Saturday

पत्रिका का शानदार आगाज

आखिरकार राजस्थान पत्रिका का मध्यप्रदेश संस्करण पत्रिका के नाम से भोपाल से लांच हो ही गया। इस अखबार का भोपाल के लोग और मीडिया जगत विगत पाँच वर्षों से इन्तजार कर रहे थे। लोगों का इन्तेजार बेकार नही गया, बहरहाल इन्तजार का फल मीठा होता है वाला मुहावरा एक बार फिर सच साबित हुआ।यह तो सर्वविदित है की राजस्थान पत्रिका का कलेवर अत्यन्त रोचक व स्तरीय है। साहित्य की भूख और व्यवस्थित ख़बरों के दीवाने पत्रिका को जरूर पढेंगे। फिलहाल पत्रिका अपने नए कद्दावर अंदाज मैं मध्यप्रदेश की जनता को लुभा रहा है। अच्छी खबरें अच्छा ले आउट और साथ ही रोचक सामग्री पत्रिका को सम्पूर्णता प्रदान कर रहा है।भोपाल में पत्रिका की धमाकेदार लांचिंग करने वाली टीम के मुखिया संपादक भुवनेश जैन और समाचार संपादक दिनेश रामावत इस बात का श्रेय ले सकते हैं कि उन्होंने भोपाल में दैनिक भास्कर को काफी चिंता में डाल दिया है, जो इन लोगों की प्राथमिक सफलता मानी जाएगी। भोपाल मैं ही पढे बढे पत्रकार धनंजय प्रताप सिंह का नया रूप देखकर यहाँ का मीडिया चकित है।बाजार में ये चर्चा थी कि पत्रिका का प्रकाशन भोपाल में अगस्त महीने से होगा लेकिन समय से पहले मध्य प्रदेश आकर पत्रिका ने सभी स्थापित प्रमुख अखबारों को चिंता मैं दाल दिया है। भोपालमैं पत्रिका की लौन्चिंग के पहले दिन से ही प्रमुख अखबारों के सर्कुलेशन गिरने की खबर है। उधर नव्दुनिया के पैर शुरुआत मैं ही उखड़ते नजर आ रहे है। पत्रिका अब भोपाल में लांचिंग के बाद अब ग्वालियर और इंदौर में अपना अखबार लांच करने की तैयारी में जुट गया है। जानकारों का मानना है कि पत्रिका भास्कर से उसी तरह बदला लेने के मूड में है जिस तरह भास्कर ने राजस्थान में जाकर किया था।
भड़ास

Tuesday

मर्द क्यों नहीं रोते?

  • जयप्रकाश चौकसे
सलमान खान की फिल्म में संवाद है कि मर्द रोते नहीं और आंसू आने पर खून बहा देते हैं। एक बॉक्स ऑफिस का अध्ययन करने वाले का कहना है कि शिरीष कुंदूर की ‘जानेमन’ असफल हुई क्योंकि उसमें ‘ही मैन’ की छवि वाला नायक सलमान रोता है। फिल्म उद्योग और उससे जुड़े लोगों में यह भ्रांति है कि नायक को रोना नहीं चाहिए। क्या शक्तिशाली ‘ही मैन’ छवि वाले व्यक्ति रोते नहीं हैं?
रोना एक स्वाभाविक काम है, जीवन केवल मुस्कान नहीं है। आंसू को केवल स्त्री से जोड़ना और कमजोरी का प्रतीक मानना गलत है। सच्चाई तो यह है कि दुख दर्द पर आंसू बहाना मनुष्य होने की निशानी है-संवेदनशील होने का प्रतीक है। आंसू बहाने पर शर्मसार होने की आवश्यकता नहीं है। आत्मा का सारा पाप धुल जाता है और आंसू बहाना पवित्रीकरण की प्रक्रिया है। क्रोंच वध पर आंसू के साथ कविता बहाकर एक डाकू कवि हो गया। यह अतार्किक लगता है कि आंसू के वजन से बॉक्स ऑफिस का पलड़ा डांवाडोल हो सकता है। मीना कुमारी ने तो आंसुओं से पलड़ा अपने पक्ष में कर लिया था। राजेंद्र कुमार आंसुओं के दम पर जुबली कुमार कहलाए थे। ‘संगम’ में ‘दोस्त दोस्त ना रहा’ गाते हुए राजकपूर रोए थे और उस दौर की यह सबसे कामयाब फिल्म थी।
इसी गीत की एक पंक्ति थी ‘पलक पर आंसुओं को तोलतीं, वह तुम न थीं तो कौन था’। ऋषिकेश मुखर्जी की ‘मेम दीदी’ में लंबा चौड़ा पठान जयंत कहता है कि वह खून बहता देख सकता है, आंसू नहीं सह पाता। कमोबेश ऐसी ही भावना अपनी आंखें मिचमिचाने की शैली में राजेश खन्ना ने नायिका पुष्पा से सफल फिल्म ‘अमर प्रेम’ में कही थी। दिलीप कुमार भी आंसू बहाते हुए भारतीय सिनेमा के त्रासदी किंग बने थे।
कुछ बातें लोकप्रिय होकर समाज में स्थापित हो जाती हैं। जैसे कि जब आप हंसते हैं तो जमाना आपके साथ हंसता है और जब आप रोते हो तो अकेले होते हो। इसमें निहित अर्थ है कि जमाना महज तमाशबीन है और दुख के समय आप अकेले रह जाते हैं। इसके साथ यह भी प्रचलित है कि दुख बांटने से हल्का होता है। यह भी कहते हैं कि बच्चा रोए नहीं तो मां को कैसे मालूम होगा कि वह भूखा है गोयाकि दुख से अकेलेपन को खारिज किया जाता है। आंसुओं से कभी भी समाज हेय नहीं माना जाता फिर परदे पर नायक के आंसू बहाने पर कैसे एतराज किया जा सकता है। एंग्री यंग मैन की छवि वाले अमिताभ भी ‘आनंद’ के साथ ही अन्य फिल्मों में रोए हैं।
‘जानेमन’ की असफलता का कारण नायक का आंसू बहाना नहीं है वरन फिल्म का ऑपेरा स्वरूप है। दर्शक अपने अविश्वास की भावना को स्थगित करके सिनमा के परदे पर घटने वाली बात को सत्य मानता है और आप उसके विलिंग सेंस ऑफ डिसबिलीफ को मत तोड़िए। ‘जानेमन’ के एक दृश्य में दरवाजा तोड़कर साजिंदे भीतर आते हैं और अनुपम पूछता है कि क्या हो रहा है तब साजिंदे कहते हैं कि गाने का सीन है, हम नहीं बजाएंगे तो कौन बजाएगा? इस तरह के दृश्य दर्शक की उस भावना को तोड़ते हैं जिसके तहत वह परदे पर प्रस्तुत को सच मानने के लिए आया था। ‘जानेमन’ इस तथाकथित बौद्धिक प्रस्तुति के कारण असफल हुई है। बहरहाल पृथ्वीराज कपूर से रणबीर कपूर तक हर दौर के नायक किसी न किसी फिल्म में रोएं हैं। यहां तक कि नायक ने गाया है कि ‘ये आंसू मेरे दिल की जबान है।’

Monday

एड्स से लड़ती-बढ़ती एक औरत

  • सुशील झा
एड्स से पीड़ित लोग आमतौर पर समाज और स्वयंसेवी संस्थाओं के रहमो- करम पर जीते हैं लेकिन अहमदाबाद की वर्षा वाला एक अपवाद हैं.
वर्षा वाला एड्स रोगी हैं लेकिन न केवल वो हिम्मत से काम लेते हुए इस बीमारी से लड़ रही हैं बल्कि सैकड़ों एड्स पीड़ितों के लिए उम्मीद बन कर उभरी हैं. वर्षा अहमदाबाद में एड्स रोगियों के लिए स्वयंसेवी संस्था चलाती हैं जहां एचआईवी पीड़ित लोग काम करते हैं और रोज़ी कमाते हैं.
लेकिन क्या काम करते हैं ये लोग? वर्षा बताती हैं, "हमने शुरुआत की थी नाश्ता बनाने के काम से. हम थेपला, खाखरा, भाखरी, समोसा जैसी चीज़ें बना कर शहर में बेचते हैं. जहां कहीं कोई उत्सव होता है तो हम अपना स्टॉल लगाते हैं और शादी-ब्याह के ऑर्डर भी लेते हैं."
वर्षा की यह शुरुआत तो छोटी थी लेकिन अब उनके साथ सैकड़ों लोग काम कर रहे हैं. लेकिन ये काम इतना आसान भी नहीं था.
वर्षा बताती हैं कि जब शुरू में लोगों को पता चला कि नाश्ते का ये सारा सामान एड्स रोगी बनाते हैं तो लोग इन्हें खरीदने से झिझकते थे.
वो कहती हैं, "शुरू में दिक्कत हुई लेकिन फिर कई स्वयंसेवी संस्थाओं ने लोगों में जागरूकता पैदा की कि एड्स रोगी का बनाया कुछ भी खाने से किसी को एड्स नहीं हो जाता. उसके बाद धीरे-धीरे यह व्यवसाय आगे बढ़ता गया." वर्षा को पिछले दिनों अपने प्रयासों के लिए यूनिसेफ़ और विश्व बैंक की एक योजना के तहत पुरस्कार राशि मिली है जिससे वो अपना व्यवसाय बढ़ाने वाली हैं. आगे की योजना के बारे में वर्षा बताती हैं कि वो एक कैंटीन खोलना चाहती हैं ताकि लोग वहां आकर खाना खा सकें.
इसके अलावा पैकेज्ड भोजन की श्रृंखला खोलने की भी योजना है वर्षा की.
वर्षा के पति और दो छोटे बच्चे भी एड्स पीड़ित हैं लेकिन अभी बच्चों को यह नहीं बताया गया है.
वो बताती हैं कि उन्हें ससुराल से काफ़ी सहयोग मिला है और अब उन्हें इस बात का कोई गिला नहीं है कि उन्हें एड्स है.
वो इसे चुनौती की तरह स्वीकार कर चुकी हैं और जीवन में आगे बढ़ रही हैं.
वो कहती हैं, "जो हो गया उसका कुछ नहीं किया जा सकता. अब आगे हमें अपनी और बाक़ी रोगियों के जीवन में बदलाव लाने की कोशिश करनी है."
वर्षा उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं जो असाध्य रोगों से पीड़ित हैं.
वर्षा से सीखा जा सकता है कि जीवन में कोई भी मुश्किल किसी को आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।
बीबीसी

Sunday

बॉलीवुड अभिनेताओं के बीच 'ब्लॉग युद्ध'

जिस देश में फ़िल्मी सितारों को भगवान के समान प्रतिष्ठा दी जाती है वहाँ ब्लॉग के ज़रिए एक-दूसरे पर भड़ास निकालने की क़वायद को उनके कुछ प्रशंसक अच्छा नहीं कह रहे हैं। मुबंई फ़िल्मों के कुछ अभिनेता आजकल ब्लॉगिंग में मशगूल हैं और उनके बीच इसके ज़रिए वाक् युद्ध भी जोरों पर है. हाल के कुछ ब्लॉग पोस्ट में दो अभिनेताओं ने बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख़ ख़ान के ऊपर कुछ ऐसी टिप्पणी की है जिससे उनके प्रशंसक ख़ासा नाराज़ हैं.
बॉलीवुड के शंहशाह अमिताभ बच्चन ने पहले अपने ब्लॉग में शाहरुख़ ख़ान के एक नए 'टेलीविज़न क्विज़ शो' को फ़्लॉप कहा लेकिन अब वह कह रहे हैं कि मीडिया ने उनके विचारो को ठीक से नहीं समझा. हाल के अपने ब्लॉग पोस्ट में उन्होंने लिखा, "शाहरुख़ बहुत पुराने मित्र और एक अच्छे सहकर्मी हैं. उन्होंने कभी भी कोई अभद्रता नहीं दिखाई है." उन्होंने लिखा है, "यदि शाहरुख़ के मन में मेरे व्यवहार के बारे मे थोड़ा भी शक है तो मैं उनसे सैकड़ों बार माफ़ी माँग लूँगा." कुछ दिनों पहले ही आमिर ख़ान ने अपने ब्लॉग में अपने एक कुत्ते का जिक्र किया था जिसका नाम शाहरुख़ है। उन्होंने अपने ब्लॉग में लिखा, "शाहरुख़ मेरे घर की देखभाल करने वाले के कुत्ते का नाम है. जब मैं ने यह घर ख़रीदा तो देखभाल करने वाले के साथ यह कुत्ता भी आ गया." उनकी इस टिप्पणी की बाद में काफ़ी आलोचना भी हुई थी जिसके बाद आमिर ने शाहरुख़ से माफ़ी माँग ली है. ये माफ़ी उन्होंने मीडिया से बातचीत के दौरान मांगी. आमिर ने कहा कि शाहरुख़ उनके बहुत अच्छे दोस्त हैं और उनका इरादा बिल्कुल उनका अपमान करने का नहीं था।
बीबीसी

बेटा नहीं जना तो जिंदा जला दी गयी

शनिवार की सुबह चार बेटियों की एक मां को बेटा न पैदा करने के लिए ससुरालियों ने जलाकर मार डाला। देवरिया के खुखुन्दू थाना क्षेत्र के ग्राम नूनखार में हुयी इस हृदयविदारक घटना को अंजाम देने में उसका पति भी शामिल था। इस काम को पति,जेठानी और सास-ससुर ने मिलकर अंजाम दिया। इसके बाद सभी मौके से फरार हो गये। पुलिस ने अभागन बहू के अधजले शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।
प्राप्त विवरण के अनुसार तड़के 4 बजे पड़ोसियों को किसी के जलने की बदबू महसूस हुयी। लोगों ने खोज बीन शुरू की। पता चला कि इन्द्रजीत तिवारी पुत्र फुलेना तिवारी के मकान से धुंआ निकल रहा है। बड़ी कोशिशों के बाद भी घर का फाटक नहीं खुला तो उसे तोड़ कर लोग अंदर घुसे। अंदर भयानक दृश्य था। कण्डे की चिता सजी हुयी थी और उस पर इन्द्रजीत की 29 वर्षीय पत्‍‌नी विन्ध्यवासिनी सुलाकर आग लगाई गयी थी। घर में परिजन नहीं थे।
लोगों ने इसकी सूचना मुकामी पुलिस को दी। सूचना पाकर मौके पर पहुंची खुखुन्दू पुलिस ने चिता से विन्ध्यवासिनी का जलने से बचा शव उतरवाया। शव मात्र कंकाल के रूप में अवशेष रह गया था। पुलिस ने विध्यवासिनी केमायके भटनी थाना क्षेत्र के बनकटा शिव में सूचना भिजवायी।
विन्ध्यवासिनी के पिता गणेश मिश्र पुत्र रघुवंश मिश्र ने मुकामी पुलिस को तहरीर दी। तहरीर में लिखा है कि विंध्यवासिनी की शादी बारह वर्ष पूर्व हुयी थी। इसकी चार बेटियां थी । बेटा न पैदा करने के लिए ससुराल के लोग उसे प्रताड़ित करते थे।
तहरीर के आधार पर पुलिस ने मृतका के पति इन्द्रजीत, श्वसुर फूलेना तिवारी, सास सरस्वती देवी व जेठानी प्रमिला पत्‍‌नी त्रिलोकी नाथ के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया है। इस सम्बंध में क्षेत्राधिकारी आलोक कुमार जायसवाल ने कहा अभियुक्तों की तलाश की जा रही है। जल्द ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया जायेगा।

जागरण

सर्कस पर संकट के बादल

सर्कस का जिक्र करने पर याद आते हैं हंसाने वाले जोकर, दिल दहलाने वाले करतब करते कलाकार, ऊंचे झूले, शेर की दहाड़ और जलती बुझती चमचमाती लाइटें आदि, लेकिन सूचना क्रांति के इस हाइटेक दौर में सर्कस से जुड़े लोगों को आशंका है कि यह उद्योग आने वाले कल में कहीं कहानियों में न सिमट जाए। ग्रेट बांबे सर्कस के मालिक केएम संजीव को लगता है कि शायद आने वाले वर्षो में सर्कस का अस्तित्व ही नहीं रहेगा। वह कहते हैं कि एक समय था जब सर्कस का दल किसी शहर में पहुंचता था तो धूम मच जाती थी। तब जितने दिन सर्कस शहर में रहता था, उतने दिन त्यौहार जैसा माहौल होता था। आज यह सब सपना लगता है क्योंकि अब तो सर्कस कब लग कर कब चला जाता है, किसी को पता ही नहीं चलता। उनकी शिकायत है कि आज लोगों के पास सर्कस के लिए समय नहीं है। थोड़ा बहुत समय मिलता है तो लोग घरों में बैठ कर टीवी देखते हैं या कंप्यूटर पर गेम खेलते हैं। सर्कस के मुख्य आकर्षण जानवर होते हैं, जिन्हें बच्चे खूब पसंद करते हैं। लेकिन सरकार ने 1970 में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम लागू कर सर्कस में जानवरों के इस्तेमाल पर ही रोक लगा दी तो यह आकर्षण भी खत्म हो गया। सर्कस के प्रबंधक विनोद कुमार ने कहा कि सरकार के आदेश के बाद हमने करीब दस साल पहले अपने सर्कस के सभी जानवर चेन्नई के चिडि़याघर को दे दिए। हमारी तो आमदनी ही चली गई, क्योंकि बच्चों को शेर, दरियाई घोड़ा, हाथी और भालू देख कर मजा आता था। अब हमारे पास केवल घोड़े, ऊंट, कुत्ते हैं। उन्होंने शिकायत की कि सरकार से उन्हें जानवरों के एवज में कोई मुआवजा नहीं मिला और इन जानवरों के बिना सर्कस भी आधा अधूरा हो गया। विनोद कहते हैं कि हमारे सर्कस की रोजी रोटी ही इन जानवरों से चलती है तो भला हम इन्हें भूखा कैसे रख सकते हैं। सर्कस के जानवरों को भूखा रखने का आरोप सही नहीं है।

Thursday

।।गीत कहीं या गजल..........।।

  • अभयकृष्ण
गीत कहीं या गजल सब एहि में कहाईल बा, आपन बर्बादी के हाल सब एहि में कहाईल बा।। पढ़े के उमरिया में किरकिटिया खेलाईल बा, एक से एक मँहग बल्ला किनाईल बा। आज उहे बल्ला से हमार कपड़ा धुलाईल बा, हमरा पहिला शौक के धुआँ धुआँ उड़ाईल बा।। गीत कहीं या गजल..........।। बाबुजी के कहना ना एगुड़ो सुनाईल बा, लागल हमके फिल्मी रोग ईऽ कहाईल बा। हर लड़की में हमरा हिरोईनी देखाईल बा, हर सपना हमार टुटके बिखराईल बा।। गीत कहीं या गजल..........।। कमाई के बेला तऽ बस हाथे मलाईल बा, इन्टरव्यु में कलकत्ता के मुबंई सुझाईल बा। सिफारिश के बिना बस किस्मतिया कोसाईल बा, चुग गइला खेत के बाद ही दुनिया पछताईल बा।। गीत कहीं या गजल..........।। आपन हाल देखके ही एगो सीख याद आईल बा, जिनगी के खेल में हुनर ही सबसे बड़ मिसाईल बा, ई कहनी तऽ आपन बाटे राउर खीस काहे निपोराईल बा, अइसन त नईखे ई रचना में रऊओ कहनी दोहराईल बा।। गीत कहीं या गजल..........।। गीत कहीं या गजल सब एहि में कहाईल बा, आपन बर्बादी के हाल सब एहि में कहाईल बा।।
भोजपत्र

Monday

ऑन लाइन रोमैंस

  • सुषमा

नजरें स्क्रीन पर चस्पा। उंगलियां की-बोर्ड पर गतिशील। वक्त सेवन पी.एम.। जी हां, आपने ठीक समझा। वही चैटिंग का मामला। इधर डेजी है, उधर संजोग। किन्हीं कारणों से जब नियमितता भंग होती है, तब दूसरे दिन डेजी संजोग को सफाई दे रही होती है और संजोग अंग्रेजी की प्रचलित गालियां देता है। डेजी निहाल होती रहती है। संजोग को मैंने दीवाना बना रखा है। सुनिश्चित किया गया यह एक घंटा नेट पर देने के लिए डेजी को बहुत से काम जल्दी-जल्दी संपादित करने पडते हैं। उसे लगता है कि पढाई प्रभावित हो रही है, पर उसे यह भी लगता है ऐसा आनंद और रोमैंस अब तक न मिला था। जिस दिन दिनचर्या से यह सात से आठ का वक्त निकल जाएगा जिंदगी के अर्थ खो जाएंगे। ओह..कहां मालूम था इंटरनेट की दुनिया इस कदर तिलिस्मी होती है।
डेजी ठीक वक्त पर नेट के लिए निकलती है। घर में इस घटना को लक्ष्य किया जाता है, लेकिन डेजी जानती है कि घरवालों को किस तरह झांसा देना है। अल्पशिक्षित मां को बेवकूफ बनाना बहुत आसान है।
मां, तुम एम.बी.ए. की स्टूडेंट होतीं तो समझतीं कि मैं साइबर कैफे क्यों जाती हूं। डेजी कुछ तमीज सीखो। नेट पर तमीज ही सीखती हूं। कॉस्मोपोलिटन मैनरिज्म। मां तुम नहीं जानतीं इंटरनेट सूचना का असीमित भंडार है और अपडेट नॉलेज के लिए इसका नियमित इस्तेमाल कितना जरूरी है। इंटरनेट स्टूडेंट के लिए रिक्वायरमेंट बन गया है।
पिता कहते हैं, रिक्वायरमेंट? मुझे लगता है डेजी तुम वक्त बर्बाद कर रही हो। पापा आपने कंप्यूटर ऑन करना सीखा नहीं और कहते हैं मैं वक्त बर्बाद कर रही हूं। मैंने तो कहा था मैं उस छोटे शहर से नहीं, किसी अच्छे इंस्टीटयूट से एम.बी.ए. करना चाहती हूं। आप नहीं माने। कॉलेज का स्तर देख तो रहे हैं। मुझे स्टडी के लिए नेट पर बैठना पडता है। स्टडी के लिए फिक्स्ड टाइम क्यों? दीदी, जरूर कुछ गडबड है। छोटे भाई सनत की बात पर डेजी भडकती है।
सनत मुझे अपने जैसा न समझना। तुम रोज चैटिंग फ्रेंड बनाते और बदलते हो, तुम्हें कोई नहीं रोकता। लडके हो, बिगड गए तो फर्क नहीं पडेगा। मैं रीसेंट रिसर्च पर कुछ मैटर कलेक्ट करने जाऊं तो भी शक हो जाता है। डेजी पहले साइबर कैफे जाने में घबराती थी। सनत जिद करके ले गया था। सनत ने छोटे से माउस को चलाकर कैसे-कैसे करिश्मे स्क्रीन पर दिखा दिए थे। दीदी, गूगल जैसे बडी लाइब्रेरी इस छोटे से डिब्बे में बंद है। दुनिया भर की सूचनाएं पलक झपकते हाजिर। चैटिंग जानती हो, कैसे की जाती है? मैं तो मेट्रोज में रहने वालों को चैट फ्रेंड बनाता हूं। मेट्रोज में अच्छा करियर तलाशा जा सकता है। तब ये फ्रेंड्स मदद कर सकते हैं। कंप्यूटर का करिश्मा देख कर डेजी चकित थी। इंटरनेट का उपयोग करते हुए उसने जाना कि उसे अब तक खबर नहीं हुई कि उसके भीतर कितनी इच्छाएं, मकसद, ऊंची उडानें मौजूद हैं। जाना कि सपनों का आकार बहुत बडा है, वह बेहद मामूली सपने देखती है और मुमकिन हो न हो, पर उसे ढेर पैसा पाने और फॉरेन टूर जैसे इरादे जरूर रखने चाहिए।
चैटिंग भी अजीब माया थी। चैट फ्रेंड की बातें उसके जेहन में प्रतिध्वनि होती रहती थीं। लगता था कि पढाई चौपट हो रही है। दिमाग में कैसी कैसी बातें आने लगी हैं। अब तक कम लोगों के बारे में सोचती थी, अब बहुत लोगों के बारे में सोचने लगी हैं। हीनभावना भी आई कि लोग कितनी अच्छी बातें करते हैं, उसे बहुत अच्छी बातें करना नहीं आता। यह भी लगा वह एक किस्म की यातना से गुजर रही है। लगता कोई उसका पीछा कर रहा है। सोचती, चैट फ्रेंड अचानक सामने आ जाए तो पहली प्रतिक्रिया क्या देगी? यह तो बिलकुल नहीं जानती थी ड्रीम ब्वॉय नेट पर मिलेगा। वह ऑन लाइन रोमैंस करेगी। जिंदगी दमादम हो जाएगी।
डेजी प्रेजेंटेशन के लिए नेट पर मैटर ढूंढ रही थी। खास सफलता नहीं मिली तो बोर होकर उसने चैट फाइल खोल ली। ऑन लाइन लिस्ट में लडकों के नाम पर मैसेज दिए। कहीं से रेस्पांस नहीं मिला। फिर संयोग कहें, नियति या भाग्य, उसे संजोग मिल गया।
आर यू फ्री फॉर चैटिंग? या एएसएल प्लीज (ऐज सेक्स लोकेशन)। ट्वेंटी, फीमेल सतना (इंडिया)। संजोग हियर, ट्वेंटी फाइव, इंदौर। नेम? डेजी मालवीय, एम.बी.ए. कर रही हूं, तुम? एम.बी.ए. कर चुका हूं। ऑक्यूपेशन? बिजनेस। हुंडई की एजेंसी है। अबाउट फैमिली? घर का इकलौता चिराग। करोडों का मालिक। चश्मा लगाता हूं, पर हैंडसम हूं। मैरिटल स्टेटस? अनवेड।
फेक इन्फॉर्मेशन तो नहीं दे रहे हो? क्यों पूछ रही हो? क्या किसी साइबर लंपट ने तुम्हें सताया? मैं फेयर लडका हूं। साइबर लंपट? हां, यही समझ लो। होता है। डेजी तुम हर तरह की बातें सुनने की स्पिरिट डेवलप करो। कॉन्फिडेंस लेवल हाई होगा। कॉन्टेक्ट नंबर? मैं इतनी जल्दी कॉन्टेक्ट नंबर नहीं बताती। ठीक करती हो। मैं भी अपनी प्राइवेट लाइफ न बताता हूं और न किसी की जानना चाहता हूं। कम से कम वेरी फ‌र्स्ट मीट में नहीं।
तुम्हारी सोच मेरी सोच से मिलती है। सिलसिला चल निकला। संजोग, एम.बी.ए. के बाद क्या करूं? जॉब या भोली लडकी की तरह शादी। कुछ न बनें लडकियां, पर सुगृहिणी हो जाती हैं। मैं जॉब करूंगी। मुझे इंदौर में प्लेसमेंट मिल सकता है?
हां, मेरे शो-रूम में और मेरे दिल में। विश्वास नहीं होता। संदेह करोगी तो स्वतंत्र भाव से जी नहीं सकोगी, न बेहतर अवसर मिलेंगे।
दिल में प्लेसमेंट? क्या यही प्यार है। क्या मैं संजोग से प्रेम करने लगी हूं। तभी तो दिल में एक किस्म की बेचैनी, खुमारी, खलबली पाती हूं। क्या इश्क करना अच्छी बात है। बिल्कुल, तभी न एक आग का दरिया है और डूब कर जाना है जैसे हाई रिस्क के बावजूद इश्कबाजों की संख्या में गिरावट न आई। लिखने वालों ने प्रेम एक पूजा है जैसी अच्छी शुरुआत कर इश्क कमीना जैसी बरगलाने वाली बातें लिख डालीं, लेकिन गजब बात यह रही इश्कबाजों ने हौसले नहीं छोडे। बदल गई डेजी की जिंदगी। बदल गए अंदाज। बदल गई दुनिया। क्लास में कन्सन्ट्रेशन नहीं बनता। प्रेजेंटेशन में गडबडा जाती। सेमिनार या गेस्ट लेक्चर होते तो बार-बार घडी देखती-सेवन पी.एम.। संयोग इंतजार कर रहा होगा। वह दो दिन बाद साइबर कैफे जा सकी। संजोग बेहद कुपित था।
दो दिन से लापता थीं, कहां मर गई थीं? गेस्ट लेक्चर यार। दिल्ली से एक खब्ती प्रोफेसर आ गया था। उसकी ट्रेन यहां पांच घंटे लेट पहुंची। शाम से क्लास ली तो देर रात तक झोंकता रहा। कई लडकियों के पापा और भाई इंस्टीटयूट आ गए कि लडकियां कहां रह गई। तुम्हारे भी? हां।
मेरी कंपनी जॉइन करो तो पापा या भाई को मत लाना। लिसिन, कल अमेरिका जा रहा हूं। इंदौर से दिल्ली की फ्लाइट, फिर दिल्ली से जूम? (हवाई जहाज ढूंढने का ध्वनि संकेत)। मैं कभी प्लेन में नहीं बैठी, डर लगता है। जो डर गया वह मर गया। अब पंद्रह दिन बातें नहीं होंगी। मैं जब जाग रहा होऊंगा तुम सो रही होगी।
अमेरिका किस परपज से जा रहे हो? मैं यह सब नेट पर नहीं बताता। विवरण सार्वजनिक हो सकते हैं। हम बडे लोगों को साइबर जासूसों से सावधान रहना पडता है। मैं जासूस नहीं।
तुम भोली लडकी हो, इसीलिये गीता पर हाथ रख कर वचन देता हूं जो कहूंगा सच कहूंगा। डेजी ने ये पंद्रह दिन हडबडी में बिताए। इस बीच दो बातें हुई। इंदौर की एक फर्म से उसे इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग के लिए कॉल लैटर मिला और मां ने बताया कि अगले पखवाडे उसे लडके वाले देखने आ रहे हैं। डेजी ने मां को अफसोस से देखा, मां उन्हें आने से रोको। मैं उस लडके से शादी नहीं करूंगी। प्राइवेट कॉलेज में पढाता है। क्या सैलरी होगी? आठ या दस हजार। अब एक आई.ए.एस. लडका ढूंढेंगे तो उसके लिए हम पचास लाख कहां से लाएंगे? तुम्हारे पापा छोटी सी कंपनी में छोटे एकाउंटेंट? पचास लाख की जरूरत नहीं। मैंने अपने लिए नेट पर सुपात्र ढूंढ लिया है। पैसा एक न लगेगा और करोडों का माल मेरा।
डेजी की भंगिमा देख मां चौंक गई। डेजी हमारे ये संस्कार नहीं कि लडकी खुद अपने लिए लडका ढूंढ ले। थोडा अक्ल से काम लो। मां न मेरी अक्ल मेरे पास है और न दिल। दोनों इंदौर के विजय नगर में भटक गए हैं। तुम उसे जानती कितना हो? जानते तो हम उन्हें भी नहीं जिनसे एक या दो मुलाकात में शादी कर लेते हैं। तुम पापा को जानती थीं? अब भी कहती हो कि पापा को ठीक से नहीं समझ पाई। मेरी और संजोग की रुचि, मिजाज, विचार बहुत मिलते हैं। बुद्धिमान लोग कहते हैं अब कुंडली नहीं, केमिस्ट्री मिलानी चाहिए। यही आदर्श व्यवस्था है। संजोग यदि हब्शी की शक्ल का हुआ तो? क्या फर्क पडता है? लोग कहते हैं नाम में क्या रखा है, मैं कहती हूं शक्ल में क्या रखा है। लडकियों को पति नहीं, पैकेज चाहिए। एक रिची-रिच। मां मुझे अच्छी जिंदगी चाहिए। पैसा, सुख, चैन, ऐश। मैं इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग में इंदौर जा रही हूं। संजोग को जानने का मौका मिला है। भगवान ही यह संयोग बना रहे हैं। डेजी तुम बडी-बडी बातें करने लगी हो। मां, जमाना बदल गया है। संजोग को अच्छी तरह जान-समझकर ही अंतिम फैसला करूंगी। बेटी के सपनों ने मां को भी उकसा दिया। शायद सुयोग बन ही जाए।
संजोग लौट आया। डेजी के प्राण बहुरे। संजोग ये पंद्रह दिन यातना में गुजरे।सेम विद मी। आशिक बनाया आपने। मैं ट्रेनिंग के लिए इंदौर आ रही हूं। मेरे रहने के लिए कुछ व्यवस्था हो सकती है? हां, मेरे दिल में। डफर और डेजी के लिए यह अच्छी खबर। डेजी मैं एक कॉन्फ्रेंस में भाग लेने खजुराहो आ रहा हूं। वहां से सतना कितनी दूर है?
बस तीन-चार घंटे का रन, आओ न। हां, तुम्हारे दर्शन हो जाएंगे। पहचानूंगी कैसे? मेरे हाथ में लाल गुलाब होगा। बेवकूफ जिस होटल में ठहरूंगा इन्फॉर्म कर दूंगा। वंडरफुल, मेरा सेल नंबर नोट करो। डेजी खुशी से मचल गई। हे भगवान इंटरनेट ने सब कितना आसान कर दिया है। वह अपने रूप को निखारने में लग गई। पहली बार ब्यूटी पार्लर गई। महिलाओं-लडकियों की बेहिसाब भीड। ये लोग अपनी स्किन टोन सुधारने और नाखून तराशने में कितना अधिक समय और पैसा खराब करती हैं। वह फेशियल कराते हुए पुलक रही थी-खूबसूरत तो मैं हूं ही, ऐसा जादू डालूंगी कि संजोग फेरे लेकर ही वापस जाए।
संजोग के आने का दिन। अब तक आ चुका होगा। कॉल क्यों नहीं करता? बताता नहीं कहां ठहरा है। मुझे उसका सेल नंबर लेना चाहिए था। मैंने अपना नंबर दे दिया, जबकि उसका लेना याद भी न रहा। इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया। डेजी मानो यातना शिविर में डाल दी गई हो और उसकी मां की बुद्धि देखिए। उसके गिरते मनोबल को बिल्कुल गिराए दे रही थीं। डेजी तुम इसी फ्रॉडिया के लिए कह रही थी कि शादी हो जाए तो करोडों का माल अपना? वह नहीं आएगा। मां फ्रॉड को फ्रॉडिया कहती हैं।
मां कुछ कारण होगा। इतनी जल्दी किसी नतीजे पर मत पहुंचो। डेजी इतनी जल्दी अपने यकीन को खोना नहीं चाहती थी। दीदी, तुम्हारे संजोग का एग्जिसटेंस है भी या नहीं, गोपनीयता बनी रहे, इसलिए कुछ लोग अपनी पहचान छिपाते हैं। संयोग फेक? सनत, चुप रहो न, संजोग ऐसा नहीं है। डेजी ने कहा तो पर उसे लगा अपने यकीन को देर तक नहीं संभाल पाएगी। उसने बहुत पाने की जो तमन्ना की है, वह फुस्स होने जा रही है। वह ठगी गई है, बेवकूफ बनाई गई है। सुबह से दोपहर हुई, फिर शाम, डेजी के सेल पर मैसेज आया। मेरे साथ कुछ लोग हैं, इसलिए तुम्हें होटल नहीं बुलाया। मैं व्यंकटेश मंदिर में हूं, कुंड की सीढी पर। ब्लैक जींस व्हाइट टी-शर्ट।
डेजी की आत्मा में बला की फुर्ती भर गई। मां, मैं क्या-क्या सोच गई थी। तुम लोग कुछ अच्छा सोचने नहीं देते। उफ, सनत मुंह फाडे न खडे रहो। मिठाई-समोसा ले आओ। मां कुछ तैयारी कर लेना। संजोग को न लगे कि हम कंगले हैं। मैं उसे लेकर आती हूं। डेजी ने इतनी तेज गति से स्कूटी अब तक न चलाई थी। तेज गति में एक खास किस्म का आनंद है। खस्ताहाल सडक में भी आनंद है। असंतुलित ट्रैफिक में आनंद है। मैं तुझसे मिलने आई मंदिर जाने के बहाने। डेजी मंदिर परिसर को पार कर पीछे की ओर बने कुंड पर पहुंची। चारों ओर चौडी सीढियों से घिरे कुंड में बारहों मास स्वच्छ पानी रहता है। दूसरी सीढी पर बैठे संजोग की पीठ दिखाई दे रही है। ब्लैक जींस, व्हाइट टी शर्ट। बाल बडे। ओह धोनी कट! अच्छा है, जो इस समय कुंड के आसपास लोग नहीं हैं। डेजी को भरोसा था अतिरेक में चिल्ला देगी संजोग। उस पर संकोच तारी हो गया और उसने शरीफ लडकी की तरह धीरे से कहा एक्सक्यूज मी। यस।
ब्लैक जींस, व्हाइट टी-शर्ट में लडकी बरामद होगी, यह डेजी के अरमानों में नहीं था। उसका दिल तेजी से धडक कर बैठने को था। यस। लडकी खडी हो गई। यहां कोई लडका शायद मेरा इंतजार करके चला गया। डेजी को नहीं मालूम कि कैसे खुद को कैसे संभाल सकी।
संजोग? हां..हां..हां..। मैं संजोग। फेक नेम। तुम डेजी? हां। बुल शिट। मैं तुम्हारी जगह किसी लडके को एक्सपेक्ट कर रही थी कि कोई लडका डेजी बन कर चैट कर रहा हो तो मजा आ जाए। लडकी इतनी सहज थी, जैसे अनुभवी हो। डेजी के लिए यह पहला हादसा था, सिवाय इसके कि एक लडका पहली चैटिंग में ही अश्लील बातें करने लगा था। अपमान और सदमे से उसका दिल भर आया। इस लडकी को अनुमान है इसने कितनी सुंदर दुनिया का अस्तित्व मिटा दिया है? इच्छा हुई लडकी का मुंह नोच ले पर यही कह सकी, मुझे नहीं मालूम था ऐसे खेल भी खेले जाते हैं। आई स्वेर डेजी मालवीय, तुम सचमुच भोली हो। आओ बातें करें।
मैं फेक लोगों से बात नहीं करना चाहतीं। लेकिन फेक लोगों से रोमैंस कर सकती हो! मेरी सलाह है ऑन लाइन याराना बनाओ, रोमैंस मत करो। यार तुम उस बंदे से इश्क कैसे कर सकती हो, जिसे तुमने देखा तक नहीं। तुम्हारे प्रॉक्सी लव को लेकर मैं कितना हंसी।
आपने ऐसा क्यों किया? मुझे बेवकूफ बनाने में मजा आता है। मैं ही मिली थी आपको? तुम जिस कदर दीवानी हो रही थीं, सब नहीं होते। मैं तुम्हें बेवकूफ बनाना जारी रखती, लेकिन तुमने बताया ट्रेनिंग के लिए इंदौर आओगी और मैं रहने की व्यवस्था करूं तो मुझे लगा मामला क्लियर कर देना चाहिए। वरना तुम संजोग के इश्क में मीरा बनी लोक लाज खोकर कुंज गलियों में भटकते हुए विजय नगर पहुंचो और संजोग तुम्हें पागल, बेवकूफ या सिरफिरी कह कर भगा दे तो तुम्हारी बुरी दशा होगी। बडे बाप के बेटे ऐसे ही सिरफिरे होते हैं। हर किसी को पागल या बेवकूफ कह कर पल्ला झाड लेते हैं। मैं तुमसे बोर भी होने लगी थी। कब तक टाइम पास करती? लेकिन आप में यह चालाकी आई कैसे? संजोग के कारण। इंदौर में पढती थी। संजोग मेरा क्लासमेट था। उसने मेरे इश्क का मजाक बनाया। रईस बाप का अकेला बेटा। मैं उसके नाम का इस्तेमाल करने लगी। आपका मकसद?
कुछ नहीं। मुझे सताया गया है। अब दूसरों को सताने में मुझे मजा आता है। तुम नहीं जानती प्रेम में चोट खाना कैसा आत्मघाती दर्द होता है। वही दर्द तुम्हारे चेहरे में है। लडकी के चेहरे में क्रांति-सी दिखाई दे रही थी। आप सिक हैं। आपको ट्रीटमेंट लेना चाहिए। लडकी हंसी, सिक! डॉक्टर कहते हैं, मैं सिजोफ्रेनिया की शिकार हूं, पर मैं नहीं मानती। होती तो तुम्हारी सतना सिटी में अकेले रहकर एक शो रूम में रिसेप्शनिस्ट न होती।
आप यहीं रहती हैं? अगर नहीं तो विजय नगर, इंदौर में? सुनो मैडम, इंदौर जाओ तो संजोग से बच कर रहना। मैं आपकी तरह सिक नहीं। हो, तभी इस वक्त यहां हो।
आपने मेरा भावनात्मक शोषण किया है, यह फिक्र है आपको? तो जाओ किसी विशेषज्ञ से साइबर कानून की जानकारी लो। मुझे सजा दिलाओ। लडकी लापरवाही दिखाते हुए चली गई। डेजी विश्वास नहीं कर पा रही थी। इंटरनेट की तिलिस्मी दुनिया में संबंधों की न महत्ता है, न गरिमा। यह कितना भयावह है कि अकेलेपन की शिकार, प्रेम में चोट खाई, सिजोफ्रेनिया से पीडित एक लडकी उसे सता रही थी और उसे नहीं मालूम इसे कैसे दंडित करे। काश! उसे फर्क करना आया होता कि संजोग लडका नहीं लडकी है, वह भी इतनी शातिर॥।

जागरण

Sunday

पुत्री से दुष्कर्म हत्या से भी जघन्य अपराध

दिल्ली की एक अदालत ने बेटी से दुष्कर्म करने वाले एक व्यक्ति को दस साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाते हुए उसके अपराध को अविश्वसनीय और हत्या से जघन्य करार दिया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संजय शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि दोषी के खिलाफ साबित हुए आरोप बेहद खौफनाक प्रवृति के हैं। इसे अपनी बेटी से दुष्कर्म करने का दोषी पाया गया है। यह हत्या से जघन्य अपराध है। 45 वर्षीय सरकारी कर्मचारी तथा शिकायतकर्ता के पिता बलबीर सिंह को धारा 376 तथा 507 के तहत दोषी ठहराते हुए अदालत ने कहा इस बात पर यकीन नहीं होता कि ऐसा अपराध उस व्यक्ति ने अंजाम दिया है, जिससे पीडि़ता की रक्षा करने की उम्मीद की जाती है। अदालत ने हाल ही में दिए अपने फैसले में दोषी को सजा के साथ दस हजार रुपये जुर्माना अदा करने के भी निर्देश दिए।
अभियोजन पक्ष के अनुसार तीन अप्रैल 2005 को बलबीर सिंह ने विवेक विहार स्थित अपने आवास पर अपनी 15 वर्षीय बेटी से दुष्कर्म किया और उसे किसी को भी घटना की जानकारी नहीं देने के लिए धमकाया। 11 अप्रैल 2005 को बिना मां की इस बच्ची ने अपनी एक सहेली के पिता और वकील से मदद मांगी और अदालत में शिकायत दाखिल की, क्योंकि पुलिस ने उसकी अपील पर कार्रवाई करने से इनकार कर दिया था। अदालत में बहस के दौरान बचाव पक्ष ने पीडि़ता पर चरित्रहीन होने का आरोप लगाया और साथ ही कहा कि उसके अपनी सहेली के भाई से शारीरिक संबंध हैं।
इस दलील को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि यह और भी निंदनीय है कि जिस व्यक्ति पर अपनी बेटी से दुष्कर्म का आरोप है, वही बेटी के चरित्र पर लांछन लगा रहा है। अदालत ने शिकायत दर्ज कराए जाने में आठ दिन की देरी होने के संबंध में कहा कि इतनी मासूम उम्र की बच्ची के लिए ऐसे मामले में तत्काल कदम उठाना इतना आसान नहीं है और वह भी ऐसे समय में जब उसके सिर पर मां का साया नहीं हो। अभियोजन पक्ष ने इस मामले में अपने आरोपों को साबित करने के लिए 19 गवाह पेश किए।

Saturday

बिग-बी की हिंदी में ब्लागिंग की तैयारी

हाल ही में ब्लागर के रूप में मशहूर हुए अमिताभ बच्चन ने हिंदी में ब्लागिंग करने की तैयारी कर ली है। उन्होंने अपने कंप्यूटर पर हिंदी का साफ्टवेयर लोड करवा लिया है। इसकी जानकारी उन्होंने अपने ब्लाग पर दी है। जाहिर है, यह जानकारी अंग्रेजी में दी है। लेकिन जल्द ही वह अपनी बात सीधे हिंदी में दुनिया तक पहुंचाएंगे। उन्होंने लिखा है कि कुछ दिनों के अभ्यास के बाद वह हिंदी में पोस्ट लिखने लगेंगे।

Friday

'संत नहीं वेश्या बनना पसंद करूँगा'

क्रिकेटर वेश्याओं से अलग नहीं होते...महेश भट्ट की फ़िल्म जन्नत का ये डायलॉग कितने विवादों को जन्म देगा, ये तो नहीं पता। लेकिन इतना ज़रूर है कि इस संवाद से बिंदास महेश भट्ट को कोई चिंता नहीं. फ़िल्म जन्नत में इमरान हाशमी ने एक सट्टेबाज़ की भूमिका की है. फ़िल्म में एक जगह उनका चरित्र कहता है- देखिए सर, क्रिकेटर और वेश्याओं के बीच ज़्यादा फ़र्क नहीं होता. दोनों की जवानी ख़त्म तो कहानी ख़त्म. इस पर बिंदास महेश भट्ट कहते हैं- जी हाँ, जन्नत में ठीक यही संवाद है. लेकिन इसमें ग़लत क्या है. अगर आप इस बारे में सोचें तो हम सभी वेश्या ही तो हैं. कम से कम ये अपना वादा तो पूरा करती हैं. मैं भी वेश्याओं से अलग नही हूँ. मैं भी आनंद बेचता हूँ. और हाँ मैं तो संत की बजाए वेश्या बनना पसंद करूँगा. अपनी फ़िल्म अर्थ, ज़ख़्म और वो लम्हे से कई विवादों को हवा देने वाले महेश भट्ट इस बार भी पीछे हटने वाले नहीं। कम से कम फ़िलहाल तो यही दिख रहा है।
बीबीसी

Thursday

चोर की सुहागरात

  • विमल कुमार
चोर की एक दिन शादी हो गई, पर लड़की वालों को पता नहीं था कि दूल्हा चोर है। दरअसल चोर के घरवालों को भी मालूम नहीं था कि उनका बेटा चोर है. सुहागरात के दिन चोर जब अपनी पत्नी से मिला तो उसने यह नहीं बताया कि वह चोर है। रात में जब वह सोने लगा तो उसके मन में यह द्वंद्व उठने लगा कि क्या वह अपनी पत्नी को यह राज़ बताए कि वह चोर है? अगर आज वह यह राज़ नहीं बताता है तो एक दिन पत्नी को जब यह राज़ पता चलेगा तो उसे गहरा धक्का लगेगा. चोर इसी उधेड़बुन में था. वह करवटें बदलता रहा. पत्नी समझ नहीं पाई कि आख़िर चोर वह सब क्यों नहीं कर रहा है जो सुहागरात में उसे करना चाहिए. वह सकुचा रही थी. उसने पति से पूछा,‘‘लगता है आप मुझसे कुछ छिपा रहे हैं. कहिए ना क्या बात है? अब तो हमें ज़िंदगी भर साथ निभाना है, इसलिए एक-दूसरे पर विश्वास करना चाहिए और मन की बातें बतानी चाहिए.’’ तब चोर ने हिम्मत जुटाई. वह बोला,‘‘जानती हो मैं क्या काम करता हूँ. मैं एक चोर हूँ. चोरी कर घर-बार चलाता हूँ.’’ यह सुनकर उसकी पत्नी रोने लगी. चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी. उसके रोने की आवाज़ जब कमरे के बाहर सुनाई पड़ी तो घरवालों के कान खड़े हो गए. वे सोचने लगे कि आख़िर बात क्या है? क्या कुछ ऐसी-वैसी बात हो गई या दुल्हन को अपने घर की याद आ रही है? चोर अपनी पत्नी को बहुत देर तक मनाता रहा. उसने कहा,‘‘आख़िर तुमने ही कहा था कि मन में कोई बात नहीं छिपानी चाहिए. इसलिए मैंने तुम्हें सच-सच बता दिया.’’
चोर की पत्नी को चोर पर प्यार आ गया। उसने मन ही मन कहा,‘‘पति चोर है तो क्या हुआ, सच तो बोलता है. मुझ पर विश्वास तो करता है.’’ इसके बाद पत्नी ने चोर को चूम लिया. चोर को आज तक याद है अपनी सुहागरात. वह भूला नहीं है. जब भी उसे उसकी पत्नी चूमती है, उसे अपनी सुहागरात की याद आ जाती है.
बीबीसी से साभार

बेटी को बनाया मां

विएना: अपनी बेटी को 24 साल तक तहखाने में बंद कर उसके साथ रेप करने वाले ऑस्ट्रिया के जोसेफ फ्रित्ज ने कहा है कि मैं शैतान नहीं हूं। अगर ऐसा होता तो मैं अपनी सबसे बड़ी बेटी को मर जाने देता। गौरतलब है कि घरेलू यौन हिंसा के अब तक के सबसे भयानक केस में 73 साल के फ्रित्ज ने अपनी बेटी एलिजाबेथ को 24 साल पहले घर के नीचे बने साउंड प्रूफ तहखाने में बंद कर दिया था। उस वक्त एलिजाबेथ की उम्र महज 18 साल थी। इस कैद के दौरान फ्रित्ज ने लगातार अपनी बेटी के साथ शारीरिक संबंध कायम किया, जिससे कुल 7 बच्चे पैदा हुए। पिछले दिनों उनमें से सबसे बड़ी 19 साल की बेटी कर्सटन की अचानक तबीयत बिगड़ने पर फ्रित्ज ने उसे हॉस्पिटल ले जाने का फैसला किया। इसी के बाद इस केस के बारे में खुलासे हुए। फ्रित्ज ने अपने वकील के हवाले से कहा है कि अगर मैं चाहता तो बच्चों को मर जाने देता। ऐसी सूरत में किसी को भी पता नहीं चलता, लेकिन मैं राक्षस नहीं हूं। फिलहाल कोमा में चल रही कर्सटन को 19 अप्रैल को हॉस्पिटल में दाखिल कराया गया था। उसके कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। डॉक्टरों का कहना है कि कैद इसकी एक वजह हो सकती है।

Wednesday

एसएमएस भेज मांगते हैं भीख

मोबाइल फोन आज हर किसी के काम आ रहा है। अपहर्ताओं ही नहीं, भिखारियों के भी। अपहर्ता फोन के जरिए फिरौती मांगते हैं तो भिखारी भीख मांगने के लिए लोगों को एसएमएस भेजते हैं। पाकिस्तान में भिखारियों ने मोबाइल फोन को अपने धंधे का हथियार बना लिया है।
पाकिस्तान के भिखारी हाईटेक जरूर हो गए हैं, लेकिन भीख मांगने का उनका अंदाज वही पुराना है। एसएमएस के जरिए भीख मांगते हुए भी वे अल्लाह को नहीं भूलते। उन्हीं के नाम पर भीख देने को कहते हैं। मसलन, लोगों के पास इस तरह के एसएमएस पहुंचते हैं, मैं एक गरीब आदमी हूं। मेरी बेटी अस्पताल में भर्ती है। यदि आप अल्लाह में यकीन रखते हैं तो कृपया मुझे दस रुपये देने का कष्ट करें। अल्लाह आपको बरकत देगा और हर तरह की परेशानियों से दूर रखेगा। हाईटेक भिखारियों ने अपनी औकात भी ज्यादा नहीं बढ़ाई है। वे एसएमएस भेज कर ज्यादा से ज्यादा सौ रुपये की ही मांग रखते हैं। व्यवसायी मुहम्मद उस्मान का दावा है कि उन्हें हर दिन ऐसे दस मैसेज मिलते हैं। अखबार डेली टाइम्स ने उस्मान के हवाले से लिखा है, इन मैसेज को नजरअंदाज करना मुश्किल है। दरअसल, अल्लाह के नाम पर मांगे जाने पर कई लोग असमंजस में पड़ जाते हैं। यूनुस नाम के एक शख्स ने तो इन अनाम संदेशवाहकों को पैसे भेजना भी शुरू कर दिया है। उनका कहना है, यह जाने बिना कि मैसेज किसने भेजा है, मैं अल्लाह के नाम पर पैसे दे देता हूं। हालांकि उनका मानना है कि भिखारियों को लोगों को ब्लैकमेल नहीं करना चाहिए।

Saturday

पांच साल बाद अपने शहर में

दुनिया बहुत छोटी सी हैं। सुना था पर अब एहसास भी हो गया फिर अपने शहर भोपाल आकर। मैंने एक मई को पत्रिका का दामन थाम लिया। इसके पहले चार साल तक हरिभूमि में प्रथम पेज पर सेवाएं दी।