Monday

...तो कहां से लाओगे बेटी

देश के अमीर राज्यों में घटते लिंग अनुपात की समस्या को विकट बताते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि भारत प्रतिकूल लिंग संतुलन के कलंक के साथ जी रहा है। दिल्ली में लड़की बचाओ विषय पर आयोजित एक राष्ट्रीय बैठक का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा, "पिछली जनगणना ने घटता लिंग अनुपात दिखाया था. हमारे देश में पैत्रिक समाज की वजह से लड़कियों और महिलाओं के ख़िलाफ़ पक्षपाती रवैया बन गया है." प्रधानमंत्री का कहना था कि यह शर्मनाक है और हमें इस चुनौती को स्वीकार करना होगा। मनमोहन सिंह ने कहा कि कोई भी राष्ट्र, समाज या समुदाय जब तक इस आधी आबादी के खिलाफ़ होने वाले पक्षपात का विरोध नहीं करेगा, तब तक अपना सिर ऊँचा नहीं कर सकता और न ही वह किसी सभ्य समाज का हिस्सा होने का दावा कर सकता है.
उन्होंने कहा, "हमारी सभ्यता पुरानी है और हम ख़ुद को आधुनिक देश कहते हैं। लेकिन फिर भी हम महिलाओं के खिलाफ़ सामाजिक पक्षपात की वजह से पनपे प्रतिकूल लिंग संतुलन के कलंक के साथ जी रहे हैं." प्रधानमंत्री का कहना था, "जनगणना के आँकड़े बताते हैं कि देश के कुछ अमीर राज्यों में यह मस्या ज़्यादा विकट है जैसे पंजाब जहाँ प्रति एक हज़ार लड़कों पर सिर्फ़ 798 लड़कियाँ हैं, हरियाणा में 819, दिल्ली में 868 और गुजरात में 883 कन्याएं हैं."
प्रधानमंत्री ने कहा कि इससे संकेत मिलते हैं कि बढ़ती आर्थिक संपन्नता और शिक्षा के विकास ने भी इस समस्या को कम नहीं किया है। सामाजिक जागरुकता पर ज़ोर देते हुए मनमोहन सिंह ने कहा, "हमें सामाजिक जागरूकता और जन्म से पूर्व भ्रूण के लिंग परीक्षण आदि के खिलाफ़ कानून को कड़ाई से लागू कर इस समस्या को सुलझाना चाहिए." उन्होंने कहा, "मैं सभी संबंधित लोगों से अपील करता हूँ कि वे जीवन बचाने की इस तकनीक के दुरुपयोग पर रोक लगाएँ।" लिंग अनुपात की घटती दर को रोकने की सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य मंत्रालय पंचायतों के चुने गए लाखों प्रतिनिधियों और स्थानीय प्रतिनिधियों के माध्यम से इस पर नियंत्रण करने की कोशिश करेगा.

2030 तक लुप्त हो जाएगी गंगा !

लोकसभा में सोमवार को 2030 तक गंगा के विलुप्त होने की आशंका पर चिंता जताई गई और इसे बचाने के लिए सरकार से गंगा प्राधिकरण बनाने की मांग की गई। शून्यकाल में सपा के रेवती रमण सिंह ने यह मामला उठाया। उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिग के चलते ग्लेशियरों के पिघलने का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि गंगा 2030 तक विलुप्त हो जाएगी। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों के अनुसार गंगा जिन ग्लेशियरों से निकलती है वह 30 किलोमीटर तक पहले ही गल चुके हैं और 30 मीटर प्रति वर्ष के हिसाब से इनका गलना जारी है। अगर ग्लेशियर गलने की यही रफ्तार रही, तो गंगा का बचना मुश्किल हो जाएगा। सिंह ने कहा कि गंगा केवल नदी नहीं है, बल्कि भारत की संस्कृति और सभ्यता का अभिन्न अंग है। सरकार को इसकी रक्षा के उपाय खोजने के लिए गंगा प्राधिकरण का तुरंत गठन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि शीघ्र ही इलाहाबाद में गंगा पर मेला लगने वाला है और सरकार को चाहिए कि वह बांधों द्वारा रोके गए पानी को नदी में छोड़े। इस पर अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने कहा कि मेले में गंगा को कितना गंदा किया जाता है, उसके बारे में क्या कहना है।

Sunday

55 रुपये की खातिर छात्राओं के कपड़े उतारे

सिजुआ, कतरास [धनबाद]। आठवीं क्लास की एक छात्रा के रुपये की चोरी का खामियाजा कक्षा की अन्य छात्राओं को इस कदर भुगतना पड़ा कि उन्हें तलाशी के नाम पर अपने कपड़े उतारने पड़े और यह कार्य स्कूल के हेडमास्टर के निर्देश पर हुआ। इस घटना के बाद अब छात्राएं स्कूल जाने के नाम से भय खाने लगी हैं। वहीं भड़के अभिभावकों ने स्कूल पहुंचकर हंगामा किया और छात्राओं के वस्त्र उतारकर उनकी तलाशी लेने का आदेश देने वाले प्रधानाध्यापक सहित एक अन्य शिक्षक की जमकर धुनाई कर डाली।
धनबाद बीडीओ स्मृति कुमारी भी भारी संख्या में पुलिस के साथ मौके पर पहुंची और अभिभावकों को समझा-बुझाकर शांत कराया। आक्रोशित अभिभावक आरोपी प्रधानाध्यापक को अविलंब वहां से हटाने की मांग पर अड़े थे। मानवता को शर्मसार कर देने वाली यह घटना सिजुआ के मोदीडीह बालिका उच्च विद्यालय की है। घटना के बाबत अभिभावकों व कक्षा आठ की छात्राओं ने बताया कि शुक्रवार को कक्षा के दौरान ही छात्रा नाजिया परवीन के 55 रुपये चोरी हो गए। इस बात की शिकायत छात्रा ने प्रधानाध्यापक मो. सरफुद्दीन से की। प्रधानाध्यापक ने विद्यालय की ही तीन शिक्षिकाओं को मामले की छानबीन का निर्देश दिया। प्रधानाध्यापक से मिले निर्देश का इन शिक्षिकाओं ने इस कदर पालन किया कि एक पल के लिए मानवता भी शर्मसार हो गई। तीनों शिक्षिकाओं ने भरी कक्षा में ही एक-एक छात्रा के वस्त्र आदि उतारकर उनकी तलाशी लेनी शुरू कर दी। ऐसा करीब एक दर्जन छात्राओं के साथ किया गया। यह देख कक्षा की अन्य छात्राएं जोर-जोर से रोने लगी और जांच का विरोध करने लगीं। छात्राओं का विरोध देख शिक्षिकाओं ने तलाशी लेना बंद कर दिया।
इधर, कक्षा से निकली कुछ छात्राओं ने घर जाकर इसकी जानकारी अभिभावकों को दी। आक्रोशित अभिभावक शनिवार को स्कूल खुलने के साथ ही विद्यालय पहुंच गए तथा घटना का विरोध करने लगे। अभिभावक प्रधानाध्यापक सहित तलाशी लेने वाली शिक्षिकाओं को वहां से हटाने की मांग कर रहे थे। अभिभावकों ने इस दौरान प्रधानाध्यापक को एक शिकायत पत्र भी देना चाहा जिसे प्रधानाध्यापक ने लेने से मना कर दिया। इस पर अभिभावकों का आक्रोश भड़क उठा और वे हंगामा मचाने लगे। देखते ही देखते हजारों अभिभावक विद्यालय परिसर में जुट गए तथा प्रधानाध्यापक मो। सरफुद्दीन सहित सहायक प्राचार्य राजीव कुमार की जमकर पिटाई कर दी। इधर, मौके की नजाकत को देखते हुए तलाशी लेने वाली तीनों शिक्षिकाएं भाग खड़ी हुई। इधर, घटना की खबर पाकर स्कूल के सचिव सुरेंद्र सिंह, अध्यक्ष राम गोपाल सिंह, सदस्य केबी सहाय, शकील अहमद, उदय गुप्ता, एएन झा आदि वहां पहुंच गए मगर भीड़ उनकी कोई भी बात सुनने को तैयार नहीं थी। सूचना पाकर केंदुआडीह इंस्पेक्टर सतीश चंद्र झा, तेतुलमारी थानेदार अखिलेश मंडल, लोयाबाद थानेदार दिनेश राणा, जोगता थानेदार सदल बल मौके पर पहुंच गए तथा लोगों को समझाना चाहा। अभिभावकों को शांत नहीं होता देख आसपास के थानों की पुलिस को बुलाकर इलाके को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया। बाद में पुलिस अधिकारियों के अनुरोध पर अभिभावकों का दल जोगता थाने पहुंचा व पुलिस के पास घटना की लिखित शिकायत की। मामले को ले पुलिस ने अभिभावकों की शिकायत पर आरोपी शिक्षकों के खिलाफ कांड अंकित कर आवश्यक कार्रवाई की बात कही। छात्रा नेहा कुमारी ने प्रधानाध्यापक सहित सचिव सुरेंद्र सिंह, राजीव कुमार सिंह आदि पर माफी नहीं मांगे जाने पर भविष्य बर्बाद कर देने व दु‌र्व्यवहार करने का आरोप लगाते हुए कांड अंकित कराया है। वहीं स्कूल पक्ष की ओर से प्रधानाध्यापक ने शामो दत्ता, शालो दत्ता, अनंतो चटर्जी, प्रसादी भुइयां, आनंद चटर्जी, राजेश नोनियां, धीरज चौहान, दिनेश चौहान, विनोद चौहान, महेन्द्र रजवार, राजू चौहान, सूर्यदेव यादव, मुखलाल चौहान व अन्य के खिलाफ जानलेवा हमला कर कागज गायब करने का आरोप लगाते हुए पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराई है। बीडीओ स्मृति कुमारी भी शनिवार को विद्यालय पहुंची और घटना की जानकारी लेने के बाद जरूरी कार्रवाई का भरोसा दिलाया।
सौजन्यः जागरण

Saturday

ससुर और पत्नी को नग्न कर पीटा


हरियाणा के पानीपत में दामाद द्वारा अपने ससुर और अपनी पत्नी को निर्वस्त्र कर बुरी तरह पीटकर घायल करने। बाद में दोनों बाप-बेटी को नग्नावस्था में एक ही कमरे बंद करने का मामला प्रकाश में आया है। हालांकि इस मामले की पुलिस रिपोर्ट अभी तक नहीं हुई है। दोनों को सामान्य अस्पताल पानीपत में इलाज के लिए लाया गया है। जहां उन्होंने एमएलआर कटवाई है। जानकारी के मुताबिक संजय कॉलोनी निवासी लखमी की पुत्री रानी का विवाह 6 वर्ष पूर्व मतलौडा के गांव थराना में राजकुमार के साथ हुआ था। घायल बेटी का आरोप है कि राजकुमार उसे दहेज के लिए तंग व मारपीट करता था। जिसकी सूचना उसने अपने बाप लखमी जो कि शुगर मिल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं को दी। लखमी का आरोप है कि जब वह अपनी बेटी का हालचाल जानने 25 अप्रैल को गांव थराना गया तो उसक दामाद राजकुमार, उसका छोटा भाई भीरू व बहन ने उसके सामने ही उसकी बेटी को पीटा और रोकने पर उसे भी पीटना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं उन लोगों ने बाप-बेटी दोनों के कपड़े उतार दिए और नन्नावस्था में बुरी तरह पीटाई के बाद दोनों बाप-बेटी को एक कमरे में बंद कर दिया। रातभर कमरे में बंद रहने के बाद सुबह किसी तरह वे बच निकले और सामान्य अस्पताल में इलाज के लिए आए थे। जहां पुलिस की सूचना के बाद चिकित्सकों ने एमएलआर काटी।

सौजन्यः हरिभूमि रोहतक

पत्रकार बिरादरी की लाचारगी

दुनिया को रास्ता दिखाने वाला लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मलिकों के दबाव के आगे घुटघुट कर जीने को मजबूर है। हर किसी के शोषण के खिलाफ अपनी कलम से आवाज बुलंद करने वाले पत्रकार जगत की आवाज मालिकानों की धमक के आगे दबकर रह गई है। अब इसे पत्रकारों की नपुंसकता मानें या उनकी रोजी-रोटी की मजबूरी वह विसंगतियों के बीच जीने को अभिशप्त हैं। विभिन्न विभागों के कर्मचारियों के वाजिब वेतन और भत्ते की चिंता करने वाला कलमकार खुद अपने यथोचित पगार के लिए आवाज उठाना तो दूर सुझाव तक देने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। राष्ट्रीय श्रमजीवी पत्रकार एवं गैर पत्रकार कर्मचारियों के लिए गठित वेतन बोर्ड के सामने एक साल में मात्र ११ सुझाव ही मिलना पत्रकारों की वास्तविक संघर्ष सामथ्र्य की पोल ही खोलता है। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने श्रमजीवी पत्रकार एवं अन्य समाचार पत्र कर्मचारियों के वेतनमान निर्धारण एवं संशोधन के लिए दो राष्ट्रीय वेतन बोर्ड गठित किए हैं। एक बोर्ड श्रमजीवी पत्रकारों तथा दूसरा गैर पत्रकार कर्मचारियों के लिए २४ मई २००७ को जारी अधिसूचना एवं तीन जुलाई २००७ के आदेश तहत गठित किए हैं। बोर्ड को मई २००८ तक अंतरिम रिपोर्ट तैयार करनी है इसलिए प्रत्येक राज्यों में बैठक में पत्रकारों एवं मालिकों से सुझाव लिए जा रहे हैं और इसी सिलसिले में राजस्थान के जोधपुर में गत दिवस पहली बैठक हुई। वेतन बोर्ड की हुई प्रथम बैठक में यह तथ्य सामने आया कि देशभर में अभी तक बोर्ड को मात्र ११ ही सुझाव मिले हैं। सुझाव नहीं मिलने की वजह यह है कि पत्रकार प्रतिष्ठान मालिकों के डर से खुलकर सामने आने से कतरा रहे हैं। बैठक में वेतनबोर्ड के सदस्य सचिव केएम साहनी ने बताया कि अहमदाबाद में एक पत्रकार ने यहां तक कहा कि आपसे मिलने की सूचना भी पत्र मालिक को मिल गई तो हमारे लिए समस्या पैदा हो जाएगी। उन्होंने कहा कि बैठक में यह भी सुझाव आया कि वेतनमान लागू नहीं करने वाले समाचार पत्रों को मिलने वाले सरकारी विज्ञापन एवं कागज कोटे में सख्ती बरती जाए लेकिन इस प्रकार का निर्णय समाचार पत्र मालिकों के खिलाफ जाकर लेने का साहस किसी सरकार के पास नहीं है। इस संबंध में १२५ अखबारों को नोटिस जारी किए गए हैं। जस्टिस नारायण कुरुप की अध्यक्षता में गठित वेतन बोर्ड को अपनी रिपोर्ट २०१० तक केंद्र सरकार को देनी है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में पांच से सात मई तक नई दिल्ली कार्यालय में जन सुनवाई भी रखी गई है। अब देखने वाली बात यह है कि उस सुनवाई में कितने पत्रकार सुझाव देने की हिम्मत जुटा पाते हैं।

Thursday

सर, मैं बहुत गरीब हूं..

  • प्रतीक्षा सक्सेना
गाजियाबाद, सर, मैं बहुत गरीब हूं। नकल कराने के लिए दूसरे छात्रों की तरह दो हजार रुपये नहीं दे सकता। उसकी सजा मुझे उन छात्रों से जिन्होंने उस शुल्क का भुगतान कर दिया है, से अलग बिठाकर दी जा रही है। अब मेरा भविष्य आपके हाथ में है..।
यह बानगी है जिले के एक मूल्यांकन केंद्र पर चेक होने के लिए आई कापियों में से एक कापी की। इस कापी पर छात्र ने बड़ी दयनीय अंदाज में इस बात का उल्लेख किया है कि किस तरह उसके केंद्र पर दो हजार रुपये नकल कराने के नाम पर लिए गए हैं और वह इतनी धनराशि दे पाने में अक्षम है। दरअसल मूल्यांकन केंद्र पर छात्रों की जो कापियां चेक होने के लिए आई हैं, वे नकल माफिया की सक्रियता की चुगली कर रही हैं। ये कापियां इलाहाबाद मंडल के एक कालेज की हैं, जिनमें कई ऐसी बातें हैं जो नकल माफिया की सक्रियता की ओर इशारा कर रही हैं।
जिले में तीन मूल्यांकन केंद्र बनाए गए हैं। उनमें से ही एक केंद्र पर विज्ञान वर्ग की कापी चेक हो रही थी। उसी दौरान एक कापी पर जब परीक्षक को छात्र की पीड़ा पढ़ने को मिली, तो वे हैरान रह गए। सूत्रों की मानें, तो उनके दो दशक के करियर में किसी कापी में छात्र द्वारा इस तरह से नकल माफिया के बारे में कभी पढ़ने को नहीं मिला।
इतना ही नहीं, जिस कालेज की ये कापियां हैं वहां एक ही पेपर में 49 छात्र अनुपस्थित पाए गए। नाम न छापने की शर्त पर परीक्षक दावा करते हैं कि इतनी बड़ी संख्या में बोर्ड की परीक्षा में छात्र किसी सामान्य परिस्थिति में अनुपस्थित नहीं हो सकते। वह आशंका जता रहे हैं कि संभव है कि इन छात्रों ने नकल के लिए पैसे न दिए हों और केंद्र पर उत्पीड़न के बाद उन्होंने परीक्षा छोड़ दी हो।
धांधली की बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती। इसी कालेज में एक ही रोल नंबर की दो कापियां भी मिली हैं। जाहिर है कि कक्ष निरीक्षक की मिलीभगत के बिना ऐसा मुमकिन नहीं है, क्योंकि नियम यह कहता है कि कापियां गिनकर इकट्ठा की जाती हैं, तो फिर एक अतिरिक्त कापी कैसे आ गई।
उसके अलावा इसी कालेज की जो अनुपस्थिति शीट भरी गई है, वह बड़े अजब ढंग से भरी गई है। केंद्र के सूत्रों के मुताबिक, शीट से ऐसा लग रहा है जैसे किसी बच्चे या कम पढ़े लिखे इंसान ने भरी हो। हालांकि इस प्रकरण पर कोई भी शिक्षक खुलकर सामने आने को तैयार नहीं है, क्योंकि मामला अनुशासनहीनता का बन सकता है।
छात्र की भाषा पढ़ने में फेल हो गए मास्साब
ज्योतिबा फूले नगर [अमरोहा]। जी हां, एक छात्र ने अपनी उत्तर पुस्तिका में ऐसी भाषा लिखी, जिसको पढ़ने व समझने में सात शिक्षक फेल हो गए। हारकर उस कापी को रख लिया गया। इतना ही नहीं एक परीक्षार्थी ने हिंदी विषय की कापी को ही कोरा छोड़ दिया, जिसको देखकर परीक्षक भी हैरान रह गए।
कुंदन मॉडल इंटर कालेज पर उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन धीरे-धीरे तेजी पकड़ रहा है। सूत्र बताते हैं कि मूल्यांकन के दौरान इंटरमीडिएट अर्थ शास्त्र के छात्र ने अपनी उत्तर पुस्तिका में अपठनीय भाषा लिखी, जिसको केंद्र उपनियंत्रक ने कई-कई शिक्षकों से पढ़वाया, किंतु सभी शिक्षक उसको समझने में नाकामयाब रहे। बताया जाता है कि भाषा को सात शिक्षकों ने पढ़ने की कोशिश की, लेकिन सभी ने हाथ खड़े कर दिए। अंत में शिक्षकों ने उस उत्तर पुस्तिका को अलग रख लिया और बाद में जांचने की बात कही।
सूत्रों के मुताबिक इसी केंद्र पर इंटरमीडिएट सामान्य हिंदी विषय की कापियों के मूल्यांकन के दौरान एक उत्तर पुस्तिका ऐसी मिली, जिसमें कुछ नहीं लिखा था। पूरी कापी कोरी थी। हिंदी विषय की उत्तर पुस्तिका खाली देखकर परीक्षक भी अचंभे में पड़ गए।
सौजन्यःजागरण

Wednesday

...तो नष्ट हो जाएगी पृथ्वी!

यह कोई नहीं जानता कि पृथ्वी पर जनजीवन का अंत कैसे होगा, लेकिन वैज्ञानिकों का दावा है कि इससे पहले कि पाँच अरब वर्ष में सूर्य पृथ्वी को जला डाले बुध या मंगल ग्रह के साथ टक्कर से हमारा ग्रह नष्ट हो सकता है। दो अलग-अलग अध्ययनों में पाया गया है कि सौरमंडल के ग्रह अपने कक्षों में करीब चार करोड़ वर्ष तक सूर्य की लगातार परिक्रमा करते रहेंगे, लेकिन उसके बाद संभावना है कि अगले पाँच अरब वर्ष में बुध ग्रह की कक्षा अव्यवस्थित हो जाए। अध्ययन में दावा किया गया है कि इससे पूरी सौर प्रणाली अस्थिर हो जाएगी परिणास्वरूप बुध या मंगल ग्रह की पृथ्वी से टक्कर हो सकती है जिससे उस समय तक मौजूद किसी भी तरह का जनजीवन समाप्त हो जाएगा। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता के हवाले से न्यू साइंटिस्ट ने कहा है कि मंगल ग्रह के साथ टक्कर की स्थिति में तुरंत ही सारा जनजीवन नष्ट हो जाएगा और पृथ्वी किसी रेड जॉइंट के तापमान पर करीब एक हजार साल तक दहकती रहेगी। दूसरे अध्ययन में जॉक लस्कर पेरिस की वेधशाला में कंप्यूटर पर सौर प्रणाली की प्रक्रिया की अनुकृति का अध्ययन इस नतीजे पर पहुँचे कि एक या दो फीसदी में वृहस्पति ग्रह के गुरुत्वाकर्षणीय खिंचाव के कारण कुछ समय के लिए बुध की कक्षा काफी लंबी हो गई।

महिलाओं को मिलेगा स्थायी कमीशन!

अधिकारियों की कमी से जूझ रही सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन दिए जाने के बारे में विचार किया जा रहा है। रक्षा राज्य मंत्री एम एम पल्लमराजू ने बुधवार को बताया कि अभी तक केवल अल्पकालिक सेवा कमीशन प्राप्त पुरुष अधिकारियों को ही स्थायी कमीशन दिया जाता है, लेकिन अब महिलाओं को भी स्थायी कमीशन दिए जाने के बारे में विचार किया जा रहा है। राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान सईदा अनवरा तैमूर के प्रश्न के उत्तर में पल्लमराजू ने बताया कि वर्तमान में अल्पकालिक सेवा कमीशन प्राप्त अधिकारियों की संख्या सेना में 3312, नौसेना में 1257 और वायुसेना में 1771 है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि स्थायी कमीशन देते समय अधिकारियों का रैंक नहीं घटाया जाता है। उन्हें पदोन्नति के समान अवसर भी दिए जाते हैं। पल्लमराजू ने बताया कि अल्पकालिक सेवा कमीशन प्राप्त अधिकारियों को प्रशिक्षण एक अलग अकादमी में उसी पद्घति से दिया जाता है जैसा राष्ट्रीय रक्षा अकादमी द्वारा दिया जाता है। पल्लमराजू ने विजय दर्डा के पूरक प्रश्न के उत्तर में बताया कि निजी क्षेत्र में बेहतर अवसर करियर वरीयताओं में परिवर्तन, रक्षा सेनाओं की कड़ी चयन प्रक्रिया और सेवा शर्तो आदि के कारण कई सैन्यकमियों ने समय पूर्व सेवानिवृत्ति की इच्छा जताई है। इनमें बड़ी संख्या अधिकारियों की है। रक्षा राज्य मंत्री ने बताया कि रक्षा सेनाओं में अधिकारियों की कमी स्थायी कमीशन के साथ-साथ विभिन्न अल्पकालिक सेवा कमीशन प्राप्त संवगों में भी है। बहरहाल उन्होंने कहा कि अल्पकालिक सेवा कमीशन प्राप्त अधिकारियों की भर्ती से अधिकारियों की कमी दूर करने में योगदान मिलता है। पल्लमराजू ने जया बच्चन के पूरक प्रश्न के उत्तर में बताया कि सेना में रिक्तियों को भरने के लिए कई कदम उठाए गए हैं और सेवा शर्तो को भी बेहतर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। सैयद अजीज पाशा के प्रश्न के उत्तर में रक्षा राज्य मंत्री ने बताया कि सैन्य क्षेत्र में कर्मचारियों और अधिकारियों के वेतन में कथित अंतर की जांच की जा रही है। उन्होंने विप्लव ठाकुर के पूरक प्रश्न के उत्तर में बताया कि ए वी सिंह समिति की रिपोर्ट की सिफारिश के आधार पर पदोन्नति के लिए वर्ष की सीमा घटाकर 2, 6 और 13 साल कर दी गई है, जिसका लाभ भी मिला है।

Tuesday

आरकुट व फेसबुक के हैकरों से सावधान

इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों सावधान! आरकुट और फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किग वेबसाइटों पर आपके प्रोफाइलों में कोई और भी नजर गड़ाए बैठा है। इन वेबसाइटों के माध्यम से कोई आपके कंप्यूटर में घुसपैठ [हैक] कर आपको बड़ा नुकसान भी पहुंचा सकता है।
एंटी-वायरस बनाने वाली कंपनी सीमेंटेक की इंटरनेट सुरक्षा खतरा रिपोर्ट [आईएसटीआर] 2007 के अनुसार इंटरनेट के हैकरों ने इन दिनों सोशल नेटवर्किग साइटों पर निशाना साधा हुआ है। सीमेंटक कंपनी के प्रबंध निदेशक विशाल धुपर ने बताया कि वेबसाइट आरकुट के माध्यम से आनलाइन होकर हम किसी से बातचीत, सूचनाओं का आदान-प्रदान और मेलजोज आसानी से बढ़ा सकते है। इस कारण साइट का ज्यादा इस्तेमाल करने वालों को कभी-कभी उन्हे बुरी नीयत वाले लोगों का भी सामना करना पड़ता है। ये लोग वायरस तो भेजते ही है और कई बार उन्हें मानसिक, भावनात्मक रूप से भी परेशान करते है। गौरतलब है कि विश्व में सोशल नेटवर्किग वाले वेबसाइटों में व‌र्ल्ड वाइड वेब[डब्लुडब्लुडब्यु], बेबो, फेसबुक, फिल्कर, माई स्पेस और आरकुट आदि युवाओं का पसंदीदा वेबसाइटे है। विशाल ने बताया कि इन सोशल नेटवर्किग वाली साइटों में सभी उपयोगकर्ताओं की प्रोफाइल में व्यक्तिगत तथ्यों की भरमार होने से कई बार अपराधी किस्म के लोग इनका दुरुपयोग भी कर रहे है। इसलिए इन साइटों का इस्तेमाल करते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

शर्मिला ने दी मर्दो को टक्कर

जज्बा मर्दो से बराबरी का और जरिया अतिरिक्त कमाई का। इन दो बातों ने शर्मिला को नारियल के पेड़ों पर दनादन चढ़ना सिखा दिया। यह काम अब तक सिर्फ मर्दो के बूते की बात माना जाता था। नारियल का पेड़ कितना भी ऊंचा क्यों न हो, 37 वर्षीय शर्मिला पलक झपकते चढ़ जाती है। इससे पास-पड़ोस के लोगों को भी काफी राहत है, क्योंकि युवक अब इस परंपरागत काम से खुद को दूर ही रख रहे हैं। केरास यानी नारियल की धरती केरल में नारियल के पेड़ पर चढ़ने वाले मजदूरों की अत्यधिक कमी है। समीपस्थ जिला कासारगोड जिले की रहने वाली शर्मिला पार्ट टाइम सरकारी नौकरी करती है। बाकी समय में नारियल तोड़ती है। वह प्रतिदिन 10-15 पेड़ों पर चढ़ती है। इसके बदले में उसे 100-150 रुपये मजदूरी मिलती है।
शर्मिला बताती है कि उसने जब यह काम शुरू किया तो पड़ोसी उसे हैरत से देखते थे। लेकिन अब तो उसे गांव के लोग बड़ी मान-मनौवल के साथ बुलाते हैं। शर्मिला के मुताबिक उसने यह काम उस वक्त शुरू करने का फैसला किया जब उसके पति का नारियल तोड़ने को लेकर कुछ मजदूरों से झगड़ा हुआ। यह वाकया उसके नए घर में प्रवेश की पूर्व संध्या का था। नतीजतन उसका घर वीरान पड़ा रहा। इसके बाद शर्मिला ने भगवान और अपने पिता का आशीर्वाद लेकर खुद यह काम शुरू कर दिया। कुछ झिझक के बाद उसके पति ने भी इस काम में मदद करनी शुरू कर दी। कुर्सी बुनने, सिलाई-कढ़ाई में पारंगत और दो बच्चों की मां शर्मिला बताती है- पेड़ कितना भी ऊंचा क्यों न हो, मुझे चढ़ने में कोई दिक्कत नहीं होती।

Monday

पीपी सिंह ठाकुर वेद राम पुरस्‍कार से सम्मानित

माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय, भोपाल के पत्रकारिता विभाग के प्रमुख पुष्पेन्द्र पाल सिंह को 21 अप्रैल को ठाकुर वेद राम प्रिंट मीडिया एंव पत्रकारिता शिक्षा पुरस्‍कार से समानित किया गया हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में पुरस्कार देते प्रदेश के पूर्व मंत्री ठाकुर सत्यप्रकाश सिंह (दाएं) व ठाकुर शिवचंद्र (बीच में)।

तो मुफ्त में मिल सकती है रोटी

  • अमित मंडलोई
इंदौर. अनाज की आसमान छूती कीमतों ने अच्छे-खासे परिवारों का बजट बिगाड़ दिया है। मौजूदा स्थितियों को देखते हुए निकट भविष्य में इस स्थिति में बदलाव के आसार भी कम ही नजर आ रहे हैं। ऐसे में यही सवाल उठता है कि आखिर इस स्थिति से कैसे उबरे। खेतों से "ोदाम तक की प्रक्रिया में अनाज नष्ट होने से बचा लिया जाए तो ही स्थिति पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है।
संभाग के सातों जिलों में इस बार करीब चार लाख 75 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं की बोवनी की गई थी। कृषि विभाग के अनुसार करीब 19 लाख टन गेहूं का उत्पादन हुआ है। इसमें से करीब 15 प्रतिशत किसान खुद के उपयोग व बीज के लिए रख लेते हैं। शेष गेहूं बाजारों में पहुंचता है। इस बार अभी से सारे सरकारी गोदाम भर चुके हैं।
दरअसल सरकारी गोदामों में केवल दो लाख टन गेहूं रखा जा सकता है। चार सौ निजी वेयर हाउस मिलाकर भी 40 से 45 फीसदी जरूरत ही पूरी हो पा रही है। शेष गेहूं या तो मंडियों व अन्य संस्थाओं में खुले में पड़ा खराब हो रहा है या व्यापारी अपने हिसाब से उसका भंडारण कर रहे हैं। शहर से कुछ ही दूर मांगलिया में ही सड़क के पास खुले में ही गेहूं के ढेर देखे जा सकते हैं। ऐसी ही स्थिति मंडियों की भी है।
फसल कटाई से लेकर ट्रांसपोर्टेशन और भंडारण में हो रहे नुकसान का अंदाजा लगाएं तो संभाग में ही हर साल 3।8 लाख टन गेहूं नष्ट हो रहा है। प्रति व्यक्ति चार सौ ग्राम प्रतिदिन के हिसाब से यह गेहूं 26 लाख 38 हजार लोगों का पूरे साल पेट भरने के लिए काफी है। इस लिहाज से यदि इस फिजूलखर्ची को 10 प्रतिशत तक कम कर दें तो भी 13 लाख 19 हजार लोगों की सालभर की रोटी का इंतजाम हो सकता है, जो शहर की आधी आबादी के बराबर है। सहायक संचालक कृषि उत्तमसिंह जादौन मानते हैं यदि इस अनाज को बचा लिया जाए तो हमें आयात की जरूरत ही नहीं पड़े।
सौजन्य-भास्कर

Sunday

जज्बे के आगे हारी विकलांगता


  • धनंजय शर्मा

जब उम्मीदें परवान चढ़ती हैं, तो अरमान मचलने लगते हैं। मंजिल शीशे की तरह बिलकुल साफ दिखाई देती है। कदमों और मंजिल का फासला लगातार कम होता जाता है। फासलों को रास्ते के बीच की दीवारों को लांघने में कोई कमजोरी कभी आड़े नहीं आती। बल्कि दुनिया उनके इरादों को सलाम करती है जो अपनी कमजोरी को हराकर खुद अपने लिए, देश के लिए इतिहास रचते हैं और ऐसा ही एक इतिहास रचने जा रही है अकलतरा की प्रतिभा शैलजा बैस। शैलजा की विकलांगता ने उसे और मजबूत बनाया और तैराकी की दुनिया में उसने एक अलग मुकाम कायम कर लिया। पहले गांव, फिर शहर और अब अपने देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए चीन जाने वाली है। इस वर्ष चीन में आयोजित पैराओलंपिक के लिए उसका चयन कर लिया गया है। जांजगीर-चांपा जिले के अकलतरा की १४ वर्षीय विकलांग तैराक शैलजा बैस के माता-पिता का साया उस पर से चार साल पहले ही हट गया। यह प्रकृति की संवेदनहीनता ही है कि महज १० साल की उम्र में ने एक सड़क दुर्घटना में अपने माता पिता को खो दिया। इस दुर्घटना के समय वह स्वयं व उसका भाई माता-पिता के साथ थे लेकिन वे बच गए। माता श्रद्धा सिंह बैस व पिता राघवेन्द्र सिंह बैस के गुजरने के बाद शैलजा व उसके छोटे भाई को नाना लव सिंह चंदेल व नानी गोमती सिंह चंदेल पाला पोसा।

बालिका चीरहरण खुली सड़क भीड़ एक बच्‍चा

दर्पण की सराहना-1
दर्पण की सराहना-2

लड़की को निर्वस्त्र कर दौड़ाया गया दर्पण ही वो ब्‍लाग है जिसने इंटरनेट को खबर देने का मूल कार्य किया। मंतोष कुमार सिंह ने सबसे पहले इंटरनेट की दुनिया को बताया कि लड़की को निर्वस्त्र कर दौड़ाया गया इन ब्‍लागों और प्रतिक्रियाओं ने राह दिखाया

लड़की को अर्धनग्न करने पर उबल पड़ा रायपुर

मां, मैं मर जाऊंगी... कोई तो बचा लो।

कोख की पीड़ा पर कैंची

  • नीलिमा सुखीजा अरोड़

जयपुर. पांच माह पहले मां बनी 35 साल की सुनीता शर्मा को प्रसव के बाद से ही लगातार कमर दर्द की शिकायत है। सुनीता को प्रसव के समय डॉक्टर ने कहा कि उनकी उम्र तीस पार है तो वे साधारण डिलीवरी का जोखिम नहीं उठाना चाहते। उनका सीजेरियन किया गया। वे कहती हैं कि जरूरत न होने पर भी ऑपरेशन किया गया, पहले दो बच्चे साधारण प्रसव से हुए थे।
सुनीता ऐसी अकेली महिला नहीं है, जिन्हें जरूरत न होते हुए भी सीजेरियन किया गया। प्रदेश के निजी अस्पतालों में होने वाले प्रसव में से 53 प्रतिशत प्रसव सर्जरी (सीजेरियन) से हो रहे हैं जबकि सरकारी अस्पतालों में यह आंकड़ा 25 फीसदी है। यह देश-दुनिया के आंकड़ों से कहीं ज्यादा है। यह चौंकाने वाले तथ्य तब सामने आए जब ‘भास्कर’ ने प्रदेश के प्रमुख सरकारी अस्पतालों व निजी अस्पतालों में यह पड़ताल की।
सीजेरियन ज्यादा होने के पीछे डॉक्टरों की खतरा न लेने की प्रवृत्ति व पैसा कमाने की इच्छा भी बड़े कारण हैं। साधारण प्रसव पर जहां खर्च महज 2 हजार रुपए आता है वहीं सीजेरियन प्रसव के दौरान यह खर्च 12 हजार रुपए से लेकर 25 हजार रुपए तक आता है। उच्च सुविधाओं वाले कुछ निजी अस्पताल इससे अधिक भी चार्ज कर सकते हैं।


पूरी दुनिया की स्थिति
विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक रिपोर्ट के अनुसार इस समय पूरी दुनिया में कुल प्रसव में से औसतन 15 फीसदी प्रसव ही सीजेरियन हो रहे हैं। जबकि राजस्थान में यह दर पूरी दुनिया की तुलना में कहीं अधिक लगभग 35 प्रतिशत आंकी गई है। कैनेडियन मेडिकल एसोसिएशन जनरल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार सीजेरियन करवाने वाली प्रति 1000 महिलाओं में से 27 महिलाएं गंभीर बीमारियों का शिकार होती हैं। इसकी तुलना में साधारण प्रसव में गंभीर रूप से बीमार होने वाली महिलाओं की संख्या केवल नौ प्रति एक हजार है।


ये हैं खतरे
शिशु जब परंपरागत मार्ग से नहीं गुजरता तो उसके फेफड़ों का पानी पूरी तरह से नहीं निकलता, ऐसे में कई मामलों में बच्चे को सांस लेने में तकलीफ हो सकती है। कुछ बच्चों की सांस ज्यादा तेज चलने लगती है इसे ट्रान्सियन्ट टैक्पिनिया ऑफ न्यूबॉर्न भी कहते हैं। साधारण डिलीवरी से होने वाले बच्चों में सिर का कोन भी सही तरीके से बनता है।
सीजेरियन भी एक सर्जरी(शल्य क्रिया) ही है, इसमें भी दूसरी सर्जरी की तरह ही खतरा होता है। एनेस्थेटिक या सर्जकिल कॉम्पलिकेशन या डॉक्टर की किसी लापरवाही की वजह से अथवा मां या बच्चे की बॉडी में रिएक्शन से कोई खतरा हो सकता है। जयपुर स्थित होली फैमिली अस्पताल से जुड़ी स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ। नीतू आहलुवालिया कहती हैं कि कुदरती प्रसव ऑप्रेशन के प्रसव से बेहतर है। जिन केसेज में मां या बच्चे की जान को खतरा होता है उन्हीं में सीजेरियन किया जाता है।

सौजन्य-भास्कर

Saturday

बाप के हाथ में बंदूक, बेटी ने थामी कलम

औरंगाबाद। नक्सली बाप के हाथ में बंदूक देख बेटी का मन विचलित नहीं हुआ। बेटी प्रिया ने बंदूक की जगह कलम थाम ली और गांव में शिक्षा का अलख जगाने लगी। बेटी की कलम के आगे पिता की बंदूक कमजोर साबित हो रही है।
यह नजारा गत गुरुवार को देव प्रखंड के अति नक्सल प्रभावित बनुआ पंचायत अंतर्गत पहाड़ों की तराई व जंगल में चल रहे नवसृजित प्राथमिक विद्यालय पक्कापर में देखने को मिला। विद्यालय के बगल बैठी अनपढ़ भगवतिया ने दबी जुबान बताया की पति श्यामदेव रिकियासन नक्सली संगठन में बंदूक थामे है परंतु बेटी प्रिया के हाथों में कलम है। इसी तरह नक्सली रामजनम रिकियासन की अनपढ़ पत्नी सबीता ने बताया कि उसने भी अपनी बेटी अंजू एवं चिंता के हाथों में कलम पकड़ा दी है। विद्यालय में कार्यरत पंचायत शिक्षक मंजू कुमारी एवं दिलीप कुमार गांवों के वनवासी बच्चों की तकदीर बदल रहे हैं। बताते हैं कि सालों बाद इस इलाके में विद्यालय की घंटी बजी है। रविवार व अन्य छुट्टियों ंको छोड़ सभी दिन नक्सलवाद की इस धरती पर शिक्षा का दीप जलता है। बनुआ पंचायत के खैरा गांव से छह किलोमीटर दूर दुर्गम रास्ते एवं जंगलों से गुजरते हुए इस विद्यालय तक पहुंचा जा सकता है। विद्यालय पहुंचते पर शिक्षकों ने बताया कि विद्यालय में 67 बच्चे नामांकित है। विद्यालय खुले मात्र एक वर्ष हुआ है लेकिन बच्चों के कंठ से निकलने लगे है 'सर अहिंसा का मार्ग अपनाएंगे।' पूछते ही बच्चे हिन्दी, अंग्रेजी व गिनती की सभी वर्णमालाएं सुना देते है। शिक्षकों ने बताया कि विद्यालय भवन न होने, पोषाहार वितरित न किये जाने तथा अन्य सुविधाओं के चलते छात्रों की संख्या में बढ़ोतरी नहीं हो रही है। दोनों पंचायत शिक्षकों को वेतन के नाम पर अभी तक धेला भी नहीं मिला है। बीईओ अरविंद कुमार ने बताया कि शीघ्र ही विद्यालय भवन का निर्माण कराया जाएगा तथा पोषाहार योजना भी चलाई जाएगी। शिक्षकों को मानदेय भी मिलेगा।
सौजन्य-जागरण

70 बरस का दूल्हा, दुल्हन 17 साल की

जालंधर दूध जैसी सफेद दाढ़ी, सिर पर पगड़ी और सेहरा और एक घोड़े के रथ पर सवार। जी हां! है न बिल्कुल दूल्हे जैसा लिबास और उम्र सिर्फ 70 साल। पांव कब्र में और दूल्हा चले दुल्हन ब्याहने। तभी तो कहते हैं 'दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे'। अब जरा दुल्हन की उम्र भी देख लीजिए, दुल्हन है 17 साल की। 70 साल में 17 साल की दुल्हन का कमाल तो कोई एनआरआई ही कर सकता है और आजकल हो भी ऐसा ही रहा है। पैसे व विदेश जाने के लोभ में लोग अपनी कम उम्र की लड़कियों की शादी एनआरआई दूल्हे से कर रहे हैं। भले ही बाद में दुल्हन को जिंदगी भर पछताना पड़े। इन्हीं बातों पर कटाक्ष करते हुए कामेडी जोड़ी संता-बंता की वीडियो एलबम 'घसीटा कनेडा विच' रिलीज की गई है। इस एलबम में इस विषय पर कटाक्ष करते हुए संता-बंता ने इसके नुकसान को बताया है। लोगों को इस बात से जागरूक करने के लिए संता-बंता ने शहर में ऐसी ही एक बारात का आयोजन किया। यह 'अनोखी' बारात बीएमसी चौक व 'दैनिक जागरण' कार्यालय से होती हुई प्रेस क्लब रवाना हुई। संता-बंता ने बताया कि वे बारात को साथ लेकर सभी पत्रकारों को रात्रि भोज के लिए प्रेस क्लब आमंत्रित कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि एलबम में समाज की और कुरीतियों को उठाया गया है। दूल्हे की भूमिका में गोल्डी उर्फ चाचा बिशना व दुल्हन की भूमिका में मोनिका वर्मा थी। बारात में हास्य कलाकार राजकुमार हनेरा, पुरुषोत्तम पदम, कोरियोग्राफर पवन कुमार, सतविन्दर कौर, अमरीक रंधावा, सतपाल वर्मा, मोना, हरिन्दर सिंह व तेजिन्दर गरचा भी मौजूद थे।
सौजन्य-जागरण

आवाज से उम्र, जेंडर बता देगा कंप्यूटर

छत्तीसगढ़ के रुंगटा कॉलेज की प्रो। रितु तिवारी ने ऐसा कंप्यूटर सॉफ्टवेयर तैयार किया है, जो आवाज सुनते ही बता देता है कि वह महिला की आवाज है या पुरुष की। उम्मीद जताई जा रही है कि थोड़े और सुधार के बाद सॉफ्टवेयर जेंडर के अलावा बोलने वाले व्यक्ति की उम्र, वजन और ऊंचाई का भी अंदाज लगा लेगा। प्रो. तिवारी ने एएनएन (आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क) नामक यह सॉफ्टवेयर इलेक्ट्रॉनिक्स एंड टेलीकम्युनिकेशन डिपार्टमेंट की टीम के सहयोग से डेढ़ साल में तैयार किया है। प्रो। तिवारी के अनुसार किसी व्यक्ति की लंबाई, उम्र, वजन और जेंडर का आवाज पर असर पड़ता है। पुरुष और महिला की आवाज की तरंगों में भी अंतर होता है। आवाज उत्पन्न करने के लिए खर्च की गई ऊर्जा भी अलग-अलग होती है। यह सॉफ्टवेयर इन सभी पहलुओं का विश्लेषण कर अंतर पता करता है। प्रो. तिवारी के मुताबिक मैटलैब सॉफ्टवेयर के 7.1 वर्जन में माइक्रोफोन से रिकॉर्ड की गई आवाज के विश्लेषण के लिए सॉफ्टवेयर खास तकनीक इस्तेमाल करता है। लैब में लगातार किए गए परीक्षणों में इसके सटीक नतीजे मिले हैं। जल्द ही यह आम लोगों के लिए मुहैया होगा। इसमें और सुधार कर भविष्य में आपराधिक मामलों की जांच में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। भिलाई की टेक्निकल यूनिवर्सिटी ने इस बारे में तैयार शोधपत्र का प्रकाशन किया है।
सौजन्य-भास्कर

Friday

पत्रकारों की सुरक्षा

रॉयटर्स के कैमरामैन फदल शना की मौत ने युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में काम कर रहे पत्रकारों की मुश्किलों की ओर एक बार फिर दुनिया का ध्यान खींचा है। शना गाजा पर इस्त्राइली टैंक के हमले की तस्वीर खींच रहे थे, लेकिन दुर्भाग्यवश खुद इस हमले का शिकार हो गए। आज फिलिस्तीन ही नहीं इराक और अफगानिस्तान जैसे देशों में भी दुनिया भर के सैकड़ों पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर वहां के हालात की खबर पूरी दुनिया को देने में जुटे हैं। हाल के सालों में कई पत्रकारों ने वहां ड्यूटी करते हुए अपनी जान गंवा दी। पश्चिमी तट और गाजा पट्टी में वर्ष 2000 से लेकर अब तक नौ जर्नलिस्ट मारे गए, कई घायल हुए। कई बार तो सैनिकों ने जानबूझकर पत्रकारों को निशाना बनाया। कुछ पत्रकारों को तो संदेह के आधार पर पकड़ लिया गया। एपी के फोटोग्राफर बिलाल हुसेन दो साल से अमेरिकी नौसेना की कैद में थे। उन्हें अब जाकर रिहा किया गया है। अनुमान है कि इराक में युद्ध शुरू होने से लेकर अब तक वहां सवा सौ से भी ज्यादा पत्रकार मारे जा चुके हैं। इनमें ज्यादातर इराकी हैं लेकिन यूरोपीय और अमेरिकियों की भी संख्या कम नहीं है। आक्रमणकारी देशों की सत्ता ऐसे पत्रकारों को पसंद नहीं करती जो तटस्थ होकर पूरी दुनिया को सच से वाकिफ कराना चाहते हैं। इन देशों का नेतृत्व वर्ग चाहता है कि ये पत्रकार उसी की नजर से घटना को देखें। इसलिए उनकी सरकारें अपने देश के चुने हुए जर्नलिस्ट को पर्याप्त सुरक्षा और संरक्षण में युद्ध क्षेत्र में ले जाती हैं। उन पत्रकारों को सीमित जानकारी दी जाती है। इस तरह उतना ही कुछ उजागर हो पाता है जितना ये सरकारें चाहती हैं। बाकी पत्रकारों की इन्हें परवाह नहीं है। एक तरफ ये देश जनतंत्र की हिमायत करते हैं लेकिन इनमें इतनी उदारता नहीं कि सारे पत्रकारों को समान भाव से सुरक्षा प्रदान करें। आखिर पूरी दुनिया को यह जानने का हक है कि उन क्षेत्रों में क्या कुछ हो रहा है। पत्रकारों की सुरक्षा का दायित्व हर देश पर है और इस मामले में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। मीडिया के लिए युद्ध क्षेत्र में विशेष व्यवस्था की जानी चाहिए। वैसे तो सिविल नागरिकों की हिफाजत के लिए कई तरह के नियम बने हुए हैं, पर मीडिया के लिए इन कायदे-कानूनों से आगे बढ़कर भी कोई व्यवस्था करने की जरूरत है और इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तत्काल कोई पहल की जानी चाहिए।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स

हादसों की रफ्तार

गुजरात में नर्मदा नहर में बस गिरने से 40 से अधिक स्कूली छात्रों की मौत एक स्तब्ध करने वाली घटना है। ये सभी छात्र 12 से 15 वर्ष की उम्र के थे और राज्य परिवहन निगम की बस से परीक्षा देने जा रहे थे। नियति को कुछ और ही मंजूर था, लेकिन इस हादसे को अन्य अनेक ऐसी ही घटनाओं की तरह से महज एक दुर्घटना नहीं कहा जा सकता। विडंबना यह है कि हमारे देश में मार्ग दुर्घटनाओं को नियति मानकर कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है अथवा बहुत हुआ तो शोक संवेदनाएं प्रकट कर दी जाती है। चुनिंदा मामलों में जांच के आदेश दे दिए जाते है और कभी-कभी दुर्घटना का शिकार हुए लोगों के परिजनों को मुआवजे की घोषणा कर दी जाती है। आमतौर पर यह सब कुछ दुर्घटना में मारे गए लोगों की संख्या पर निर्भर करता है। शायद ही कभी स्थानीय प्रशासन अथवा राज्य सरकारे मार्ग दुर्घटनाओं में चार-छह-दस लोगों की मौतों पर ध्यान देती हों। भले ही गुजरात के बस हादसे की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए गए हों, लेकिन जांच के नतीजों से शायद ही कोई सबक सीखा जाए। दरअसल यह एक राष्ट्रीय प्रवृत्तिबन चुकी है और शायद यही कारण है कि भारत उन देशों में लगभग शीर्ष पर है जहां सड़क दुर्घटनाओं में सबसे ज्यादा लोग मारे जाते है। एक अनुमान के अनुसार देश में सड़क हादसों में प्रतिवर्ष एक लाख से अधिक लोग असमय काल के गाल में समा जाते है। सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए ज्यादातर लोग युवा अथवा अपने घर-परिवार के कमाऊ सदस्य होते है। स्पष्ट है कि जब ऐसे लोग मार्ग दुर्घटना का शिकार बनते है तो संबंधित परिवार के साथ-साथ किसी न किसी स्तर पर समाज और राष्ट्र को भी क्षति उठानी पड़ती है। समस्या यह है कि इस क्षति से अवगत होने के बावजूद सड़क दुर्घटनाओं को कम करने के प्रयास किसी भी स्तर पर नहीं हो रहे है।
गुजरात बस हादसे की जांच चाहे जिस नतीजे पर पहुंचे, यह किसी से छिपा नहीं कि मार्ग दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार और चिह्नित किए जा चुके कारणों का निवारण करने से बचा जा रहा है। न तो यातायात को सुचारु रूप से चलाने की कोई व्यवस्था बन पा रही है और न ही खटारा वाहनों से छुटकारा पाने की। वाहन चालकों की दक्षता पर ध्यान देने की भी कोई जरूरत नहीं समझी जा रही। गुजरात में जो बस दुर्घटना का शिकार बनी वह एक तरह से खटारा ही थी। यह बस आठ लाख किलोमीटर का सफर तय कर चुकी थी और फिर भी राज्य परिवहन निगम के बेड़े में शामिल थी। खटारा वाहनों के संदर्भ में यह भी ध्यान रहे कि उनकी देखरेख के नाम पर खानापूरी ही अधिक होती है। कुछ राज्यों में तो परिवहन निगम की ज्यादातर बसें जैसे-तैसे चलने की हालत में होती है। बात केवल परिवहन निगम की बसों की ही नहीं, बल्कि अन्य अनेक निजी अथवा सरकारी वाहनों की भी है। गुजरात की बस दुर्घटना यह भी बता रही है कि किस तरह स्कूली बच्चों को आवागमन के सही साधन उपलब्ध नहीं है। यह भी कम चिंताजनक नहीं कि जहां छात्रों को आवागमन की कोई निश्चित सुविधा प्राप्त है वहां भी वह संतोषजनक नहीं है। आखिर यह एक तथ्य है कि जब-तब स्कूली बसें तरह-तरह के हादसों का शिकार बनती रहती है। क्या यह उम्मीद की जाए कि गुजरात की घटना हमारे नीति-नियंताओं को कोई सबक सिखा सकेगी?
संपादकीय- जागरण

विडंबनाओं की मशाल

आजादी की मशाल के सामने ओलिंपिक खेलों की मशाल फीकी पड़ गई। भारत के लिए तो यह चुनौतियों की मशाल ही साबित हुई। तिब्बती प्रदर्शनकारियों और ओलिंपिक मशाल की सुरक्षा के बीच संतुलन बैठाने के चक्कर में नई दिल्ली को पसीने छूट गए। 2008 के बीजिंग ओलिंपिक का उत्सव भारत के लिए रस्म अदायगी से ज्यादा नहीं साबित हुआ।
महज दो किलोमीटर की अति सुरक्षित दौड़ ओलिंपिक खेलों के संदर्भ में एक मजाक लगती है। उस पर भी इसमें दौड़ने वाले खिलाड़ी और अन्य लोग अंतिम क्षण तक अपने को इस आयोजन से अलग करने में ही व्यस्त रहे। सुरक्षा कर्मियों और मीडिया कर्मियों के अलावा कोई साधारण दर्शक इस ऐतिहासिक और महान आयोजन का गवाह नहीं बन सका। राजधानीवासी यह सवाल पूछते ही रह गए कि जब इसी तरह सबसे छिप-छिपाकर सबकुछ करना था, तो ओलिंपिक मशाल को भारत लाने की जरूरत ही क्या थी?
चीन ने बड़े सुनियोजित ढंग से अपने ओलिंपिक आयोजन के अवसर को डिजाइन किया था। पूरी दुनिया में मशाल दौड़ के जरिए वह अपने शौर्य, सामथ्र्य और समृद्धि का जो प्रदर्शन करना चाहता था वह तिब्बत मुद्दे के पुनर्जीवन में तब्दील होकर रह गया। ‘सौहार्द की मशाल यात्रा’ प्रतिरोध और प्रतिकार की यात्रा बनकर रह गई।
तिब्बत का मुद्दा जितना प्रचारित और प्रासंगिक आज लग रहा है, उतना तो यह उस समय भी नहीं लग रहा था जब चीन ने अपनी लाल सेना के जरिए इसका अधिग्रहण किया था। इस अर्थ में यह अवसर निर्वासित तिब्बतियों के लिए नैतिक विजय का अवसर सिद्ध हुआ। भारत सरकार इस बात पर संतोष कर सकती है कि उसने बिना अपनी लाठी तोड़े सांप को मर जाने दिया। मतलब यह कि महत्वपूर्ण और जिम्मेदार देश होने के नाते उसने अपने यहां मशाल दौड़ भी करवा दी और लोकतांत्रिक देश होने के नाते तिब्बतियों के प्रदर्शन करने के जनवादी अधिकार का सम्मान भी बना रहने दिया।
इस कठिन संतुलन के माध्यम से भारत ने बेशक अपनी नैतिक-भौतिक जिम्मेदारियों से मुक्ति पा ली हो, पर चीन की मुसीबतें ओलिंपिक खेलों के बीजिंग में संपन्न होने तक बनी रहेंगी। लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी बात यह है कि मास्को ओलिंपिक और लांस एंजेल्स ओलिंपिक से खेलों के इस महाकुंभ की जो विडंबनात्मक नियति सामने आई वह बीजिंग ओलिंपिक के साथ और घनीभूत हो गई।
संपादकीय-भास्कर

Thursday

मौत के बाद भी सौगात दे गई मासूम

दुनिया में आने वाले हर शख्स की मौत निश्चित है लेकिन कुछ लोग मरने के बाद भी दूसरों को खुशी की सौगात देकर अपना नाम अमर कर जाते हैं। नन्हीं विदुषी के साथ भी कुछ ऐसा हुआ। वाराणसी के सेंट जांस स्कूल मडौली में एलकेजी की इस बच्ची की विगत 6 फरवरी को स्कूल के गेट के सामने स्कूल की ही बस से कुचल कर मौत हो गई थी। बच्ची के पिता उत्पल उपाध्याय की पहल पर सेंट जांस स्कूल के प्रबन्धन ने विदुषी की याद स्मृति को अक्षुण बनाए रखने के लिए शिवी अग्रवाल नामक लड़की को गोद लेने की घोषणा की और उसकी फीस, ड्रेस, किताब, कापी, टिफिन व ट्रांसपोर्ट तथा 12वीं तक की पढ़ाई फ्री करने की व्यवस्था की। सारनाथ क्षेत्र के नारायण बिहार की शिवी के पिता कुलभूषण अग्रवाल की मलदहिया में 27 जुलाई 2007 को बदमाशों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। जिसके चलते शिवी के परिवार की आथिक स्थिति काफी खराब हो गई थी। शिवी के परिवार वाले विदुषी के पिता उत्पल उपाध्याय से मिले एवं बातचीत की। विदुषी की मृत्यु के बाद उत्पल उपाध्याय की स्कूल प्रशासन के साथ कुछ प्रमुख बातें तय हुई थीं। इसी के अन्तर्गत उन्होंने शिवी को स्कूल में प्रवेश के लिए सुझाया। सेंट जांस के प्रधानाचार्य से कल विदुषी के पिता एवं शिवी की मां शुभी अग्रवाल मिले। प्रधानाचार्य ने शिवी को गोद लेने की घोषणा की।
सौजन्य-वार्ता

पत्रकार जावेद खान की सड़क हादसे में मौत

छत्तीसगढ़ के जगदलपुर के निकट १७ अप्रैल की सुबह हुई सड़क दुर्घटना में बिलासपुर के एक पत्रकार एवं एक प्रेसकर्मी की मौत हो गई तथा दो अन्य घायल हो गए। बिलासपुर के हिन्दी दैनिक नवभारत के सहायक संपादक जावेद खान अपने दो प्रेस सहयोगियों के साथ संघ के कार्यक्रम में भाग लेने बस्तर जा रहे थे। जगदलपुर से आठ किमी पूर्व घाट लोहंगा के पास वाहन के अनियंत्रित होकर पेड़ से टकरा जाने से यह दुर्घटना हुई। वरिष्ठ पत्रकार श्री खान तथा नवभारत के कर्मचारी दिलहरण मानिकपुरी की घटनास्थल पर ही मौत हो गई।

ऐसी सजा किसी को भी न मिले

बिलासपुर. धार्मिक उन्माद की आग में झुलस रहे बोड़सरा में एक ऐसी घटना भी हुई, जो किसी भी इंसान की मानवीय संवेदनाओं को झकझोरकर रख दे। बीमारी से जूझते हुए दो माह से खाट पर पड़ी अधेड़ महिला चार दिनों तक केवल पानी के सहारे जिंदा रही। लाठीचार्ज के बाद भागते समय उसका पति घर में बाहर से ताला लगाकर चला गया। बुधवार को सर्वे कर रहे प्रशासन के दल ने उसे बाहर निकालकर अस्पताल पहुंचाया।
बीमार पड़ी प्यारी बाई के लिए 12 अप्रैल की शाम मुसीबतों का पहाड़ लेकर आई। वह अपने पति के साथ बोड़सरा में रहती थी। पैर में तेज दर्द और सूजन की वजह से लगभग दो माह से वह बिस्तर पर ही पड़ी थी। शनिवार को बोड़सरा मेला-स्थल से निकाले गए जुलूस में उसका पति भी शामिल हुआ। बलवा के बाद पुलिस आरोपियों को तलाशने लगी। गिरफ्तारी के डर से उसका पति घर में बाहर से ताला लगाकर भाग खड़ा हुआ।
महिला घर के भीतर ही थी। वह चल फिर भी नहीं सकती थी। पहले दिन महिला ने गांव वालों को दरवाजा खोलने के लिए पुकारा, लेकिन सूने गांव में उसकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं था। घर में भोजन के नाम पर कुछ भी नहीं था। एक बर्तन में पानी रखा था। पानी के सहारे ही उसने चार दिन गुजार दिए। पहले से ही बीमारी से जुझ रही महिला काफी कमजोर हो गई और तेज आवाज में पुकारने का दम भी उसमें नहीं बचा। उसकी हालत बिगड़ती ही गई। आज दोपहर बिल्हा तहसीलदार मरकाम कुछ पटवारियों के साथ बोड़सरा में हुए नुकसान का जायजा लेने के लिए सर्वे कर रहे थे। तभी उन्हें एक घर के भीतर से किसी महिला के कराहने की आवाज सुनाई दी। ध्यान से सुनने पर पता चला कि आवाज जिस घर से आ रही है, उसमें बाहर से ताला लगा हुआ है। घर का ताला तुड़वाकर जब वे अंदर पहुंचे, तो प्यारी बाई बिस्तर में गंभीर हालत में पड़ी हुई थी। काफी देर तक पूछने पर वह बमुश्किल जवाब दे पाई कि पिछले चार दिनों से उसके पेट में अन्न का एक दाना भी नहीं गया है। उसे तुरंत बोड़सरा के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भिजवाया गया। उसकी हालत को देखते हुए डाक्टरों ने तुरंत उसे ग्लूकोज चढ़ाकर प्राथमिक उपचार किया। इसके बाद तत्काल उसे सिम्स रिफर कर दिया गया।
साभारःभास्कर

कुनबे की सियासत

कांग्रेस की तरफ से यह साफ कर दिया गया है कि न तो गांधी परिवार को चाटुकारिता पसंद है और न ही प्राइम मिनिस्टर का पद खाली है। लेकिन राहुल गांधी को पीएम बनाए जाने की मांग के साथ जो मुद्दे उठ खड़े हुए हैं, उनका जवाब मिलना अब भी बाकी है। सवाल कई हैं, जैसे कि यह मांग क्यों उठी, जबकि राहुल मंत्री पद लेने तक से इनकार कर चुके हैं? क्या कांग्रेस (यूपीए) को पीएम पद के लिए एक नए नाम की जरूरत है, जबकि इलेक्शन में अभी साल भर की देरी तो है ही? क्या इस मांग को मौजूदा पीएम मनमोहन सिंह के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नहीं माना जाना चाहिए? क्या राहुल गांधी के नाम से ऐसा जादू हो जाएगा कि कांग्रेस और यूपीए की किस्मत चमक जाए? क्या यह चाटुकारिता का ही लेटेस्ट नमूना है, जिसने वंशवाद को कांग्रेस में पूरी तरह प्रतिष्ठित कर दिया है? या फिर यह कांग्रेस और यूपीए की अंदरूनी सियासत का कोई दांव है? जाहिर है, ये सवाल ऐसे हैं कि इन पर अंतहीन बहस चल सकती है। उस बहस को लेकर इस देश में उत्साह की भी कोई कमी नहीं रहने वाली। हो तो यह भी सकता है कि बहस चलाना ही किसी का मकसद रहा हो। लेकिन यह बहस कांग्रेस को एक खतरनाक मोड़ की तरफ ले जा सकती थी। चाटुकारिता बीच बाजार में अच्छी नहीं लगती। वंशवाद का आरोप शर्मिंदगी पैदा करता है। और सबसे बड़ी बात यह कि इससे सरकार के मुखिया पर छींटे पड़ते हैं, जो कि चुनावों को लेकर गरमाते माहौल में कोई अच्छी बात नहीं। इससे सरकार की इज्जत और लीडरशिप की साख आलोचना के दायरे में आ जाती है, यानी यह अपने विरोधियों की बंदूकों में खुद बारूद भर देने जैसी बात है। कांग्रेस की निगाह से यह खतरा छिपा नहीं रह सकता था, लिहाजा सीनियर नेताओं को फटकारने के अंदाज में और कुनबे में खटपट का खतरा उठाते हुए स्थिति संभालने की कोशिश की गई। यह कोशिश तकनीकी तौर पर सही थी, लेकिन सियासत का अनुभव तो यही बताता है कि राहुल गांधी के लिए लामबंदी न तो खत्म होगी और न ही उनका फैन क्लब ऐसी फटकार से ज्यादा हतोत्साहित होगा। फटकार वक्ती है, जबकि युवराज के मनोनयन के लिए मौन सहमति हमेशा रहती है। कांग्रेस कुल मिलाकर कांग्रेस ही रहेगी और अपनी संस्कृति से बाहर नहीं निकलेगी, हालांकि इसे लेकर सवाल भी उसका पीछा नहीं छोड़ेंगे। हम समझते हैं कि कांग्रेस को अपना नजरिया वाकई उदार बनाना चाहिए। उसे अपने भीतर लीडरशिप के सवाल को खुला रखने का साहस जुटाना चाहिए। हो सकता है कि नेतृत्व की विविधता उसे बेहतर और ताकतवर पार्टी बनाए। देश की सबसे बड़ी पार्टी खुद वंशवाद के आरोप से घिरे रहे, यह गर्व करने की बात तो नहीं। फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस तरह का आत्मघाती माहौल रचने के बजाय कांग्रेस के नेता पार्टी को मजबूत बनाने के सूत्र क्यों नहीं सुझाते? यूपी-बिहार में कांग्रेस को मजबूत करने की कवायद राहुल गांधी के रोड शोज से आगे क्यों नहीं बढ़ी? सारा माजरा क्या कहता है? सूत न कपास, जुलाहों में लठ्ठमलठ्ठ।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स

महंगाई से हारती सरकार

संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण के पहले दिन महंगाई पर जिस तरह जबरदस्त हंगामा हुआ और दूसरे दिन सरकार की जमकर खिंचाई हुई उससे यह साफ है कि मूल्य वृद्धि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई है। संप्रग सरकार के लिए यह विशेष चिंता का कारण बनना चाहिए कि महंगाई पर विरोधी दलों के साथ-साथ उसके सहयोगी दल भी उसके खिलाफ खुलकर खड़े हो गए हैं। विडंबना यह है कि महंगाई के मामले में संसद और संसद के बाहर निंदित एवं लांछित होने के बाद भी वह ऐसे व्यवहार कर रही है जैसे उसे इसका अहसास ही नहीं कि आवश्यक वस्तुओं के बढ़ते मूल्य आम आदमी के लिए कितने कष्टकारी साबित हो रहे हैं? आखिर ऐसे आचरण को संवेदनहीनता नहीं तो और क्या कहेंगे? संसद में विपक्ष और वाम दलों के समक्ष निरुत्तर रहने के बाद वित्तमंत्री चिदंबरम और कृषिमंत्री शरद पवार ने महंगाई रोकने के उपायों की जिस तरह एक और किश्त पेश की उससे तो यह लगता है कि सरकार अपनी आलोचना की प्रतीक्षा कर रही थी। आखिर प्रधानमंत्री को महंगाई पर मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाने का विचार इसके पहले क्यों नहीं आया? क्या कारण है कि अभी तक खाद्य तेल और दालों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये वितरित करने तथा वायदा कारोबार पर विचार करने की जरूरत नहीं समझी गई? भले ही उफनती महंगाई के पीछे एक कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति हो, लेकिन इस पर संदेह नहीं कि उसमें कहीं न कहीं सरकार की अदूरदर्शिता का भी योगदान है। यदि संप्रग सरकार ने महंगाई पर लगाम लगाने के लिए समय रहते सख्त कदम उठाए होते तो हालात इतने खराब नहीं होते। दुर्भाग्य से अर्थशास्त्रियों के प्रभुत्व वाली संप्रग सरकार एक ऐसी केंद्रीय सत्ता है जिसे मूल्य वृद्धि की जानकारी तब तक नहीं होती जब तक मुद्रास्फीति के आंकड़े सामने नहीं आते। इसमें संदेह है कि ये सरकारी अर्थशास्त्री इस सामान्य तथ्य से परिचित होंगे कि मुद्रास्फीति के आंकड़े महंगाई की सही तस्वीर प्रस्तुत नहीं करते। महंगाई के बढ़ते चले जाने से कहीं अधिक क्षुब्ध करने वाली बात यह है कि केंद्रीय सत्ता को अपनी कहीं कोई गलती नहीं नजर आती। वह कभी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में खाद्यान्न के बढ़ते दामों की दुहाई देती है और कभी जादू की छड़ी न होने का जुमला उछाल कर जले पर नमक छिड़कती है। अब वह महंगाई रोकने में राज्य सरकारों को उनकी भूमिका की याद दिलाते हुए उनसे अपील कर रही है। सबसे खराब बात यह है कि वह जमाखोरों और कालाबाजारियों के साथ-साथ कुछ वस्तुओं के उत्पादकों के समक्ष असहाय नजर आ रही है। वित्तमंत्री ने स्टील और सीमेंट के उत्पादकों के अनुचित रवैये का जो उल्लेख किया वह केंद्रीय सत्ता केशासन करने की क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाने के लिए पर्याप्त है। यदि यह सरकार महंगाई बढ़ाने वाले ज्ञात कारणों का निवारण करने में भी समर्थ नहीं तो फिर इसका सीधा अर्थ है कि या तो उसे शासन करना नहीं आता या फिर उसने सब कुछ बाजार के हवाले करके कर्तव्य की इतिश्री कर ली है। गत दिवस संसद के दोनों सदनों में वाम दलों ने महंगाई रोकने में नाकाम संप्रग सरकार पर जैसे करारे प्रहार किए उसके बाद तो यही शेष रह जाता है कि वे समर्थन वापसी की घोषणा कर दें। वे ऐसा शायद ही करें। जो भी हो, केंद्र सरकार के रवैये से यह नहीं लगता कि वह महंगाई पर रोक लगा सकेगी।

संपादकीय- जागरण

सड़क हादसों की अंतहीन दौड़

देशभर से लगभग रोज दर्जनों लोगों की सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाने की खबरें आती रहती हैं। अफसोस की बात यह है कि मीडिया में इन खबरों का महत्व तब तक नहीं होता जब तक मृतकों में कोई विशिष्ट न हो या मृतकों की संख्या बहुत ज्यादा न हो। बुधवार को बड़ौदा में हुई बस दुर्घटना में मासूम बच्चों की मौत दोनों ही पैमानों पर एक बड़ी और दुखद खबर है। यह एक संकेत भी है कि अगला शिकार कोई हमारा अपना भी हो सकता है।
सड़क दुर्घटनाओं के कारणों में प्रमुख है गाड़ी चलाने वालों की अकुशलता और असावधानी। सड़कों के हालात को भी कुछ हद तक जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, पर जिस आसानी से अपात्र लोग भी ड्राइविंग लाइसेंस बनाकर स्टाइलिश मोटर साइकिल, कार चलाते हैं उससे तो वह अपनी जिंदगी खतरे में डालते ही हैं। इसी तरह गलत तरीके से बने लाइसेंस लेकर जब कोई बस या ट्रक चलाता है तो वह औरों की जिंदगी से खिलवाड़ करता है।
जिस तरह देश में सड़कों की स्थिति में सुधार हो रहा है, जिस तरह आसान ऋण लेकर लोग कार, मोटर साइकिल और बड़े वाहन खरीद रहे हैं, क्या उसी तरह से ड्राइविंग लाइसेंस और सड़क सुरक्षा को लेकर प्रयास किए गए? क्या ऐसा लगता है कि प्रशासन तंत्र में किसी को भी सड़क सुरक्षा के प्रति कोई चिंता है? लगता है हर दुर्घटना के बाद जांच करने और मुआवजा देने के अलावा प्रशासन का कोई कर्तव्य रह ही नहीं गया है।
एक और चिंताजनक पहलू है ऐसी दुर्घटनाओं के बाद पुलिस और अन्य एजेंसियों द्वारा घायलों को चिकित्सा दिलाने की बजाय कानूनी दांवपेंच में मूल्यवान समय नष्ट करना। कितने ही मामले ऐसे आते हैं कि दुर्घटना में घायल व्यक्ति सड़क पर पड़ा तड़पता रहा और पुलिस, थाने के सीमा विवाद में उलझी रही।
क्या वे पुलिस वाले तब भी यही करते जब उनके अपने परिवार का कोई दुर्घटनाग्रस्त हुआ होता? अफसोस तो यही है कि शासन और प्रशासन में शामिल लोगों के लिए उस तंत्र के बाहर लोग शायद मायने ही नहीं रखते हैं। वे अपने आप को ‘सरकार’ समझते हैं और बाकी को ‘पब्लिक।’ अगली किसी भी दुर्घटना में मृतक या घायलों में हमारे अपने भी हो सकते हैं। उस समय अपनी पीड़ा की कल्पना मात्र भी असहनीय है। देश भर में यदि ड्राइविंग लाइसेंस बनने से लेकर ड्राइविंग के तरीके सुधारने तक और सड़क दुर्घटनाओं में तुरंत सहायता की सुविधा प्रदान नहीं की गई तो हम अगली दुर्घटना पर फिर दुख जताने के अलावा कुछ नहीं कर पाएंगे।
संपादकीय-भास्कर

Wednesday

बाप ने किया ब्याहता बेटी से दुष्कर्म

पूर्वी दिल्ली- जिसकी गोदी में खेलकर बड़ी हुई, जिसकी उंगली पकड़कर आंगन में चलना सीखा, जिसके मुंह से पहला शब्द 'पापा' निकला, उसी बाप ने मौका पाकर एक दिन पवित्र रिश्तों को ठेंगा दिखाते हुए अपनी ही बेटी की इज्जत को तार-तार कर दिया। ऐसी घिनौनी घटना करावल नगर इलाके में सोमवार की रात हुई। यहां एक कामांध पिता ने अपनी ब्याहता बेटी के हाथ-पांव बांध, मुंह में कपड़ा ठूंस बंधक बना उससे दुष्कर्म किया। यह तो शुक्र रहा कि छोटी बहन ने पिता के इस कृत्य को देख लिया और तत्काल बड़ी बेटी के साथ अस्पताल गई मां को सूचित किया। मां की शिकायत पर पुलिस ने आरोपी पिता का गिरफ्तार कर लिया है।
जानकारी के अनुसार लालबाग सब्जी मंडी में फेरी लगाने वाला भीमसेन सपरिवार किराये के मकान में करावल नगर में रहता है। उसकी तीन बेटियां हैं। उसकी मंझली बेटी उन्नीस वर्षीय रीमा (परिवर्तित नाम) की पिछले साल 21 मई को शादी हुई थी। वह रविवार को ही मायके आई थी। उसकी बड़ी बहन गर्भवती है और वह भी अभी मायके में ही है। सोमवार को उसकी मां उसकी बड़ी बहन को डाक्टर से दिखाने अस्पताल गई थी जहां डाक्टरों ने गर्भवती युवती को अस्पताल में भर्ती कर लिया। ऐसे में उसकी मां को भी अस्पताल में ही रुकना पड़ा गया। सोमवार की रात घर पर भीमसेन, उनकी मंझली बेटी रीमा व सोलह वर्षीय छोटी बेटी थी। रात में रीमा की छोटी बहन किसी काम से छत पर गई थी। इसी दौरान रीमा को अकेला पाकर भीमसेन ने उसके हाथ-पांव बांध, मुंह में कपड़ा ठूंस जबरन उससे दुष्कर्म करने लगा। उसी बीच भीमसेन की छोटी बेटी छत से आ गई तो पिता को बहन से दुष्कर्म करते देख उसके होश उड़ गए। उसने तुरंत मोबाइल फोन से इसकी सूचना अपनी मां को दी। अगले दिन यानी मंगलवार की सुबह उसकी मां स्थानीय थाने में घटना की सूचना दी। पुलिस ने महिला की शिकायत पर भीमसेन को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस मामले की जांच कर रही है।
साभारःजागरण

मूर्ति और माया

यूपी की मुख्यमंत्री मायावती द्वारा अपनी ही मूर्ति के अनावरण को एक तबका उनके एक और राजनीतिक ड्रामे के रूप में देख सकता है। लेकिन मायावती की आलोचना करने या हंसी उड़ाने से पहले हमें दलित राजनीति के द्वंद्व को समझना होगा। दलित राजनीति दरअसल दो अजेंडे पर एक साथ काम करती है। एक तो राजनीतिक, दूसरा सामाजिक, हालांकि एक अर्थ में दोनों एक-दूसरे के पूरक भी हैं। दलितों को राजनीति में भागीदारी दिलाने के साथ उन्हें सामाजिक स्तर पर शेष समाज के समकक्ष खड़ा करना भी दलित नेतृत्व का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य रहा है। दलितों का समर्थ वर्ग हर स्तर पर सवर्ण की बराबरी करना या उन्हें मात देना चाहता है। इसके लिए वह उनके रीति-रिवाज, चाल-चलन को अपनाने की कोशिश करता है। जानेमाने समाजशास्त्री एम। एन. श्रीनिवास ने इस प्रवृत्ति को 'संस्कृताइजेशन' कहा था। असल में ऐसा करके दलित समुदाय यह साबित करना चाहता है कि वह किसी भी स्तर पर कमजोर नहीं है। शायद यही वजह है कि बाबासाहेब आम्बेडकर ने हमेशा आधुनिक शिक्षा, रहन-सहन और पहनावे-ओढ़ा़वे की वकालत की। उन्हें लगता था कि इन्हें अपनाकर ही दलित तबका समाज की मुख्यधारा में जगह बना सकता है। समय ने साबित किया कि आम्बेडकर की सोच कितनी सही थी। इस सोच का विस्तार आज कई रूपों में हुआ है, जो कई लेवल पर अतिवादी भी लग सकता है। बीएसपी के संस्थापक कांशीराम मानते थे कि अगर किसी नेता का कद सचमुच बड़ा है तो उसके जीवनकाल में ही उसकी प्रतिमा लगाई जानी चाहिए। मूर्ति यह दर्शाएगी कि उस व्यक्ति ने जीवनकाल में ही असाधारण उपलब्धियां हासिल कर ली हैं। मायावती को लगता है कि उनका कद इस लायक हो गया है कि उनकी मूर्ति बन सके। उन्होंने अपने आप को देवी बताने में भी हिचकिचाहट नहीं महसूस की। उन्हें मंच पर नेताओं-कार्यकर्ताओं से पैर छुआना अच्छा लगा। उन्होंने सवर्ण राजनीति को शिकस्त देने के लिए उसके हर तौर-तरीके अपनाए। उन्होंने उनके नेताओं की तरह धन-संपत्ति अर्जित की, शानो-शौकत से रहना शुरू किया। दिलचस्प तो यह है कि उन्हीं की तरह मायावती पर भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे। इन सब से मायावती को संतोष हुआ होगा कि उन्होंने सवर्ण राजनीति को उसी की शैली में मात दी। बीएसपी समर्थक इसके लिए अपनी पीठ थपथपा सकते हैं कि उनकी पार्टी प्रचलित राजनीतिक संस्कृति के रंग में रंग गई या उसमें घुल-मिल गई। यह दलित राजनीति की सफलता तो हो सकती है, सार्थकता नहीं। उसकी सार्थकता तो तब होती जब मायावती की इमेज भी एक चमकदार नेता की होती। अगर उन्होंने चालू नारों, आक्रामक भाषा और धन-संपत्ति की बजाय अपने विचार और सादगी को हथियार बनाया होता तो शायद वह सवर्ण राजनीति पर निर्णायक प्रहार कर सकती थीं, पर वह ऐसा न कर सकीं। शायद उन्हें इस बात का अहसास है। इसलिए वह डरी रहती हैं कि उनका दलित वोट बैंक भी कोई छीन न ले। उनके बयानों में उनका यह भय झलकता रहता है। अपनी मूर्ति देखकर उनका अहं तुष्ट हुआ होगा पर अब वे अपने राज्य के लिए कुछ ठोस काम करके दिखाएं ताकि लोगों को लगे कि उनकी उपलब्धियां उनकी मूर्ति से बड़ी हैं।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स

देशहित में नहीं मुफ्ती की सलाह

केंद्र में गृहमंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर रह चुके मुफ्ती मोहम्मद सईद को पता होगा कि भारतीय गणराज्य में केंद्र व राज्यों के अधिकार और भूमिकाएं क्या हैं। जम्मू-कश्मीर राज्य को धारा 370 के तहत कुछ विशेष सहूलियतें जरूर प्राप्त हैं, लेकिन मनचाही मुद्रा चलाने का अधिकार दूसरे राज्यों की तरह उसे भी नहीं है।
फिर भी मुफ्ती साहब यह सलाह देते घूम रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर में भारत-पाकिस्तान दोनों देशों की मुद्राएं चलाई जानी चाहिए। मुफ्ती चूंकि राज्य के सत्ता-संचालन में भागीदार हैं, इसलिए सार्वजनिक रूप से दिए जाने वाले उनके वक्तव्य का राजनीतिक ही नहीं, कूटनीतिक महत्व भी बढ़ जाता है। अभी कुछ दिन पहले राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस-पीडीपी गठबंधन सरकार के वित्तमंत्री जम्मू-कश्मीर के लिए अलग से अपनी मुद्रा चलाने का सुझाव देकर गंभीर विवाद को जन्म दे चुके हैं।
इसके ठीक बाद पीडीपी के संरक्षक मुफ्ती मोहम्मद सईद का भी इसी से मिलता-जुलता बयान आना एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा माना जाएगा। मुफ्ती की बेटी और पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती भी पाकिस्तान के पत्रकार सम्मेलन में जम्मू-कश्मीर को भारत-पाकिस्तान द्वारा संयुक्त रूप से नियंत्रित करने और इसके लिए साझा क्षेत्रीय परिषद बनाने का विवादास्पद प्रस्ताव कर चुकी हैं।
आतंकवाद और अलगाववाद से त्रस्त जम्मू-कश्मीर के लोकतांत्रिक नेता भी यदि अलगाववादियों जैसी बातें करने लगेंगे, तो इसे दुर्भाग्य ही माना जाएगा। इस्लामी जेहादियों का सिर्फ एक ही घोषित मकसद है-जम्मू-कश्मीर को भारत के कथित चंगुल से आजाद कराना। इसके लिए सीमापार से आतंकवादी घुसपैठियों का हुजूम लगातार यहां आता रहा है और जम्मू-कश्मीर के अलावा देश के दूसरे हिस्सों में भी आतंक फैलता रहा है।
ऐसी स्थिति में समझा जा सकता है कि दोनों कश्मीर के लिए ‘फ्री ट्रेड’ और निर्बाध आवाजाही का रणनीतिक लाभ किसको मिलेगा! श्रीनगर और मुजफ्फराबाद की जमीनी हकीकत न तो सार्क संगठन जैसी है और न ही यूरोपीय संघ जैसी। फिर उसके जैसे मॉडल यहां लागू करने की दलील देने का तुक समझ में नहीं आता है? क्षेत्रीय पार्टियों और उसके नेताओं का यह स्वाभाविक संकट होता है कि वे अक्सर राष्ट्रीय हितों की अनदेखी कर जाते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं किसी को देश के संविधान और सीमाई संप्रभुत्ता के विरुद्ध बयानबाजी की छूट दी जा सकती है।
संपादकीय-भास्कर

सिफारिशों में संशोधन

छठे वेतन आयोग की रपट की जांच-परख के लिए कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन यह संकेत देता है कि केंद्र सरकार विभिन्न कर्मचारी संगठनों की आपत्तियों पर गौर करने के लिए तैयार है। आईपीएस, आईएफएस, आईआईएस और सैन्य अधिकारियों समेत केंद्रीय कर्मचारियों के विभिन्न संगठनों की नाराजगी देखते हुए इस पर विचार करना उचित ही है कि कहीं वेतन आयोग की अनुशंसाओं में विसंगतियां तो नहीं? यह विचित्र है कि तमाम आपत्तियों से अवगत होने के बावजूद वेतन आयोग अपनी सिफारिशों में तनिक भी फेरबदल के लिए सहमत नहीं। वेतन आयोग अपनी सिफारिशों को लेकर जिस तरह दृढ़ नजर आ रहा है उससे तो यह लगता है जैसे उसने अंतिम सत्य का निर्धारण कर दिया है। क्या वास्तव में ऐसा है? यदि उसकी सिफारिशें इतनी ही नीर-क्षीर हैं तो फिर उनसे कोई भी सहमत क्यों नहीं दिखता? क्या कारण है कि केंद्रीय कर्मचारियों के अनेक संगठनों के साथ-साथ रक्षामंत्री एके एंटनी और रेलमंत्री लालू यादव भी वेतन आयोग की सिफारिशों में बदलाव के इच्छुक हैं? इस संदर्भ में इन दोनों मंत्रियों द्वारा प्रधानमंत्री से अपनी चिंता व्यक्त करना सामान्य बात नहीं। यह भी सामान्य घटनाक्रम नहीं कि आईपीएस सेवा के अधिकारियों ने अपना दु:खड़ा सोनिया गांधी के समक्ष रोया। जहां वेतन आयोग की सिफारिशों के संदर्भ में आईपीएस अधिकारियों की मांग का अनेक राजनेताओं ने समर्थन किया है वहीं भारतीय सूचना सेवा के अधिकारियों ने इन सिफारिशों को तथ्यात्मक रूप से गलत ठहराया है। क्या इस सबकी अनदेखी कर दी जाए? इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या सेना के जवानों की निराशा को दूर करने की कोशिश न की जाए? वेतन आयोग को इससे अवगत होना ही चाहिए कि उसकी सिफारिशें सामने आते ही एक बड़ी संख्या में सैन्य अधिकारियों ने नौकरी छोड़ने की इच्छा व्यक्त की है।
नि:संदेह कोई भी वेतन आयोग सभी कर्मचारियों को संतुष्ट नहीं कर सकता, लेकिन आखिर ऐसी सिफारिशें किस काम की जिनसे कोई खुश ही न नजर आए? फिलहाल इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता कि कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली उच्चाधिकार प्राप्त समिति इस पर गौर करेगी या नहीं कि वेतन आयोग ने आईएएस अधिकारियों का कुछ ज्यादा ही ख्याल रखा है, लेकिन बेहतरी इसी में है कि किसी भी संवर्ग के अधिकारियों को अति विशिष्ट दर्जा देने से बचा जाए। आखिर आईएएस अधिकारियों की तुलना में आईपीएस, आईएफएस आदि सेवा के अधिकारियों को दोयम दर्जे पर रखने का क्या औचित्य? विभिन्न संवर्गो के बीच जानबूझकर भेदभाव करने का मतलब है प्रशासनिक तंत्र के एक बड़े वर्ग को कुंठा से भर देना। इससे न तो सरकार का हित होने वाला है और न ही समाज का। अब जब यह उम्मीद बंध रही है कि उच्चाधिकार प्राप्त समिति वेतन आयोग की सिफारिशों में कुछ न कुछ संशोधन करेगी तब यह आवश्यक हो जाता है कि अधिकारियों और कर्मचारियों की नाराजगी दूर करने के साथ ही इस पर भी ध्यान दिया जाए कि वे कैसे कार्यकुशल और जवाबदेह बनें? यदि संशोधित सिफारिशें आ जाती है और सरकारी कामकाज का ढर्रा जस का तस बना रहता है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण ही होगा।
संपादकीय- जागरण

Tuesday

‘अनाथ’ की विदाई में रो पड़ा गांव!


तिल्दा-नेवरा. छत्तीसगढ- 18 बरस की चंपा को यकीन ही नहीं था कि उस जैसी अनाथ को विदा करने पूरा गांव उमड़ पड़ेगा। रामनवमी के दिन जिस गांव की वह बेटी बन कर रही, उन्होंने बड़ी धूमधाम से उसकी शादी की। किसी ने पिता बनकर कन्यादान किया तो किसी ने मामा बनकर रस्म अदा की। और जब विदाई का वक्त आया तो हर किसी की आंखें छलक उठीं। दरअसल चंपा अनाथ होते हुए भी अकेली नहीं थी। 13 साल पहले जब वह महज पांच बरस की थी, उसके पिता दुखुराम यादव चल बसे। मां पांच साल की चंपा के जिम्मे चमेली, मोंगरा और केवरा को छोड़कर बिना बताए चली गई। वह कभी लौट कर नहीं आई। दो-तीन बरस की तीन छोटी बहनों को चंपा कैसे संभालती, उसे भी नहीं पता था। मां के गायब होने पर सिवा आंसू के कुछ नहीं बचा था। कई दिनों तक रिश्तेदारों ने भी उसके घर नहीं झांका। तब गांववालों ने चारों बहनों को पालने का बीड़ा उठाया। मोहनलाल चंद्रवंशी (70) ने बच्चियों की देखभाल का जिम्मा लिया। पूरा गांव उनके लिए माता-पिता बन गया। तीसरी तक चंपा ने पढ़ाई भी की। गांववालों ने काम दिया और उनकी जरूरतों को पूरा किया। जिंदगी की गाड़ी ऐसी ही चली और जब वह 18 साल की हुई तो गांव वालों ने ही उसके लिए पास के गांव सरारी में दूल्हा ढूंढ़ा। रामनवमी की तारीख तय हुई और दूल्हा गोवर्धन यादव बारात लेकर पहुंच गया। स्वागत में पूरा गांव खड़ा था। पहली बार ऐसा हुआ, जब किसी लड़की की विदाई में पूरा गांव रो रहा था। चंपा के आंसू तो थम नहीं रहे थे। उसे अपनी छोटी बहनों को छोड़कर जाते हुए काफी बेचैनी हो रही थी। तीनों बहनों को उसने मां की तरह पाला था। तीनों बहनें उसे ढाढस बंधा रहीं थी, कि उनकी चिंता न करे। उनकी चिंता करने के लिए पूरा गांव है। गांव का हर व्यक्ति उसे यही समझा रहा था। चंपा की विदाई के समय ऐसा कोई भी नहीं था जिनकी आंखों में आंसू नहीं थे।

साभारःभास्कर

नई रोशनी

इतिहास के किसी अंधेरे से निकलकर वर्तमान की रोशनी में आने वाला हरेक अध्याय हमारी जिज्ञासा को थोड़ा और झकझोरता है, साथ ही यह उम्मीद भी जगाता है कि हम अपने आदि पूर्वजों के जीवन के बारे में कुछ और जान सकेंगे। पिछले दिनों कोलकाता से करीब ढाई सौ किलोमीटर दूर सुसुनिया गांव में जो ऐतिहासिक अवशेष मिले हैं, उनहोंने हमारी इस खोज को थोड़ा और विस्तार दिया है। यहां खुदाई में आदिम अभिलेख और प्राचीन औजारों के अलावा जीवाश्म भी मिले हैं जो कुछ पालतू पशुओं, घोड़े, हिरन या उस नस्ल के दूसरे जानवरों के हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि ये सब करीब एक लाख पुराने हो सकते हैं। हालांकि वहां अब तक मनुष्य का कोई अवशेष नहीं मिला है पर खुदाई में जुटे विशेषज्ञों को विश्वास है कि उन्हें इस स्तर पर जल्दी ही सफलता मिलेगी। अब इस पूरे स्थल की व्यापक खुदाई की जाएगी। उत्खनन की अगुआई कर रहे जी। एल. बदम और प्रो. मणिब्रत भट्टाचार्जी मानते हैं कि इस स्थल पर दस हजार से एक लाख वर्ष पहले के बीच मनुष्य जीवन रहा होगा। यानी यह पैलियोलिथिक और मेसोलिथिक दौर के बीच की बात है। इसकी खासियत यह है कि यहां विभिन्न कालखंडों में रहने वाले लोगों के बीच एक सांस्कृतिक नैरंतर्य दिखाई देता है। सच कहा जाए तो यह अवशेष भारत में आदि मानव के आगमन और उसके रहन-सहन को लेकर अब तक की धारणा को चुनौती देता है। अगर यह वाकई एक लाख साल पहले का है, तो हमें कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता माइकल पेट्राग्लिया और हन्ना जेम्स के निष्कर्ष पर पुनर्विचार करना होगा, जिन्होंने कहा था कि 70 हजार साल पहले आधुनिक (एंथ्रोपोलॉजी के संदर्भ में) मानव अफ्रीका से मध्य पूर्व होते हुए भारत पहुंचा था। गौरतलब है कि अफ्रीका में एक लाख नब्बे हजार साल पहले आधुनिक मानव के सामने आने की बात मानी जाती है। वहीं से वह पूरी दुनिया में फैला। इस तथ्य पर आम सहमति है। लेकिन उसके माइग्रेशन को लेकर कई थ्योरी प्रचलित हैं। नई-नई खोजें उन सिद्धांतों को ध्वस्त कर दे रही हैं। तो क्या सुसुनिया में जो कुछ भी मिल रहा है, वह भारतीय जीवन को नए सिरे से देखने की दृष्टि दे सकता है? हमारे आदि पूर्वजों के आगमन के बारे में नए तथ्यों के आने से कुछ खास विकसित सभ्यताओं के बारे में कायम हमारी मान्यताएं पूरी तरह बदल सकती हैं? विशेषज्ञों को चाहिए कि वे इस काम को अंजाम तक पहुंचाएं ताकि कोई निश्चित नतीजा निकल सके।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स

नई राह पर नेपाल

नेपाल में माओवादियों का विजय अभियान जिस तरह जारी है उससे उनका निर्णायक ताकत के रूप में उभरना तय है। संविधान सभा के लिए हुए चुनावों में माओवादियों का सबसे आगे रहना अप्रत्याशित अवश्य है, लेकिन उनकी सफलता यह स्पष्ट करती है कि मुख्यधारा के राजनीतिक दल और विशेष रूप से नेपाली कांग्रेस आम जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी। इसके लिए अन्य किसी को दोष नहीं दिया जा सकता। मुख्यधारा के राजनीतिक दल जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप कार्य करने के स्थान पर जिस तरह गुटबाजी में उलझे रहे उसे देखते हुए उनके हश्र पर आश्चर्य नहीं। यद्यपि अभी पूरे चुनाव परिणाम सामने आना शेष हैं, लेकिन माओवादियों की बढ़त के बाद दुनिया भर की निगाहें उन्हीं पर केंद्रित होना स्वाभाविक है। वैसे तो प्रचंड के नाम से विख्यात और साथ ही कुख्यात सीपीएन माओवादी दल के नेता पुष्प कमल दहल ने गठबंधन सरकार बनाने के संकेत दिए हैं और नेपाली कांग्रेस के साथ मिलकर काम करने की इच्छा भी व्यक्त की है, लेकिन उनके इरादों को लेकर संदेह बरकरार रहना स्वाभाविक है। इन संदेहों का कारण उनका अतीत है। माओवादी चाहते तो न जाने कब लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बन सकते थे, लेकिन ऐसा करने के बजाय उन्होंने सशस्त्र संघर्ष छेड़ा और फिर हिंसा और हत्याओं को जायज ठहराने के बाद लोकतंत्र के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया। क्या ऐसे हिंसाप्रेमी तत्व लोकतंत्र के प्रति वास्तव में प्रतिबद्ध रह सकेंगे? दरअसल यह वह सवाल है जिसका सवाल भविष्य के गर्भ में निहित है।
नेपाल के चुनावों से केवल ढाई सौ वर्ष पुरानी राजशाही के अंत पर मुहर ही नहीं लगी, बल्कि दुनिया के नक्शे से एक मात्र हिंदू राष्ट्र भी विदा हो गया। यदि इस देश मेंराजशाही प्रतीकात्मक रूप से भी अपना अस्तित्व नहीं बनाए रख सकी तो इसके लिए नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र जिम्मेदार हैं, जिन्होंने अपने आचरण से अपनी लोकप्रियता खत्म की। नेपाल के घटनाक्रम पर भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया कुछ भी हो, लेकिन यह सहज ही समझा जा सकता है कि विदेश नीति के नियंताओं के माथे पर चिंता की लकीरें उभर रही होंगी। भले ही माओवादी नेता भारत के साथ अपने संबंधों को लेकर राजनीतिक रूप से उपयुक्त बयान दे रहे हों, लेकिन माओवादियों के वर्चस्व वाला नेपाल भारत विरोधी रुख अपना सकता है। वह उस सकारात्मक दबाव से भी मुक्त हो सकता है जो अभी तक भारत कुछ अन्य देशों और विशेष रूप से अमेरिका के साथ मिलकर उस पर डालने में सक्षम था। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि भारत के नक्सली संगठन जो वस्तुत: माओवादियों के भाई-बंधु ही हैं, और अधिक दुस्साहसी हो सकते हैं। वैसे भी वे इस दर्शन पर यकीन करते हैं कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। भारत सरकार को इसके प्रति सतर्क रहना होगा कि नक्सली संगठन नेपाल के माओवादियों से दुष्प्रेरित न होने पाएं। भारत को नेपाल में भावी सरकार के गठन के साथ ही उस सरकार की ओर से रचे जाने वाले संविधान पर भी निगाह रखनी होगी। यह ठीक है कि नेपाल एक नई राह पर चलने को तैयार है, लेकिन फिलहाल इसे लेकर सिर्फ अनुमान ही लगाए जा सकते हैं कि यह राह दोनों देशों के संबंधों को किस स्तर पर ले जाएगी?
संपादकीय- जागरण

Monday

बालू में दफनाया गया मासूम जिन्दा बचा


सीतामढ़ी। 'जाको राखे साईयां मार सके न कोय' यह कहावत शनिवार को जिले के परिहार थाना क्षेत्र के नरफोरवा गांव में उस समय चरितार्थ हुई, जब एक मासूम को गांव के ही एक युवक द्वारा अधमरा करने के बाद बालू में दफना दिया गया। मगर ईश्वर की कृपा कहिये कि कुछ लोगों ने इस हैवानियत को देख लिया और बच्चे को बालू से निकालकर सदर अस्पताल में भर्ती कराया है। बच्चा सही-सलामत है। उसके शरीर पर गहरे जख्म हैवानियत की कहानी बयां कर रही है। परिहार पुलिस ने सदर अस्पताल पहुंचकर मासूम के पिता के बयान पर मामला दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी है।
जानकारी के अनुसार परिहार थाना क्षेत्र के नरफोरवा गांव निवासी शिवजी शर्मा के पांच वर्षीय पुत्र राहुल को ग्रामीण लक्ष्मण शर्मा के 17 वर्षीय पुत्र सरोज घर से बहला-फुसलाकर शनिवार को सरेह में ले गया और सुनसान जगह पर अधमरा करने के बाद मृत समझकर बालू में दफन कर दिया। इसी बीच, ग्रामीण बुद्धू मांझी की पत्नी व सरदलपट्टी निवासी जतन राम घर जाने के लिए सरेह से लौट रहे थे कि अचानक उनलोगों की नजर सरोज पर पड़ी। घटना को देख दोनों के शोर मचाने पर आसपास के लोग इकट्ठा हो गये। लोगों ने इसकी सूचना शिवजी शर्मा को दी। उसके बाद आनन-फानन में बच्चा इलाज के लिए सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया। चिकित्सकों के मुताबिक बच्चा सही-सलामत है।
उधर, राहुल की मां के अनुसार बच्चे के गले व शरीर के अलावा बांयी आंख पर जख्म हैं। चिकित्सकों का कहना है कि अगर बच्चे को समय पर नहीं बचाया जाता तो उसकी जान जा सकती थी। राहुल के पिता ने बताया कि 10 दिन पूर्व सरोज उनके घर आकर टंगे हुए कमीज से पैसा व डायरी निकाल रहा था, लेकिन वह पकड़ा गया और डांट-फटकार कर उसे छोड़ दिया गया। दो-तीन दिन बाद सरोज ने शिवजी शर्मा के बड़े पुत्र राजा से कहा कि तुम्हारे बाप ने हमको डांटा हैं। मैं तुम्हारे भाई को जान से मार दूंगा। इसी आक्रोश में शनिवार को सरोज ने शिवजी के पांच वर्षीय पुत्र राहुल को अधमरा कर बालू में दफना दिया, लेकिन वह बाल-बाल बच गया।

साभारःजागरण

अशुभ संकेत

अफगानिस्तान में तालिबान आतंकियों के हमले में तीन भारतीयों की मौत एक बार फिर इस सच्चाई को बयान कर रही है कि वहां अमन-चैन की बहाली के लिए जो भी देश सक्रिय हैं उनकी मुश्किलें कम होने के बजाय बढ़ती जा रही हैं। सीमा सड़क संगठन के ठिकाने पर आत्मघाती आतंकी कार्रवाई यह भी साबित करती है कि अफगानिस्तान में तालिबान अभी भी खतरा बने हुए हैं। ये आतंकी नाटो सेना के जवानों को निशाना बनाने के साथ जिस तरह अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में जुटे विदेशी सहायता दलों पर हमले कर रहे हैं उससे तो यही जाहिर होता है कि उनकी दिलचस्पी अपने देश को अस्थिर रखने में ही अधिक है। ऐसे तत्व वे चाहे जिस नाम से जाने जाएं, सभ्य समाज के शत्रु हैं। ऐसे तत्वों का निर्ममतापूर्वक दमन किया जाना चाहिए, लेकिन अफगानिस्तान की करजई सरकार ऐसा नहीं कर पा रही है। विडंबना यह है कि करजई सरकार कभी-कभी आतंकी संगठनों से बातचीत कर बीच का रास्ता तलाशने की कोशिश करती दिखती है। वह कंट्टरपंथियों के समक्ष झुकती हुई भी नजर आ रही है। हाल ही में भारतीय चैनलों पर लगाया गया प्रतिबंध कुल मिलाकर कट्टरपंथियों के बोलबाले को ही प्रमाणित करता है। यह चिंताजनक है कि अफगानिस्तान में पिछले छह-सात वर्षो में विदेशी सैनिकों की उपस्थिति के बावजूद हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। वर्तमान में वहां नाटो के नेतृत्व में करीब पचास हजार सैनिक तैनात हैं, लेकिन वे पर्याप्त साबित नहीं हो रहे। अफगानिस्तान के अनेक इलाके अभी भी तालिबान के गढ़ के रूप में जाने जाते हैं। कुछ इलाकों में तो उनकी ताकत घटने के बजाय बढ़ रही है। इसके पीछे अनेक कारण हैं और उनमें से एक पाकिस्तान की अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में दिलचस्पी न होना है।
अपने संकीर्ण स्वार्थो के चलते पाकिस्तान इस आशंका से ग्रस्त है कि अफगानिस्तान में शांति व्यवस्था कायम होने से इस देश में उसकी पूछ नहीं रह जाएगी। वह गुपचुप रूप से ऐसे अनेक काम कर रहा है जिससे अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में सहायता कर रहे देश और विशेष रूप से भारत हतोत्साहित हो। क्या यह विचित्र नहीं कि वह अफगानिस्तान को सहायता देने में भारत को अपनी भूमि का इस्तेमाल नहीं करने दे रहा है? भारत सरकार अफगानिस्तान में निर्माण संबंधी जो अनेक कार्य करा रही है उनमें पाकिस्तान पोषित और प्रेरित आतंकी तत्व लगातार अड़ंगा डाल रहे हैं। वस्तुत: यही कारण है कि अफगानिस्तान में कार्यरत भारतीयों पर जब-तब हमले होते ही रहते हैं। इस वर्ष यह दूसरी बार है जब भारतीयों को निशाना बनाया गया। यह ठीक है कि भारत सरकार अफगानिस्तान में अपने लोगों पर हमलों के खिलाफ सख्त रवैये का प्रदर्शन करते हुए यह कह रही है कि वह तालिबान के आगे घुटने नहीं टेकेगी, लेकिन केवल इतना ही पर्याप्त नहीं। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि अफगानिस्तान में कार्यरत भारतीय सुरक्षित रहें और यदि कोई उनकी सुरक्षा के लिए खतरा बने तो उसे मुंहतोड़ जवाब दिया जाए।
संपादकीय- जागरण

कहने में क्या हर्ज है

कर्नाटक के चुनावों के लिए घोषणापत्रों का युद्ध शुरू हो गया है। पहले बीजेपी ने कहा कि यदि उसकी सरकार बनी तो वह किसानों को 10 हॉर्स पावर तक के पंपिंग सेटों के लिए मुफ्त बिजली देगी। इसके अलावा वह किसानों, स्वरोजगार वालों और समाजसेवी संगठनों को 4 प्रतिशत ब्याज पर ऋण भी उपलब्ध कराएगी। इस पर कांग्रेस ने 3 फीसदी ब्याज दर पर ही ऋण दिलाने की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही वह गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले प्रत्येक परिवार को एक-एक रंगीन टीवी और 2 रुपये प्रति किलो की दर से प्रति माह 25 किलो चावल भी देगी। चुनावी घोषणापत्रों का हाल कुछ ऐसा हो गया है जैसे चालू टीवी सीरियलों में किसी फूहड़ टिप्पणी के बाद झेंप मिटाने के लिए एक्टर डायलॉग मारते हैं, 'हें॥ हें... कहने में क्या हर्ज है!' बोलने के पहले कुछ सोचने-समझने की जरूरत नहीं है। यदि उसका कुछ मतलब निकले तो अच्छी बात है, और यदि नहीं निकले तो भी नुकसान क्या है। कोई सीने पर सवार हो जाए तो वे बता सकते हैं कि पीडीएस अनाज के परिवहन का खर्च राज्य सरकार उठा ले तो इस दाम पर अनाज देना मुमकिन हो सकता है। यह नहीं तो ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के फंड से काम के बदले चावल बांटा जा सकता है। लेकिन ऐसे तकनीकी जवाब का कोई नैतिक आधार नहीं है। जो पार्टियां पांच साल के अपने शासन में अपने काम से मतदाताओं को इस बात का आभास नहीं दे पातीं कि भविष्य में वे क्या करेंगी, वे चुनाव के समय बताने का नाटक करती हैं कि यदि उन्हें फिर से जिताया गया तो वे कौन से नए जलवे बिखेरेंगी। मैनिफेस्टो जारी करने की पूरी परंपरा एक बड़बोलेपन की प्रतियोगिता में तब्दील हो गई है, जिसमें देखा यह जाता है कि कौन कितनी ऊंची हांक लेता है। बाद में उस पर अमल कितना हुआ, यह बताना कतई जरूरी नहीं होता। इसके पहले कांग्रेस पंजाब में मुफ्त बिजली देने और बीजेपी झारखंड में हर वनवासी को एक-एक गाय देने का वादा कर चुकी है। इन घोषणापत्रों में कोई विशेषता देखने की कोशिश ही बेकार है। चुनाव-प्रणाली में सुधार की जिस प्रक्रिया के तहत हम दलबदल, दागी उम्मीदवारों और बूथ कैप्चरिंग से पीछा छुड़ाने की कोशिश कर रहे हैं, उसमें झूठ कैप्चरिंग और मैनिफेस्टो पर अमल की जांच का मुद्दा भी शामिल करना चाहिए।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स

नेपाल में बनते नए समीकरण

लोकतांत्रिक चुनावों की अपनी तमाम खूबियां होती हैं और उनमें से एक है उसके अप्रत्याशित नतीजे। दुनिया भर में जहां भी लोकतांत्रिक तरीकों से लोगों ने अपनी सरकार बनाने का विकल्प चुना है, वहां कभी न कभी ऐसा जरूर हुआ है कि इस प्रक्रिया के नतीजों पर उन्हीं लोगों को भी उतना ही आश्चर्य हुआ, जितना अन्य पर्यवेक्षकों को। कुछ ऐसा ही हुआ है हमारे पड़ोसी देश नेपाल में, जहां एक ऐतिहासिक चुनाव में नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)ने अप्रत्याशित सफलता हासिल की है। अब इसमें बहुत संशय नहीं कि नेपाल की सदियों पुरानी राजशाही का अंत निकट है और वहां की अगली लोकतांत्रिक सरकार में माओवादियों का प्रभुत्व रहेगा। चुनाव के नतीजों में नेपाली कांग्रेस के अलावा अन्य छोटे दलों, जिसमें मधेशियों के प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियां शामिल थीं, का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा। भारत में इन नतीजों पर अभी आधिकारिक तौर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। ऐसा लगता है कि नेपाल के घटनाक्रम पर जिस तरह से भारत ने निष्क्रियता के भाव दिखाए थे, उसके चलते भारतीय विदेश नीति के निर्धारकों ने ये मान लिया था कि वहां जो कुछ भी होगा उससे भारत को कोई लेना-देना नहीं है और अंत में नेपाल रहेगा, तो भारत का छोटा भाई। पर अब नए परिप्रेक्ष्य में यह नहीं कहा जा सकता कि अगली सरकार का रुख भारत के प्रति वही रहेगा, जो पिछली राजशाही और नेपाल कांग्रेस का रहता था। माओवादी नेता प्रचंड नेपाल में भारत विरोधी भावनाओं के बल पर ही वहां के आम आदमी का विश्वास जीतने में सफल रहे हैं। आज प्रचंड यह जरूर कह रहे हैं कि उनकी सरकार बनने की दशा में वे भारत और चीन के साथ अच्छे संबंध बनाने के पक्षधर हैं। पर भारत और नेपाल के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा का लगभग न होना, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक समानताएं, बेरोकटोक आवागमन और सदियों पुराना लगाव दोनों देशों के संबंधों को एक ऐसी परिभाषा देता है जो और किसी देश के साथ नहीं है। दूसरी ओर भारत के कई राज्यों में नक्सलवाद और माओवादी अशांति की आग फैलाते जा रहे हैं। नेपाल में माओवादी सरकार बन जाने के बाद लाल गलियारे से नेपाल का जुड़ा होना एक बिलकुल नई स्थिति को पैदा कर सकता है, जिसके लिए हमारे नीति निर्धारकों को तैयार रहना चाहिए। पड़ोसी राज्यों में लोकतंत्र की बयार बहना एक शुभ संकेत है, लेकिन अपने देश की आंतरिक और सीमा सुरक्षा के लिए हमारी तैयारी का भी कोई विकल्प नहीं है। इस दिशा में अब समझदारी से काम लेने की जरूरत है।
संपादकीय- भास्कर

Sunday

कछुए बने मिसाइल परीक्षण में बाधा

केंद्रपाड़ा जिले के गाहिरमाथा समुद्र तट पर बड़ी संख्या में पाए जाने वाले कछुए आम तौर पर मार्च में ही अंडे देने लगते हैं। उड़ीसा के एक समुद्र तट पर पाए जाने वाले कछुए इस साल अंडे देने में देरी कर रहे हैं। लेकिन इस बार आधा अप्रैल बीत जाने के बाद भी यह प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह देरी इस इलाके में हुए मिसाइल अग्नि-1 के परीक्षण की वजह से हुई है। यह परीक्षण 23 मार्च को हुआ था। लिहाजा उड़ीसा सरकार ने रक्षा अनुसंधान व विकास संगठन [डीआरडीओ] को चिट्ठी लिख कर इस मिसाइल का अगला परीक्षण टाल देने का आग्रह किया है। यह परीक्षण अप्रैल के आखिरी सप्ताह में होने वाला है। प्रमुख वन्य जीव संरक्षक बीके पटनायक के मुताबिक हम डीआरडीओ को परीक्षण टालने के लिए कह चुके हैं ताकि भीतरकणिका राष्ट्रीय उद्यान के तहत आने वाले गाहिरमाथा तट पर कछुओं द्वारा अंडे देने की प्रक्रिया बाधित न हो। हालांकि इस मामले पर कछुआ संरक्षण समूह की अलग राय है। आपरेशन कच्छप के सचिव विश्वजीत मोहंती के अनुसार भद्रक जिले के धमारा में बन रहे बंदरगाह के कारण समुद्री फैलाव में कमी के चलते कछुओं के अंडे देने की प्रक्रिया बाधित हुई है। अब कारण जो भी हो, लेकिन कछुओं के कारण मिसाइल का परीक्षण टाले जाने के सरकार के आग्रह पर डीआरडीओ क्या रुख अपनाता है, यह देखना दिलचस्प होगा।

जलवे बिखेरता, हंसी का बाजार

  • मुकेश तिवारी
वर्ष 2006-2007 को यदि हंसी का साल कहा जाए तो गलत नहीं होगा। पूरे साल भर छोटे पर्दे से लेकर बड़े पर्दे तक मुस्काराहट का जाल फैला रहा। लाफ्टर चैंपियंस ने गांव-गांव और शहर-शहर जाकर लोगों के हंसाने का काम किया और गुस्से व परेशानियों में डूबे रहने वाले करोड़ों भारतीयों की विलुप्त हुई हंसी फिर लौटा दी। इस कार्यक्रम ने लोगों को खुलकर हंसने में मजबूर कर दिया। पिछले इतिहास में नजर डालें तो गांवों में होने वाली नौटकी, नाटक, रामलीला जैसे कार्यक्रमों में दर्शकों के मनोरंजन के लिए जोकर जैसे एक पात्र को ’शामिल किए जाने की परंपरा रही है। जैसे-जैसे सिनेमाई संसार का उदय हुआ, वैसे-वैसे करिश्माई निर्माताओं ने अभिनेताओं के साथ एक हास्य कलाकार और अभिनेत्री के साथ उसकी सहेली के रूप में एक हास्य अभिनेत्री को रखना अनिवार्य-सा कर दिया। जैसे ही यह हास्य कलाकार पर्दे नजर आता बरबस ही दर्शकों के चेहरों में मुस्कान थम जाती थी। महमूद, जानीवाकर, भगवान दादा, उमादेवी, असरानी, केस्तो मुकर्जी जैसे कलाकार वर्षों तक लोगों के दिलों पर राज करते रहे हैं और इनमें से कुछ तो आज भी दर्शकों के चहेते कलाकार हैं। बीच में एक दौर एक्शान और पशिचमी सभ्यता से जुड़ी फिल्मों व धारावाहिकों का आया। इनमें हास्य का पुट तो रहा लेकिन प्रमुखता से नहीं। इस बीच हास्य के क्षेत्र में दौर फिर बदला जब अभिनेताओं ने हंसोड़े अभिनय को अपने कैरियर में जोड़ कर सफलताओं में कदम रखा और स्वयं को हास्य रंग में ढाल लिया। जिनमें प्रमुख रूप से कादरखांन, शक्तिकपूर,गोविंदा, परेश रावल, संजयदत्त, अक्षयकुमार सहित अनेक कलाकार शामिल हैं। इनकी छवि दर्शको के मध्य परिवर्तित हुई। इस तरह के पात्रों को मिलती लगातार सफलताओं को भांप कर, वही कहानी और मारधाड़ देखकर ऊब चुके दर्शकों के टेस्ट को टी.वी. निर्माताओं ने पहचानकर वर्ष 2005 से हंसी का जादू जो चलाना प्रारंभ कर दिया। 2006-2007 तक वह जादू दर्शकों के सिर चढ़कर बोलने लगा। 2006 में लाफ्टर चैलेंज को लेकर स्टार वन को मिली जबरजस्त सफलता ने सारे सिनेमा की धारा को इसी ओर मोड़ दिया। यहां तक कि टी.वी. चैनल, फिल्म निर्माता तो दूर समाचार चैनल भी इस तरह के कार्यक्रमों से दर्शकों को रिझाने की होड़ में शामिल हो गए। न्यूज चैनलों ने राजनीति से परे हटकर हास्य को भी अपना हथियार बना लिया। इस तरह के कार्यक्रमों की शुरुआत का श्रेय न्यूज चैनलों में सबसे पहले एन.डी.टी.वी. को जाता है, जिसने ‘गुस्ताखी माफ‘ के माध्यम से चुटीले अंदाज में जनता की आवाज को पुतलों के जरिए पहुंचाने का नया अंदाज निकाला और सफलता भी प्राप्त की। दूसरी ओर ये कहें कि ‘स्टार वन‘ को गुस्ताखी माफ जैसे कार्यक्रमों ने ही आगे का रास्ता दिखाया। ऐसा नहीं कि हास्य के अन्य कार्यक्रम टी.वी. दर्शकों के सामने नहीं थे, लेकिन वास्तविक हंसी की फुहारें तब चलीं, जब लाफ्टर ने धूम मचाई। लगभग एक वर्ष के समय में ही मामूली से दर्शकों का मनोरंजन कर छोटे स्टेजों में हंसी बिखेरने वाली प्रतिभाओं और अंधेरे में जी रहे, कलाकारों में नई जान आ गई। आज राजू श्रीवास्तव, सुनील पाल, राजीव निगम, अहसान कुरैशी, नवीन प्रभाकर लाखों लोगों के चहेते बन गए हैं। इस हास्य शो की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि पाकिस्तान से सुधरते रिश्तों में एक रिश्ता और जुड़ गया। वह यह था कि पाक से आए कलाकारों ने भी भारतीयों के दिलों में अपने हास्य के माध्यम से जगह बना ली। अब कभी अनाम रहे चेहरों को देखकर बरबस ही दर्शकों के चेहरों में मुस्कराहट बिखरने लगती है। लाफ्टर द्वितीय के बाद, महा-मुकाबला के आते-आते स्थिती यह हो गई कि लगभग प्रत्येक चैनल के लिए हास्य, स्कूलों की पढ़ाई में अंग्रेजी की तरह अनिवार्य हो गया। एन.डी.टी.वी. को देख आज तक, इंडिया टी.वी. और अनेक समाचार चैनल भी हंसी के हंसगुल्ले खबरों के बीच परोसने मजबूर हो गए। खौफ और ऊबाने वाले इस दौर में दर्शकों के लिए हास्य शो बड़ी उम्मीद बनकर आए हैं। दिनभर की थकान और तनाव से काफी हद तक मुक्ति दिलाने में ये शो सफल रहे हैं। इसके संबंध में मीडिया विशेषज्ञों का कहना है कि हास्य का यह दौर नई अर्थव्यवस्था और खुलेपन की देन है। असल में हंसी का बाजार जो वापस आया है, तो इससे स्पष्ट है कि आज समाज पर कितना बोझ है। हंसी का बाजार जिस तरह से जलवे बिखेर रहा है, उससे एक बात और सामने आती है कि वर्तमान में हास्य बिकाऊ मसाला है, तो भारतीयों के लिए इसके लक्षण शुभ हैं। क्योंकि कहा जाता है कि समाज की बुराईयों, गल्लतियों व दकियानूसी बातों से हास्यकार हमें गुदगुदाता है। दूसरी ओर पूर्ण विकसित समाज ही हास्य को समझ सकता है। हमारे भारतीय समाज ने यदि हास्य को स्वीकार किया है तो इसका मतलब यह है कि समाज में बोझ होने के बाद भी मस्ती से जीने की तमन्ना बाकी है।

तिब्बत और भारत

भारत सरकार ने चीन के इस अनुरोध को ठुकरा कर बिलकुल सही किया कि ओलंपिक मशाल के आगमन पर दिल्ली में तिब्बतियों के विरोध प्रदर्शन पर रोक लगा दी जाए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति संवेदनशील और लोकतांत्रिक राष्ट्र होने के नाते भारत के लिए ऐसे किसी सुझाव पर ध्यान देने का कोई औचित्य ही नहीं। यह आश्चर्यजनक है कि भारत सरकार ने तो तिब्बतियों को लोकतांत्रिक तरीके से अपना विरोध दर्ज कराने की अनुमति दी, लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार ने ठीक इसके विपरीत कार्य किया। उसने तिब्बतियों को कोलकाता में रैली करने की इजाजत देने से इनकार कर दिया। क्या पश्चिम बंगाल सरकार ने अपने लिए शेष देश से अलग नियम बना रखे हैं? यदि नहीं तो इस शर्मनाक चीनपरस्ती का क्या मतलब? पश्चिम बंगाल सरकार ने कुछ दिनों पहले जिस तरह तिब्बतियों को जुलूस निकालने की अनुमति दी और फिर उन्हें रैली करने से रोक दिया उससे यह साफ हो गया कि उसने चीन को खुश करने के लिए ऐसा किया। यह इससे भी जाहिर होता है कि पश्चिम बंगाल सरकार के इस रवैये की चीनी दूत ने खासी सराहना की। यह ठीक नहीं कि वामपंथी राजनेता अब यह संकेत देने में संकोच नहीं करते कि उनके प्राण तो चीन में ही बसते हैं? वामपंथियों का ऐसा व्यवहार इस धारणा को बल प्रदान करता है कि उन्हें राष्ट्र हित से अधिक चीन के हितों की परवाह है। वैसे तो वामपंथियों का चीन प्रेम जग जाहिर है, लेकिन क्या अब वे एक देश में दो नियम चाहते हैं? अच्छा हो कि भारत सरकार यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में विदेश नीति से संबंधित मामलों में केंद्र और राज्य अपना-अपना राग अलापते न नजर आएं, क्योंकि ऐसा होने का अर्थ है अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की जगहंसाई।
तिब्बत का मसला जिस तरह दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गया है उसे देखते हुए भारत के लिए केवल यही पर्याप्त नहीं कि वह चीन के दबाव में आने से बचे। आवश्यक यह भी है कि वह तिब्बत की स्वायत्तता के पक्ष में अपने रवैये पर दृढ़ रहे। यह इसलिए और भी जरूरी है, क्योंकि चीन तिब्बत में मानवाधिकारों का निर्ममता से दमन करने में लगा हुआ है। यदि हमारे देश में सबसे ज्यादा तिब्बती शरणार्थी रह रहे हैं तो उनके लोकतांत्रिक अधिकारों की चिंता करते दिखना भारत सरकार का नैतिक दायित्व है। इस दायित्व की पूर्ति करते समय चीन से मैत्री संबंधों का ध्यान रखने के साथ ही एक जिम्मेदार राष्ट्र की तरह से व्यवहार करना भी आवश्यक है। यह सही है कि खेलों और विशेष रूप से ओलंपिक को राजनीति से दूर रखना चाहिए, लेकिन यदि ऐसा नहीं हो पा रहा तो इसके लिए चीन ही जिम्मेदार है। वह तिब्बत के मामले में सच्चाई बयान करने के बजाय दुष्प्रचार का सहारा लेने के साथ ही दलाई लामा को बदनाम भी कर रहा है। आज यदि ओलंपिक मशाल की यात्रा विवादों से घिर गई है तो वे प्रमुख देश भी दोषी हैं जिन्होंने चीन के अलोकतांत्रिक स्वरूप से परिचित होने के बाद भी उसे ओलंपिक की मेजबानी सौंपी। चूंकि ओलंपिक का चीन से बस इतना ही नाता है कि वे इस बार वहां हो रहे है इसलिए तिब्बतियों और उनके समर्थकों के लिए यह जरूरी है कि वे अपने विरोध प्रदर्शन को हिंसा से मुक्त रखें। यदि ओलंपिक मशाल की यात्रा में बाधा डाली जाती है तो इससे कुल मिलाकर चीन को दुष्प्रचार करने का ही मौका मिलेगा और यह तिब्बत के हित में नहीं होगा।
संपादकीय- जागरण

Saturday

वृक्ष बनते विश्वास के बीज

  • संजय द्विवेदी
देश के नेतृत्व के साथ-साथ आम आदमी के भीतर पैदा हुए आत्मविश्वास ने विकास की गति बहुत बढ़ा दी है। भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता की तमाम कहानियों के बीच भी विश्वास के बीज धीरे-धीरे एक वृक्ष का रूप ले रहे हैं। आजादी के ६ दशक पूरे करने के बाद हमारे भारतवंशी आज दुनिया के हर देश में एक नई निगाह से देखे जा रहे हैं। उनकी प्रतिभा का आदर और मूल्य भी उन्हें मिल रहा है। आजादी के लड़ाई के मूल्य आज भले थोड़े धुंधले दिखते हों या राष्ट्रीय पर्व औपचारिकताओं में लिपटे हुए, लेकिन यह सच है कि देश की युवा शक्ति आज भी अपने राष्ट्र को उसी जज्बे से प्यार करती है, जो सपना हमारे सेनानियों ने देखा था। आजादी की जंग में जिन नौजवानों ने अपना सर्वस्व निछावर किया, वही ललक और प्रेरणा आज भी भारत के उत्थान के लिए नई पीढ़ी में दिखती है। हमारे प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र में भले ही संवेदना घट चली हो, लेकिन आम आदमी आज भी बेहद ईमानदार और नैतिक है। वह सीधे रास्ते चलकर प्रगति की सीढिय़ां चढऩा चाहता है। यदि ऐसा न होता तो विदेशों में जाकर भारत के युवा सफलताओं के इतिहास न लिख रहे होते। जो विदेशों में गए हैं, उनके सामने यदि अपने देश में ही विकास के समान अवसर उपलब्ध होते तो वे शायद अपनी मातृभूमि को छोडऩे के लिए प्रेरित न होते। बावजूद इसके विदेशों में जाकर भी उन्होंने अपनी प्रतिभा, मेहनत और ईमानदारी से भारत के लिए एक ब्रांड एंबेसेडर का काम किया है। यही कारण है कि सांप, सपेरों और साधुओं के रूप में पहचाने जाने वाले भारत की छवि आज एक ऐसे तेजी से प्रगति करते राष्ट्र के रूप में बनी है, जो तेजी से अपने को एक महाशक्ति में बदल रहा है। आर्थिक सुधारों की तीव्र गति ने भारत को दुनिया के सामने एक ऐसे चमकीले क्षेत्र के रूप में स्थापित कर दिया है, जहां व्यवसायिक विकास की भारी संभावनाएं देखी जा रही हैं। यह अकारण नहीं है कि तेजी के साथ भारत की तरफ विदेशी राष्ट्र आकर्षित हुए हैं। बाजारवाद के हो-हल्ले के बावजूद आम भारतीय की शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक स्थितियों में व्यापक परिवर्तन देखे जा रहे है। ये परिवर्तन आज भले ही मध्यवर्ग तक सीमित दिखते हों, इनका लाभ आने वाले समय में नीचे तक पहुंचेगा। भारी संख्या में युवा शक्तियों से सुसज्जित देश अपनी आंकाक्षाओं की पूर्ति के लिए अब किसी भी सीमा को तोडऩे को आतुर है। युवा शक्ति तेजी के साथ नए-नए विषयों पर काम कर रही है, जिसने हर क्षेत्र में एक ऐसी प्रयोगधर्मी और प्रगतिशील पीढ़ी खड़ी की है, जिस पर दुनिया विस्मित है। सूचना प्रौद्योगिकी, फिल्में, कृषि और अनुसंधान से जुड़े क्षेत्रों या विविध प्रदर्शन कलाएं हर जगह भारतीय प्रतिभाएं वैश्विक संदर्भ में अपनी जगह बना रही हैं। शायद यही कारण है कि भारत की तरफ देखने का दुनिया का नजरिया पिछले एक दशक में बहुत बदला है। ये चीजें अनायास और अचानक घट गईं हैं, ऐसा भी नहीं है। देश के नेतृत्व के साथ-साथ आम आदमी के अंदर पैदा हुए आत्मविश्वास ने विकास की गति बहुत बढ़ा दी है। भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता की तमाम कहानियों के बीच भी विश्वास के बीज धीरे-धीरे एक वृक्ष का रूप ले रहे हैं।
लेखक हरिभूमि रायपुर में स्थानीय संपादक हैं।

E-mail-123dwivedi@gmail.com

तुलसी की परीक्षा

भारतीय सोप ऑपेरा की चुनौतियां दिन पर दिन बढ़ती जा रही हैं। अब टीवी धारावाहिक निर्माताओं को टिके रहने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। आज सोप ऑपेरा को रिएलिटी शो ने पछाड़ दिया है। यह इस बात का सबूत है कि भारतीय दर्शक की रुचि तेजी से बदली है। वह विशेष छवि के साथ बंधकर नहीं रहना चाहता। शायद यही वजह है कि पिछले करीब सात सालों में औसत भारतीय परिवार में एक अहम जगह बना लेने वाले धारावाहिक 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' की लोकप्रियता उतार पर है। शुरुआती पांच सालों में तो इस सीरियल ने डबल डिजिट में टीआरपी बरकरार रखी थी। इसकी नायिका का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री स्मृति ईरानी को बेमिसाल लोकप्रियता मिली। उसकी पॉपुलैरिटी को भुनाने के लिए बीजेपी ने उसे लोकसभा चुनाव में टिकट दे दिया लेकिन वह पराजित हुईं। आठ महीने पहले जब स्मृति ने सीरियल छोड़ दिया तो 'क्योंकि ...' की टीआरपी में और कमी आई। सीरियल निर्माता एकता कपूर को लगा कि शायद दर्शक स्मृति की जगह किसी और को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, इसलिए एक बार फिर स्मृति ईरानी को तुलसी की अपनी पुरानी भूमिका में लाया जा रहा है और इसका खूब प्रचार किया जा रहा है। यह एक तरह से सास-बहू मॉडल के सोप ऑपेरा की अग्नि परीक्षा है और उसे बचाने की आखिरी कोशिश। तुलसी जिस महिला का प्रतिनिधित्व कर रही है, उसकी छवि से समाज आगे जाना चाहता है। क्या वजह है कि अब कई चैनलों पर प्रसारित सीरियलों में पारिवारिक ताने-बाने से हटकर कुछ अलग तरह का कथा संसार बुना जा रहा है। इनमें जो महिलाएं हैं वे अलग किस्म की हैं। उनका संघर्ष घर की चहारदीवारी में नहीं उसके बाहर है। वह रोजी-रोजगार के लिए, अपनी स्वतंत्र पहचान के लिए जूझने वाली युवा महिलाएं हैं, रोने-बिसूरने वाली भाग्य और भगवान के भरोसे जीने वाली प्रौढ़ाएं नहीं। ऐसे धारावाहिकों को हाल के सालों में दर्शकों का अच्छा समर्थन मिला है। ये सोप ऑपेरा बताते हैं कि समाज में बदलाव की छटपटाहट तेज है। समाज छवियों को स्थापित तो कर रहा है पर उसे तोड़ डालने में देर भी नहीं लगाता। एक छवि से बंधकर न रहने की प्रवृति एक परिपक्व समाज का लक्षण है। टीवी पर मनोरंजन को लेकर आ रहा वैविध्य समाज के बदलते स्वरूप और उसमें बढ़ती जनतांत्रिकता का भी सूचक है। हमारा समाज अब एकरूप और स्थिर नहीं रह गया है। उसकी हर स्तर पर गतिशीलता बढ़ी है इसलिए उसकी अपेक्षाएं भी बदल रही हैं। एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के कर्ता-धर्ता इससे बेखबर नहीं रह सकते।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स
12 अप्रैल २००८

खाद्यान्न संकट का खतरा

चिंताजनक केवल यही नहीं है कि महंगाई पर रोक लगाने के प्रयासों के बावजूद मुद्रास्फीति की दर घटने का नाम नहीं ले रही, बल्कि यह भी है कि केंद्रीय सत्ता मूल्य वृद्धि के समक्ष असहाय नजर आ रही है। केंद्र सरकार के नीति-निर्माता देश की जनता को महंगाई का मुकाबला करने में सफल रहने का भरोसा दिलाने के बजाय जिस तरह जादू की छड़ी न होने का जुमला उछाल रहे है उससे तो यही प्रकट होता है कि अब उन्हें यही नहीं समझ आ रहा कि आगे क्या किया जाए? विगत दिवस प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खाद्यान्न के मूल्यों में वृद्धि के चलते विकास की गति थमने की आशंका जता कर सच की स्वीकारोक्ति भर की है। उन्होंने यह भी माना कि महंगाई के चलते रोजगार के अवसर कम होने के साथ गरीबी उन्मूलन का अभियान भी प्रभावित हो सकता है। प्रश्न यह है कि उनकी सरकार इस जटिल स्थिति से निपटने के लिए क्या करने जा रही है? क्या सच्चाई बयान करने मात्र से समस्या का समाधान हो जाएगा? प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के महानिदेशक के इस विचार से सहमति जताई कि जैविक ईधन बनाने में खाद्यान्न का उपयोग दुनिया भर में अन्न संकट बढ़ा रहा है, लेकिन आखिर जब भारत में यह कार्य सीमित स्तर पर हो रहा है तब फिर देश में अनाज की कमी का क्या मतलब? क्या यह एक तथ्य नहीं कि कृषि और किसानों की उपेक्षा के चलते ही भारत पर्याप्त मात्रा में अन्न का उत्पादन करने में असमर्थ है? पिछले चार वर्षो में खेती और किसानों की जैसी घातक उपेक्षा की गई है उसके दुष्परिणामस्वरूप भारत वैश्विक अन्न संकट में भागीदार बना है। यद्यपि केंद्रीय सत्ता कुछ वर्ष पहले ही इससे अवगत हो गई थी कि देश में गेहूं, चावल जैसी मुख्य उपज की पैदावार भी घटती जा रही है, लेकिन पता नहीं क्यों उसने इस ओर ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी? सबसे खराब बात यह रही कि वह तब भी नहीं चेती जब खुद सरकारी सर्वेक्षण यह बता रहे थे कि एक बड़ी संख्या में किसान हताश-निराश हैं और वे खेती को घाटे का सौदा मानने लगे हैं।
यदि भारत कृषि प्रधान देश होते हुए भी गेहूं, दालों, खाद्य तेल आदि का आयात करने के लिए विवश है तो इसके लिए भारत सरकार ही जिम्मेदार है। यह गनीमत है कि भारत में बड़े पैमाने पर खाद्यान्न का इस्तेमाल जैविक ईधन बनाने में नहीं किया जा रहा, अन्यथा आज महंगाई अपने भयावह रूप में होती। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की चेतावनी के बाद समझदारी इसी में है कि भारत अन्य देशों की तरह से खाद्यान्न से जैविक ईधन बनाने से बचे। वैसे भी इस नुस्खे की उपयोगिता सिद्ध होनी अभी शेष है। देखना है कि दुनिया के अन्य देश और विशेष रूप से अमेरिका, ब्राजील आदि यह साधारण सी बात समझते हैं या नहीं कि यदि लाखों टन अनाज जैविक ईधन बनाने में खपा दिया जाएगा तो फिर पेट भरने के लिए अन्न कहां से आएगा? बेहतर हो कि भारत संयुक्त राष्ट्र के मंच के जरिये खाद्यान्न को जैविक ईधन में तब्दील करने के सिलसिले के प्रति दुनिया को आगाह करे। केवल इतना ही पर्याप्त नहीं। संप्रग सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि का वास्तव में उत्थान हो। नि:संदेह यह कार्य केवल चिंता जताने या फिर किसानों के कर्ज माफ करने भर से संभव नहीं।
संपादकीय- जागरण
1२ अप्रैल २००८

Thursday

दम तोड़ दिया

  • डॉ. सैयद मकबूल अली
रह के खामोश जो फनकार ने
दम तोड़ दिया
रोज गढ़ते हुए आकार ने
दम तोड़ दिया
***
उतरा आकाश से दुनिया को सजाने के लिए
भागते वक्त की रफ्तार ने
दम तोड़ दिया
***
उसने जालिम को मोहब्बत से
किया जेरो-जबर
उसके हलकून पे तलवार ने
दम तोड़ दिया
***
जो किया ही नहीं था
उसकी सजा काटी थी
एक पाकीजा गुनहगार ने
दम तोड़ दिया
***
वक्त की मार ने कुछ
ऐसा सताया मकबूल
मेरे रहबर मेरे सरदार ने
दम तोड़ दिया

ओबीसी आरक्षण को मंजूरी

उच्चतम न्यायालय ने एक अहम फैसले में आज केन्द्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण को मंजूरी दे दी, लेकिन इस वर्ग की क्रीमीलेयर को आरक्षण के दायरे से बाहर रखने के निर्देश दिए।मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिलाने वाले 2006 के केन्द्रीय शिक्षण संस्थान (प्रवेश में आरक्षण) कानून को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए लम्बी बहस के बाद उक्त कानून को वैध ठहराया।लेकिन साथ ही यह भी निर्देश दिया कि यदि आरक्षण का आधार जाति है तो इस वर्ग के सुविधा-सम्पन्न यानी क्रीमीलेयर को आरक्षण के दायरे से बाहर रखा जाए। पीठ ने चार-एक के बहुमत से उक्त कानून को वैध ठहराया। न्यायमूर्ति दलबीर भंडारी ने इससे असहमति जताई।

खजाने का रास्ता

अफ्रीका की चमक अब सबको लुभा रही है। वह 'अंधकार का महाद्वीप' नहीं रहा, जैसा कि उसे हाल तक समझा जाता रहा है। इस बात का अहसास भारत को कुछ साल पहले ही हो गया था, जब दुनिया के घटते तेल भंडारों और आसमान छूते खनिजों से घबराए देशों ने अफ्रीका के अनछुए खजानों का रुख किया। यही वक्त था, जब भारत में आर्थिक तरक्की रफ्तार पकड़ने लगी थी और साफ हो गया था कि कामयाब होने के लिए हमें बेहिसाब संसाधनों की जरूरत पड़ने वाली है। तभी चीन इस दौड़ में शामिल हुआ और देखते-देखते कई अफ्रीकी देशों में उसकी धाक जमने लगी। मुकाबले में भारत की शुरुआत सुस्त रही, लेकिन अब नई दिल्ली में आयोजित हुए अफ्रीका समिट के जरिए उस गंवाए गए वक्त की भरपाई का इरादा झलका है। भारत ऐसी उम्मीद कर सकता है, क्योंकि अगर चीन से तुलना करने की आदत से बचें, तो अफ्रीका से हमारा रिश्ता न सिर्फ काफी पुराना है, बल्कि गहरा भी है। जिस वक्त अफ्रीका के देश पश्चिमी दबदबे से आजाद होने की कोशिश में थे, भारत उनका स्वाभाविक साथी था। रंगभेद के खिलाफ जंग में भी भारत ने उनका जमकर साथ दिया। गुजरात से गए लोगों ने कई देशों की इकॉनमी में हाथ बंटाया। हाल के बरसों में भारतीय कंपनियों ने अफ्रीका के कई हिस्सों में इंफ्रास्ट्रक्चर और तेल की खोज का काम हाथ में लिया है। यानी कुल मिलाकर अफ्रीका में भारत की मौजूदगी अच्छी खासी है, लेकिन इसे नए जोश के साथ नए मुकाम तक ले जाने का बहुत बड़ा मिशन तो बाकी है ही। भारत इस मिशन को एक अलग नजरिए से देखता है। वह न तो पश्चिमी देशों की तरह दखलंदाज दिखना चाहता है और न ही चीन की तरह आक्रामक। वह एक संवेदनशील और उदार सहयोगी की तरह पेश आना चाहता है और उसे उम्मीद है कि उसका सफर न सिर्फ फायदेमंद रहेगा, बल्कि दूर तक भी जाएगा। इस लिहाज से अफ्रीका समिट की शुरुआत में प्राइम मिनिस्टर मनमोहन सिंह ने जो पेशकश की, उसे अव्वल दर्जे की व्यापारिक कूटनीति कहा जा सकता है। उन्होंने दुनिया के 50 सबसे कम विकसित देशों के लिए भारतीय बाजार पूरी तरह खोलने का ऐलान किया। इनमें से 34 देश अफ्रीका के हैं, जिन्हें अब भारतीय इम्पोर्ट में न सिर्फ तरजीह मिलेगी, बल्कि पूरी तरह शुल्क माफी भी। इसके अलावा अफ्रीका के लिए उदार कर्ज और मदद का ऐलान तो है ही। इसे अफ्रीका के देश सराहेंगे, जिन्हें माल बटोरने वाले दोस्तों की बजाय तरक्की में साझीदारों की जरूरत है। जैसे-जैसे इन देशों में विकास होगा, इनकी चेतना बढ़ेगी, वैसे-वैसे ये विदेशी सहयोगों के बीच चुनाव करने लगेंगे। इसके कुछ संकेत मिलने भी लगे हैं। मसलन धमाकेदार शुरुआत और मदद की बरसात के बावजूद चीनी तौर-तरीकों पर ऐतराज उठने लगे हैं। यह बात नापसंद की जा रही है कि चीनी अपने सस्ते माल से अफ्रीकी बाजार को पाट रहे हैं, संसाधनों पर अंधाधुंध कब्जा कर रहे हैं, स्थानीय आबादी में घुल-मिल नहीं रहे और यहां तक कि अपने देश से कामगार लेकर आ रहे हैं। इसके मुकाबले पूरे अफ्रीका में भारतीय व्यवसाय की अच्छी साख है, जिसने अफ्रीका को अपना बना लिया है। भारत-अफ्रीका रिश्तों की इस मजबूत बुनियाद पर भविष्य की इमारत खड़ी करना मुश्किल नहीं होना चाहिए।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स
१० अप्रैल २००८

कहां ले जाएगा यह क्षेत्रवाद!

आज हम साझा सरकार, साझे व्यापार और साझी संस्कृति के दौर में हैं और यह दौर अभी चलेगा, क्योंकि जैसे-जैसे पूरी दुनिया एक वैश्विक गांव में बदलती जा रही है, वैसे-वैसे सीमाओं और सरहदों के पार के सरोकार हमारे अपने होते जा रहे हैं या हमारे जीवन पर ज्यादा असर डालते जा रहे हैं। पिछले दिनों शेयर बाजार की गिरावट का कारण यदि विदेशी, खासतौर पर अमेरिकी बाजार की मंदी थी, तो आज की महंगाई के कारण भी काफी हद तक हमारी सीमाओं के बाहर पाए जा सकते हैं।
एक तरफ तो भारतीय प्रोफेशनल्स और प्रशिक्षित लोगों की मांग पूरी दुनिया में बढ़ती जा रही है, तो दूसरी ओर हमारे अपने देश में कुछ राज्यों में क्षेत्रवाद की मांग जोर पकड़ती जा रही है। पहले यह मांग उठाते समय राजनीतिक दल सोचते थे कि इनसे उनके राज्य या फिर राज्य के लोगों या फिर उनकी अपनी राजनीति पर कोई उलटा असर तो नहीं पड़ेगा और इसीलिए ऐसी मांग ज्यादा देर तक और दूर तक नहीं ले जाई जाती थी। जरा सोचिए कि यदि बेंगलूर, गुड़गांव और नोएडा में ऐसी मांग उठाई गई होती, तो वहां की व्यापार और सेवा क्षेत्र की कंपनियां कहां तक तरक्की कर पाती।
तो आज यदि महाराष्ट्र में वहां की निजी कंपनियों में मराठियों के लिए नौकरी में आरक्षण की मांग उठ रही है तो इसका असर मुंबई और पुणो में स्थापित निजी कंपनियों पर कैसा होगा? क्या कोई भी प्रदेश और वहां की इंडस्ट्री इसलिए ज्यादा तरक्की कर सकती हैं कि उनमें ज्यादातर वहीं के लोग काम करें? क्या बाहर के लोगों के लिए नौकरी के अवसर कम करके किसी क्षेत्र विशेष की कंपनियों को बढ़ावा मिलता है? और इससे भी आगे है यह सवाल कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत से बाहर काम कर रहे भारतीयों की पहचान का क्या होगा?
महाराष्ट्र में काम कर रहा मराठी व्यक्ति भारत की सरहद से बाहर जाते ही केवल भारतीय हो जाता है, पर कुछ राजनीतिक पार्टियों द्वारा उठाई जा रही मांगों के चलते ऐसा न हो कि क्षेत्रवादी पहचान को भारत के बाहर भी ले जाने की तैयारी हो। फिर क्या वह दिन दूर नहीं जब विदेशों में काम कर रहे भारतीयों की पहचान और समस्याओं को भी उनके क्षेत्र या राज्य के लिए छोड़ दिया जाएगा? तब क्या होगा ‘भारतीय’ पहचान का? समय रहते इस तरह की क्षेत्रवादी मांगों को समझदारी से निपटाने की जरूरत है।
संपादकीय-भास्कर
१० अप्रैल २००८

मदरसों में आधुनिक शिक्षा

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत कार्यरत राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय संस्थान की मदरसों में आधुनिक शिक्षा प्रदान करने की पहल एक सही शुरुआत है। यह समय की मांग है कि मदरसों के साथ-साथ मुस्लिम समाज का धार्मिक एवं राजनीतिक नेतृत्व इस पहल को समर्थन देने के लिए आगे आए। ऐसी अपेक्षा इसलिए की जाती है, क्योंकि आज के युग में केवल धार्मिक शिक्षा से काम चलने वाला नहीं है। नि:संदेह धार्मिक शिक्षा के महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन क्या यह किसी से छिपा है कि आधुनिक विषयों के ज्ञान के बगैर किसी भी वर्ग के छात्रों के व्यक्तित्व का अपेक्षित विकास संभव नहीं। कम से कम अब तो मदरसों के संचालक इससे परिचित हो ही गए होंगे कि उनके यहां से निकले छात्रों के समक्ष अपने जीवन को संवारने के अवसर बहुत ही सीमित होते हैं। मदरसों से निकले छात्रों को शायद ही कोई ढंग की नौकरी मिल पाती हो। इस तथ्य से भी मुंह मोड़ने का कोई मतलब नहीं कि मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन और गरीबी के लिए एक हद मदरसों की शिक्षा को पर्याप्त समझा जाना है। दरअसल आज के युग में जो समाज आधुनिक शिक्षा से जितना दूर रहेगा वह आगे बढ़ने में उतना ही असफल साबित होगा। यद्यपि मदरसों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने की पहल इसके पहले भी की जा चुकी है, लेकिन वह परवान नहीं चढ़ सकी। जब भी शासन के स्तर पर ऐसी कोई पहल हुई, मुस्लिम समाज के एक वर्ग ने उसे संदेह की नजर से देखा। अनेक बार तो ऐसी किसी पहल को मदरसों और साथ-साथ मुस्लिम समाज के मामलों में अनावश्यक दखल करार दिया गया। देखना यह है कि राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय संस्थान की पहल का क्या हश्र होता है? जो भी हो, यह समझने की जरूरत है कि मदरसों के संदर्भ में सच्चर समिति की सिफारिशें मुस्लिम समाज का भला करने में सहायक सिद्ध नहीं होने वालीं।
चूंकि राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय संस्थान की ओर से आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए दी जाने वाली सुविधाओं से कोई शर्त नहीं जुड़ी है इसलिए उन्हें हासिल करने में गुरेज नहीं किया जाना चाहिए। क्या मुस्लिम समाज का नेतृत्व यह सुनिश्चित करेगा कि मदरसे आधुनिक शिक्षा का भी केंद्र बनें? बेहतर होगा कि दारुल उलूम जैसी संस्थाएं मदरसों को इसके लिए प्रेरित करें कि वे राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय संस्थान की ओर से मुहैया कराए जाने वाली सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए आगे आएं। प्रेरणा प्रदान करने का यह कार्य उत्तार भारत में खास तौर पर होना चाहिए, क्योंकि दक्षिण के राज्यों के मुकाबले उत्तार भारत के मुस्लिम छात्र आधुनिक शिक्षा से कहीं अधिक दूर हैं। वे सामाजिक पिछड़ेपन के रूप में इसकी कीमत भी चुका रहे हैं। यह आश्चर्यजनक है कि राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय संस्थान अभी तक मध्यप्रदेश में कुछ मदरसों को संबद्ध कर वहां अपना एक केंद्र ही बना सका है। आज आवश्यकता इस बात की है कि देश का प्रत्येक वह मदरसा राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय संस्थान का केंद्र बने जो आधुनिक शिक्षा से अछूता है। यह ठीक है कि मौलाना-मौलवियों का एक वर्ग कंप्यूटर की उपयोगिता समझने लगा है, लेकिन अभी ऐसे मदरसों की संख्या बहुत कम है जहां के छात्र आधुनिक ज्ञान के इस माध्यम से कुछ जानने-सीखने और समझने में समर्थ हैं।
संपादकीय- जागरण
१० अप्रैल २००८