ही जीवन जीने मूलमंत्र है। कोई दौलतमंद है और सुखी है, इस बात में अब सच्चाई नहीं रही। इसके बाद भौतिक सुख की प्राप्ति के लिए अधिक से अधिक धन संग्रह करना याने मुसीबतों को आमंत्रित करना है। जो लोग कहते हैं कि पैसा तो हाथ का मैल है, ऐसे लोगों को आज की पीढ़ी माफ करने वाली नहीं है, परंतु समय पर कमाया हुआ धन और समय पर खर्च किया गया धन भी सुखमय सांसारिक जीवन नहीं दे सकता, यह सच है। बेशुमार धन के बीच भी एक अच्छी गहरी नींद के लिए तरसते रहते हैं, शायद इस सच को वे ही समझते हैं, जो सालों से गहरी स्वाभीवित नींद नहीं ले पाए हैं।
अब बात उस दम्पति की, जिनकी शादी को अधिक समय नहीं हुआ था। पति कूग पोप 23 वर्ष का था और उसकी पत्नी कलेर आवन 25 वर्ष की थी। उन्हें रहने और खाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। जीवन फाके मस्ती में कट रहा था। फिर भी वे खुश थे। कुछ नहीं था, पर प्यार और अपनापे की बेशुमार दौलत उनके पास थी। वे दु:खी रहकर भी सुख के क्षणों को पा ही लेते थे। ऐसे में उनकी पुत्री सेरेन के जन्म के बाद उन्हें 50 लाख पाउंड का जैकपॉट लग गया। इसके पहले दस हजार पाउंड का कर्ज था, जिसे देने के लिए वे जद्दोजहद कर रहे थे। वे अपनी पुत्री सेरेन को क्रिसमस गिफ्ट भी देने की स्थिति में नहीं थे। लेकिन जैकपॉट लगते ही उनका जीवन ही बदल गया। अब वे अपना दो रुम वाला फ्लैट छोड़कर स्वीमिंग पूल वाले विशाल बंगले में रहने लगे। विश्व के तमाम भौतिक सुख उनके कदमों पर थे। वे अपने आपको सबसे सुखी परिवार मान रहे थे। लेकिन यह भौतिक सुख वास्तव में सुख नहीं था। दौलत के आते ही तमाम बुराइयाँ भी आने लगी। पति कूगपोप को पत्नी बुरी लगने लगी। इसलिए उसने अपने लिए एक गर्लफ्रेंड ढूँढ ली। इसका नाम एलाइस था। दोनों साथ-साथ घूमने लगे, कुछ समय बाद कूगपोप अपने घर से 100 मील दूर अपनी गर्लफेरंड के साथ रहने चला गया। कुछ समय बाद दोनों में तलाक हो गया। लाखों पाउंड के मालिक बनने के बाद उनके जीवन से असली सुख दूर चला गया। दोनों ने स्वीकार किया कि जब वे कड़के थे, तब अधिक सुखी थे।
आज भीतर के सुख को प्राप्त करने की सीख देने वाले देश भर के तमाम साधु-संतों की सम्पत्ति पर एक नजर डालें, तो स्पष्ट हो जाएगा कि वे स्वयं भी कतई सुखी नहीं हैं। क्या ये दौलत उन्हें खुशी दे सकती है? लेकिन आज उनकी सम्पत्ति को देखकर यही लगता है कि वे न जाने किस सुख की बात करते हैं। वास्तव में देखा जाए, तो जिस सुख को हम बाजार में खरीदने जाते हैं, वह हमारे भीतर ही है। घर में तमाम सुख-सुविधाएँ से सुसज्जित हो जाए, तब भी हमें ऐसा लगेगा कि कुछ बाकी रह गया। साल भर पिज्जा या फास्ड फूड खाने वाला यदि एक दिन माँ के हाथ की जली रोटी ही खा ले, तो वह सारे स्वाद भुल जाएगा। पर वह जली रोटी मिले कहाँ से? उसने तो पिज्जा में ही जीवन का असली सुख ढूँढ़ने की कोशिश की है, वह भला कैसे मिलेगा?
सुखी होने किताब बेचने वाले किताब से लाखों कमा लेते हैं, पर सुख नहीं कमा पाते। सुख के संबंध में कई पोथियाँ लिखी गई हैं, पर असली सुख की चावी कहाँ है, यह कोई नहीं बता पाया है। लोगों के हाथ में जो नहीं है, वे उसे पाने की जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं। लेकिन जो उनके पास है, उसका उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। हर हाल में खुश रहने वाले संभवत: असली सुख प्राप्त कर सकते हैं। कोई सुख के लिए घर बसाता है, तो कोई सुख के लिए घर छोड़ता है। जीवन के एक-एक क्षण को जीने की कोशिश करो, यही सुख की सही व्याख्या है।
आज हम सभी एक दूष्टिभरम में जी रहे हैं। जो वास्तव में सुख है, उसकी तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता। दूसरा कितना सुखी है, हम यही देख रहे हैं। हम कितने दु:खी हैं, यही हमें दिखाई दे रहा है। सुख और दु:ख के बीच एक महीन रेखा है, बहुत ही कम अंतर है इसमें। सुख खुशी देने में है, पाने में नहीं। इसलिए खुशी को जो भी क्षण मिले, उसे पकड़ लो और फिर उसे बाँट दो, आप देखेंगे कि वही खुशी दोगुनी होकर आपके पास आ जाएगी। आप इसे फिर बाँट दीजिए, फिर देखो कमाल, आप से बड़ा सुखी कोई नहीं होगा। बड़े-बड़े साधू-महात्मा और रइसजादे भी आपसे जलने लगेंगे, क्योंकि आपके पास कुछ भी न होकर खुशियों की दौलत है। बेशुमार दौलत होने के बाद भी आत्मिक सुख नहीं पाने वाले निर्धन की सूची में आते हैं, दूसरी ओर जेकपाट जीतने वाले युगल आखिर में सुख का जेकपाट जीत तो गए, पर उन्हें तलाक लेना पड़ा।
हम समवेत

Thursday

गणेशजी ने पंडाल में किए बम निष्क्रिय!

भारत में हर जगह गणेश उत्सव की धूम है तो फिर इस उत्सव को मनाने में गुजरात भला कैसे पीछे रहता। गुजरात में भी ये उत्सव पूरे जोर-शोर से मनाया जा रहा है। मगर 26 जुलाई को हुए अहमदाबाद ब्लास्ट की कसक आज भी यहां के लोगों के दिलों में कितनी गहरी है इसका अंदाजा यहां पर बने एक पंडाल को देखकर लगाया जा सकता है।
मंगलकर्ता, विघ्नहर्ता गणेश यहां बम को निष्क्रिय कर रहे हैं। श्रद्धालुओं ने गणेश जी को एक नया रूप दिया है। इनका मानना है कि 26 जुलाई को हुए अहमदाबाद ब्लास्ट के बाद जिस तरह से सूरत में बमों को निष्क्रिय कर दांव पर लगी हजारों जानों को बचाया गया वो गणेश जी का ही करिश्मा था।
पुराणों में लिखा है की जब जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है और कोई अनचाही मुसीबत आती है तब विघ्नहर्ता गणेश जी सभी बाधाओं को दूर कर अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। गुजरात के इन श्रद्धालुओं का भी मानना है की जैसे सूरत में गुजरात पुलिस ने सभी बम को विफल किया और एक बड़ी अनहोनी को टाल दिया ऐसा भगवान गणेशजी के चमत्कार से ही संभव हुआ।
आईबीएन-7

Tuesday

बिना आईडी प्रूफ के नहीं होगा रेलवे रिजर्वेशन

  • पूनम गौड़
अगर आप रेलवे में आरक्षण कराने जा रहे हैं, तो आपके पास पहचान पत्र या फोन नंबर होना चाहिए। बिना आईडी प्रूफ के रेलवे आपको रिजर्वेशन नहीं देगी। रेलवे ने यह कदम सुरक्षा के मद्देनजर उठाया है। उत्तर रेलवे के डिविजनल रेलवे मैनिजर राकेश सक्सेना का कहना है कि यात्री अब आरक्षण फॉर्म पर अपना फोन नंबर देंगे। इसके न होने पर फोटो पहचान पत्र दिखाकर आरक्षण करवाया जा सकता है। रेलवे अधिकारियों के अनुसार इसके कई लाभ होंगे। एक तो यह कि हादसे के समय व्यक्ति की पहचान आसानी से हो सकेगी और क्लेम देने में भी परेशानी नहीं आएगी। दूसरा कोई भी व्यक्ति गलत इरादों के साथ आरक्षण नहीं करवा पाएगा और तीसरा रेलवे टिकटों की कालाबाजारी कम हो सकेगी। उत्तर रेलवे के सभी आरक्षण केंद्रों को यह आदेश जारी कर दिए हैं। इंडियन रेलवे आतंकवादियों के निशाने पर है। खुफिया एजंसियों ने रेलवे को चेतावनी दी है कि आतंकी व पाकिस्तानी खुफिया एजंसी आईएसआई के एजंट देश में रेलवे के माध्यम से ही मूवमंट कर रहे हैं। इसके चलते अब रेलवे ने रिजर्वेशन सिस्टम में व्यापक सुधार करने की दिशा में कदम उठाएं हैं। रेलवे रिजर्वेशन के लिए आईडी को अनिवार्य कर दिया गया है। रेलवे के नए नियमों के मुताबिक आरक्षण करवाने से पूर्व आपको अपना लैंडलाइन या मोबाइल नंबर फॉर्म पर लिखना होगा। इसके अभाव में आपको अपना कोई भी आईडी प्रूफ दिखाना होगा। इसके बिना आपको आरक्षण मिले, ऐसी गारंटी नहीं है। रेलवे की माने तो फोन नंबर वेरिफिकेशन के बाद ही जारी किए जाते हैं इसलिए व्यक्ति के नंबर से उस तक पहुंचा जा सकता है। अभी तक बिना किसी औपचारिकताओं और पूछताछ के रेलवे आरक्षण लोगों को उपलब्ध हो जाते थे। जिसकी वजह से असामाजिक तत्व और आतंकवादियों के मद्देनजर रेलवे को सुरक्षित माध्यम मानते थे। रेलवे सूत्रों के अनुसार आईबी के मुताबिक आतंकी और आईएसआई रेलवे में सफर को सबसे सुरक्षित मानते हैं। ऐसे में अब रेलवे ने भी इन नई चुनौती से निपटने के लिए नियमों में बदलाव किए हैं। रेलवे का दावा है कि ऐसा सिर्फ सुरक्षा कारणों से नहीं बल्कि यात्रियों की सहूलियत के लिए भी किया जा रहा है। पिछले साल भी फेस्टिवल सीजन से पहले रेलवे ने आरक्षण करवाने वालों की जांच के लिए मुहिम छेड़ी थी। उस समय रेलवे ने आरक्षण फार्म में दर्ज पतों की जांच की थी, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में पतों की जांच करना रेलवे के लिए टेढ़ी खीर साबित हुआ। अब बदलावों के तौर पर टेलिफोन नंबर या फोटो आई कार्ड को अनिवार्य किया गया है। इस योजना का एक मकसद दलालों पर लगाम कसना भी है। सूत्रों के अनुसार फेस्टिवल सीजन में विभिन्न जगहों की आरक्षित टिकटों के लिए यात्रियों में मारामारी रहती है। ऐसे में रेलवे दलाल भी सक्रिय हो जाते हैं। पूर्व में ऐसे कई खुलासे हो भी चुके हैं, जब आतंकी ट्रेनों में आवागमन करते हैं।
क्या होंगे पेच
भारतीय रेल में बड़ी आबादी ऐसी है, जिनके पास न तो फोन है ,और न ही वोटर आई कार्ड हैं। ऐसे लोग अपना आरक्षण कैसे करवाएंगे, इस बारे में रेलवे अभी तक कुछ ठोस रणनीति नहीं बना पाई है। वोटर आई कार्ड फिलहाल लोगों की पहुंच से दूर है। रेलवे डीआरएम राकेश सक्सेना का कहना है कि पहचान पत्र परिवार के किसी भी सदस्य का चल सकता है। मसलन यदि पत्नी को सफर करना है, तो वह अपने पति का पहचान पत्र दिखा सकती है। इसके साथ उसे अपनी जॉइंट फोटो दिखानी होगी। इसी तरह बच्चे भी अभिभावकों का पहचान पत्र दिखा सकते हैं। वह कहते हैं कि राशन कार्ड, ग्राम पंचायत से लिखा हुआ पत्र या फिर कंपनी के लेटर हेड पर लिखा हुआ स्टांप पेपर, रेजिडेंट वेलफेयर असोसिएशन का पत्र, स्कूल के पहचान पत्र या लिखित पत्र आरक्षण के लिए मान्य होंगे।
नवभारत टाइम्स