Thursday

नारी, तुम सचमुच शक्ति हो

  • डॉ महेश परिमल

महिलाओं के स्वालम्बन और आत्मनिर्र्भर होने की बात हमेशा कही जाती है, पर इसे चरितार्थ करने के नाम पर केवल बयानबाजी होती है। इस दिशा में जब तक महिलाएँ स्वयं आगे नहीं आएँगी, तब तक कुछ होने वाला नहीं। हाल ही में दो घटनाएँ ऐसी हुई,जिससे लगता है कि महिलाओं ने न केवल आत्मनिर्भरता की दिशा में, बल्कि अपनी जिंदादिली का परिचय आगे आकर दिया। इन दोनों ही घटनाओं से इन महिलाओं ने यह बता दिया कि उनमें भी कुछ कर गुजरने का जज्बा है, इसके लिए वे पुरुषों के आगे किसी प्रकार की सहायता की भी अपेक्षा नहीं करतीं।हुआ यूँ कि राजस्थान के उदयपुर में बारहवीं की परीक्षा चल रही थी, एक केंद्र में साधारण रूप से जैसी आपाधापी होती है, उसी तरह हर तरफ मारा-मारी मची थी। किसी को अपनी सीट नहीं मिल रही थी, किसी को रोल नम्बर ही नहीं मिल रहा था। कोई अपने साथी की तलाश में था, तो कोई बहुत ही बेफिक्र होकर अपना काम कर रहा था। ऐसे में परीक्षा शुरू होने में मात्र दस मिनट पहले एक विचित्र घटना उस परीक्षा केंद्र में हुई। सभी ने अपने-अपने काम छोड़ दिए और उस नजारे को देखने लगे। बात यह थी कि एक नवयौवना दुल्हन परीक्षा केंद्र के बरामदे से गुजरने लगी। शादी का जोड़ा, शरीर पर थोड़े से गहने, हाथों पर मेंहदी, घँघट निकला हुआ, यह थी उषा, जो उस दिन उस परीक्षा केंद्र में बारहवीं की परीक्षा में शामिल होने आई थी। साधारण मध्यम वर्ग परिवार की उषा के माता-पिता की इतनी अच्छी हैसियत नहीं थी कि बहुत सारा दहेज देकर बिटिया की शादी किसी अमीर घर में करते, इसलिए अभी उषा की उम्र शादी लायक नहीं थी, फिर भी उन्होंने उसके लिए योग्य वर की तलाश में थे। योग्य वर मिल भी गया, उन्होंने समझा कि परीक्षा तक सब कुछ ठीक हो जाएगा। उषा ने अपने भावी पति को देखा, दोनों ने मिलकर तय किया कि बारहवीं की परीक्षा तक शादी नहीं होगी, भावी पति ने उषा को बारहवीं की परीक्षा देने की अनुमति भी दे दी। अब किसे पता था कि शादी का मुहूर्त और परीक्षा की तारीख में एक दिन का अंतर होगा। अब मजे की बात यह है कि उषा तो सच्चे मन से परीक्षा की तैयारी कर रही थी। जिस दिन शादी, उसके ठीक दूसरे दिन परीक्षा का पहला पेपर। अब शादी कोई ऐसे तो हो नहीं जाती, पंडितों के सभी प्रसंग निपटाते-निपटाते आधी रात बीत चुकी थी। उसके बाद भोजन और फिर विदाई, बज गए चार। परीक्षा शुरू होनी थी सुबह सात बजे। समय मात्र तीन घंटे का। ऐसे में पढ़ाई आवश्यक थी, सो उषा ने जो थोड़ा समय मिला, उसे पढ़ाई में लगा दिया। अब वह दुल्हन के जोड़े में ही पहुँच गई, परीक्षा भवन। यह उसकी दृढ़ता ही थी, जो उसे यह सब करने के लिए प्रेरित कर रही थी। कुछ कर बताने का साहस ही उसे शक्ति प्रदान कर रहा था। उसने वह सब कुछ किया, जो उसे करना था। इसी से स्पष्ट है कि नारी यदि ठान ले कि उसे यह करना है, तो वह कर के ही रहती है।

एक और घटना राजस्थान से काफी दूर सिकर गाँव की है। इस गाँव में एक स्नातक गृहिणी सुभीता रहती हैं। पति की सहायता करने के लिए उसे शिक्षिका बनने की ठानी। इसके लिए बी.एड. करना आवश्यक था। पति सेना में हैं, इसलिए घर की कई जिम्मेदारियाँ उसे ही सँभालनी पड़ती थी। एक बार जब पति काफी समय बाद सेना से अवकाश लेकर आए, तो सुभीता ने उससे कहा कि घर में कई बार उसे लगता है कि वह केवल घर के कामों में ही सिमटकर नहीं रहना चाहती, वह कुछ और करना चाहती है। पति राजेंद्र को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी। पति के बाद ससुराल वालों ने भी कोई दलील नहीं दी। उन्होंने भी सोचा कि बहू बाहर जाकर कुछ करे, तो उससे समाज का ही भला होगा। अब स्थितियाँ अनुकूल हो, इसके लिए पति-पत्नी ने मिलकर ईश्वर से प्रार्थना की कि उनकी इच्छा पूरी कर दे। पर ईश्वर तो सुभीता को किसी और ही परीक्षा के लिए तैयार कर रहे थे। वह सुभीता को एक जाँबाज महिला के रूप में प्रस्तुत करना चाहते थे। यहाँ भी कुदरत ने अपनी करामात दिखाई। राजेंद्र जब छुट्टियाँ खत्म कर सीमा पर गया, उसके पहले अपने प्यार का बीज सुभीता की कोख पर स्थापित कर गया। सुभीता के लिए अब शुरू हो गई परीक्षा की घड़ी। एक तरफ पढ़ाई, दूसरी तरफ घर के रोजमर्रा के काम और तीसरी तरफ अपने प्यार की निशानी का धयान रखना। समय के साथ-साथ सब कुछ बदलता रहा।

अचानक एक सूचना ने सुभीता को हतप्रभ कर दिया। बीएड परीक्षा की समय सारिणी घोषित की गई, तब उसे ध्यान में आया कि उसकी डॉक्टर ने डिलीवरी की भी वही तारीख दी है। अब क्या होगा, पति हजार किलोमीटर दूर। परीक्षा भी देनी ही है, नहीं तो साल भर की मेहनत पर पानी फिर जाएगा। अब क्या किया जाए? संकट की घड़ी चारों तरफ से अपने तेज घंटे बजा रही थी। परीक्षा की तारीख आ पहुँची, परीक्षा शुरू होने में गिनती के घंटे बचे थे कि सुभीता को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। घर परिवार के सभी सदस्य तनाव में आ गए। अब क्या होगा? इधार सुभीता आश्वस्त थी कि जो भी होगा, अच्छा ही होगा। उसे ईश्वर पर पूरा विश्वास था। आधी रात को उसने एक तंदुरुस्त बच्चे को जन्म दिया। उसके बाद फोन पर अपने पति से कहा- मैं एक भारतीय सिपाही की पत्नी हूँ, मैं इससे भी विकट परिस्थिति के लिए तैयार थी। हमारा बेटा स्वस्थ है और अभी कुछ ही घंटों बाद मैं परीक्षा देने जा रही हूँ। उधार पति को उसकी जीवटता पर आश्चर्य हो रहा था, लेकिन वह खुश था कि मेरी पत्नी ने एक जाँबाज महिला होने का परिचय दिया है। उधार परीक्षा केंद्र में इसकी सूचना दे दी गई, वहाँ के लोगों ने उसके लिए विशेष व्यवस्था करते हुए उसे एक अलग कमरे में पेपर लिखने की छूट दे दी। सुभीता एम्बुलेंस से परीक्षा केंद्र पहुँची और पेपर समाप्त कर तुरंत ही अस्पताल पहुँच गई।

दोनों ही विकट परिस्थितियों में परीक्षा दी, यह बताते हुए खुशी हो रही है कि दोनों ने ही फर्स्ट क्लास में परीक्षा पास की। इस घटना ने साबित कर दिया कि ईश्वर हमारी हर घड़ी परीक्षा लेता है। यह काम इतने खामोश तरीके से होता है कि किसी को पता ही नहीं चलता। इसमें जो पास हो जाता है, उसके लिए फिर एक नई परीक्षा की तैयारी की जाती है। इसी तरह हर घड़ी परीक्षा देते हुए इंसान नए रास्ते तलाशता रहता है। उसे नई मंजिल मिलती रहती है। उन दोनों जाँबाज महिलाओं को सलाम......
हम समवेत

Tuesday

नाजुक हाथों में होगा सारी दुनिया का बोझ

  • विजय शर्मा
बालीवुड की बहुचर्चित फिल्म 'कुली' के सुपरहिट गीत 'सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं..' में आपने सुपर स्टार अमिताभ बच्चन को रेलवे स्टेशन पर यात्रियों का सामान ढोते देखा होगा। कुली के काम में अब तक पुरुषों का एकाधिकार रहा है। लेकिन अब वह दिन दूर नहीं, जब आप ट्रेन से उतरें और कोई महिला कुली आपका सामान उठाने के लिए आगे आ जाए।
पुरुषों को हर क्षेत्र में कड़ी टक्कर दे रही महिलाएं, अब रेलवे स्टेशनों पर कुली के काम में भी उनको चुनौती देती नजर आएंगी। रेल मंत्रालय ने उत्तर रेलवे में पहली बार महिला कुलियों की भर्ती की योजना बनाई है। इसके तहत फिरोजपुर रेल मंडल में 344 कुलियों की भर्ती के लिए युवा पुरुष व महिलाओं से 25 अगस्त तक आवेदन मांगे गए हैं।
फिरोजपुर रेल मंडल के सीनियर कामशिर्यल मैनेजर बृजेश धर्माणी ने बताया कि कुलियों से गैंगमैन बनाए जाने के बाद से मंडल के विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर कुलियों के सैकड़ों पद रिक्त हो गए हैं। उन्होंने बताया कि ऐसा देश में पहली बार हो रहा है कि कुलियों की भर्ती के लिए महिलाएं भी आवेदन कर सकेंगी। इन्हें भी रेलवे बोर्ड द्वारा निर्धारित किए गए सभी टेस्ट पास करने होंगे। उल्लेखनीय है कि कुली बनने के लिए रेलवे बोर्ड द्वारा निर्धारित टेस्टों में पुरुषों को सात मिनट में 15 सौ मीटर की दौड़ पूरी करनी होती है। जबकि महिला कुलियों को चार सौ मीटर की दौड़ तीन मिनट में पूरी करनी होगी। इसके अलावा दोनों को ही 50 किलो भार सामान उठाकर दिखाना होगा। टेस्ट में पास होने के बाद इनको बिल्ले अलाट किए जाएंगे।
जागरण

Sunday

जैसे पड़ोसी मुल्क में हुए हो धमाके..

  • अनिल पाण्डेय
शुक्रवार और शनिवार को हमारे देश के दो बड़े शहर बैंगलुरु और अहमदाबाद बम धमाकों से गूंज गए। दोनों ही दिन प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने धमाकों की निंदा कर दी। उनके बयान से ऐसा लगा मानो धमाके भारत में नहीं किसी बल्कि किसी दूसरे मुल्क में हुए हों। न जाने हमारी खुफिया एजेंसियों को भी क्या हो गया है। आतंकवादियों की हिम्मत इतनी बढ़ गई है कि वो हमला करके साफ निकलते जा रहे हैं और हमारी पुलिस व खुफिया एजेंसियां सिर्फ जांच का भरोसा ही दिला रही हैं। रविवार को गृहमंत्री ने कहा कि सरकार संघीय जांच एजेंसी बनाने पर विचार कर रही है। अगर अब भी सरकार विचार ही करेगी तब तो जनता का कल्याण हो चुका। जिस समय पूरा देश महंगाई की आग में झुलस रहा था उस समय सत्तापक्ष उससे निपटने के बजाय कुर्सी की जोड़-तोड़ में लगा रहा। मई में जयपुर में धमाके हुए तब से अब तक जांच की जा रही है जो लगता है, अगले कुछ वर्षों के पहले पूरी नहीं हो पाएगी। फिर आईटी राजधानी बैंगलुरु में धमाके वह भी तब जबकि एक साल से लगातार ऐसी खबरें आ रही थीं कि बैंगलुरु आतंकियों के निशाने पर है। अब यदि इस पर भी सुरक्षा तंत्र कुछ न कर सके तो किसको दोष दें। रही बात पुलिस की तो उससे किसी भी प्रकार की उम्मीद करना बेमानी होगा। पुलिस तो पूरी तरह से राजनेताऒं की परछाई बन चुकी है। यदि उनके सामने भी आतंकी बम लगा रहे हों तो वे तब तक कार्रवाई नहीं करेंगे जब तक उनकी जेब गरम नहीं कर दी जाती या फिर किसी से आदेश न दिलवा दिया जाए।

यह कहना गलत न होगा कि राजनेताऒं की आपसी खींचतान का नतीजा आम जनता को हर बार भुगतना पड़ता है। कई बार मांग उठी कि केंद्रीय एजेंसियों को स्वतंत्र कर दिया जाए पर राजनैतिक लाभ के चलते किसी भी सरकार ने ऐसा नहीं किया। आप सोच सकते हैं कि हमारा देश किस ऒर जा रहा है। देश की सर्वोच्च अदालत ने जिस आतंकी को फांसी की सजा सुना दी उसकी सजा को आज तक टाल के रखा गया है। इसी तरह की दरियादिली का नतीजा था, कि काठमांडू से इंडियन एअरलाइंस की फ्लाइट को हाईजैक कर कंधार ले जाया गया और यात्रियों को छोड़ने के बदले एक खूंखार आतंकवादी को छुड़ा लिया गया। जिस देश का नेतृत्व कड़े फैसले नहीं ले सकेगा और कुर्सी के मोह में पड़ा रहेगा वहां इससे बदतर और क्या हो सकता है। आतंकियों का जब मन चाहता है, जहां मन चाहता है वहां विस्फोट कर देते हैं। लोगों की जान से खिलवाड़ करते हैं और नेताऒं को इन सब पर ठोस कदम उठाने के बजाय भाषण का एक मुद्दा मिल जाता है।

महंगाई पर मूर्ख बनायाः यदि आप सबको याद हो तो लगभग डेढ़ महीने पहले प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने दंभ भरते हुए कहा था कि चार से छह हफ्तों में महंगाई काबू में आ जाएगी और इसकी दर भी घटकर छह फीसदी पर वापस आ जाएगी। लेकिन आंकड़ा कम होने के बढ़ते हुए 12 प्रतिशत को पार कर गया। इन सबसे यह तो सिद्ध हो गया है कि नेताऒं को फायदेमंद लगता है वे वही करते हैं और रही जनता तो उसे तो मूर्खों की श्रेणी में रखा जाता है जिसकी याद सिर्फ चुनावों के वक्त आती है।

ग्रामीण पत्रकार करेंगे विदेश की सैर

हरिभूमि अखबार अपने ब्यूरो प्रमुखों और ग्रामीण प्रतिनिधियों को थाइलैंड के टूर पर ले जा रहा है। ये लोग वहां की जीवनशैली, सामाजिक व सांस्कृतिक व्यवस्था, पर्यटन व्यवसाय आदि के बारे में अध्ययन करेंगे। हरिभूमि अखबार का दावा है कि वो देश का पहला ऐसा समाचार पत्र है जो अपने ग्रामीण प्रतिनिधियों को विदेश यात्रा पर ले जा रहा है। ये लोग 29 जुलाई को अपनी यात्रा शुरू करेंगे। हरिभूमि पत्र समूह के प्रमुख कैप्टन अभिमन्यु ने इस अध्ययन यात्रा की संकल्पना की है। कैप्टन अभिमन्यु के मुताबिक दुनिया में जो बदलाव हो रहे हैं उससे कस्बाई व ग्रामीण पत्रकारों को भी समय-समय पर रू-ब-रू कराते रहना चाहिए। यात्रा के दौरान प्रतिनिधियों का थाइलैंड के प्रेस क्लब सदस्यों से मुलाकात के अलावा वहां के समाचार पत्र कार्यालयों के अवलोकन का भी कार्यक्रम है।
अध्ययन दल का नेतृत्व प्रबंध संपादक हिमांशु द्विवेदी करेंगे। दल 29 जुलाई को दोपहर 2।20 बजे ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस से कोलकाता रवाना होगा और दूसरे दिन 30 जुलाई को जेट एयरवेज के विमान से थाइलैंड के लिए उड़ेगा। अध्ययन दल में जाने वालों के नाम इस प्रकार है-- हिमांशु द्विवेदी, प्रियंका सिंह परिहार बिलासपुर, राकेश श्रीवास्तव कोरबा, विवेक श्रीवास्तव रायगढ़, अरुण सिंह अंबिकापुर, बाबी अग्रवाल सूरजपुर, वीरेंद्र कुमार सोनी, प्रशांत तिवारी, संजय बनवासी (ये सभी रायपुर), सचिन अग्रहरि राजनांदगांव, राधेश्याम शर्मा छुरिया, महेश मिश्रा कवर्धा, गोपी कश्यप नगरी, अनिल गेहलावत, आलोक तिवारी, अखिलेश तिवारी (ये सभी भिलाई), प्रकाश अग्रवाल डोगरगढ़, अजय बेहरा दुर्ग, जोगेंद्र सिंह सरगांव, लीलाधर राठी सुकमा, अतुल अग्रवाल दंतेवाड़ा, केपी साहू महासमुंद, नरेश कुशवाहा जगदलपुर, पुरुषोत्तम नत्थानी बलौदाबाजार, विजय कुमार शर्मा दल्ली राजहरा, कैलाश दुबे सहसपुर लोहारा, संजय भावनानी पाली, श्याम किशोर शर्मा राजिम, वालाल उज्जैनी दर्री।

Friday

बागड़ के भय से उबरा खेत?

  • महेश बाग़ी
लोकतंत्र को कार्यपालिका और व्यवस्थापिका जिस तरह खोखला कर रही हैं, उसी तरह न्यायपालिका और लोकायुक्त जैसी संस्थाओं की ज़िम्मेदारी भी बढ़ती जा रही है। इस देश में लोकतंत्र अब तक कायम है तो इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि देश की अवाम का न्यायपालिका पर भरोसा कायम है। पिछले कुछ समय में ऐसे कई मामले सामने आए हैं,जिनमें न्यायपालिका ने कार्यपालिका और व्यवस्थापिका पर नकेल डाल कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को बरकरार रखा। इसी क्रम में मध्यप्रदेश के लोकायुक्त का उल्लेख करना भी आवश्यक है। ग़ौरतलब है कि लोकायुक्त के समक्ष भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार के कई मामले विचाराधीन हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी पत्नी सहित डंपर कांड की जांच का सामना कर रहे हैं। इसके अलावा उनके मंत्रिमंडल के तेरह सदस्य-बाबूलाल गौर, हिम्मत कोठारी, कैलाश विजयवर्गीय, जयंत मलैया, नरोत्तम मिश्रा, गोपाल भार्गव, अनूप मिश्रा, कुसुम मेहदेले, कमल पटेल, विजय शाह, लक्ष्मीकांत शर्मा, गंगाराम पटेल और चौधारी चंद्रभान सिंह भी भ्रष्टाचार के अलग-अलग मामलों में लोकायुक्त के घेरे में हैं। ज़ाहिर है कि मुख्यमंत्री सहित उनके मंत्रिमंडल के लगभग आधे सहयोगी, भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं। चूंकि निकट भविष्य में विधानसभा चुनाव होने वाले है, इसलिए सरकार यह कतई नहीं चाहेगी कि ऐसे समय में लोकायुक्त जाँच किसी निष्कर्ष पर पहुंच कर सरकार को संकट में डाल दे। ऐसे में लोकायुक्त पर दबाव बनाने का सबसे अच्छा तरीका यही था कि उन्हें किसी मामले में उलझाया जाए और ऐसा किया भी गया।
मध्यप्रदेश के लोकायुक्त रिपुसूदन दयाल के खिलाफ़ रिवेरो टाउनशिप में अवैधा तरीके डूप्लेक्स बंगला आवंटित करवाने का मामला प्रकाश में आया। कहा गया कि लोकायुक्त ने अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए उक्त आवंटन प्राप्त किया। इस संबंधा में तथ्य बताते हैं कि लोकायुक्त की पत्नी श्रीमती उषा दयाल के नाम से लॉटरी सिस्टम में प्लांट क्र 76 आवंटित हुआ। श्रीमती दयाल ने एक आवेदन देकर प्लाट क्र. 76 की जगह 60 का आवंटन प्राप्त कर लिया। इसी में पद और प्रभाव के दुरूपयोग का आरोप लगा कर मामला पुलिस तक ले जाया गया। पुलिस ने शिकायतकर्ता की आपत्ति और तथ्यों के अवलोकन के बाद पाया कि इसमें कहीं कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। तब सिधे जिला अदालत में मामला पेश किया गया और वहाँ भी पुलिस रिपोर्ट पर मुहर लग गई। शिकायतकर्ता मामला हाईकोर्ट ले गए और अभी इस पर फैसला आता, इसके पूर्व ही हाईकोर्ट के हवाले से यह ख़बर छपवा दी गई कि जिला जज के फैसले को हाईकोर्ट ने अवैध मानते हुए जज के खिलाफ कार्यवाही की अनुशंसा की है। लेकिन हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार ने यह कह कर सबको चौंका दिया कि ऐसा कोई फ़ैसला दिया ही नहीं गया और अखबारों में मनगंढ़त समाचार छपवा दिया गया।
इस सारी कवायद का लब्बेलुआब यही है कि ऊपरी इशारे पर कुछ लोग लोकायुक्त के पीछे हाथ धोकर पड़े हुए हैं और किसी भी तरह उन्हें अदालती चक्कर में घसीट रहे हैं, ताकि वे अपने अधीन चल रही जांच को जल्दी न निपटा सकें। नेताओं और अफसरों को जनता से कोई डर नहीं है। उसे तो वे अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से बरगला देंगे, किंतु न्यायिक संस्थाओं का ख़ौफ़ उन्हें चैन की नींद नहीं सोने दे रहा है। लोकायुक्त जैसी संस्था पर अगर कुछ लोग अंगुली उठा रहे हैं तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। इससे नेताओं-अफसरों की हिम्मत बढ़ती है और उनके अंदर भरा न्यायपालिका का डर कम होता है। पिछले दिनों इसका नज़ारा दिखा भी था। जब आयकर विभाग ने स्वास्थ्य विभाग के कर्ता-धार्ताओं के यहां छापे मारे और जिसके कारण अजय विश्नोई की स्वास्थ्य मंत्री पद से छुट्टी हुई, तब स्वास्थ्य आयुक्त रहे आईएएस राजेश राजौरा ने इस्तीफे की घोषणा कर दी। अगर सरकार में ईमानदारी होती तो उनका इस्तीफ़ा मंजूर कर लेती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और कुछ ही दिनों बाद राजौरा को नई पद स्थापना दे दी गई। यह सब प्रायोजित था। दरअसल, राजौरा ने जान-बूझ कर इस्तीफे की भाषा वह चुनी थी, जिसे नामंजूर किया जाए और यही हुआ भी। कहने की ज़रूरत नहीं कि दवा घोटाले में शामिल लोगों को बचाने की यह प्रारंभिक कार्यवाही थी। पहले राजौरा बच गए और बाकी भ्रष्टों के बचने का रास्ता साफ़ कर दिया गया।
यह सारी कवायद लोकायुक्त के डर से की गई। यदि यह डर नहीं होता तो क्या नेता-अफसर ऐसा कर पाते ? इस्तीफे की नौटंकी का मकसद ही दवा घोटाले पर परदा डालना था, जिसमें सरकार को प्रारंभिक सफलता मिल गई है। बहरहाल, मामला लोकायुक्त पर दबाव बनाने का है और इन दिनों सत्ता पूरी कोशिश कर रही है कि वह उन्हें येन-केन-प्रकरन उलझाए रखे। रिवेरो टाउनशिप का मामला ऐसा ही है। विधायिका और कार्यपालिका लोकतंत्र को तमाशा बनाने पर आमादा है। दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि खुद को लोकतंत्र का चौथा प्रहरी और सच्चाई का अलमबरदार कहने वाला मीडिया भी लोकतंत्र-विरोधी ताकतों की कठपुतली बनता नज़र आ रहा है। लोकायुक्त को घेरने की ख़ातिर मनगढ़ंत समाचार प्रकाशित करने की प्रवृत्ति लोकतंत्र के दामन पर बदनुमा दाग़ है। इन परिस्थितियों न्यायपालिका, लोकायुक्त, आर्थिक अपराधा अनुसंधान ब्यूरो, महालेखा परीक्षक तथा सतर्कता आयोग जैसी संस्थाओं की ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है। मोजुदा परिस्थितियों में खेत को बागड़ से डरने की कतई ज़रूरत नहीं है। लोकायुक्त को चाहिए कि वे डंपर मामले सहित भ्रष्टाचार के अन्य मामलों में तेज़ी लाएं और जनता के सामने सच्चाई प्रकट करें। न्याय में देरी को माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी अनुचित ठहराया है। डंपर मामले की जांच का काम एक माह में पूरा करने का निर्देश मिलने के छह माह बाद तक जांच पूरी न होने से यह संदेह होता है कि लोकायुक्त कहीं न कहीं दबाव में हैं। न्यायिक संस्थाओं के प्रति आम आदमी का सम्मान बना रहे, इसके लिए ज़रूरी है कि जांच कार्य में तेज़ी लाई जाए और दूधा का दूधा पानी का पानी कर दिया जाए। उम्मीद की जाना चाहिए कि इस दिशा में निकट भविष्य में कोई निष्कर्ष सामने आएगा, जो भ्रष्टो के चेहरे पर पड़ा नकाब उतार सकेगा।
हम समवेत

Tuesday

रियलिटी शो के बहाने जिंदगी से खिलवाड़?

  • मंतोष कुमार सिंह

कुकुरमुत्ते की तरह प्रतिदिन फैल रहे टीवी मनोरंजन चैनल अतिशीघ्र प्रसिध्दि पाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। ऐसे नए-नए कार्यक्रम बनाए जा रहे हैं, जिसके जरिए ढेर सारा धन इकट्टठा किया जा सके। प्रसिध्दि और पैसे की लालशा के चलते ये चैनल युवाओं और मासूम बच्चों की जिंदगी के साथ जमकर खिलावड़ कर रहे हैं। आसमान को छुने की तमन्ना संजोए युवा वर्ग तेजी से इनके चंगुल में फंस रहा है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से कई कलाकार बुलंदियों को छू जाते हैं तो कई की जिंदगी खतरे में पड़ जाती है। पिछले दिनों रियलिटी शो कार्यक्रमों के दौरान हुए कई हादसों ने नई बहस को जन्म दिया है।

हाल ही में इंदौर में रियलिटी शो खतरों के खिलाड़ी के दौरान एक युवक की जान खतरे में पड़ गई। कुछ बनने की तमन्ना संजोए 22 वर्षीय अंजार खान भी इस शो में भाग लेने इंदौर पहुंचा था। शो के प्रमोशन के दौरान प्रतिभागियों को लंबे समय तक के लिए पानी से भरे एक बड़े शीशे के टैंक में रहने के लिए कहा गया था। अंजार खान भी तीन से पांच मिनट तक टैंक के अंदर रहा, वह कब बेहोश हो गया किसी को पता ही नहीं चला। लोगों को लगा कि वह सांस रोके है। कुछ देर बाद जब वह पानी में और नीचे जाने लगा तो तमाशा देख रहे लोगों को गड़बड़ी लगी। आयोजकों ने उसे बेहोशी की अवस्था में बाहर निकाला। जब वह मूर्छित हो गया तो आयोजक उसे अस्पताल में छोड़कर भाग गए। अंजार खान के फेफड़े में पानी भर गया।

कुछ दिन पूर्व ऐसे ही एक रियलिटी शो के दौरान कोलकाता में 16 साल की प्रतिभागी शिंजिनी सेनगुप्ता लकवे की शिकार हो गई। शिंजिनी एक शो में नृत्य प्रतिस्पर्धा में भाग ले रही थीं और एक राउंड में उनके खराब नाच पर शो के जजों की फटकार पर वे न केवल रोईं बल्कि उनको इतना सदमा लगा कि उन्हें लकवा मार गया। इससे पूर्व सरेगामापा लिटिल चैंप्स प्रतियोगिता से स्मिता नंदी के बाहर होने पर उनके पिता को दिल का दौरा पड़ गया था। इस घटना का असर लिटिल चैंप्स विजेता अनामिका चौधरी पर पड़ा और कार्यक्रम के दौरान उनकी तबियत बिगड़ गई। रियलिटी शो के दौरान कई और घटनाएं भी जो चुकीं हैं जो किन्हीं कारणों से सार्वजनिक नहीं हो पाईं। इस तरह के रियलिटी शो पर अब सवाल उठने लगे हैं और नियम कानून बनाने की चर्चा होने लगी है। कुछ शो तो उकसाने-भड़काने वाले बनाए ही जाते है। जिसका एक मात्र उद्देश्य टीआरपी होता है। अधिकांश रियलिटी शो विदेशी शो की नकल हैं। दर्शकों की संख्या बढ़ने के लिए जज ऐसे हथकंडे अपनाते हैं। कार्यक्रम के निर्माता भी चहते हैं कि शो के दौरान कुछ ऐसा किया जाए कि लोगों की भावनाएं आहत हों और उनका झुकाव चैनल की ओर हो। टीआरपी के चक्कर में कभी-कभी हदें भी पार हो जाती हैं और शिंजिनी, अंजार और अनामिका जैसी घटनाएं भी घट जाती हैं। यह सच है कि रियलिटी शो ने गांवों और छोटे शहरों के कई गुमनाम लोग को रातों-रात स्टार बना दिया, इसे देखकर और लोगों को लगा कि उनका बच्चा भी बड़ा स्टार बन सकता है। इन शो में अक्सर बचों को उम्र से पहले बड़ा दिखाने की कोशिश की जाती है।

छोटे पर्दे के टैलेंट हंट शो हों, फिल्में या फिर व्यावसायिक विज्ञापन में बाल कलाकारों पर वयस्कों से ज्यादा दबाव होता है। उन्हें मनोरंजन उद्योग के नकारात्मक पहलुओं से भी जूझने को विवश होना पड़ता है। इन बाल कलाकारों पर काम का बोझ इतना बढ़ जाता कि यह कभी यह जान ही नहीं पाते कि समुद्र तट की रेत पर बालू से घर बनाने या आम के पेड़ पर चढ़ने या पेड़ पर चढ़कर अमरूद तोड़कर खाने का मजा क्या होता है। अपने छोटे से शहर या गांव के तालाब में नहाने से वंचित इन बाल कलाकारों की बाल अवस्था को लेकर अब सरकार भी सोचने लगी है। छोटों बच्चों से 12 से 18 घंटे तक काम कराया जाता है। इस दौरान उन्हें शिक्षा-दीक्षा से भी दूर रहना पड़ता है। काम के बोझ के चलते उनका बचपन अंधकारमय हो जाता है। प्रतियोगिता में हार का असर कई बच्चे पर गहराई तक पड़ता और वे सदमें का शिकार हो जाते हैं। कई बार तो जजों की डांट को वे दिल से लगा लेते और उससे जिंदगीभर उबर नहीं पाते हैं।कुल मिलाकर आजकल चैनलों पर प्रतिभाओं का बाजारीकरण हो गया है। प्रोडक्शन हाउस और चैनल वाले युवाओं और बच्चों को चांद-तारे छूने के सपने दिखाकर प्रॉडक्ट की तरह उन्हें बेच रहे हैं। रातों-रात सुपर स्टार बनने की तमन्ना संजोए से प्रतिभागी जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं। यानी मुनाफे के लिए और मनोरंजन का साधन बने इन शो के निर्माताओं को जहां यादा जिम्मेदारी दिखाने कि जरूरत है, वहीं जजों को भी सावधानी बरतनी होगी। सरकार को भी ऐसे रियलिटी शो पर निगरानी रखने के लिए कड़े कदम उठाने पड़ेंगे।

Monday

डाक्टरी सलाह देता ब्लॉग

तकनीक, विज्ञान, सिनेमा, मीडिया जैसे विषयों पर तो हिंदी में कई ब्लॉग है, लेकिन स्वास्थ्य और चिकित्सा विषयों पर आधारित ब्लॉगों की संख्या काफी कम है। 'मीडिया डाक्टर' एक ऐसा ही ब्लॉग है जहां पर पाठकों को चिकित्सा संबंधी ज्ञान उपलब्ध कराए जा रहे है।
'मीडिया डाक्टर' में चिकित्सा जगत में होने वाले नए शोध कार्यो को पेश किया जा रहा है, साथ ही बीमारियों के उपचार की विधि भी यहां बताई जाती है। एक पोस्ट 'अब हो पाएगी डायबिटीज की और भी कारगर स्क्रीनिंग एवं डायग्नोसिस' में मधुमेह बीमारी के उपचार के संबंध में हुए नए शोध कार्य के बारे जानकारी दी गई है।
ब्लॉग में 'जर्नल ऑफ क्लीनिकल एंडोक्राईनॉलाजी एंड मेटाबॉलिज्म' में छपी रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि विश्व के कई प्रमुख चिकित्सकों के एक पैनल ने कहा है कि मरीज के रक्त से किया जाने वाला ग्लाईकोसेटेज हीमोग्लोबिन टेस्ट, जिसे मधुमेह के मरीजों में इसलिए किया जाता है ताकि पिछले तीन महीने के दौरान उनके रक्त में चीनी के कंट्रोल का पूरा नक्शा इलाज करने वाले डाक्टर के पास उपलब्ध हो जाए। डाक्टरों का अब मानना है कि इस जांच का प्रयोग मरीजों के उपचार के लिए किया जाना चाहिए।
'जब जीना दुभर सा कर देती है यह खारिश खुजली' नामक पोस्ट में चर्म रोग के संबंध में उपयोगी जानकारी दी गई है। पोस्ट में बताया गया है कि स्केबीज चर्म रोग 'स्केबी' नामक एक छोटे से कीड़े से फैलता है। यह छूत की बीमारी तो है, लेकिन यह हवा, पानी अथवा सांस द्वारा नहीं फैलती है, बल्कि यह रोगी के साथ संपर्क से फैलती है।
खुजली होने पर बिना डाक्टरी सलाह पर दवा लेने पर ब्लॉग में लिखा है कि हमारे यहां खुजली मिटाने वाली दवाओं की बिक्री बहुत होती है, क्योंकि अक्सर लोग बिना किसी डाक्टरी सलाह के कोई भी ट्यूब बाजार से उठा लाते है। ऐसे में रोग को बढ़ावा मिल जाता है। दरअसल, हमें चर्म रोग के प्रति सावधान रहने की जरूरत है और डाक्टरी सलाह के बाद ही दवा का प्रयोग करना चाहिए।
कई प्रकार की बीमारियों और उनके उपचार के संबंध में यहां जानकारी दी जा रही है, साथ ही रोग से जुड़ी भ्रांतियों के प्रति भी यहां सचेत किया जा रहा है। एक पोस्ट में लिखा गया है- दोस्तो, आओ अब इन भ्रांतियों का भांडा फोड़ ही डालें। इस ब्लॉग पर लगातार पाठक भी पहुंच रहे है और अपने सवाल भी पूछते है। दरअसल, इस ब्लॉग के संचालक डा। प्रवीण चोपड़ा पेशे से चिकित्सक हैं और इसी कारण वे इन सवालों का सटीक जवाब दे रहे है।
जागरण

Sunday

पुरुषों की सेक्स इच्छा का खूबसूरती से कोई लेना-देना नहीं

संगिनी आकर्षक है या नहीं, पुरुषों की सेक्स करने की इच्छा से इसका कोई संबंध नहीं होता। एक स्टडी के मुताबिक, पुरुषों को किसी भी महिला के साथ सेक्स करने में कोई गुरेज नहीं होता। यह माना जाता रहा है कि पुरुषों को सिर्फ महिलाओं की खूबसूरती ही आकर्षित करती है। लेकिन एक स्टडी से पता चला है कि पुरुषों में सेक्स होर्मोन के लेवल पर महिलाओं की खूबसूरती का कोई असर नहीं होता। रिसर्च में कहा गया है कि पुरुष किसी आकर्षक महिला से बात कर रहे हों या किसी साधारण महिला से, उनके टेस्टेस्टरोन का लेवल बराबर लेवल पर ही बढ़ता है। रिसर्च में 21 से 25 साल उम्र के 63 मेल स्टूडेंट्स को शामिल किया गया। जब वे किसी लड़की से पांच मिनट तक बात कर रहे थे तो उनके टेस्टेस्टीरोन के लेवल में आठ फीसदी का इजाफा देखा गया। इनमें आकर्षक और साधारण, दोनों तरह की लड़कियों को शामिल किया गया। हॉलैंड की ग्रोनिनजेन यूनिवर्सिटी के लिएंडर वान डर मीज ने बताया कि नतीजों से पता चलता है कि टेस्टेस्टीरोन का बढ़ना एक ऑटोमैटिक रिएक्शन होती है।
नवभारत टाइम्स

Saturday

आतंकवादियों के लिए काल है, जाँबाज महिला

  • डॉ महेश परिमल
अपराधी का सबसे गहरा संबंध अपराध से ही होता है। अपराध करने के लिए भी साहस चाहिए, जो जितना अधिक साहस इकट्ठा कर सकता है, वह उतना ही बड़ा अपराधी। अपराधी से कई लोग डरते हैं, विशेषकर शरीफ लोग। कई अपराधी बेखौफ होते हैं, तो कई मदमस्त। दुनिया में कुछ भी हो जाए, वे अपनी आपराधिक प्रवृत्ति से बाज नहीं आते। जिन अपराधियों के हाथों में हथियार होते हैं, वे और भी खूंखार होते हैं। निहत्था अपराधी भी यदि अपनी पर आ जाए, तो वह बहुत-कुछ कर सकता है। कुल मिलाकर अपराधी हर स्थिति में अपराधी ही होता है, केवल अपराध करने के पहले थोड़ी देर के लिए ही सही, पर शरीफ बनने का नाटक अवश्य करता है। अपराधी का बड़ा स्वरूप आतंकवादी है। अपराधी का इलाका होता है, पर आतंकवादी के सामने पूरा देश होता है। यही आतंकवादी जब किसी महिला के सामने हो और थर-थर काँपने लगे, तो उस महिला को क्या कहेंगे आप? जी हाँ हमारे देश में एक महिला ऐसी भी हैं, जिसके सामने अपराधी अपना गुनाह कुबूल करते हैं। इस महिला पर अब तक कई हमले हो चुके हैं, फिर भी वह आज भी गर्व से अपना काम मुस्तैदी से कर रही हैं।

यह महिला न तो पुलिस अधिकारी है, न हिप्रोटिस और न ही मनोचिकित्सक है। आतंकवादियों ने इस महिला का मार डालने की कसम खा रखी है। इस संबंध में जब उस महिला से पूछा गया, तो वह कहती हैं '' इट्स ए प्रोफेशनल हेजार्ड, यह तो व्यावसायिक खतरा है। इसमें हम क्या कर सकते हैं। मैं तो केवल अपनार् कत्तव्य निभा रही हूँ।'' इस जाँबाज महिला का नाम है डॉ. मालिनी सुब्रमण्यम। आतंकवादियों की हिट लिस्ट में इस महिला का नाम भी है। यह डॉक्टर किरण बेदी, मुम्बई पुलिस की एसीपी मीरा बोरवणकर से जरा भी कम नहीं है। देश के एकमात्र टॉप लेबल की फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की सहायक अधीक्षक के रूप में कार्यरत् डॉ. सुब्रमण्यम अपने काम में इतनी निपुण हैं कि कितना बड़ा अपराधी हो या फिर आतंकवादी, उनके सामने झूठ नहीं बोल सकता। कई खतरनाक अपराधियों पर नार्को टेस्ट कर उन्हें सच बोलने के लिए विवश किया है। शायद यही वजह है कि उस पर अब तक कई हमले हो चुके हैं। एक बार एक आरोपी ने उन्हें ऐसा धक्का दिया कि वह गिर गई और उनके हाथ की हड्डी टूट गई। छह हफ्ते का प्लास्टर लगा। ऐसे कई हमले उन पर हुए, पर वह डरने वालों में से नहीं है। लश्कर-ए-तोयबा के आतंकवादी सबाहुद्दीन ने तो उसे जान से मारने की धमकी दे रखी है। एक पत्रकार वार्ता में कर्नाटक पुलिस के डायरेक्टर जनरल के.आर.श्रीनिवास ने इस बात को स्वीकार भी किया। सबाहुद्दीन वही आतंकवादी है, जिस पर 2005 में बेंगलुरु की इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ साइंस में हुए बम विस्फोट में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।

अपराधियों से सच उगलवाने के लिए नार्को टेस्ट को न्यायालय ने अभी तक पूरी तरह से मान्यता नहीं दी है। अभी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। किंतु सन 2000 से अब तक 1200 नार्को टेस्ट, 1800 ब्रेन मेपिंग और 3400 पोलिग्राफ टेस्ट करने वाली डॉ. मालिनी सुब्रमण्यम के लिए यह एक रिकॉर्ड है। यह रिकॉर्ड इस फौलादी महिला के मनोबल के आगे बहुत ही छोटा है। दो बच्चों की माँ डॉ. मालिनी ने अब तक 130 आतंकवादियों, 15 नक्सलवादियों और अन्य कई खूंखार अपराधियों के मुँह से सच उगलवाया है। इनमें से प्रमुख है स्टेम पेपर कांड के सूत्रधार अब्दुल करीम तेलगी, एक समय दाऊद इब्राहिम के साथी अबु सालेम, अल कायदा के सबाहुद्दीन, प्रीति जैन आदि।

अपराधियों के बीच आने के पहले डॉ. मालिनी नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ मेंटल हेल्थ एण्ड न्यूरोसाइंसिस (नीमहांस ) से सम्बध्द थी। इस संस्था को पूरे एशिया में मनोरोगियों की देखभाल के लिए सर्वश्रेष्ठ अस्पताल माना जाता है। इस अस्पताल में जब भी किसी ड्रग्स एडिक्ट को लाया जाता, तब उसके इलाज में डॉ. मालिनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती। एक बार पुलिस के एक उच्चाधिकारी की नजर डॉ. मालिनी पर पड़ गई, वे उनकी कार्यप्रणाली से बहुत प्रभावित हुए। तब उन्होंने राय और केंद्र सरकार से डॉ मालिनी की सेवाएँ लेने की सिफारिश की। यही कारण है कि कुछ ही दिनों में डॉ. मालिनी का तबादला फोरेंसिक सइंस लेबोरेटरी में कर दिया गया। यहाँ पहुँचने के बाद डॉ. मालिनी ने नार्को टेस्ट और ट्रूथ सिरम के माध्यम से अपराधियों से सच किस तरह से उगलवाया जाए, इस पर एक रिसर्च तैयार किया और उसे केंद्र सरकार सूचना विभाग को भेज दिया। सामान्यत: केंद्र सरकार ऐसे विषय पर तुरंत कोई निर्णय नहीं लेती, परंतु न जाने क्यों, डॉ. मालिनी के शोधपत्र मे ऐसा क्या था कि सरकार ने तुरंत ही इस पर अपना निर्णय लेते हुए डॉ. मालिनी के सुझाव को माना और अपराधियों से सच उगलवाने के लिए इस तकनीक के इस्तेमाल की अनुमति दे दी।

सबसे पहले कर्नाटक सरकार ने ही इस तकनीक को अपनाया। कुछ ही वर्षो में डॉ। मालिनी का नाम इस क्षेत्र में गूँजने लगा। फिर तो अपराधियों के बीच रहना उनकी दिनचर्या में ही शामिल हो गया। पिछले आठ वर्षों में डॉ. मालिनी ने इस क्षेत्र में अपना काम पूरी शिद्दत से करते हुए इतनी महारत हासिल की कि अपराधी उनके नाम से ही काँपने लगते। उसके बाद ही पुलिस ने उनकी सेवाएँ लेनी शुरू की। आज स्थिति लगातार बदल रही है। रोज-रोज नए-नए अपराधी उनके सामने होते हैं, एक महिला होने के नाते डॉ. मालिनी बखूबी जानती हैं कि उनका काम ही ऐसा है कि अपराधियों की ऑंखों की किरकिरी बनना स्वाभाविक है। फिर भी वह आज भी अपना काम बिंदास भाव से करती हैं। बिना डरे बिना थके... ऐसी जाँबाज महिला को शत-शत नमन ...।
हम समवेत

Sunday

एक्सक्लूसिव और ब्रेकिंग के बीच तड़पती खबरें

- संजय द्विवेदी -

खबरिया चैनलों की होड़ और गलाकाट स्पर्धा ने खबरों के मायने बदल दिए हैं। खबरें अब सिर्फ सूचनाएं नहीं देती, वे एक्सक्लूसिव में बदल रही हैं। हर खबर का अब ब्रेकिंग न्यूज में बदल जाना सिर्फ खबर की कलरिंग भर का मामला नहीं है। दरअसल, यह उसके चरित्र और प्रस्तुति का भी बदलाव है । खबरें अब निर्दोष नहीं रहीं। वे अब सायास हैं, कुछ सतरंगी भी। खबरों का खबर होना सूचना का उत्कर्ष है, लेकिन जब होड़ इस कदर हो तो खबरें सहम जाती हैं, सकुचा जाती है। और खड़ी हो जाती हैं किनारे। खबर का प्रस्तोता स्क्रीन पर आता है और वह बताता है कि यह खबर आप किस नज़र से देखेंगे। पहले खबरें दर्शक को मौका देती थीं कि वह समाचार के बारे में अपना नज़रिया बनाए। अब नज़रिया बनाने के लिए खबर खुद बाध्य करती है। आपको किस ख़बर को किस नज़रिए से देखना है, यह बताने के लिए छोटे पर्दें पर तमाम सुंदर चेहरे हैं जो आपको अपनी खबर के साथ बहा ले जाते हैं।
ख़बर क्राइम की है तो कुछ खतरनाक शक्ल के लोग, खबर सिनेमा की है तो कुछ सुदर्शन चेहरे, ख़बर गंभीर है तो कुछ गंभीरता का लबादा ओढ़े चेहरे ! कुल मिलाकर मामला अब सिर्फ ख़बर तक नहीं है। ख़बर तो कहीं दूर बहुत दूर, खडी़ है...ठिठकी हुई सी। उसका प्रस्तोता बताता है कि आप ख़बर को इस नज़र देखिए। वह यह भी बताता है कि इस ख़बर का असर क्या है और इस खबर को देख कर आप किस तरह और क्यों धन्य हो रहे हैं ! वह यह भी जोड़ता है कि यह ख़बर आप पहली बार किसी चैनल पर देख रहे हैं।
दर्शक को कमतर और ख़बर को बेहतर बताने की यह होड़ अब एक ऐसी स्पर्धा में तब्दील हो गई है जहाँ ख़बर अपने असली व्यक्तित्व को खो देती है और वह बदल जाती है नारे में, चीख में, हल्लाबोल में या एक ऐसे मायावी संसार में जहाँ से कोई मतलब निकाल पाना ज्ञानियों के ही बस की बात है।
हर ख़बर कैसे ब्रेकिंग या एक्सक्लूसिव हो सकती है, यह सोचना ही रोचक है। टीवी ने खबर के शिल्प को ही नहीं बदला है। वह बहुत कुछ फिल्मों के करीब जा रही है, जिसमें नायक हैं, नायिकाएं हैं और खलनायक भी। साथ मे है कोई जादुई निदेशक। ख़बर का यह शिल्प दरअसल खबरिया चेनलों की विवशता भी है। चौबीस घंटे के हाहाकार को किसी मौलिक और गंभीर प्रस्तुति में बदलने के अपने खतरे हैं, जो कुछ चैनल उठा भी रहे हैं। पर अपराध, सेक्स, मनोरंजन से जुड़ी खबरें मीडिया की आजमायी हुई सफलता का फंडा है। हमारी नैसिर्गिकी विकृतियों का प्रतिनिधित्व करने वाली खबरें खबरिया चैनलों पर अगर ज्यादा जगह पाती हैं तो यह पूरा का पूरा मामला कहीं न कहीं टीआरपी से ही जाकर जुड़ता है। इतने प्रभावकारी माध्यम और उसके नीति नियामकों की यह मजबूरी और आत्मविश्वासहीनता समझी जा सकती है। बाजार में टिके रहने के अपने मूल्य हैं।
ये समझौतों के रूप में मीडिया के समर्पण का शिलालेख बनाते हैं। शायद इसीलिए जनता का एजेंडा उस तरह चैनलों पर नहीं दिखता, जिस परिमाण में इसे दिखना चाहिए। समस्याओं से जूझता समाज, जनांदोलनों से जुड़ी गतिविधियाँ, आम आदमी के जीवन संघर्ष, उसकी विद्रूपताएं हमारे मीडिया पर उस तरह प्रस्तुत नहीं की जाती कि उनसे बदलाव की किसी सोच को बल मिले। पर्दें पर दिखती हैं रंगीनियाँ, अपराध का अतिरंजित रूप, राजनीति का विमर्श और सिनेमा का हाहाकारी प्रभाव । क्या खबरें इतनी ही हैं ?
बॉडी और प्लेजर की पत्रकारिता हमारे सिर चढ़कर नाच रही है। शायद इसीलिए मीडिया से जीवन का विमर्श, उसकी चिंताएं और बेहतर समाज बनाने की तड़प की जगह सिकुड़ती जा रही है। कुछ अच्छी खबरें जब चैनलों पर साया होती हैं तो उन्हें देखते रहना एक अलग तरह का आनंद देता है।
एनडीटीवी ने 'मेघा रे मेघा' नाम से बारिश को लेकर अनेक क्षेत्रों से अपने नामवर रिपोर्टरों से जो खबरें करवाईं वे अदभुत हैं। उनमें भाषा, स्थान, माटी की महक, फोटोग्राफर, रिपोर्टर और संपादक का अपना सौंदर्यबोध भी झलकता है। प्रकृति के इन दृश्यों को इस तरह से कैद करना और उन्हें बारिश के साथ जोड़ना तथा इन खबरों का टीवी पर चलना एक ऐसा अनुभव है जो हमें हमारी धरती के सरोकारों से जोड़ता है। इस खबर के साथ न ब्रेकिंग का दावा था न एक्सक्लूसिव का लेकिन ख़बर देखी गई और महसूस भी की गई।
कोकीन लेती युवापीढ़ी, राखी और मीका का चुंबन प्रसंग, करीना या शाहीद कपूर की प्रेम कहानियों से आगे जिंदगी के ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जो इंतजार कर रहे हैं कि उनसे पास भी कोई रिपोर्टर आएगा और जहान को उनकी भी कहानी सुनाएगा।
अभिषेक बच्चन की शादी को लेकर चिंतित मीडिया शायद उन इलाकों और लोगों पर भी नज़र डालेगा जो सालों-साल से मतपेटियों मे वोट डालते आ रहे हैं, इस इंतजार में कि इन पतपेटियों से कोई देवदूत निकलेगा जो उनके सारे कष्ट हर लेगा ! लेकिन उनके भ्रम अब टूट चुके हैं। पथराई आँखों से वे किसी ख़बरनवीस की आँखें तकती है कि कोई आए और उनके दर्द को लिखे या आवाज़ दे।
कहानियों में कहानियों की तलाश करते बहुत से पत्रकार और रिपोर्टर उन तक पहुँचने की कोशिश भी करते रहे हैं। यह धारा लुप्त तो नहीं हुई है लेकिन मंद जरूर पड़ रही है। बाजार की मार, माँग और प्रहार इतने गहरे हैं कि हमारे सामने दिखती हुई ख़बरों ने हमसे मुँह मोड़ लिया है। हम तलाश में हैं ऐसी स्टोरी की जो हमें रातों-रात नायक बना दे, मीडिया में हमारी टीआरपी सबसे ऊपर हो, हर जगह हमारे अखबार/चैनल की ही चर्चा हो। इस बदले हुए बुनियादी उसूल ने खबरों को देखने का हमारा नज़रिया बदल-सा दिया है। हम खबरें क्रिएट करने की होड़ में हैं क्योंकि क्रिएट की गई ख़बर एक्सक्लूसिव तो होंगी ही ।
एक्सक्लूसिव की यह तलाश कहाँ जाकर रूकेगी, कहा नहीं जा सकता। बावजूद इसके हम पत्रकारिता के बुनियादी उसूलों पर कायम रहते हुए एक संतुलन बना पाएं तो यह बात हमारी विश्वसनीयता और प्रामाणिकता को बनाए रखने में सहायक होगी।
(संजय द्विवेदी रायपुर में जी चौबीस घंटे न्यूज चैनल के इनपुट एडीटर हैं)

भड़ास4मीडिया

Monday

पाक जेलों में प्रताड़ना से मरते हैं कैदी


पाकिस्तान की जेल में दस साल कैद काटने के बाद वतन लौटे रामप्रकाश की आपबीती भयावह है। रामप्रकाश को जासूसी के आरोप में जेल हुई थी। उन्हें गत एक जुलाई को रिहा किया गया था, लेकिन उनकी वतन वापसी सोमवार को संभव हो सकी। जेल में दी गई प्रताड़ना को रामप्रकाश भयावह बताते हैं। उनके मुताबिक एक साल तक तो जगह बदल-बदल कर लगातार यातना दी जाती रही। उन्होंने बताया कि जेल में करीब 25 ऐसे भारतीय कैदियों को देखा जो प्रताड़ित किए जाने के कारण अपनी सुध-बुध तक खो चुके थे। लगभग 30 भारतीय कैदियों की तो इन हालात में मौत हो चुकी है। जेलों में न तो अच्छा खाना दिया जाता है, न ही पीने को पानी और न ही इलाज की कोई सुविधा। रामप्रकाश ने सोमवार को वाघा बार्डर से पार होकर अपनी सरजमीं पर कदम रख ही दिए। रामप्रकाश जम्मू-कश्मीर के तवी जिले के रहने वाला है। सीमा पर रामप्रकाश के बेटे दीपक ने अपने पिता का गर्मजोशी से स्वागत किया। करीब दस साल पहले रामप्रकाश को सियालकोट से खुफियागिरी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। 1 जुलाई को सजा की मियाद खत्म होने पर उसे कोट लखपत जेल से रिहा कर दिया गया। वाघा बार्डर पर पाकिस्तान टीवी को दिए साक्षात्कार में रामप्रकाश ने बताया कि 1997 में उसे पाकिस्तान से शराब की तस्करी कर भारत में दाखिल होने की कोशिश करते हुए गिरफ्तार कर लिया गया था। उसने अपने ऊपर लगाए जासूसी के आरोपों को गलत बताया।

जागरण