Monday

हर भारतीय सात हजार रुपये का कर्जदार

देश का हर नागरिक अब लगभग 7 हजार 2 सौ 18 रुपये का कर्जदार है। वित्त मंत्रालय द्वारा 31 मार्च को जारी आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2007-08 के पहले नौ महीनों में भारत पर विदेशी ऋण 31.8 अरब डालर बढ़कर 201.4 अरब डालर के स्तर पर पहुंच गया है। इस लिहाज से 1.10 अरब की आबादी वाले भारत में हर नागरिक पर 7 हजार 2 सौ 18 रुपये की उधारी है। देश पर कर्ज बढ़ाने में कंपनियों द्वारा विदेश से जुटाए गए ऋणों और रुपये की खासी मजबूती ने अहम भूमिका निभाई है। मार्च 2007 तक विदेशी कर्ज 169.7 अरब डालर था। 2007-08 की तीसरी तिमाही के दौरान यह 10.3 अरब डालर और बढ़ गया। इसी तरह रुपये की मजबूती के चलते अप्रैल-दिसंबर 2007 के दौरान विदेशी ऋण छह अरब डालर तक बढ़ गया। तीसरी तिमाही में दीर्घकालिक ऋण भी 6.3 अरब डालर बढ़कर 166.2 अरब डालर तक पहुंच गया। पकालिकालों भी चार अरब डालर बढ़कर 35.2 अरब डालर हो गया।

अपनों की बेरुखी

  • मंतोष कुमार सिंह
लोकसभा चुनाव के नजदीक आने के साथ ही सभी पार्टियां मतदाताओं को लुभाने की जुगत में जुट गई हैं। कई ऐसे मुद्दे उखाड़े जा रहे हैं जो वर्तमान में औचित्यहीन हैं। सभी राजनीतिक दल अपने आपको इस रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं कि जैसे वही एक मात्र जनता के हितैषी हैं। ऐसे में वामपंथी दलों की बैसाखी पर टिकी केंद्र की यूपीए सरकार भी एक-एक कदम फूंक-फूंककर रख रही है लेकिन विपक्ष की भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ केंद्र को समर्थन दे रहे सहयोगी भी सरकार की टांग खिंचने में लगे हुए हैं। चुनावी साल में केंद्र सरकार विपक्ष से ज्यादा अपनों की बेरुखी से बेचैन है। अभी अमरीका के साथ असैन्य परमाणु करार का मसला सुलङा भी नहीं है कि वामपंथी दलों ने महंगाई और छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन की धमकी दे डाली है। वहीं मौके की नजाकत को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने भी पाशा फेंक दिया है। भाजपा ने वामदलों को चुनौती दी है कि वे केंद्र सरकार से समर्थन वापस लेकर दिखाएं। यह सच है कि वेतहाशा बढ़ती महंगाई ने आम आदमी को मुश्किल में डाल दिया है। रोजमर्रा की सभी वस्तुओं की कीमतें सातवें आसमान पर हैं। केंद्र सरकार के तमाम दावों और उपायों के बावजूद महंगाई में निरंतर वृद्धि जारी है। फल, सब्जियों, मसूर, जौ, कच्ची रबर, सरसो, बिजली, पेट्रोल-डीजल, खाद्य तेल, आटा, गुड़, खांडसारी, रवा, सूजी और मैदा के महंगे होने से मुद्रास्फीति की दर १५ मार्च को समाप्त हुए सप्ताह में ०।७६ प्रतिशत की तीव्र बढ़ोतरी के साथ ६.६८ प्रतिशत पर पहुंच गई। मुद्रास्फीति का यह स्तर ५९ सप्ताह में सबसे ज्यादा है। सकल उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति का आलोच्य सप्ताह का स्तर २७ जनवरी २००७ को समाप्त हुए सप्ताह के ६.६९ प्रतिशत के बाद सर्वाधिक है। पिछले साल १७ मार्च को समाप्त हुए सप्ताह में मुद्रास्फीति ६.५६ प्रतिशत और इस वर्ष आठ मार्च को ५.९२ प्रतिशत थी। ऐसे में सहयोगी दलों को सरकार के साथ होना चाहिए। सहयोगियों को महंगाई से निपटने के लिए एक मंच पर बैठकर मंथन करना चाहिए न की सरकार की खिंचाई करनी चाहिए। क्योंकि खिलाफत करने से समस्या का समाधान संभव नहीं है। इससे परोक्ष रूप से विपक्ष को ही फायदा होगा। अगर ऐसा ही रहा तो निश्चित तौर पर वामदलों की बेरुखी का खामियाजा केंद्र सरकार को लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ेगा। सरकार को भी इसका एहसास हो गया है। इसलिए वह कोई भी कदम काफी सोच समङा कर आगे बढ़ा रही है।
साभार-भड़ास

सुप्रीमकोर्ट ने दी अमिताभ को राहत


सुप्रीम कोर्ट ने बालीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन से संबद्ध उत्तर प्रदेश में बाराबंकी के जमीन सौदा मामले की जांच का आदेश देने से सोमवार को इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें इलाहबाद हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार पर मामले में अमिताभ बच्चन के खिलाफ किसी प्रकार की आपराधिक दीवानी या राजस्व प्रक्रिया शुरू करने पर रोक लगा दी थी। हाई कोर्ट ने गत वर्ष 11 दिसंबर को अभिनेता को क्लीन चिट दे दी थी। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि ऐसे कोई प्रमाण नहीं मिले हैं कि अभिनेता ने राजस्व रिकार्ड में प्रविष्टि दर्ज कराने को लेकर स्वयं कोई धोखाधड़ी या जालसाजी की है। राज्य सरकार की ओर से मामले में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल ने दलील दी कि यह राजस्व रिकार्ड में हेरफेर से जुड़ा मामला है जिससे अंतत: अमिताभ बच्चन को फायदा हुआ और इसकी जांच किए जाने की जरूरत है।

निकल पड़ी ओलिंपिक की मशाल


आसमान में चमक बिखेरती आतिशबाजी, खुशी से झूमते जनसमूह, कलाकारों के उल्लासपूर्ण नृत्य, करतबों और कड़ी सुरक्षा के बीच चीन के राष्ट्रपति हू जिनताओ ने इस साल अगस्त में होने वाले बीजिंग ओलिंपिक खेलों की मशाल रैली को रवाना किया।ओलिंपिक आयोजन समिति के प्रमुख लिऊ की ने राजधानी बीजिंग के थ्येन आनमन स्क्वायर में आयोजित समारोह में लाल झंडे लिए हुए खुशी से नाचते-गाते लोगों के हुजूम, अधिकारियों, नृत्य कलाकारों और छात्र-छात्राओं से मुखातिब होते हुए कहा कि यह पवित्र मशाल ओलिंपिक की महान भावना की प्रतीक है। इससे न सिर्फ तमाम उम्मीदें और सपने जुड़े हैं, बल्कि यह आनंद, दोस्ती और शांति को भी खुद में समेटे हुए है।130 दिनों की इस ओलिंपिक मशाल रैली का पहला पड़ाव कल कजाखिस्तान में होगा। यह मशाल चीन के विभिन्न प्रांतों और क्षेत्रों से होती हुई ओलिंपिक खेलों के उद्‍घाटन से दो दिन पहले छह अगस्त को बीजिंग लाई जाएगी।

Sunday

तस्वीरों में 2020 के भारत के प्रमुख शहर

भोपाल
कोच्ची

कोलकाता


गोवा



बेंगलूर




दिल्ली




सभी फोटो मेरे एक मित्र मनीष ने रोहतक से मेल किया है












सबसे बड़ा कर्जदार है उत्तर प्रदेश

देश में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल सर्वाधिक कर्ज का बोझ उठा रहे हैं। यह तथ्य महाराष्ट्र के आर्थिक सर्वेक्षण से उभर कर सामने आया है। इसमें कहा गया है कि वर्ष 2006-07 में उत्तर प्रदेश पर सबसे ज्यादा एक लाख 61 हजार 358 करोड़ रुपये का कर्ज बोझ रहा। यह राज्य के सकल घरेलू उत्पाद [जीडीपी] का 52 प्रतिशत है। इसी अवधि में महाराष्ट्र पर एक लाख 34 हजार 493 करोड़ रुपये, पश्चिम बंगाल पर एक लाख 26 हजार 226 करोड़ रुपये और आंध्र प्रदेश पर 91 हजार 445 करोड़ रुपये का कर्ज बोझ रहा। वैसे तो महाराष्ट्र के मामले में कुल कर्ज अधिक है, लेकिन यह राज्य के जीडीपी का महज 26.4 प्रतिशत ही है। वहीं, दूसरी ओर पश्चिम बंगाल पर कुल कर्ज उसके जीडीपी का 48 प्रतिशत आंका गया है। आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक बिहार पर 54 हजार 897 करोड़ रुपये का कर्ज है जो कई राज्यों के मुकाबले कम है। इसके बावजूद बिहार पर कर्ज का भार उसके जीडीपी का 64 प्रतिशत है। इसी तरह राजस्थान पर कुल कर्ज बोझ 72 हजार 652 करोड़ रुपये है जो उसके जीडीपी का 53.6 प्रतिशत है।

चीन खतरा नंबर वन

तिब्बत को चीनी भू-भाग के रूप में मान्यता देने के राजग सरकार के फैसले को एक चूक बताते हुए पूर्व रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडिस ने कहा है कि साम्यवादी देश भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है। उन्होंने चीन को धौंस दिखाने का मौका देने के लिए संप्रग सरकार की भी आलोचना की। तिब्बत संकट और उस पर भारत की प्रतिक्रिया पर आक्रोश जाहिर करते हुए राजग नेता ने कहा कि ओलंपिक मशाल को भारत आने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने अपने सहयोगियों और अन्य लोगों से भी कहा कि वे इस मशाल को देश से नहीं गुजरने देने के लिए जो भी प्रयास हो सकते हैं करें। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार की ओर से तिब्बत को चीन का हिस्सा स्वीकारे जाने के फैसले पर उन्होंने कहा कि यह गलती नहीं थी, बल्कि एक भूल थी। ऐसा नहीं होना चाहिए था। फर्नाडिस इस सरकार में रक्षा मंत्री थे। सीएनएन-आईबीएन पर प्रसारित करण थापर के डेविल्स एडवोकेट कार्यक्रम में फर्नाडिस ने 10 साल पहले दिए गए बयान को याद करते हुए कहा कि चीन अभी भी भारत के लिए संभावित खतरा नंबर एक है और वह दुश्मन बन सकता है। भारतीय राजदूत निरुपमा राव को पिछले दिनों मध्यरात्रि में चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से बुलाए जाने की घटना पर फर्नाडीस ने कहा कि भारत ने इस मुद्दे पर आत्मसमर्पण कर दिया। जार्ज फर्नाडिस ने कहा कि हमारी सरकार ने इसकी मंजूरी दी। उन्हें कोई शर्म नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि सरकार को अपने राजदूत को अगले दिन तक का इंतजार करने की सलाह देनी चाहिए थी। गौरतलब है कि निरुपमा राव को यहां चीनी दूतावास की सुरक्षा तोड़े जाने के मुद्दे पर अपनी चिंता जताने के लिए चीनी विदेश मंत्रालय ने मध्यरात्रि में तलब किया था। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत को चीन के हाथों बेच दिया गया है। यह पूछे जाने पर कि क्या चीन भारत को धौंस दिखा रहा है, उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से और हमारा देश इसे स्वीकार करता है। पूर्व रक्षा मंत्री ने कहा कि चीन के प्रति भारत का यह रुख 1962 के युद्ध के कारण है। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि 1962 में जो हुआ था वह अभी भी लोगों के जेहन में बना हुआ है और वे इससे बाहर नहीं निकल सकते। फर्नाडिस ने देश में तिब्बतियों के विरोध प्रदर्शन से निपटने के तरीके को लेकर चीन की ओर से मिली सराहना पर भी ऐतराज जताया। उन्होंने कहा कि तिब्बत मामले में भारत की प्रतिक्रिया अपर्याप्त थी। उन्होंने कहा कि भारत को इस मामले में और साहस दिखाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि भारत को बीजिंग में इस साल अगस्त में होने वाले ओलंपिक खेलों का बहिष्कार करना चाहिए और मशाल को अपने क्षेत्र से गुजरने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। फर्नाडीस ने कहा कि मैंने अपने सभी सहयोगियों और तिब्बत का समर्थन करने वाले अन्य लोगों से कहा है कि उन्हें चीनी मशाल को यहां से गुजरने से रोकना चाहिए।

शोहरत और कामयाबी का नशा

शोहरत और कामयाबी का नशा इस कदर सर चढकर बोलता है कि इंसान अपने पुराने साथी और दिन भी भूल जाता है। ऐसा ही नशा ऐश्वर्या राय बच्चन के सर पर भी चढा हुआ मालूम होता है।यही वजह है कि जब उससे मिलने उसकी पुरानी दोस्त स्वेता मेनन आई तो ऐश ने उससे अच्छा व्यवहार करना तो दूर उसे पहचानने से ही इंकार कर दिया. बेचारी स्वेता ऐश के इस व्यवहार से दुखी होकर वापस चली गई.ज्ञात हो कि स्वेता और ऐश्वर्या राय दोनो ने मिस इंडिया प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था और दोनो एक महिने की रिहर्सल के लिए गोवा के फाइव स्टार होटल में ठहरे थे और दोनो एक ही कमरे में साथ साथ थे.इस दौरान दोनो की अच्छी दोस्ती हो गई थी. यही वजह थी कि जब वह काफी अर्से बाद सिकंदर खेर की फिल्म समर आफ 2007 की पार्टी में हिस्सा लेने आई तो वह ऐश्वर्या राय से मिलने की भी इच्छुक थी.वह ऐश की बेताबी से प्रतिक्षा कर रही थी और जैसे ही ऐश आई तो वह उसे हैलो बोलने गई लेकिन ऐश ने कोई उत्साह नहीं दिखाया और न ही स्वेता से कोई बात की. उसने स्वेता को पूरी तरह नजरांदाज कर दिया. ऐश की इस बेरुखी से स्वेता हैरान रह गई.

Saturday

सालों की मेहनत खाक

  • मंतोष कुमार सिंह
यह भारत है। सबकुछ संभव है। यहां भगवान देता है तो छप्पड फाड के और लेता भी है तो छप्पड फाड के। कब किस पर प्रभु की दृष्टि अथवा कुष्टि पड जाए कहा नहीं जा सकता। कौन कब अर्श से फर्श पर आ जाए इसकी भविष्यवाणी भी नहीं की जा सकती है। शायद किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आठ बार ओलंपिक में स्वर्ण पदक जितने वाली भारतीय हाकी टीम ओलंपिक के लिए ही क्वालीफाई नहीं कर पाएगी लेकिन हमारे जांबाज खिलाडियों ने यह भी कर दिखाया। अस्सी साल की मेहनत को कुछ ही समय में खाक कर दिय। हमारे खिलाडियों ने ओलंपिक क्वालीफाईंग टूर्नामेंट के फाइनल में इंग्लैंड से 2-0 से हारकर बीजिंग ओलिंपिक में स्थान पाने का भारत का सपना तोड दिय। पिछले अस्सी वर्षों में यह पहली बार है कि भारत ओलिंपिक हाकी स्पर्धा का हिस्सा नहीं बन पाएगा। पूरे मैच में भारतीय खिलाडी संघर्ष करते नजर आए। भारत और इंग्लैंड के खेल में जमीन-आसमान का अंतर दिखा। इंग्लैंड के खिलाडी क्लोज मार्किंग, जल्दी पास देने और पोजिशन के मुताबिक खेलने की रणनीति पर डटे रहे। दूसरी ओर भारत के पास कोई योजना ही नजर नहीं आ रही थी। खिलाडियों में आपसी तालमेल का भी अभाव दिखा। भारतीयों ने कुछ अच्छे मूव बनाए लेकिन उन्हें अंजाम तक नहीं पहुंचा पाने की पुरानी कमजोरी फिर जाहिर हो गई। खिलाडियों का ध्यान अपने ही खेल पर रहा। जिसके कारण टीम को हार का मुंह देखना पडा। भारत ओलंपिक हाकी का स्वर्ण पदक आठ बार जीत चुका है। 1928 में पहली बार भारतीया हाकी टीम ने पूरी दुनिया पर विजय पताका फहराया था। टीम ने एम्सटर्डम में जयपाल सिंह के नेतृत्व में स्वर्ण पदक जीता था और सोना जीतने का सिलसिला लगातार 1956 तक जारी रहा। 1960 में फाइनल हारने के बाद 1964 में भारत पुनः स्वर्ण जीतने में सफलता प्राप्त की। इसके बाद 1968 और 1972 में फाइनल में पहुंचने में असफल रहा लेकिन कांस्य पदक जीतने में सफल रहा। बहिष्कारों के बीच हुए 1980 के मास्को ओलिंपिक खेलों में भारत को स्वर्ण जीतने में सफलता मिली। उसके बाद से वह कभी सेमीफाइनल में नहीं पहुंच सका। टीम को पताल में पहंचाले में भारतीय हाकी महासंघ (आईएचएफ) का अहम योगदान है। ओलंपिक में पहुंचने में भारत की नाकामी के लिए आईएचएफ के अध्यक्ष केपीएस गिल की तानाशाही नीतियां जिम्मेदार हैं। आईएचएफ मौजूदा पदाधिकारियों की राजनीति की भेंट चढ गया है। महासंघ में कोई भी व्यक्ति किसी पद पर आठ साल से अधिक समय तक नहीं रह सकता मगर इस प्रावधान की सरासर अनदेखी की गई है। गिल साहब 1994 से महासंघ के अध्यक्ष पद काबिज हैं। इन 14 सालों में हाकी ने वह सबकुछ गंवा दिया जिसे सहेजने में 80 साल लग गए थे। दरअसल भारतीय हाकी टीम का पतन गिल के पद संभालने के साथ ही शुरू हो गया था।

नसबंदी कराओ, बंदूक पाओ

मध्य प्रदेश के शिवपुरी में जनसंख्या नियंत्रण के उपाय के तहत एक अनूठी पहल की गई है। यहां नसबंदी कराने वाले पुरुषों को बंदूक का लाइसेंस दिया जा रहा है।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डा. दिनेश कौशल ने बताया कि शुक्रवार को जिला अस्पताल में आयोजित पुरुष नसबंदी शिविर में 22 लोगों का आपरेशन किया गया था। इनमें से 19 लोगों ने हथियार के लाइसेंस के लिए आवेदन दिया है, जिन्हें जरूरी जांच-पड़ताल के बाद लाइसेंस जारी कर दिए जाएंगे।
गौरतलब है कि नसबंदी शिविर में ही लाइसेंस के फार्म जमा कराने की व्यवस्था की गई थी। इस जिले में लोगों में बंदूकों के प्रति खास आकर्षण है। बंदूक लेकर चलना यहां शान और संपन्नता की निशानी माना जाता है। इसके चलते स्वास्थ्य विभाग ने नसबंदी कराने वालों के लिए बंदूक का लाइसेंस देने का चारा फेंका। यह पहल काफी सफल भी रही।

ऊटपटांग शीर्षक पर पुरस्कार

ऊटपटांग शीर्षक वाली किताबों की प्रतियोगिता में इस साल इफ यू वांट क्लोजर इन योर रिलेशनशिप, स्टार्ट विद योर लेग्स ने बाजी मारी है। इस पुस्तिका को आई वाज टार्चर्ड बाइ दि पिग्मी लव क्वीन से कड़ी टक्कर मिली। बुकसेलर मैगजीन पुरस्कार के लिए तीसरा स्थान चीज प्राब्लम साल्व्ड शीर्षक वाली किताब को मिला। यह फैसला आनलाइन वोटिंग के जरिए कराया गया। वोट में आठ हजार 500 लोगों ने हिस्सा लिया। यह पुरस्कार पिछले 30 साल से लगातार दिया जा रहा है। दरअसल पुरस्कार देने वाली पत्रिका बुकसेलर के सहायक संपादक जोएल रिकेट ने टाप पर रही किताब के बारे में कहा, इस किताब का शीर्षक इतना सटीक है कि आपको किताब पढे़ बिना इसकी विषयवस्तु पता चल जाती है। इस किताब के लेखक बिग बूम ने इसे एक मार्गनिर्देशक पुस्तिका बताया है। उन्होंने इसे महिलाओं की भलाई के लिए एक पुरुष द्वारा लिखी किताब बताया है।

धरती का विनाश रोकने के लिए ब्लैक आउट

दुनिया भर में 29 मार्च को ग्लोबल वार्मिग विरोध दिवस मनाया गया। इस अवसर पर करीब 35 देशों के 370 शहरों में लोगों ने ब्लैक आउट कर इस मसले को उजागर किया। इस मौके पर पूरा आस्ट्रेलिया लगभग एक घंटे तक अंधेरे में रहा। सिडनी के ओपेरा हाउस और व्यस्त हार्बर ब्रिज की बत्तियां भी गुल कर दी गई थीं। 'अर्थ आवर 2008' के आयोजकों के अनुसार दुनिया भर में करीब तीन करोड़ लोगों ने पर्यावरण संरक्षण के इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया। अर्थ आवर आयोजन का उद्देश्य ग्लोबल वार्मिग संकट की ओर विश्व समुदाय का ध्यान आकर्षित करना था। आस्ट्रेलिया में लोगों ने समुद्र के किनारे कैंडिल लाइट पार्टियों का आयोजन किया। नदियों में दीप दान किया। पूरे देश में बिजली की खपत को एक तरह से ठप कर दिया गया था। दक्षिण विक्टोरिया प्रांत के एक रेस्त्रां ने उन लोगों को मुफ्त बीयर बांटा, जो कार्बन गैस के उत्सर्जन के खिलाफ काली पट्टियां बांध कर रेस्त्रां आए थे। पिछले वर्ष भी आस्ट्रेलिया में लोगों ने अर्थ आवर मनाया था। उस समय भी पूरे आस्ट्रेलिया में घंटे भर के लिए बत्तिायां गुल कर दी गई थी। उस कार्यक्रम में करीब 20 लाख लोगों ने भाग लिया था। आस्ट्रेलिया के अलावा अमेरिका के अटलांटा, शिकागो, न्यूयार्क, मिसीसिपी और सैन फ्रांसिस्को के लोगों ने भी ग्लोबल वार्मिग की समस्या को उजागर करने के कार्यक्रम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। सैन फ्रांसिस्को के गोल्डन गेट ब्रिज और शिकागो के सीयर्स टावर की बत्तिायां घंटे भर गुल रहीं। थाइलैंड, कनाडा, जर्मनी, जापान, फिजी, न्यूजीलैंड और इजरायल में भी लोगों ने बत्तिायां गुल की। अर्थ आवर 2008 के आयोजकों ने लोगों से स्थानीय समय के हिसाब से शाम 8 बजे से 9 बजे तक बत्ताी बुझा कर ग्लोबल वार्मिग की ओर विश्व समुदाय का ध्यान दिलाने को कहा था। साढ़े तीन हजार व्यापारिक घरानों ने भी इस वैश्विक कार्यक्रम में भाग लिया।

लालू पर फिदा हुई बेगम


रेलमंत्री लालू प्रसाद का अंदाज ही निराला है-बात राजनीति की हो या टीवी शो की हर जगह वह अपनी हाजिर जवाबी के लिए मशहूर हैं। चैट शो की चर्चित पाकिस्तानी एंकर बेगम नवाजिश भी लालू से बातचीत में उनकी इस खास अदा पर मोहित हो गई। भारतीय मनोरंजन टेलीविजन चैनल पर पेश होने वाले एक चैट शो 'बेगम' में लालू का यह साक्षात्कार पेश किया जाएगा। लालू ने अपने ठेठ गंवई एवं चुटीले अंदाज में बेगम के सवालों का जवाब दिया, जिसमें लालू ने उन्हें राजनीति का मर्म समझाया। उन्होंने बेगम को बताया कि राजनीति में दोस्त नहीं बनाना चाहिए, नहीं तो वह आपको बाजार में बेच देगा। विदेशी छात्रों को मैनेजमेंट का फंडा पढ़ाने वाले लालू प्रसाद ने बेगम को एक सवाल के जवाब में खांटी देशी अंदाज में रेलवे को एक लाभकारी निकाय बनाने का रहस्य समझाते हुए कहा कि रेलवे एक जर्सी गाय है। मेरे रेल मंत्रालय संभालने से पहले यह गंदा-संदा था। मैंने इसे नहला-धुला कर साफ किया तो यह दूध देने लगी। चैट शो के एपीसोड की शूटिंग के दौरान रेलमंत्री लालू प्रसाद को तैयार होने में 30 मिनट लगे। लालू ने बेगम को बताया कि उन्हें सबसे अधिक नफरत मोबाइल फोन से है। बातचीत के बीच में ही उन्होंने बेगम को अपने साथ रेल यात्रा की पेशकश भी कर दी। इसपर बेगम ने उनसे पूछा कि राबड़ी जी को इस पर आपत्ति तो नहीं होगी। लालू प्रसाद ने बताया कि एक समय वह मांसाहारी थे, लेकिन अब वह इसे छूते तक नहीं। खानपान में आए इस बदलाव के बारे उन्होंने बताया कि एक दिन शंकर भगवान उनके सपने में आए और कहा कि मांस मछली छोड़ दो तो तुम्हारी परेशानी दूर हो जाएगी। उस दिन से उन्होंने मांस मछली खाना छोड़ दिया। लालू प्रसाद ने कहा कि उनके पसंदीदा अभिनेता दिलीप कुमार और अभिनेत्री सायरा बानो रही हैं। आजकल उन्हें शाहरूख खान और सलमान खान पसंद हैं। उन्होंने कहा कि अब फिल्मों में वो बात नहीं रही। इक्का-दुक्का अच्छी फिल्में बनती भी हैं तो समय की कमी के कारण वह इसे नहीं देख पाते। बेगम ने जब उनसे पूछा कि आजकल आप एक बड़े ब्रांड बन चुके हैं, तो उन्होंने कहा कि मेरे उपभोक्ता ज्यादा हैं। मेरे कारण अगर किसी का रेट बढ़ जाता है तो क्या फर्क पड़ता है। राजनीति पर तल्ख टिप्पणी करते हुए लालू प्रसाद ने कहा कि राजनीति में किसी को दोस्त नहीं बनाना चाहिए, नहीं तो वह आपको बाजार में बेच देगा। लालू यादव ने बेगम को कांसे से बनी ट्रेन उपहार स्वरूप भेंट की।
साभारःजागरण

मेनका पर भैंस लूट का मुकदमा


पीलीभीत।
पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी तथा तीन अज्ञात लोगों के विरुद्ध शनिवार को वीसलपुर कोतवाली में लूट का मुकदमा दर्ज कराया गया है। पुलिस अधीक्षक सुग्रीव गिरि ने बताया कि बरेली जिले के सेथल कस्बा निवासी शब्बीर ने पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी तथा तीन अज्ञात लोगों के विरुद्ध उसके जानवरों को जबरन ग्रामीणों में बांट दिए जाने की शिकायत पुलिस थाने में दर्ज कराई है। उल्लेखनीय है कि शुक्रवार को वीसलपुर तहसील निवासी शब्बीर लखीमपुर जिले से एक मेटाडोर पर कुछ भैंसें खरीदकर ले जा रहा था, संयोग से मेनका गांधी भी वीसलपुर में थीं, उन्होंने मेटाडोर रुकवा कर उस पर लदी भैंसों को ग्रामीणों में बांट दिया था।

दैनिक जागरण कानपुर को पत्रकारों की आवश्‍यकता है

शशिकान्‍त अवस्‍थी

दैनिक जागरण के कानपुर संस्‍करण ने वरिष्ठ उप सम्‍पादक, उप सम्‍पादक तथा प्रशिक्षु उप सम्‍पादक पद हेतु विज्ञापन प्रकाशित कर आवेदन आमन्त्रित किये है । दस दिन के अन्‍दर आवेदन कानपुर कार्यालय में आवेदन प्राप्त हो जाये ।
दैनिक जागरण बिल्डिंग,सर्वोदय नगर ,कानपुर ।

जागरण ने कोई ई-मेल आईडी नही दी है । लेकिन कानपुर के बाहर से लोग मेरी ई-मेल आईडी पर मेल भेज सकते है जिन्‍हे मै प्रिन्‍ट करके जागरण के कार्यालय में पहुंचा दूंगा । मेरी आई डी है awasthi.shashikant@gmail.com

देखें भडास

मीरा नायर 'पर्सन ऑफ द ईयर'

भारत में जन्मी अंतरराष्ट्रीय स्तर की फिल्म निर्माता मीरा नायर को एक अमेरिकी अखबार ने 'पर्सन ऑफ द ईयर' पुरस्कार से सम्मानित किया है। इंडिया अब्रोड अखबार द्वारा प्रायोजित यह पुरस्कार मीरा नायर को शुक्रवार शाम पेप्सिको की सीईओ इंदिरा नूई ने प्रदान किया। पिछले साल नूई को भी इस पुरस्कार से नवाजा गया था। इस मौके पर नूई ने मीरा नायर के सिनेमा और समाज के लिए योगदान का जिक्र करते हुए कहा कि मीरा ने अपनी प्रतिभा से लोकमानस से जुड़े प्रश्नों को उठाया है। 50 वर्षीय मीरा नायर ने इस पुरस्कार के लिए अपनी माँ और उन सभी महिलाओं के प्रति सम्मान व्यक्त किया, जो उनके लिए प्रेरणास्रोत रही हैं। नायर की सफल पुरस्कार विजेता फिल्मों में सलाम बांबे, मानसून वेडिंग और द नेमसेक हैं। मीरा अगली फिल्म 'एमेलिया' बनाने जा रहीं हैं, जिसमें हॉलीवुड अभिनेत्री हिलेरी स्वांक काम करेंगी। इस मौके पर प्रख्यात अर्थशास्त्री पद्मा देसाई और उनके पति जगदीश भगवती को इंडिया अब्रोड लाइफटाइम अचीवमेंट से नवाजा दिया गया। दोनों ही कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं।

Thursday

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी ऐश्वर्या के दीवाने


पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गीलानी भी बॉलीवुड की अदाकारा ऐश्वर्या राय के दीवाने हैं.
हाल ही में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के पद की शपथ लेने वाले यूसुफ़ रज़ा गीलानी भी ऐश्वर्या राय की खूबसूरती और उनकी अदाओं पर फिदा हैं. पाकिस्तान के निजी चैनल जियो टीवी को दिए एक इंटरव्यू में यूसुफ़ रज़ा गीलानी ने बताया कि वो जेल में क़ैद के दौरान अपने लैपटॉप पर ऐश्वर्या राय की फ़िल्में देखा करते थे. वैसे, गीलानी स्वरकोकिला लता मंगेश्कर के गाने भी बड़े चाव से सुनते हैं. उनका कहना था, " मैं जब जेल में था तो उस दौरान मैं अपने लैपटॉप पर ऐश्वर्या राय की फ़िल्में देखता था और लता जी के गाने सुना करता था. मुझे ये बात कुबूल करने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि मैं ऐश्वर्या राय का ज़बरदस्त प्रशंसक हूँ." पाकिस्तान के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री गीलानी फ़िल्मों के शौकीन माने जाते हैं.यूसुफ़ रज़ा गीलानी 2001 में पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के अध्यक्ष थे और उन दौरान पद के दुरुपयोग के आरोप में उन्हें जेल की सज़ा काटनी पड़ी थी. वो 2006 तक रावलपिंडी की जेल में रहे थे. पचपन वर्षीय गीलानी ने अपने इंटरव्यू में बताया कि जेल के दौरान वो अधिकारियों की अनुमति से ऐश्वर्या राय की फ़िल्मों की डीवीडी मांग लिया करते थे. और खाली समय में वो इन फ़िल्मों को देखते थे और लता मंगेश्कर के गाने सुना करते थे.पाकिस्तान के अख़बार उर्दू एक्सप्रेस के अनुसार गीलानी ने माना कि उन्होंने जेल में ऐश्वर्या राय की सारी फ़िल्में देख लीं.उनका कहना था, "अपने जेल के दिनों में मैंने ऐश्वर्या राय की तक़रीबन सभी फ़िल्में देख लीं थीं." ये कोई पहला मौक़ा नहीं है जब किसी पाकिस्तानी राजनीतिज्ञ ने अपने बॉलीवुड प्रेम को इस तरह खुलकर ज़ाहिर किया है.
पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ भी बॉलीवुड की फ़िल्में और उसके कलाकारों को काफ़ी पसंद करते हैं. वर्ष 2003 में अपनी भारत यात्रा के दौरान मुशर्रफ़ ने शाहरुख़ ख़ान और रानी मुखर्जी से मुलाक़ात की थी. पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल ज़िया उल हक़ फ़िल्म स्टार शत्रुघ्न सिन्हा के ज़बरदस्त प्रशंसक थे. शत्रुघ्न सिन्हा उनके अच्छे दोस्त भी थे.

साभारःबीबीसी

अब ब्लाग पर हिंदी कॉमिक्स


हिंदी ब्लॉग की दुनिया में लगातार ही नए प्रयोग हो रहे है। तकनीक के साथ कदम बढ़ाते कुछ ब्लागर अब हिंदी कॉमिक्स को लेकर प्रयोग कर रहे है। बचपन में चाचा चौधरी, साबू, बिल्लू, पिंकी नागराज जैसे कॉमिक्स चरित्रों के प्रति एक अलग ही दीवानगी होती थी। इसी दीवानगी को कुछ ब्लॉगर ऑन लाइन तरीके से आगे बढ़ा रहे है।
पुनीत पांडे और प्रतीक द्वारा चलाए जा रहे ब्लॉग 'हिंदी ब्लॉग्स' में कॉमिक्स को लेकर लगातार चर्चा होती रहती है। कॉमिक्स के विभिन्न पात्रों को लेकर इस ब्लॉग में रोचक जानकारियां दी गई है। इसके साथ ही कई कॉमिक्स प्रकाशकों के लिंक भी यहां दिए जाते है। एक पोस्ट में ब्लॉग के प्रति गहरी रूचि को उजागर करते हुए पुनीत पांडे ने लिखा, 'शायद ही कोई ऐसा हो जिसने चाचा चौधरी और साबू के किस्से नहीं पढ़े हों। चाचा चौधरी के कॉमिक्स कुछ अजीब ही होते हैं। चाचा चौधरी को मैंने किसी भी कॉमिक्स में बुद्धिमतापूर्वक काम करते नहीं देखा, सब कुछ संयोग से अपने हो जाता है। फिर भी अंत में लिख दिया जाता है- चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज है!'
ब्लॉग जगत में कॉमिक्स के पात्रों को लेकर सबसे अधिक बातें होती है। साथ ही इन पात्रों की तस्वीरे भी पोस्ट की जाती है। इन ब्लॉगों पर दी गई टिप्पणियां भी मजेदार होती है। एक टिप्पणीकार ने लिखा, 'पौराणिक कथाओं के पात्रों से मेरा पहला परिचय अमर चित्र कथा के माध्यम से ही हुआ। मुझे प्राण, बिल्लू और पिंकी आज भी पसंद है।' प्रतीक ने एक पोस्ट में लिखा, 'कॉमिक्स की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इससे बच्चों में पढ़ने के प्रति गहरा रुझान पैदा हो जाता है जो बाद में दूसरी बौद्धिक पुस्तकों के अध्ययन के लिए भी प्रेरित करता है।' उन्होंने लिखा कि कॉमिक्स में प्रयोग की जाने वाली हिंदी काफी अच्छी और स्तरीय होती है जो पढ़ने वालों के लिए आगे चलकर नींव का काम करती है।
साभारःजागरण

जीत गई जिंदगी..!


'जाको राखे साइंया, मार सके न कोय..'की तर्ज पर आगरा शहर से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित हुलसपुरा गाँव में 45 फ़ीट गहरे गड्ढे में गिरी बच्ची ने मौत को मात देकर नई ज़िंदगी जीत ली है.दो बरस की वंदना 27 घंटे बाद गहरे गड्ढे से जीवित बाहर निकाल ली गई.वंदना को बाहर निकालने के लिए चलाए गए बचाव कार्य में सेना की मदद ली गई जिसके बाद ही वंदना को सफलतापूर्वक बाहर निकाला जा सका. 25 मार्च की शाम को वंदना खेलते वक्त बोरिंग के गहरे गड्ढे में गिर गई थी. लगभग 27 घंटों तक चले बचाव कार्य में आखिरकार सफलता हासिल हुई और वंदना को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया.

Monday

डालमिया ने की हेराफेरी !


भारतीय क्रिकेट बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष जगमोहन डालमिया ने अपने कार्यकाल के दौरान बीसीसीआई कोष से दो करोड़ 90 लाख रुपए का गबन किया। बीसीसीआई के मार्च 2006 में दायर मामले पर कार्रवाई करते हुए आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) ने पाया कि डालमिया ने कानूनी शुल्क के लिए जमा राशि को अन्य खर्चों में व्यय किया, जिनमें उनके व्यक्तिगत फोन बिल का भुगतान भी शामिल है। पुलिस संयुक्त आयुक्त (अपराध) राकेश मारिया ने कहा कि भारतीय कर विभाग ने लंदन से चलाए जा रहे पिलकाम खाते पर 64 मामले दर्ज ‍किए हैं। पिलकाम पाकिस्तान, भारत और श्रीलंका में 1996 में आयोजित विश्वकप की संयुक्त आयोजन समिति थी। उन्होंने कहा कि अपराध शाखा अब स्थानीय अदालत में डालमिया, गौतम दत्ता और केएम चौधरी के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल करेगी। उन्होंने कहा कि इस मामले में जाँच अभी जारी है और संभावना है कि आरोप-पत्र में कुछ और लोगों के नाम जुड़ेंगे। उन्होंने कहा कि कानूनी मामलों के खर्चे के लिए छह खाते खोले गए थे और इसमें से कोलकाता में केवल एक खाता खोला गया, जिसमें छह करोड़ 92 लाख रुपए जमा किए गए थे। मारिया ने कहा कि दस साल से अधिक साल तक बीसीसीआई अध्यक्ष रहे डालमिया ने फोन बिल, होटल बिल, कार का किराया तथा विदेशी विनिमय और स्टेशनरी की खरीदारी में राशि की हेराफेरी की। उन्होंने कहा कि दो करोड़ 90 लाख रुपए में से 85 लाख रुपए तो केवल फोन बिल के ही चुकाए गए। डालमिया ने अपने व्यक्तिगत फोन बिल भी इससे चुकता किए। इनमें से उनकी माँ के नाम पर दर्ज एक फोन तथा उनकी तीन कंपनियों के फोन शामिल हैं।

गिलानी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री निर्वाचित


यूसुफ रजा गिलानी को सोमवार को संसद ने पाकिस्तान का नया प्रधानमंत्री चुना। आगामी गठबंधन सरकार के मुखिया के तौर पर चुने गए 55 वर्षीय गिलानी की जीत पहले से ही तय थी। नेशनल असेंबली के पूर्व स्पीकर गिलानी को 342 सदस्यीय नेशनल असेंबली में 264 मत मिले, जबकि उनके एकमात्र विरोधी और विपक्षी पीएमएल (क्यू) के वरिष्ठ नेता चौधरी परवेज इलाही को 42 मत मिले। नेशनल असेंबली की स्पीकर फहमीदा मिर्जा ने गिलानी के जीत की घोषणा करते हुए कहा कि यूसुफ रजा गिलानी को सदस्यों का बहुमत हासिल है। उल्लेखनीय है कि गिलानी को मुशर्रफ के शासनकाल में पाँच साल के कारावास की सजा काटनी पड़ी थी। खबर है कि नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री गिलानी ने पूर्व मुख्‍य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी एवं अन्य जजों को रिहा करने के आदेश दिए हैं। इन जजों को आपातकाल के दौरान नजरबंद कर दिया गया था।

केन्द्र सरकार के कर्मचारियों की बल्ले-बल्ले


छठे वेतन आयोग ने केन्द्र सरकार के कर्मचारियों के लिए नए वेतनमानों की सिफारिश करते हुए न्यूनतम वेतनमान 6660 रुपए और अधिकतम 90 हजार रुपए मासिक तय किया है। न्यायमूर्ति बीएन श्रीकृष्ण की अध्यक्षता वाले छठे वेतन आयोग ने नए वेतनमानों को एक जनवरी 2006 से लागू करने की सिफारिश अपनी रिपोर्ट में दी है। केन्द्र सरकार के अधिकारियों में सचिव और केबिनेट सचिव को अलग-अलग वेतनमान दिए गए हैं। केबिनेट सचिव के लिए 90 हजार रुपए मासिक (फिक्स) वेतन तय किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ए-1 श्रेणी के शहरों के लिए आवास भत्ता मौजूदा दर 30 प्रतिशत पर ही रहेगा, लेकिन ए, बी-1, बी-2 श्रेणी के शहरों में यह भत्ता बढ़ाकर 20 प्रतिशत तथा सी श्रेणी तथा अन्य शहर जो किसी श्रेणी में नहीं आते उनके लिए आवास भत्ता 10 प्रतिशत करने की सिफारिश की गई है। छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक नए वेतनमान लागू करने से 2008-09 में सरकार पर 12561 करोड़ रुपए का बोझ आएगा। आयोग ने कहा है कि यदि उसके द्वारा सुझाए गए को लागू किया गया तो 4586 करोड़ रुपये की बचत होगी और सरकार पर 7975 करोड़ रुपये का ही बोझ पड़ेगा। आयोग के अनुसार एरियर के भुगतान पर 18060 करोड़ रुपये की एकबारगी अदायगी का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ेगा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि रक्षा सेवाओं के लिए भी नागरिक सेवाओं के वेतनमानों के समान ही ग्रेड मान्य होंगे। लेकिन सेनाओं में ब्रिगेडियर के रैंक तक सभी अधिकारियों को 6000 रुपए और नर्सिंग सेवाओं के अधिकारियों को 4200 रुपए तथा अधिकारियों से नीचे के सभी रैंक के कर्मियों को 1000 रुपये प्रतिमाह अलग से 'सैन्य सेवा वेतन' के रूप में दिए जाएँगे। आवास और महँगाई भत्ते जैसे दूसरे भत्तों की गणना में 'सैन्य सेवा वेतन' शामिल होगा, लेकिन सालाना वेतन वृद्धि में यह शामिल नहीं होगा। सशस्त्र सेना चिकित्सा सेवा के महानिदेशक को सर्वोच्च वेतनमान 80 हजार रुपए (फिक्स) रखा गया है। रक्षा सेनाओं में अधिकारी से नीचे के रैंक के लिए केवल दो ट्रेड समूह रखे गए हैं। इससे पहले के वाई और जेड ट्रेड समूह को मिला दिया गया है। एक्स समूह में आने वाले ट्रेड समूह के कर्मचारियों को 1400 रुपए महीने का अतिरिक्त वेतन दिया जाएगा। पेंशन का भुगतान अंतिम पूर्ण वेतन के 50 प्रतिशत के बराबर किया जाएगा और इसमें पूर्ण पेंशन भुगतान के लिए 33 साल की नौकरी की शर्त भी नहीं होगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि 15 से 20 साल की सेवा के बाद नौकरी छोड़ने वालों को उदार सेवानिवृत्ति पैकेज दिया जाएगा। सेवानिवृत्ति के बाद 80, 85, 90, 95 और 100 साल की उम्र तक पहुँचने वाले पेंशनरों और पारिवारिक पेंशनभोगियों को अधिक दर पर पेंशन दी जाएगी। एकमुश्त पेंशन लेने के लिए नए सिरे से निर्धारण करने की भी सिफारिश रिपोर्ट में की गई है। किसी सरकारी कर्मचारी की नौकरी पर रहते अचानक किसी घटना में मृत्यु की स्थिति में उसके परिवार को 10 साल की अवधि के लिए बढ़ी पर पेंशन का भुगतान किया जाएगा।
वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि न्यायमूर्ति बीएन श्रीकृष्ण की अध्यक्षता वाले आयोग ने अपनी रपट सौंप दी है। आयोग की सिफारिशें स्वीकार करने के बाद केंद सरकार के 40 लाख से ज्यादा कर्मचारियों को तोहफा मिलेगा। आयोग का गठन 2006 में किया गया था। सरकार ने अपने कर्मचारियों के 50 फीसदी महँगाई भत्ते का मूल वेतन में विलय करने का निर्णय लिया है और सिफारिशें लागू करने से कर्मचारियों के वेतनमानों में खासी बढ़ोतरी होगी। हालाँकि वित्तमंत्री ने बजट में वेतनमानों में बढ़ोतरी के संबंध में कोई विशेष आवंटन नहीं किया है उन्होंने कहा था कि इसकी पर्याप्त गुंजाइश है।

Thursday

होली की ढेर सारी शुभकामनाएं



  1. खाके गुजिया, पी के भंग लगा के थोड़ा थोड़ा सा रंग बजा के ढोलक और मृदंग खेलें होली हम तेरे संग। होली मुबारक

  2. रंग उड़ाये पिचकारी रंग से रंग जाये दुनिया सारी होली के रंग आपके जीवन को रंग दें ये शुभकामना है हमारी। शुभ होली।

  3. रंग के त्यौहार में सभी रंगों की हो भरमार ढेर सारी खुशियों से भरा हो आपका संसार यही दुआ है हमारी भगवान से हर बार। होली मुबारक।

  4. मक्की की रोटी नींबू का अचार सूरज की किरणें खुशियों की बहार चांद की चांदनी अपनॊं का प्यार मुबारक हो आपको होली का त्यौहार।

  5. रंगों में घुली लड़की क्या लाल गुलाबी है जो देखता है कहता है क्या माल गुलाबी है पिछले बरस तूने जो भिगोया था होली में अब तक निशानी का वो रुमाल गुलाबी है।

Wednesday

पीपी सिंह को ठाकुर वेद राम पुरस्‍कार

माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय, भोपाल के पत्रकारिता विभाग के प्रमुख प्रो. पुष्पेन्द्र पाल सिंह को ठाकुर वेद राम प्रिंट मीडिया एंव पत्रकारिता शिक्षा पुरस्‍कार से समानित किए जाने का निर्णय किया गया है। श्री सिंह को पत्रकारिता के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए 21 अप्रैल को यह पुरस्कार दिया जाएगा। यह पुरस्कार दुनिया भर में कुल्‍लू के शॉल को नई पहचान दिलाने वाले ठाकुर वेद राम के जन्‍म दिवस पर आयोजित एक समारोह में प्रदान किए जाएगा।साहित्‍य, पत्रकारिता, हैंडीक्राफ्ट व हैंडलूम और कॉआपरेटिव के क्षेत्र में विशेष योगदान देने वालों को प्रति वर्ष भुट्टी वीवर्स कॉआपरेटिव सोसायटी की ओर से ठाकुर वेद राम राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार दिया जाता है।पत्रकारिता जगत में पीपी सिंह के नाम से मशहूर श्री सिंह को इससे पहले पंजाब कला साहित्य अकादमी की तरफ से भी विशेष अकादमी अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है।आठ अक्टूबर १९६९ को जन्मे पीपी सिंह को पिछले वर्ष अमरीका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ्लोर्डिया की ओर से अमेरिका भी बुलाया जा चुका है। वर्तमान में पुष्पेन्द्र पाल सिंह माखन लाल पत्रकारिता विश्‍व विद्यालय के पत्रकारिता विभाग के प्रमुख की भूमिका निभा रहे हैं।



Sunday

मध्य प्रदेश मीडिया में क्रांति

मध्य प्रदेश में नए अखबारों के प्रकाशन को लेकर होड़ मची है। जानकारी के अनुसार इस साल नौ नए अखबारों का प्रकाशन होना है, जिस कड़ी में कई अखबारों का प्रकाशन शुरू हो गया है। अमर उजाला के जल्द भोपाल से भी प्रकाशित होने की खबर है। बिजनेस अखबार बिजनेस स्टैंडर्ड जल्द ही इंदौर संस्करण लांच करने जा रहा है। राज एक्सप्रेस जुलाई से ग्वालियर और जबलपुर से संस्करण शुरू कर रहा है। हरिभूमि भी जबलपुर और ग्वालियर पहुंचने वाला है।

Saturday

मीडिया मसाला-2

सीएनबीसी टीवी में आए दो नए पत्रकार
पी साई हरीनी और अर्पणा आंद्रे ने सीएनबीसी टीवी 18 मुंबई में ज्‍वॉइन किया है। साई टीवी 9 के अलावा एनडीटीवी में भी कार्य का चुके हैं, जबकि अर्पणा ने सेंट जेवियर्स से अपनी पढ़ाई पूरी की हैं।

शोभना आईबीएन7 में
सहारा टीवी और इंडिया टीवी के बाद अब शोभना यादव ने आईबीएन-7 नोयड़ा में ज्‍वॉइन कर लिया है।

दो पत्रकारों ने आईएएनएस छोड़ा
आईएएनएस, नई दिल्ली के अरविंद अमर उजाला, गाजियाबाद की टीम के सदस्य बन गए हैं। इसी तरह खबर है कि आईएएनएस की सुनीता ने नई दिल्ली में ही आज समाज अखबार ज्वॉइन कर लिया है।

मुकेश केजरीवाल न्यूज 24 में
अमर उजाला के राष्ट्रीय ब्यूरो में रिपोर्टर मुकेश केजरीवाल ने बीएजी फिल्‍म्‍स के नए चैनल न्यूज 24 ज्‍वॉइन कर लिया है।

निशांत राघव हिंदुस्‍तान में
दैनिक जागरण नोएडा आफिस में बतौर सीनियर रिपोर्टर कार्य कर रहे निशांत राघव ने अब जागरण को छोड़कर दैनिक हिंदुस्तान, फरीदाबाद ब्यूरो के इंचार्ज के पद पर ज्‍वॉइन कर लिया है।

प्रणय उपाध्याय न्यूज 24 में
प्रणय उपाध्याय ने बीएजी फिल्‍म्‍स के नए चैनल न्यूज 24 को ज्वॉइन किया है। प्रणय इससे पहले दैनिक जागरण के राष्ट्रीय ब्यूरो में सीनियर रिपोर्टर थे।
साभार-मेरीखबर

मीडिया मसाला

  • मध्‍य प्रदेश से आईनेक्‍स्‍ट
  • दैनिक भास्‍कर भी टैबुलाइड अखबार ला सकता है
हिंदुस्‍तान में मीडिया का स्‍वरुप बड़ी तेजी से बदल रहा है। कुछ समय पहले तक मुंबई और दिल्‍ली से निकलने वाले टैबुलाइड अखबार अब छोटे शहरों मे भी अपनी दस्‍तक दे रहे हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि आने वाला समय छोटे अखबारों का ही है। टैबुलाइड अखबार निकालने में फिलहाल सबसे आगे दैनिक जागरण (कानपुर) समूह है। खबर है कि दैनिक भास्‍कर भी टैबुलाइड अखबार ला सकता है।
समूह का टैबुलाइड अखबार आईनेक्स्ट उत्‍तर प्रदेश में अपना जलवा दिखाने के बाद अब मध्‍यप्रदेश के तमाम शहरों में आने की तैयारी कर रहा है। भोपाल समेत राज्य के दूसरे शहरों से भी आईनेक्‍स्‍ट जल्‍द ही शुरु होने जा रहा है। इसके लिए राजधानी भोपाल में समूह ने यूएनआई की बिल्डिंग किराये पर ली है। यह बिल्डिंग दैनिक भास्‍कर और नवभारत के ऑफिस के मध्‍य में है। उम्मीद है कि अगले कुछ ही महीनों में आईनेक्स्ट और समूह का बिजनेस अखबार शुरु हो जाएगा।

  • सहारा लाएगा पांच नए चैनल

बढ़ती मीडिया इंडस्‍ट्रीज में सब मलाई खाने में जुट गए हैं। और अब इस बार नंबर है सहारा वन का। सहारा वन मीडिया एंड इंटरटेनमेंट लिमिटेड अगले छह महीनों में पांच नए चैनल लांच करने की योजना बना रहा है। इसमें एक बंगाली चैनल होगा।
साभार-मेरीखबर

Thursday

नक्सलियों से लोहा लेने में कोताही क्यों ?

  • मंतोष कुमार सिंह
आतंरिक सुरक्षा के लिए प्रतिदिन खतरा बनते जा रहे नक्सलियों से लोहा लेने में पीडित राज्य सरकारें कोताही क्यों बरतती रही हैं, यह समझ से परे है। सरकारों की लापरवाही का नतीजा आम जनता और सुरक्षाकर्मियों को भुगतना पड रहा है। देश के 11 राज्य नक्सली हिंसा के शिकार हैं। पिछले साल नक्सली हिंसा में लगभग 50 प्रतिशत की वृध्दि हुई। पूरे देश में जितनी वारदातें हुईं उसके आधो से अधिक मामले अकेले छत्तीसगढ में हुए। 1960 के आसपास बंगाल के नक्सलबाडी से नक्सलवाद का जन्म हुआ। धीरे-धीरे नक्सलियों ने अपनी जडें मजबूत करनी शुरू कीं। 1985-95 में नक्सलियों ने मधय प्रदेश, छत्तीसगढ, आंधार प्रदेश, महाराष्ट्र, उडीसा, बिहार, उत्तार प्रदेश और झारखंड तक अपना नेटवर्क फैला लिया। गरीबों के मसीहा के रूप में जन्मे नक्सली उनका ही खुन पीने लगे। खून-खराबा, अपहरण, लूट आदि उनकी दिनचर्या बन गई और वे अत्याधुनिक हथियारों से लैस हो गए। आदिवासी और गरीबों की मजबूरी का फायदा उठाते हुए नक्सली इन्हें अपने कुनबे में शामिल करते गए। फिलहाल नक्सल पीडित क्षेत्रों के लोगों का जीना दुर्भर हो गया है। प्रभावित क्षेत्र के लोगों को नक्सलियों के साथ-साथ सुरक्षा बलों के जवानों के शोषण का भी शिकार होना पडता है। दोनों ही आदिवासियों और गरीबों की बहू-बेटियों को अपने हवस का शिकार बनाते हैं। डर और दहशत के मारे ये लोग कुछ नहीं कर पाते। मुंह खोलने की सजा मौत के रूप में चुकानी पडती है। दूसरी ओर इस बात का खुलासा हो चुका है कि कई एनजीओ अप्रत्यक्ष रूप से नक्सलियों की मदद करते हैं। इन एनजीओ के माधयम से विदेशी पूंजी नक्सलियों को मिल रही है। नक्सली हिंसा में वृध्दि की मुख्य वजह भ्रष्टाचार भी है। केंद्र सरकार से नक्सली उन्मूलन के लिए मिलने वाली राशि अफसर डकार जाते हैं। इसका लेखा-जोखा लेने वाला कोई नहीं है। भ्रष्टाचार के चलते खुफिया सूचना तंत्र भी पंगू बना हुआ है। ऐसे में नक्सली बडी वारदातों को अंजाम देने में सफल हो जाते हैं।
किसी बडी नक्सली वारदात के बाद राजनेता साहसिक प्रतिक्रिया देकर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड लेते हैं। अगर इस बात का बीडा उठा लिया जाए कि नक्सली समस्या से किसी भी सूरत में निजात पाना है तो लक्ष्य थोडी सी मेहनत के बाद जरूर मिल जाएगा। इसका ताजा उदाहरण पिछले दिनों उडीसा में देखने को मिला। पांच सौ की संख्या में नक्सलियों ने नयागढ जिले में पुलिस थानों, प्रशिक्षण स्कूल और जिला शस्त्रागार पर हमला कर कई जवानों को मौत के घात उतार दिया तथा भारी मात्रा में हथियार लूट ले गए। हमले के बाद राज्य सरकार और पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए नक्सलियों के खिलाफ नकेल कस दी। साहसिक कदम उठाते हुए 1500 जवानों ने फुलबनी जिले की कुपारी पहाडी पर छिपे 300 नक्सलियों को चारों ओर से घेर लिया और कई दिनों तक चली मुठभेड में अधिाकांश नक्सलियों को मार गिराया। इस अभियान में पहली बार वायुसेना के हेलीकाप्टरों को भी लगाया गया था। राज्य सरकार ने पडोसी राज्यों से भी मदद लेकर नक्सलियों के नाक में दम कर दिया। साथ ही हमले में लूटे गए 115 राइफलें, एक कारबाइन और एक ट्रक गोला बारूद बरामद कर लिया। यह कार्रवाई कई दिनों तक चली। नक्सलियों के पास से और हथियार और विस्फोटक सामग्री भी जब्त की गई। इतना ही नहीं कई खुंखार नक्सलियों को पुलिस ने धार दबोचा। पुलिस की सक्रियता और जबरदस्त पलटवार से नक्सली इधार से उधार सुरक्षित स्थान की तलाश में भागने लगे। सरकार के इस कदम की तारीफ की जानी चाहिए। इसे नक्सलियों के खिलाफ अब तक के सबसे बडे अभियान के रूप में देखा जा रहा है। सुरक्षा बल के जवान नक्सलियों के मांद में घुस कर उन्हें चुनौति दे रहे हैं। पीडित राज्यों को भी उड़ीसा से सबक लेते हुए नक्सलियों के खिलाफ आर-पार की लडाई छेड देनी चाहिए। इस प्रकार के साहसिक कदमों से नक्सलियों के हौसले पस्त होंगे और उनमें बिखराव शुरू होगा। यह सर्वविदित है कि सबको अपनी जान की परवाह होती है। ऐसे में जब नक्सलियों के खिलाफ चौतरफा हमला बोला जाएगा तो निश्चित तौर पर सफलता मिलेगी। बस कारगर रणनीति और उस पर अमल करने का जज्बा होना चाहिए। कोई भी समस्या ऐसी नहीं है जिसका समाधान न हो। बस उसे खोजने की जरूरत है। तमाम उपायों और दांवों के बावजूद नक्सली हिंसा में लगातार वृध्दि हो रही है। पुलिस और खुफिया तंत्र की मुस्तैदी को धात्ता बताते हुए नक्सली देश की आंतरिक सुरक्षा पर चोट कर रहे हैं। आतंकवाद पर काबू पाने में सरकार कुछ हद तक सफल रही है, लेकिन नक्सली गतिविधियों में तेजी से इजाफा हुआ है। छत्ताीसगढ की स्थिति तो जम्मू-कश्मीर और असम से भी विस्फोटक हो चुकी है। पिछले पांच सालों में यहां नक्सली हिंसा में दोगुनी वृध्दि हुई है। नक्सलियों ने छत्तीसगढ सरकार के साथ-साथ केंद्र सरकार की नाक में भी दम कर दिया है। वर्ष 2007 आतंकवादी घटनाओं की दृष्टि से अपेक्षाकृत राहत भरा रहा तथा आतंकवादी अपने कुत्सित मकसद में अपेक्षाकृत कम कामयाब हुए।
पूरे देश से मधय दिसंबर तक के प्राप्त आंकडों के अनुसार इस वर्ष आतंकवादी घटनाओं में कम से कम 2465 जानें गईं जिनमें 1125 आतंकवादी, 957 नागरिक और 333 सुरक्षाकर्मी शामिल हैं। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों में नाटकीय कमी आई। वहां आतंकवाद संबंधी घटनाओं में 768 जानें गईं जो 1990 के बाद सबसे कम हैं। वर्ष 1990 में 177 मौतें हुई थीं। अगर सरकारी आंकडों पर नजर डालें तो नक्सली हिंसा की भयावहता की असली तस्वीर उजागर होती है। इस साल 20 नवंबर तक आतंकवादी और नक्सली हिंसा में कुल 393 जवान और पुलिस अधिाकारी शहीद हुए, जिनमें जम्मू-कश्मीर में 118, उत्तार-पूर्वी राज्यों में 71 और नक्सल प्रभावित राज्यों में 204 जवान मारे गए। जबकि अकेले छत्तीसगढ में 188 जवानों को जान से हाथ धोना पडा अर्थात देशभर में आतंकी और नक्सली हिंसा में मारे गए जवानों में आधो छत्तीसगढ के हैं। 20 नवंबर 2007 तक जम्मू-कश्मीर में 417 तथा उत्तार-पूर्वी राज्यों में 434 आतंकवादी मारे गए। वहीं नक्सल प्रभावित राज्यों में 127 नक्सली ढेर हुए। 127 में मात्र 65 नक्सली छत्ताीसगढ में मारे गए, जबकि 179 को गिरफ्तार किया गया।
इस साल प्रदेश में 164 निर्दोष लोगों को नक्सलियों ने अपना शिकार बनाया, जबकि पूरे देश में 401 लोग नक्सली हिंसा के शिकार हुए। कुल मिलकार नक्सली हिंसा में 732 लोगों की जान गई। अकेले छत्ताीसगढ में 417 हिंसा के शिकार हुए। इस साल देश में कुल 1350 नक्सली घटनाएं हुईं। इन आंकडों से स्पष्ट है कि नक्सली नासूर बनते जा रहे हैं। इनसे निपटने के लिए अब तक कोई कारगर रणनीति नहीं बनी है। पीडित राज्य सरकारें अपने-अपने ढंग से नक्सलियों से लड रहे हैं। संयुक्त रूप से कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। धाडल्ले से नक्सलियों के प्रशिक्षण् शिविर चल रहे हैं। जिनकी जानकारी सबको है। ऐसे में केंद्र और प्रभावित राज्य सरकारों को एक मंच पर आकर कोई कारगर रणनीति बनाकर नक्सलियों के खिलाफ चौतरफा धाावा बोल देना चाहिए तब जाकर सफलता मिलेगी।

बाजार के चंगुल में क्रिकेट

  • मंतोष कुमार सिंह
परिवर्तन प्रकृति का सत्य नियम है। समय-समय पर हर क्षेत्र में परविर्तन होते रहे हैं, लेकिन किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि क्रिकेट में इस तरह का परिवर्तन देखने को मिलेगा कि वह पूरी तरह बाजार के चंगुल में फंस जाएगा। खूले बाजार में क्रिकेटरों की नीलामी होगी। खिलाडियों की प्रतिभा को सरेआम रौंदा जाएगा। धानबाकुरों के मेले में जानवरों की तरह बेचा जाएगा। ऐसे लोग उन्हें खरीदेंगे जिनका क्रिकेट से दूर-दूर तक का रिश्ता नहीं है। इससे स्पष्ट है कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल क्रिकेट को बाजार ने अगवा कर लिया है। यह क्रिकेट और उसके प्रशंसकों के लिए अच्छा नहीं है। इस मंडी से सिर्फ टीम के फ्रेंचाइजी लेने वालों का ही फायदा होगा। इससे न तो क्रिकेट की तरक्की होगी और न ही खिलाडियों की। हां क्रिकेटर मालामाल जरूर हो जाएंगे, लेकिन उनकी प्रतिभा का क्या होगा यह आने वाला समय ही बताएगा।
दुनिया के सबसे रईस क्रिकेट बोर्ड बीसीसीआई के इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के लिए पिछले दिनों मुंबई में मंडी लगी थी। इस मंडी में 60 क्रिकेटर अगले तीन सालों के लिए बिक गए। क्रिकेट के बाजार में खरीदार कोई और नहीं मुकेश अंबानी (मुंबई), विजय माल्या (बेंगलूर), शाहरुख खान (कोलकाता) और प्रीटि जिंटा (मोहाली) थे। इनके साथ डेक्कन क्रॉनिकल (हैदराबाद), इंडिया सीमेंट (चेन्नई), जीएमआर (दिल्ली) और इमार्जिंग मीडिया (जयपुर) ने ताल ठोकी। आईपीएल की फ्रेंचाइजी इन आठ टीमों ने खरीदी है। ट्वेंटी-20 टूर्नामेंट के लिए खिलाडियों की नीलामी में भारतीय वनडे टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी पर लक्ष्मी की सबसे ज्यादा बारिश हुई। धोनी को चेन्नई ने 6 करोड रुपए में खरीद लिया। भारत के तूफानी गेंदबाज ईशांत शर्मा गेंदबाजों की श्रेणी में सबसे महंगे रहे। उन्हें 3.8 करोड में शाहरुख खान ने अपनी टीम में ले लिया। खिलाडियों की नीलामी में भी शाहरुख खान किंग सबित हुए। उन्होंने अन्य टीमों को पटखनी दे दी। उनकी कोलकाता टीम में पाकिस्तान के रावलपिंडी एक्सप्रेस शोएब अख्तर, आस्ट्रेलिया के कप्तान रिकी पोंटिंग, न्यूजीलैंड के विकेट कीपर मैक्कुलम, वेस्टइंडीज के ताबडतोड बल्लेबाज क्रिस गेल और भारत के गेंदबाज ईशांत शर्मा आए। धोनी के बाद दूसरी सबसे बडी बोली एंड्रयू सायमंड्स के नाम रही। उन्हें 5.4 करोड रुपए की कीमत पर हैदराबाद ने अपनी झोली में डाल लिया। 18 अप्रैल से एक जून तक होने वाले आईपीएल ट्वेंटी-20 टूर्नामेंट में 44 दिन के अंदर 59 मैच खेले जाएंगे और जीतने वाली टीम को 30 लाख अमरीकी डॉलर की पुरस्कार राशि दी जाएगी। यह धानराशि पिछले साल हुए पहले ट्वेंटी-20 क्रिकेट विश्व कप में जीतने वाली भारतीय टीम को मिले इनाम से 11 लाख डॉलर अधिक है। कुल मिलकर चौतरफा पैसा ही पैसा।
आने वाले समय में बीसीसीआई का लीग क्रिकेट जगत में कई बदलाव ला सकता है। क्रिकेट के जानकारों का कहना है कि ट्वेंटी-20 स्पधरओं के चलते टेस्ट मैचों और वनडे की लोकप्रियता में कमी आएगी। लोगों का फटाफट क्रिकेट की तरफ रूझान ज्यादा रहेगा। इंडियन प्रीमियर क्रिकेट लीग की तर्ज पर बाकी देशों में भी ऐसे ही लीग की शुरुआत हो जाएगी। खिलाडी अंतरराष्ट्रीय मैचों की तुलना में लीग पर ज्यादा धयान देंगे, क्योंकि पैसे की खातिर क्रिकेटर देश के बजाय क्रिकेट लीग को तरजीह देने लगेंगे। इससे क्रिकेट की नहीं खिलाडियों की भलाई होगी। खेल पर बजारू ताकतें हावी हो जाएंगी। बीसीसीआई द्वारा सार्वजनिक रूप से क्रिकेटरों की नीलामी की चौतरफा आलोचना हो रही है। बोर्ड का एक मात्र धयेय पैसा कमाना है। बोर्ड धान उगाहने की एक संस्था बन गया है। क्रिकेट इतिहास की शायद यह पहली घटना है जब खिलाडियों का चयन चयनकर्ताओं ने नहीं पैसे वालो ने किया। अब यह आशंका जताई जा रही है कि कहीं क्रिकेट अक्षुण्य न हो जाए।
एक तरफ भारत में क्रिकेट पर धान लुटाया जा रहा है तो दूसरी तरफ कई खेल अपने अस्तित्व की लडाई लड रहे हैं। क्रिकेट के कारण हाकी, फुटबाल, कुश्ती, तैराकी, कबवी, बैडमिंटन और तीरंदाजी जैसे पारंपरिक खेल पिछड गए हैं। क्रिकेट के अलावा बाकी खेल और खिलाडी उपेक्षा के शिकार हैं। हाल ही में गोवा में आयोजित राष्ट्रीय बैडमिंटन शिविर शटलकॉक उपलब्धा न होने के कारण् रद्द करना पडा। भारतीय बैडमिंटन संघ ने शिविर को रद्द कर खिलाडियों को घर जाने के लिए कह दिया। यह शिविर थॉमस और उबेर कप क्वालिफायर्स की तैयारी के सिलसिले में लगाया जाना था, लेकिन यह शिविर उपेक्षा का शिकार हो गया। यह पहला मौका नहीं है जब क्रिकेट के अलावा दूसरा कोई खेल उपेक्षा का शिकार हुआ हो। कई बार हाकी के साथ भी सरकार, खेल संघ और मीडिया ने सौतेला व्यवहार किया है। पिछले दिनों ट्वेंटी-20 वर्ल्ड कप विजेता टीम इंडिया को सिर पर बिठा लिया गया लेकिन एशिया कप जितने वाली हाकी टीम को दोयम दर्जे पर रखा गया। हाकी टीम ने भी एशिया कप जैसा बडा टूर्नामेंट जीता था लेकिन खिलाडियों को किसी ने पूछा तक नहीं। उनके साथ लावारिसों की तरह व्यवहार किया गया। नौ सितंबर-2007 को हाकी टीम ने अपने से मजबूत दक्षिण कोरिया को 7-2 के बडे अंतर से रौंदकर खिताब पर कब्जा किया था लेकिन खिलाडियों को पर्याप्त सम्मान और पुरस्कार नहीं दिया गया, जिसके कारण उन्हें हडताल करने की धामकी देनी पडी। इतना होने के बाद केंद्र सरकार की कान में जूं रेंगी। धामकी के बाद सरकार और नागरिक उव्यन मंत्रालय ने उनकी सुधा ली और इनामों व प्रमोशन की घोषणा कर दी। अगर क्रिकेट की तरह हॉकी खिलाडियों का भी ख्याल रखा जाता तो शायद हमारी टीम दुनिया में नंबर-वन होती। दूसरी ओर आईपीएल से प्रायोजकों के छिनने का भी खतरा पैदा हो गया है। स्पांसर आईपीएल पर ज्यादा पैसा लगाना पसंद करेंगे, क्योंकि इससे उन्हें ज्यादा दर्शक मिल जाएंगे। इसका असर ओलंपिक खेलों की तैयारियों पर पड सकता है। बीजिंग में इसी साल अगस्त में होने वाले ओलंपिक खेलों की तैयारियां जोरों पर हैं। ऐसी आशंका जताई जा रही है कि ओलंपिक खेलों के लिए पर्याप्त धान और सुविधाएं न मिली तो इस बार भी भारत पदक से चुक जाएगा। जनसंख्या में हम विश्व में दूसरे स्थान पर हैं, लेकिन ओलंपिक खेलों में एक मेडल के लिए तरस जाते हैं। कहीं क्रिकेट पर हो रही धानवर्षा से अन्य खेल विलुप्त न हो जाएं। क्रिकेट में बेशुमार पैसा, ग्लैमर आदि को देखकर कौन युवा दूसरे खेलों की ओर रुख करेगा। मीडिया में भी क्रिकेट को तरजीह दी जा रही है। हमें क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों को भी प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि खिलाडी विश्व पटल पर धामाकेदार उपस्थिति दर्ज करा सकें।

दो महापुरुषों के अवसान का दुख

  • मंतोष कुमार सिंह
भारत माता ने कई ऐसे सपूतों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने ओज से देश को ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को रोशन किया है। ऐसी ही दो महान हस्तियां योग गुरु महर्षि महेश योगी और समाजसेवी बाबा आमटे अब हमारे बीच नहीं रहे। दोनों महापुरुषों ने अपने-अपने क्षेत्र में ऐसे कीर्तिमान रचे हैं, जिसे युगों-युगों तक याद किया जाएगा। सैकडों-हजारों सालों बाद ऐसे व्यक्तित्वों का धारती पर अवतार होता जिनके चेहरे पर तेजस्विता, शीतलता, अथाह करुणा, गरिमा, गंभीरता और पूर्णता होती है। वास्तव में ऐसे लोग युगपुरुष होते हैं। ऐसे युगपुरुषों का काल स्वयं अभिनन्दन करता है। दिशाएं सिर झुकाकर वर मालाएं पहनाती हैं। पृथ्वी स्वयं ही नतमस्तक हो जाती है। धारती का वह भाग सौभाग्यशाली हो जाता है जहां इस प्रकार के युगपुरुषों के चरण पडते हैं।
ऐसे ही महापुरुष थे बाबा आमटे जिन्होंने अपना सारा जीवन वंचितों और समाज के पिछडे वर्ग के लोगों की सेवा में लगा दिया। वे जीवन के अंतिम पडाव तक दबे कुचले लोगों की भलाई और समाज में हेय हष्टि से देखे जाने वाले कुष्ठ रोगियों के बारे कुछ न कुछ करते रहे। बाबा आमटे कुष्ट रोगियों, अपंगों, आदिवासियों तथा समाज से तिरस्कृत अन्य लोगों की अंतिम उम्मीद थे। उन्होंने गांधीवादी मूल्यों को स्थापित करने में अपना पूरा जीवन लगा दिया। बाबा आमटे का जन्म 24 दिसंबर 1914 को महाराष्ट्र के वध जिले में हिंगनघाट में हुआ था। बाबा का पूरा नाम मुरलीधार देवीदास आमटे था। उनके पिता देवीदास हरबाजी आमटे शासकीय सेवा में थे। उन्होंने देश से भेदभाव मिटाने और एकता बनाए रखने के लिए जीवन भर संघर्ष किया। एक दिन बाबा ने एक कुष्ठ रोगी को बरसात में भीगते हुए देखा तो उनका मन करूणा से भर गया। बस यहीं से बाबा के जीवन को एक नई दिशा मिल गई। अपनी पत्नी साधानाताई और पुषों के साथ उन्होंने आनंदवन आश्रम की स्थापना की। इसके अलावा कुष्ठ रोगियों के लिए उन्होंने सोमनाथ और अशोकवन जैसे आश्रमों की भी स्थापना की जहां आज हजारों कुष्ठ रोगियों की सेवा की जाती है। बाबा आमटे भारत के सच्चे सपूत थे और उनका जीवन जनसेवा करने वाले लोगों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहेगा। आमटे ने आम लोगों खासतौर पर गरीब और पिछडे लोगों की सेवा में अपना जीवन लगाया और उनसे प्यार और स्नेह पाया। उनके निधान से न सिर्फ उन लोगों को बल्कि पूरे राष्ट्र की क्षति हुई है। बाबा आमटे हमेशा ही आशावादी रहे। उन्होंने एकबार बीबीसी को दिए गए साक्षात्कार में कहा था कि अमीरी एक उबाऊ चीज है और लगातार अमीर होते युवा एक दिन नई राह ढूढेंगे। आगे आने वाले दिनों में युवाआं को सक्रिया राजनीति में हिस्सा लेना ही होगा, क्योंकि युवाओं के बिना कोई भी राजनीति बांङा है। बाबा पडोसी मुल्क पाकिस्तान को भी अपना ही देश मानते थे। वे कहते थे कि सिर्फ भारत ही नहीं मैं पडोसी देश पाकिस्तान को लेकर भी बहुत आशावादी हू। मुङो आशा है कि बहुत जल्द ही दोनों मुल्कों के बीच सीमाएं समाप्त हो जाएंगी, लोग एक दूसरे से मुक्त व्यापार कर सकेंगे। हमारे देश का पानी पाकिस्तान के बासमती को उगाता है जिसे वे सारी दुनिया में बेचते हैं, तो यह कैसे दो देश हुए। उन्होंने 1949 में बंजर भूमि में कुष्ठ रोगियों के लिए आनंदवन आश्रम की स्थापना की थी। इसकी शुरुआत 14 रुपए और छह कुष्ट रोगियों से हुई थी। आनंदवन इस समय तीन हजार लोगों के पुनर्वास का केंद्र बन गया है। इस समय आश्रम में विश्वविद्यालय, अस्पताल, अनाथालय, तकनीकि इकाइयां हैं तथा यहां डेरी और खेती भी होती है।
दूसरी ओर संतुलित जीवन शैली से जुडी धयान और योग की भारतीय पारंपरिक विधा से पश्चिमी देशों को परिचित कराने वाले योग गुरु महर्षि महेश योगी का हालैंड के एम्सटर्डम में पिछले दिनों निधान हो गया।
उनका जन्म छत्तीसगढ की तीर्थभूमि राजिम के नजदीक एक छोटे से गांव पांडुका में 12 जनवरी 1917 को हुआ था। महर्षि महेश योगी का असली नाम महेश वर्मा था। बचपन में ही वे अपना गांव छोडकर जबलपुर चले गए थे। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शनशास्ष में स्नातकोत्तार की उपाधि ली थी। 1939 में वह स्वामी ब्रहमानन्द सरस्वती के अनुयाई बन गए थे। महर्षि योगी ने 40 और 50 के दशक में हिमाचल में अपने गुरु से धयान और योग की शिक्षा ली। उन्होंने 1958 में विश्व भ्रमण की शुरुआत की। विश्वभर में प्रसिध्दा संगीत बैंड बीटल्स के गुरु रहे महर्षि योगी जनवरी-2008 में अपने संस्थान के अधयक्ष पद से यह कहते हुए हट गए थे कि अब वह निशब्दता के क्षेत्र में काम करना चाहते हैं और तभी से उन्होंने मौन धाारण कर लिया था। धयान और योग के माधयम से मनुष्य जीवन को संतुलित जीवन का पाठ पढाने वाले महर्षि योगी अपने प्रारंभिक जीवन को बहुत रूचिकर नहीं मानते थे इसलिए उन्होंने इस बारे में कभी खुल कर बात नहीं की। जीवन परमआनंद से भरपूर है और मनुष्य का जन्म इसका आनंद उठाने के लिए हुआ है, योगी के दर्शन का मूल आधाार यही था। वे कहते थे प्रत्येक व्यक्ति में ऊर्जा, ज्ञान और सामर्थ्य का अपार भंडार है तथा इसके सदुपयोग से वह जीवन को सुखद बना सकता है। दुनिया भर में सुख, शांति और समृध्दि का संदेश देने वाले महर्षि योगी ने शिक्षा के प्रसार के लिए विश्वव्यापी स्तर पर स्कूल और विश्वविद्यालय खोले। महेश योगी ने 150 देशों में पांच सौ से अधिाक स्कूल खोला है। दुनिया में चार महर्षि विश्वविद्यालय और चार देशों में वैदिक शिक्षण संस्थान हैं। योगी के संगठन के पास इस समय 160 अरब रुपए की संपत्तिा है। महर्षि योगी ने वेद और आधयात्मिकता के माधयम से संसार के नवनिर्माण के संकल्पना की आधारशिला रखी। उनके जैसा कोई नहीं था और न ही संभवत: आगे कोई होगा। 1941 में वह स्वामी ब्रहमानन्द सरस्वती के सचिव बन गए जिन्होंने उन्हें बाल ब्रहमाचार्य महेश नाम दिया। वे ब्रहमनान्द सरस्वती के साथ 1953 तक रहे। 1953 में महर्षि योगी ने संतों की घाटी उत्ताराकाशी की ओर रूख किया। महेश योगी हरिद्वार के बिल्कुल पास बसे ऋषिकेश को अपनी दूसरी जन्म स्थली मानते थे, लेकिन हैरानी की बात यह है कि महर्षि कभी धार्मनगरी हरिद्वार में नहीं आए। भागीरथी के तट पर नौ वर्षों तक कठोर साधाना कर विश्व के 192 देशों में भावातीत धयान तथा योग का परचम लहरा कर भारत को विश्व गुरु के सिंहासन पर बिठाने की दिशा में तेजी से बढ रहे महर्षि महेश योगी उत्तारकाशी को अपना घर तथा उत्ताराखंड को भारत का सिर मानते थे। आज भी गजोली तथा कुंसी आश्रम में भारतीय संस्कृति में रच बस गए 120 विदेशी भक्त भावतीत धयान के लिए यहां पर मौजूद हैं। महर्षि वेद विज्ञान विद्यापीठ में पंडित तैयार करने एवं रैथल में हजारों नाली जमीन पर निर्माणाधीन विश्वस्तरीय आयुर्वेदिक अस्पताल सहित कई संस्थाएं खडी कर उन्होंने अपने उत्तारकाशी प्रेम को प्रदर्शित किया है। महर्षि योगी अब हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनके विचार नीलगगन में हमेशा गुंजते रहेंगे। योगी कहते थे कि मानव जर्जरित होता जा रहा है, यदि कोई पेड खोखला हो जाए तो वह नहीं रह पाता। ठीक वैसे ही मनुष्य भी खोखला होने पर समाप्त हो जाएगा। दोनों युगपुरुषों को सत् सत् नमन।

Wednesday

विश्व पटल पर भारत की धमाकेदार धमक

  • मंतोष कुमार सिंह

हिन्दुस्तान आजादी की 60 वीं वर्षगांठ मना रहा है। इन 60 सालों में देश ने हर क्षेत्र में तरक्की की है। विकास के अनगिनत कीर्तिमान रचे गए हैं। 1947 और 2008 के भारत में जमीन-आसमान का अंतर है। तीव्रगति से शिखर की ओर अग्रसर अर्थव्यवस्था, सूचना प्रौद्योगिकी, विज्ञान, रक्षा, खाद्यान्न और बाजार सहित लगभग सभी क्षेत्रों में बढती आत्मनिर्भरता ने देश को विश्व पटल पर एक शक्ति के रूप में उभारा है। अमरीका की प्रसिद्ध आर्थिक पत्रिका 'फोर्ब्स की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में अरबपतियों की संख्या में उल्लेखनीय वृध्दि हुई है। दुनिया के शीर्ष 100 अरबपतियों में 40 भारत के हैं। इन धानबांकुरों की वार्षिक संपत्ति भी 170 अरब डालर तक पहुंच चुकी है। इन 60 वर्षो में भारतीय उद्योगपति जापानियां के मुकाबले काफी समृध्द हुए हैं। भारत का औद्योगिक साम्राज्य तेजी से विश्वबाजार में अपनी हिस्सेदारी बढा रहा है। देश में इस समय करोडपतियों की संख्या एक लाख को पार कर चुकी है। दुनिया के दस धानकुबेर सीईओ की फेहरिस्त में भारत के चार उद्योगपतियों ने जगह बनाई है। स्टील किंग लक्ष्मी निवास मित्तल, मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी और अजीम प्रेमजी शामिल हैं। फोर्ब्स ने मित्तल को दूसरे, मुकेश को छठे, अनिल अंबानी को सातवें और विप्रो के अजीम प्रेमजी को नौवे स्थान पर रखा है। अपनी 52 अरब डालर की संपत्ति के साथ वारेन ब्रफेट इस सूची में शीर्ष पर विराजमान हैं। वहीं आर्सेलर-मित्तल के प्रमुख लक्ष्मी निवास मित्तल की संपत्ति 32 अरब डालर की आंकी गई है। जबकि रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुकेश अंबानी की संपत्ति 20.1 अरब डॉलर और अनिल अंबानी की संपत्ति 18.2 अरब डालर के करीब है। अजीम प्रेमजी की कुल संपत्ति 17.1 अरब डालर है। वहीं दुनिया की सूचना प्रौद्योगिकी सेवा प्रदाता क्षेत्र की 100 सर्वश्रेष्ठ कंपनियों में भारत की एक तिहाई कंपनियां शुमार हैं। जिनमें टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज, एचसीएल टेकनोलोजीस, जेनपैक्ट, डब्ल्यूएनएस ग्लोबल सर्विसेज प्रमुख हैं। आउटसोर्सिन्ग की प्रमुख कंपनियों के प्रमुखों को विश्वसनीय, अभिनव और टेकनोलॉजी सेवी भागीदारों की पहचान करने में मदद के लिए साइबर मीडिया और ग्लोबल सर्विसेज मैगजीन द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में बताया गया कि 100 सर्वश्रेष्ठ कंपनियों में भारत की 29 कंपनियां शामिल हैं। दस श्रेणियों में शीर्ष स्थान पाने वाली कंपनियों में से भारत और अमरीका की चार-चार तथा चीन और मैक्सिको की एक-एक कंपनियां शामिल हैं। भारत की सेवा प्रदाता ये कंपनियां अपने राजस्व का दो तिहाई से तीन चौथाई अमरीका से अर्जित करती हैं, लेकिन अब वे अमरीका पर अपनी निर्भरता कम करना चाहती हैं। भारत वैश्विक सेवा प्रदाता का केंद्र बन गया है और 57 प्रतिशत कर्मचारी सेवा प्रदाता केद्रों में कार्यरत हैं। जिनके कार्यालय भारत में ही हैं, जबकि 18 प्रतिशत अमरीका में हैं। भारतीय कंपनियों के अलावा अमरीका की इडीएस, सिटेल, ईपीएएम सिस्टम और कम्प्यूटर साइंसेज कॉर्पोरेशन तथा चीन की न्यूसोट और मेक्सिको की साटटेक इस सूची में शामिल होने वाली प्रमुख कंपनियां हैं। देश में विदेशी निजी शेयर पूंजी निवेश कंपनियों का वार्षिक इक्विटी अगले दो वर्षों में 40 अरब डालर तक पहुंच जाने का अनुमान है और इसका सबसे ज्यादा लाभ जमीन जायदाद क्षेत्र को मिलेगा। अभी ऐसी 400 कंपनियां भारत में निवेश कर रही हैं। 2010 तक इनकी संख्या 70 तक बढ सकती है। इस इक्विटी निवेश का सबसे ज्यादा लाभ रियल स्टेट क्षेत्र को मिलेगा, क्योंकि इससे उनका मुनाफा 35 से 50 प्रतिशत तक हो सकता है। रियल स्टेट क्षेत्र की भारत की तेजी से मजबूत होती अर्थव्यवस्था में बडी भूमिका है। वर्ष 2007 में भारत में सबसे ज्यादा इक्विटी निवेश हुआ। इन कंपनियों में 17.14 अरब डालर के करीब निवेश किया था। इनमें चीन जैसी उभरती अर्थव्यवस्था वाले देश की भी कंपनियां शामिल थीं। इस दौरान भारत के मुकाबले चीन में 50 प्रतिशत से भी कम 8.3 अरब डालर का निवेश हुआ जबकि 2006 में भारत के सात अरब डालर के मुकाबले चीन में 13 अरब डालर का पीई विदेशी निवेश हुआ था। रियल स्टेट क्षेत्र में वर्ष 2005 में मात्र 10 लाख डॉलर का निवेश हुआ था, जो एक साल बाद बढकर 89 करोड डालर पर पहुंच गया। रियल स्टेट के अलावा सूचना प्रौद्योगिकी, बैकिंग, वित्ता सेवाओं तथा स्वास्थ्य और फार्मास्यूटिकल क्षेत्रों में विदेशी निवेश बढा है। वर्ष 2007 में विदेशी निवेश करने वाली ऐसी कुल 386 कंपनियां थीं। वहीं आईटी और उससे जुडी कंपनियों में कुल 66 करार हुए। वर्ष 2007 प्रमुख निवेशों में टेमसेक होल्डिंग ने भारती एअरटेल में 109 करोड 60 लाख डालर का निवेश किया। डयूश बैंक और सिटी ग्रुप तथा विदेशी निवेशकों ने जीएमआर में एक अरब डालर का तथा आईसीआईसीआई वेंचर पंड ने जीपी इंट्राटेक में 89 करोड डालर का निवेश किया। भारत की आर्थिक, समाजिक और राजनीतिक परिदृश्य का लोहा अमरीका भी मान चुका है। इसे भारत और अमरीका के बीच हुए 123 परमाणु समङाते के रूप में देखा जा सकता है। 60 सालों में विभिन्न क्षेत्रों में विकास पर एक नजर डालने पर पता चलता है कि जनसंख्या विकराल रूप से बढी है। जनसंख्या की बढोत्तारी से सरकार परेशान रही। इस पर नियंषण के लिए कई कदम उठाए गए लेकिन पूरी सफलता नहीं मिल पाई है। 1950 -51 में भारत की आबादी 359 मिलियन थी जो 2005-06 में 1112 मिलियन पर पहुंच गई। 1960-61 में 434 मिलियन,1970-71 में 541,1980-91 में 679 ,1990-91 में 839 और 2000-01 में 1019 मिलियन आबादी थी। नई तकनीकी और कृषि क्रांति के चलते खाद्यान्न में उल्लेखनीय बढोत्तारी हुई है। जनसंख्या के बढते घनत्व के चलते कृषिभूमि कम होती जा रही है, फिर भी खाद्यान्नों के उत्पादन में वृध्दि जारी है। भारत में दलहन की सबसे ज्यादा खेती होती है। दुनिया के 50 प्रतिशत आम की पैदावार यहां होती है। कृषि क्षेत्र में 65 प्रतिशत लोगों को रोजगार मिला हुआ है और लाखों गांव खेती पर निर्भर हैं। 1950-51 में 50.8, 1960-61 में 82.0,1970-71 में 108.4, 1980-81 में 129.6 1990-91 में 176,2000-01 में 196.8 और 2006-07 में 209.2 (अग्रिम अनुमान) मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ है। आजादी के बाद प्रति व्यक्ति आय भी अच्छी खासी वृध्दि हुई है। प्राइवेट और आईटी सेक्टर में रोजगार के अनगिनत अवसर उपलब्धा हुए हैं। अब खुदरा बाजार में भी रिलायंस जैसी बडी कंपनियां उतर चुकी हैं, जिसके चलते लाखों की संख्या में रोजगार उपलब्धा हुए हैं। रोजगार के कारण प्रति व्यक्ति आया में भी इजाफा हो रहा है। 1950-51 में प्रति व्यक्ति आय 3687,1960-61 में 4429,1970-71 में 50025,1980-81 में 5352, 1990-91 में 7321,2000-01 में 16133 और 2006-07 में 22483 रुपए (अनुमान) थी। बिजली के उत्पादन में भी प्रतिदिन इजाफा हो रहा है,लेकिन बढती जनसंख्या के चलते मांग और पूर्ति के बीच खाई बनी हुई है। आज भी लाखों गांव बिजली की पहुच से दूर हैं। हालांकि सभी राज्य सरकारें विद्युत उत्पादन में वृध्दि करने में लगीं र्हुईं हैं। 1950-51 में प्रति घंटे विद्युत उत्पादन 5.1 अरब किलोवाट,1960-61 में 16.9,1970-71 में 55.8,1980-81 में 120.8, 1990-91 में 264.3,2000-01 में 499.5 और 2005-06 में 623.2 (केवल जनोपयोगी) दर्ज की गई। विदेशी व्यापार और विदेशी मुद्रा संपदा में भी 60 वर्षों में उल्लेखनीय इजाफा हुआ है। आयात और निर्यात दोनों क्षेत्र में बढोत्तारी जारी है। अनेक विदेशी कंपनी भारत में निवेश कर रही हैं। वहीं भारतीय कंपनियां और उद्योगपति भी विश्व पटल पर नई पहचान बनाने में कामयाब रहे। देसी कंपनियां तेजी से विश्व में पैर पसार रही हैं। जिसका व्यापार और मुद्रा संपदा पर खासा असर पडा। 1950-51 में आयात 1273 और निर्यात 1269 मिलियन डालर था,जो 2006-07 में बढकर क्रमश: 181368 व 124629 मिलियन डालर पर पहुंच गया। विदेशी मुद्रा संपदा भी 1.9 से बढकर 191.9 अरब डालर हो गई। विकास की रतार को देखकर कई वैज्ञानिक, आर्थिक और अन्य रिपोर्टों में यह खुलासा हो चुका है कि भारत 2020 तक महाशक्ति बन जाएगा।

Tuesday

अब आटोमोबाइल बाजार में भी क्रांति

मंतोष कुमार सिंह
इतिहास के पन्नों में शीघ्र ही एक और क्रांति दर्ज हो जाएगी। जिसका नाम होगा आटोमोबाइल। टाटा मोटर्स ने लखटकिया कार नैनो का निर्माण कर इस ओर कदम भी बढा दिया है। अगर रतन टाटा जनता की इस ड्रीम कार को सही सलामत जनता के पास पहुंचाने में सफल रहे तो निश्चित तौर पर मोबाइल की तरह हर कोई कार का मालिक हो जाएगा। भारतीय सडकों पर सिर्फ कारें दौडेंगी। बाजार में कई तरह की सस्ती कारें आ जाएंगी। दुपहिया वाहन और सस्ते हो जाएंगे। नैनो की सबसे बडी खासियत कम कीमत है। यह बाजार में बिक रही बहुत सी मोटरसाइकिलों से सिर्फ थोडी सी महंगी है। कई मोटरसाइकिल तो ग्राहक के पास आकर इससे भी महंगी हो जाती है। कंपनी ने इसकी कीमत एक लाख रुपए रखी है। वैट, ट्रांसपोर्ट का खर्च, रोड टैक्स और इंश्योरेंश के बाद सडक पर इसकी कीमत एक लाख 28 हजार 500 रुपए होगी। फिर भी यह दुनिया की सबसे सस्ती कार होगी। कम कीमत के चलते उपभोक्ता को आयकर विभाग के भी चक्कर नहीं लगाने पडेंगे। कार को छोटी-छोटी मासिक किश्तों में आम आदमी भी खरीद सकता है। यह कार साल के मधय तक भारत में उपलब्धा हो जाएगी। टाटा की योजना नैनो को लैटिन अमरीका एवं अफ्रीकी देशों में निर्यात करने की भी है। 64 सीसी इंजन क्षमता वाली यह कार एक लीटर में 18 किलोमीटर का एवरेज देगी। नैनो में चार से पांच लोग आराम से बैठ सकते हैं। कार में सबसे बडी खूबी इंजन है, जिसे आगे की बजाए पीछे लगाया गया है। यह कार तीन माडलों, एक बेसिक और दो डीलक्स वर्जन में उपलब्धा होगी। डीलक्स माडल में एसी भी होगा। यूरो-4 और भारत स्पेस-3 नार्मस पर खरी उतरी यह कार फ्रांट और साइड क्रेश टेस्ट में भी सुरक्षित पाई गई है। इसकी अधिकतम रफ्तार 90 किलोमीटर है। भारतीय बाजार में उपलब्धा सबसे सस्ती कार मारुती-800 की तुलना में नैनो अंदर से 8 फीसदी छोटी है लेकिन अंदर से यह 21 फीसदी बडी है। 64 सीसी की नैनो में 33 एचपी पेट्रोल इंजन लगाया गया है। कार में यूरो-4 तकनीक का इस्तेमाल किया गया है जिसके कारण यह दोपहिया वाहनों से भी कम प्रदूषण्ा फैलाएगी। यात्रियों की सुरक्षा के लिए भी कई उपाए किए गए हैं। खुबियों के साथ-साथ इस कार में भी कई खामियां हैं। कार के टायर बेहद छोटे हैं जिसके कारण हाईवे पर चलाना मुश्किल हो सकता है। छोटी होने के कारण कार को तेज रफ्तार से चलाना खतरनाक हो सकता है। नैना में समान रखने के लिए जगह भी नहीं है। भारत के बडे शहरों में दिन-प्रतिदिन गाडियों की संख्या में बढोतरी होती जा रही है। नैनो के बाजार में आने से इनकी संख्या में और इजाफा होगा, जिसके चलते प्रदूषण और टैरफिक जाम की समस्या से दो-चार होना पडेगा। एक सर्वेक्षण के मुताबिक राजधानी दिल्ली में घनत्व के हिसाब से सबसे अधिक कारें हैं। राजधानी में प्रति 1000 की संख्या पर 85 निजी कारें हैं। राजधानी में प्रत्यके 10 वां आदमी कार का मालिक है। इस कार के बाजार में आने से सडकों पर बोझा बढेगा और जाम की समस्या पैदा होगी। भारत में इस समय करीब सात करोड दोपहिया वाहन और 1 करोड निजी कारें हैं और इनकी संख्या रोज बढ रही है। भारत में कारों की संख्या में बढोतरी होने से तेल के आयात में भी बढोतरी होगी। भारत अपनी जरूरत के लिए 75 फीसदी तेल आयात करता है और संसार का चौथा सबसे बडा तेल उपभोक्ता है ऐसे में कारों की संख्या बढने का मतलब है तेल के आयात में इजाफा। मांग बढने के चलते पेट्रोलियम पदार्थों के दामों में और वृध्दि होगी तथा महंगाई पर भी असर पडेगा। कार की एक बडी कमी इंजन का पीछे होना भी बताया जा रहा है। क्योंकि आगे इंजन होने से दुर्घटना होने पर यह सपोर्ट के रूप में काम करता है लेकिन पीछे इंजन होने से जान का अधिक खतरा होगा। दूसरी ओर नैनो ने आटोमोबइल बाजार में नई प्रतिस्पध्दर् पैदा कर दी है। अब कई कंपनियां बाजार में सस्ती कारें लाने के लिए कमर कस रही हैं। साल के अंत तक सुजुकी 660 सीसी की कार ला रही है। फोर्ड भी छोटी कार के लिए 500 मिलियन डॉलर का निवेश करने जा रही है। बजाज भी निसान और रोने के साथ मिलकर ऐसी ही योजना बना रहा है। क्रिसलर भी चीनी कंपनी के साथ मिलकर तैयारी में है। काइनेटिक इंजीनियरिंग और आयशर भी एक लाख की कार के माडल के साथ दहलीज पर खडें हैं। अभी से यह चर्चा जोरों पर है कि 'नैनो के बाजार में आने से वाहन उद्योग पर चौतरफा असर होगा। एसोचैम के अनुसार कार के बाजार में आने के बाद दोपहिया वाहन निर्माताओं को दामों में 20 फीसदी तक की कटौती करनी पडेगी। यहीं नहीं सेकंड हैंड चार पहिया बाजार के वाहनों की कीमतों में भी अच्छी खासी गिरावट दर्ज की जाएगी। अनुमान के मुताबिक सेकंड हैंड चार पहिया वाहनों की कीमतों में 35 फीसदी की गिरावट आ सकती है। यह अनुमान एसोचैम की ओर से 50 कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) के बीच कराएं सर्वे में सामने आए हैं। पचास फीसदी से अधिक सीईओ का मानना है कि टाटा ने दो पहिया वाहन निर्माताओं को एक चुनौती दी है। टाटा ने इन निर्माताओं के सामने उत्पाद और उसकी तकनीक में प्रयोग की दृष्टि से भी चुनौती पेश की है। पिछले वर्ष लांच हुए स्कूटर और मोपेड का रिस्पांस बाजार में अच्छा नहीं रहा, इंजन की क्षमता बढाने के लिए अगर कोई प्रयोग किया जाता है तो लागत में वृध्दि होती है। नवंबर 2006 से अब तक दो पहिया वाहनों का बाजार 25 फीसदी तक सिकुडा है। जहां नवंबर 2006 में 19 लाख वाहनों की बिक्री हुई थी वहीं 2007 में सिर्फ 15।5 लाख वाहन ही बिक पाए। इसे अगर संकेत माने तो लखटकिया कार के बाजार में आने बाद उपभोक्ताओं के पास चार पहिया वाहनों में ज्यादा विकल्प मौजूद होंगे ऐसे में कार की कीमत अहम भूमिका अदा करेगी और दो पहिया वाहनों की बिक्री प्रभावित होगी। आठ फीसदी सीईओ ने माना कि आय बढने से ग्राहक ज्यादा खर्च करते हैं। जबकि 70 फीसदी लोगों ने माना कि टाटा की नैनो कार अगले तीन से चार वर्ष में बाजार के 50 फीसदी हिस्से पर कब्जा करने में सक्षम है। साथ ही मैट्रो और बडे शहरों के कार बाजार के आकार में परिवर्तन होगा। 75 फीसदी सीईओ मानते हैं कि टाटा की लखटकिया कार से बैंक लोन लेने वालों की संख्या में भी 25 फीसदी की बढोतरी आ जाएगी। वर्तमान में चार पहिया वाहनों के लिए लोन लेने वालों की संख्या में दस फीसदी की कमी दर्ज की गई है जबकि इस दौरान निर्माण और रियल एस्टेट के क्षेत्र में 26 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। जर्मन की रिसर्च कंपनी सीएमएस वर्ल्ड वाइड का कहना है कि भविष्य में भारतीय सडकों पर नैनो का ही राज होगा। रिपोर्ट के अनुसार 2013 तक लखटकिया कार के जरिए टाटा मोटर्स देश में कम भार वाले वाहनों का उत्पादन करने के मामले में शिखर पर पहुंच जाएगा। अगले पांच सालों में टाटा मोटर्स हर साल 12 लाख छोटे वाहनों का उत्पादन करेगा, जिसमें 'नैनो की हिस्सेदारी 50 फीसदी होगी। 2013 तक नैनो छह लाख गाडियों की बिक्री का कीर्तिमान रच सकती है। टाटा मोटर्स ने निश्चित तौर पर कई कंपनियों के सामने नई चुनौती पैदा कर दी है। अन्य आटोमोबाइल कंपनियों को बाजार में बने रहने के लिए छोटी तथा सस्ती कारों का निर्माण् करना पडेगा, जिससे प्रतिस्पध्र्दा और बढेगी। कुल मिलकर ग्रहकों को ही फायदा होगा।

Monday

अपने ही घर में असुरक्षित महिलाएं

  • मंतोष कुमार सिंह
भारत को आजाद हुए 60 वर्ष हो गए हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत ने न जाने प्रगति की कितनी सीढियां चढ ली हैं। अगर हम देखें तो विकास का पैमाना माने जाने वाला ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं बचा है, जहां भारत की पहुंच नहीं हो पाई है। इसमें सिर्फ देश के पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाओं ने भी अग्रणी भूमिका निभाई हैं। आज कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं होगा जिसमें महिलाओं की भागीदारी न हो। परंतु तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश में भारतीय महिलाओं की दशा पूर्ववत बनी हुई है। केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारें भी औरतों के जीवनस्तर में सुधार का प्रयास कर रही हैं, लेकिन इनका प्रयास सार्थक साबित नहीं हो पा रहा है। अमानवीय कृत्यों के चलते महिलाएं अपने ही घर में असुरक्षित हैं। राष्ट्रीय अपरा रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक वर्ष-2006 में औसतन हर घंटे 18 महिलाएं क्रूरता की शिकार हुईं और इससे भी परेशान करने वाली बात यह है कि इस तरह की घटनाओं में दिन-प्रतिदिन बढोतरी हो रही है। राज्यों के स्तर पर देखें तो वर्ष-2006 में महिलाओं के प्रति अपराध के मामले में आंध प्रदेश सबसे आगे रहा। वहां पर 21484 मामले सामने आए जो पूरे देश में होने वाले अपराधा का 13 प्रतिशत है। दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश का नाम आता है जहां पर पूरे राष्ट्रीय अपराध के 9.9 प्रतिशत मामले सामने आए। हाल ही में राजस्थान के उदयपुर में एक ब्रिटिश पत्रकार के साथ बलात्कार और आर्थिक राजधानी मुंबई में नववर्ष की पूर्व संधया पर दो युवतियों के साथ छेडछाड की घटना ने एक बार फिर इस बारे में कठोर कानून की जरूरत महसूस कराई है। महिलाओं के प्रति अपराधा में हर वर्ष बढोतरी हुई है। 2003 से 2006 के बीच बलात्कार के मामलों में बढोतरी दर्ज की गई। दस लाख से अधिक आबादी वाले 35 शहरों में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली शीर्ष पर रहा। दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराधा के कुल 4134 मामले दर्ज किए गए जो पूरे देश में होने वाले अपराधा का 18.9 प्रतिशत है। दूसरे स्थान पर हैदराबाद रहा, जहां 1755 मामले दर्ज हुए। दिल्ली में होने वाले अपराधों में 31.2 बलात्कार के मामले, 34.7 अपहरण, 18.7 दहेज हत्या, 17.1 मामले में पतियों व रिश्तेदारों द्वारा मारने-पीटने और 20.1 प्रतिशत मामले छेडखानी से जुडे हुए थे। ये वे तथ्य हैं जो उजागर हुए तथा जनता के सामने प्रस्तुत किए गए। उन घटनाओं की संख्या भी कम नहीं है, जिन्हें दबा दिया गया या लोकलज्जा के चलते उजागर नहीं किया गया। इन आंकडों से आप सहज अनुमान लगा सकते हैं कि आज की महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं। इन घटनाओं से साफ जाहिर हो रहा है कि हमारी सरकारें महिलाओं के उत्थान के लिए जो कदम उठा रही हैं, क्या उन्हें उसमें सफलता मिल पाई है।
दूसरी ओर घर और दतर दोनों जगह महिलाएं भेदभाव की शिकार हैं। करीब तीन चौथाई महिलाओं का मानना है कि उनके पति उनके काम में हाथ नहीं बंटाते हैं। केवल एक चौथाई पति ही खाना बनाने, घर की सफाई करने और बच्चों की देखभाल करने में पत्नियों का हाथ बंटाते हैं। वाणिज्य मंडल एसौचैम की हाल ही में जारी रिपोर्ट में यह निष्कर्ष सामने आया है। समाज में महिलाएं पुरुषवादी मानसिकता और लैंगिक भेदभाव की शिकार हैं। यही कारण है कि उन्हें नौकरी में पदोन्नति नहीं मिलती। काम के बढ़िया अवसर नहीं मिलते और वे कार्यालयों में शीर्ष स्थान तक नहीं पहुंच पातीं। मात्र 3.3 प्रतिशत महिलाएं ही महत्वपूर्ण पदों पर पहुंच पाती हैं। 17.7 प्रतिशत महिलाएं तो बीच की श्रेणी के पदों तक पहुंच पाती हैं। जबकि 78.9 प्रतिशत महिलाएं जूनियर स्तर तक ही रह जाती हैं। एसौचेम ने 575 कामकाजी महिलाओं के सर्वेक्षण के नमूने के आधार पर यह आंकडे जारी किए हैं। शहर में रहने वाली 66.33 प्रतिशत महिलाएं नौकरी करना चाहती हैं। जबकि 52.84 ग्रामीण महिलाएं घरेलू पत्नियां ही बने रहना चाहती हैं। शहरों में 29.95 प्रतिशत तथा महानगरों में 18.24 प्रतिशत महिलाएं नौकरी करना चाहती हैं। महानगरों में 16.91 प्रतिशत महिलाएं अपना व्यापार करना चाहती हैं जबकि शहरी इलाकों में यह प्रतिशत 3.72 प्रतिशत और ग्रामीण इलाकों में यह प्रतिशत 2.34 प्रतिशत है। नौकरी की संभावना बढने के बावजूद महानगरों की 17 प्रतिशत महिलाएं स्वरोजगार करना चाहती हैं। 42 प्रतिशत महिलाओं का मानना है कि वे पुरुषों की तरह दफ्तर में ज्यादा देर तक नहीं रह सकतीं। लोगों से सम्पर्क नहीं बना सकती। इसलिए उन्हें पदोन्नति नहीं मिल पाती और 34.66 प्रतिशत महिलाओं का मानना है कि वे पारिवारिक कारणों से पुरुष की तरह दौड-धूप नहीं कर सकतीं इसलिए वे नौकरी में पिछड जाती हैं। 22 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएं पारिवारिक जिम्मेवारियों में फंस जाती हैं जबकि शहरों में 19 प्रतिशत तथा महानगरों में केवल 9 प्रतिशत महिलाएं पारिवारिक जिम्मेदारियों से बंधी हैं। इससे स्पष्ट है कि आधुनिक पुरुषप्रधान समाज में नारी को द्वितीय पंक्ति में रखा गया है। जब हम पुरुष और नारी में भेद नहीं करते हैं तो क्यों नहीं औरतों को प्रथम पंक्ति में रखते हैं। महिलाओं को भी वे सभी अधिकार मिलने चाहिए जो पुरुषों को मिल रहे हैं। जहां तक क्षमता का सवाल है यह स्पष्ट हो चुका है कि महिलाएं प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों से आगे जा रही हैं, लेकिन हमारे समाज में नारी को वह स्थान नहीं दिया गया है, जो उसे मिलना चाहिए। समाज में नारी को पुरुष के साथ नीचे ओहदे पर रखा गया है, धारती पर आते ही लडके और लडकी के मधय अधिकांश परिवारों में भेद किया जाता है। लडकियों की शिक्षा तथा विकास पर पर्याप्त धयान नहीं दिया जाता है। यह सच है कि विगत कुछ दशकों की तुलना में वर्तमान समय में महिलाएं अधिकार संपन्न हुई हैं। पंचायत राज की विभिन्न स्तरीय संस्थाओं में आरक्षण मिल गया है। कुछ समय बाद लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों में भी आरक्षण मिल जाएगा, ऐसी आशा की जा रही है, लेकिन विगत कुछ वर्षों में महिलाओं पर हुए अत्याचार के आंकडों को देखा जाए तो सहज पता चल जाएगा कि महिलाओं की सुरक्षा कितना कठिन कार्य है। हमारा समाज नारी को वह स्थान नहीं दे पाया है, जो उसे मिलना चाहिए। आज महिलाओं के सामने असमानता सबसे बडी चुनौती है। नारी को इसके लिए अपनी चेतना को जगाना होगा। महिला उत्थान के लिए दो चीजें बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। महिलाओं के प्रति हमारे रुख में क्रांतिकारी परिवर्तन तथा पुरुष और नारी दोनों के लिए सार्वभौमिक शिक्षा। तभी हम नारी की स्थिति में परिवर्तन की आशा कर सकते हैं। औरतों पर हो रहे घटनाओं के कारणों की खोजकर अत्याचारियों को कडी से कडी सजा नहीं दी गई तो महिलाओं का वर्तमान और भविष्य अंधाकारमय होता चला जाएगा।

Sunday

परिसीमन की पीड़ा

मंतोष कुमार सिंह
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा प्रेषित नए परिसीमन को हरी झंडी देकर कई प्रमुख पार्टियों को मुश्किल में डाल दिया है। अब झारखंड और पूर्वोत्तार के चार राज्यों असम, मणिपुर, अरूणाचल प्रदेश एवं नागालैंड को छोडकर देश में आगामी लोकसभा चुनाव के साथ-साथ लगभग दर्जन भर राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव नए परिसीमन के आधार पर ही होंगे। अभी तक 1971 की जनगणना के आधार पर 1976 में बनाए गए निर्वाचन क्षेत्र ही चल रहे थे। परिसीमन की पीडा सबसे अधिक कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, जनता दल सेक्यूलर और बहुजन समाज पार्टी में देखने को मिल रही है। जिन राज्यों में इस साल विधानसभा के चुनाव होने हैं, वहां परिसीमन को लेकर गहमागहमी ज्यादा है। इन दिनों मधय प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, छतीसगढ और कर्नाटक के प्रत्येक नुक्कड और चौराहों पर नए परिसीमन के आधार पर होने वाले चुनाव की ही चर्चा हो रही है। हालांकि चुनाव आयोग् आगामी अप्रैल या मई में होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव को परिसीमन आयोग की रिपोर्ट के आधार पर चुनाव कराने में असमर्थता जाहिर की है। आयोग को परिसीमन रिपोर्ट पर राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद इसके अनुसार चुनाव कराने के लिए कम से कम तीन से चार माह के अतिरिक्त समय की जरूरत होगी। चुनाव आयोग विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने से पहले विधानसभा चुनावों को छह माह तक आगे बढा सकता है, लेकिन विधानसभा या लोकसभा का कार्यकाल पूरा होने के बाद सदन को भंग करने का अधिकार चुनाव आयोग को नहीं है।
परिसीमन आयोग ने छह राज्यों को छोडकर देश में 3726 विधानसभा एवं 504 लोकसभा चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन पूरा कर लिया है। परिसीमन से अनुसूचित जाति के लोगों के लिए लोकसभा की सुरक्षित सीटों की संख्या 78 से बढकर 84 तथा अनुसूचित जनजाति के लिए 38 से बढकर 42 हो गई है। इसी तरह अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए सीटों की संख्या में वृध्दि हुई है वहीं सामान्य सीटों की संख्या वर्तमान 402 से घटकर 392 रह गई हैं। विधानसभाओं में भी सुरक्षित सीटों में इजाफा हो गया है। अनुसूचित जाति के लिए जहां सुरक्षित सीटों की संख्या वर्तमान 555 से बढकर 610 हो गई हैं वहीं अनुसूचित जनजातियों के लिए यह संख्या वर्तमान 545 से बढकर 527 पहुंच गई हैं। ऐसे में अभी से कई दिग्गज नेता सुरक्षित क्षेत्रों की तलाश में जुट गए हैं। परिसीमन को लेकर मचे हाहाकार के कई कारण हैं।
गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पडा है। दोनों राज्यों में बसपा ने अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया है, जिसका फायदा परोक्ष रूप से भाजपा को मिला है। साथ ही मधय प्रदेश, झारखंड, छतीसगढ और राजस्थान जैसे जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, वहां कांग्रेस के संगठन का ढांचा काफी कमजोर है? मधय प्रदेश में काफी मशक्कत के बाद सुरेश पचौरी को इकाई का अधयक्ष नियुक्त किया गया है। वहीं पडोसी राज्य और कभी मधय प्रदेश का हिस्सा रहे छतीसगढ में आपसी गुटबाजी चरम पर है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एक दूसरे की टांग खिंचने में लगे हुए हैं। केशकाल विधानसभा उपचुनाव में मिली करारी हार का ठिकरा एक दूसरे के सिर फोड जा रहा है। इससे पहले मालखरौदा और खैरागढ उपचुनाव में भी पंजे को हार का सामना करना पडा था। शिकस्त के पीछे गुटबाजी मुख्य वजह मानी जा रही है। मधयप्रदेश और छत्तीसगढ में पार्टी के पास संगठन के नाम पर सिर्फ प्रदेश अधयक्ष हैं। केंद्र में कांग्रेसनीत सरकार होने के बावजूद पार्टी को कई राज्यों में नेताओं की कमी से जुझना पड रहा है। हालात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिन राज्यों के चुनाव नतीजे आम चुनाव के लिए माहौल तैयार करेंगे, उन प्रदेशों में पार्टी अपनी प्रदेश कमेटी तक नहीं बना पाई है। वहीं राजस्थान में निष्क्रिय कमेटी के जरिए चुनावी जंग जीतने की तैयारी है। राजस्थान, मधयप्रदेश और छत्तीसगढ में भाजपा की सरकारें हैं। इन राज्यों में अक्टूबर में विधानसभा चुनाव होने हैं। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में जीत से आत्मविश्वास से भरी भाजपा को कांग्रेस इन्हीं राज्यों में शिकस्त दे सकती है। पर पार्टी अभी तक संगठन तैयार नहीं कर पाई है। गुजरात में कांग्रेस बिना संगठन के चुनाव मैदान में उतरी थी। नतीजा सबके सामने हैं। कांग्रेस रणनीतिकार यह तो स्वीकार करते हैं कि चुनाव के संगठन का मजबूत होना बेहद जरूरी है लेकिन संगठन तैयार करने में पार्टी की कोई दिलचस्पी नहीं है। शायद इसकी अहम वजह वरिष्ठ नेताओं की किल्लत है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी परिसीमन के जरिए अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं में जान फूंकना चहती है। पार्टी का कहना है कि परिसीमन के दो फायदे हैं। पहला कांग्रेस संगठन में जंग खा चुके कई वृध्द नेता नए निर्वाचन क्षेत्र में अप्रासंगिक हो जाएंगे और उनसे मुक्ति मिल जाएगी। क्योंकि जनता अब उनसे छुटकारा पाना चाहती है। दूसरा, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के प्रति वफादार नए चेहरों को चुनौती देने का मौका मिलेगा। नए चेहरों के सहारे चुनावी नैया को पार लगाया जा सकता है। साथ ही कई राज्यों में अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के सीटों में हुए फेरबदल से बसपा की बजाए राजनीतिक समीकरण कांग्रेस के पक्ष में बदल जाएगा। इतना ही नहीं मुस्लिम बहुल इलाकों में से अधिकांश के सुरक्षित विधानसभा क्षेत्रों में आने से मुसलमानों का वोट बैंक भी कांग्रेस की झोली में आ सकेगा।
कई लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों में परिसीमन से दलित एवं वनवासी वर्ग के लिए कुछ आरक्षित होने से कांग्रेस को फायदा नजर आ रहा है। दूसरी ओर भाजपा के अंदर भी गुणा-भाग का खेल खेला जा रहा है। वर्षों से अपने आपको सुरक्षित महसूस कर रहे कई दिग्गज भविष्य को लेकर व्याकूल हो गए हैं। उन्हें अब कुर्सी असुरक्षित महसूस होने लगी है। दरअसल परिसीमन से कई नेताओं के सीटों का गणित बिगड गया है। उनके सुरक्षित सीटों के इधार-उधार हो जाने से वे पसोपेश में हैं। वहीं नए एवं युवा नेताओं के चेहरे पर चमक देखी जा रही है। दरअसल काफी समय से मौके की तलाश में भटक रहे इन नेताओं के सामने अब उम्मीद की किरण नजर आने लगी है। इन्हें लगता है कि परिसीमन से अब चुनाव लडने का मौका मिलेगा। ऐसा होने से वे भी अपना जौहर चुनाव के मैदान में दिखा सकेगें। परिसीमन से कई सुरक्षित क्षेत्रों पर कब्जा जमा चुके पूराने चेहरों का वर्चस्व कम होगा और युवा पीढी को मौका मिलेगा। इससे स्पष्ट है कि उम्रदराज नेताओं के अंदर बेचैनी देखी जा रही है। जबकि जिनके अंदर काबिलियत और चुनाव जितने का मदा है। उन्हें किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं है। यह सच है कि प्रतिभावान लोगों को कहीं से भी चुनाव लडने से परहेज नहीं है। उनके लिए सभी सीटें सुरक्षित हैं।