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Sunday

वेतन बढ़े, निजाम भी तो सुघरे

  • जयंतीलाल भंडारी
एक सितम्बर से देश के 55 लाख से अधिक केंद्रीय कर्मचारियों को छठे वेतन आयोग के अनुरूप बढ़ा हुआ वेतन मिलना शुरू हो जाएगा। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को स्वीकृत करके केंद्रीय कर्मचारियों की तनख्वाह में औसतन 21 फीसदी बढ़ोतरी करने की मंजूरी दी हैै। वेतनमान में बढ़ोतरी के बाद पहले साल में केंद्र सरकार पर 30 हजार करोड़ रूपए का बोझ पड़ेगा। सरकारी कर्मचारी कई वर्षो से यह मांग करते रहे थे कि निजी क्षेत्र की तुलना में उनका वेतन बेहद कम है और इस असमानता को दूर किया जाना चाहिए।केंद्र सरकार के द्वारा छठे वेतन आयोग को लागू किए जाने के बाद अब राज्य सरकारों पर भी नए वेतनमान लागू करने का दबाव बढ़ गया है। सामान्यतया राज्य सरकारें केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर कर्मचारियों का वेतन तय करती हंै। चूंकि निकट भविष्य में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और अगले साल लोकसभा चुनाव भी है। राज्य सरकारें भी अपने कर्मचारियों को वेतन वृद्धि का तोहफा देने की कवायद में जुट गई हैं। उत्तरप्रदेश की मायावती सरकार ने नए वेतनमान का ऎलान भी कर दिया है। यद्यपि एक दशक पहले पांचवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करते समय गरीब राज्यों की वित्तीय स्थिति पर प्रतिकूल असर पड़ा था। कई राज्यों ने वित्तीय अनुकूलता न होने के कारण बकाया राशि का नकद भुगतान न कर, उसे भविष्य निधि कोष में जमा कराया था, इससे गरीब राज्यों की वित्तीय स्थिति पर तत्काल बोझ नहीं पड़ा था। इस बार भी जिन राज्यों की वित्तीय स्थिति सुदृढ़ नहीं है, वहां वेतन वृद्धि का असर ज्यादा तकलीफदेह दिखाई देगा।बहरहाल नए वेतनमान से केंद्र सरकार के कर्मचारियों की मुरादें पूरी हुई हैं। अब कई कर्मचारी नए वेतनमान से लाभ-हानि के गुणा-भाग में भी लग गए हैं। वे मालूम कर रहे हैं कि उन्हें और अन्य वर्गो के कर्मचारियों को कितना लाभ हुआ है। वे विचार कर रहे हैं कि सरकारी क्षेत्र के विभिन्न स्तरीय अधिकारियों के मघ्य वेतन की असमानता कितनी है और साथ ही उनके हिस्से आने वाला वेतन निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के मुकाबले में कितना है। कर्मचारियों के द्वारा यह विश्लेषण किया जा रहा है कि निम्न और उच्च पदों पर काम करने वाले कर्मचारियों का वेतन अंतर और कितना बढ़ गया है। यह देखा जा रहा है कि संशोधित वेतन से सचिव स्तर के कर्मचारियों को जहां 90,000 रूपए मासिक वेतन मिलेगा, वहीं सबसे निचले तबके के कर्मचारियों को 10,000 रूपए मासिक वेतन मिलेगा। यह भी विश्लेषण हो रहा हैै कि निजी क्षेत्रों में सीईओ और प्रशासनिक स्तर के अधिकारियों का जो वेतन सरकारी अधिकारियों के मुकाबले पहले कितना ज्यादा था और नए वेतनमान के बाद भी क्या यह अंतर बना हुआ हैक् यह विश्लेषण उभरकर सामने आ रहे हैं कि निजी क्षेत्र में नए उच्च अधिकारियों को शुरूआत में ही जहां 1 लाख से अधिक रूपए तक मासिक तनख्वाह मिलती हैै, वहीं छठे वेतनमान के तहत सरकारी कर्मचारी लम्बे अनुभव के बाद भी इस आंकड़े तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। विश्लेषण किया जा रहा है कि मघ्यम दर्जे के सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बीच छठे वेतन आयोग के वेतनमान में जरूर समानता होगी। विश्लेषण किया जा रहा है कि छठे वेतन आयोग के तहत सरकारी कर्मचारियों को 2।5 से 3 फीसदी सालाना वेतनवृद्धि प्राप्त होगी, जबकि निजी क्षेत्र में वेतनवृद्धि का आंकड़ा वैश्विक मंदी के दौर में भी 10 से 20 फीसदी के मघ्य हैै। अनुभव किया जा रहा है कि आईटी, कम्प्यूटर, बैंकिंग, वित्त तथा सेवा क्षेत्र की कम्पनियों के कर्मचारियों को बहुत वेतन मिल रहा है। उन्हेें और अधिक वेतन मिल रहा है जो एकदम नई उम्र के हैैं और अच्छे शैक्षणिक संस्थानों से ऊंची गुणवत्ता डिग्रियां लेकर निकले हैैं। दूसरी ओर अर्थ विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी नौकरी वेतन में निजी क्षेत्र की तुलना में कुछ कमजोर क्यों न हो, मगर वह कई दृष्टिकोणों से निजी क्षेत्र से बेहतर ही रहेेगी। सरकारी नौकरी में वेतन के साथ मिलने वाले अन्य लाभ बेहतर होते हैैं और उनकी उपयोगिता निजी क्षेत्र के मुकाबले अधिक होती हैै। अन्य लाभों में पेंशन, जॉब सुरक्षा तथा तनाव रहित कार्य स्थितियां प्रमुख रूप से गिनाई जा सकती हैं। कारपोरेेट अधिकारियों के बीच कराए गए एक नवीनतम सर्वेक्षण से भी इसकी पुष्टि होती है। सर्वेक्षण में यह सामने आया है कि प्रतिभाशाली लोग अब भी सरकारी प्रशासनिक सेवाओं में जाना ज्यादा पसंद करते हैैं। निजी क्षेत्र में जितना वेतन दिया जाता हैै उसका परिणाम मिल जाता है, लेकिन सरकारी क्षेत्र में भारी-भरकर वेतन और अन्य सुविधाओं का उपयुक्त परिणाम नहीं मिल पाता हैै। सरकारी क्षेत्र में निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की तुलना में कर्मचारियों की उत्पादकता कम हैै और उनमें नए आर्थिक दौर के अनुरूप प्रतिस्पर्धा की दौड़ में कार्य करने के लिए पहल क्षमता और उत्साह का अभाव हैै। सरकारी क्षेत्र अब भी वैश्वीकरण की चुनौतियों को समझ नहीं पाया हैै। सरकारी क्षेत्र में कदम-कदम पर भ्रष्टाचार है। पिछले दिनों ट्रांसपेरेेंसी इंटरनेशनल और सेंटर फॉर मैनेजमेंट स्ट्डीज द्वारा भारत में भ्रष्टाचार पर तैयार की गई रिपोर्ट में कहा गया हैै कि देश में भ्रष्टाचार खतरनाक स्तर पर है। देश के लगभग सभी सरकारी विभागों में रिश्वत ली जाती है। स्थिति इतनी चिंताजनक है कि देश में अमीर एवं मघ्यम वर्ग को ही नहीं गरीब आदमी को भी बुनियादी सेवाएं हासिल करने के लिए सरकारी विभागों के अधिकारियों व कर्मचारियों की आए दिन मुटी गर्म करनी पड़ती है। अब छठे वेतन आयोग ने कार्य संस्कृति, समयबद्धता, अनुशासन, कर्मचारियों की संख्या व खर्च में कटौती, कागजी कार्यो में कमी, अल्पावधि जांच, अनुबंधित सेवा, कार्यकुशलता आधारित पदोन्नति और लेटलतीफ कर्मचारियों पर निगरानी आदि पर जो सिफारिशें दी हैं, वेतन बढ़ाने के साथ इनका परिपालन जरूरी किया जाए। सरकार को अब सरकारी कर्मचारियों के कार्यो की जवाबदेही की रू परेखा बनानी होगी। यदि कल तक यह कहा जाता रहा है कि कम वेतन पर भ्रष्टाचार पनपता है तो अब नए समुचित वेतन पर जवाबदेही भी स्पष्ट रूप से निर्धारित होनी चाहिए। चूंकि केंद्र सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों को छठे वेतन आयोग के माघ्यम से अच्छे वेतन दिए हैं। अतएव देश के करोड़ों लोग सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों से भ्रष्टाचार रहित कर्तव्य परायणता और कार्यकुशलता की उम्मीदें कर रहे हैं। इसलिए सभी केंद्रीय अधिकारियों और कर्मचारियों को इस बात को घ्यान में रखना होगा कि वैश्विक गांव बन गई नई दुनिया के आर्थिक परिवेश में भारत को आगे बढ़ाने के लिए नई कार्य संस्कृति को अपनाएंगे। हम आशा करें कि देश का सरकारी क्षेत्र नए वेतनमान की खुशियों के साथ निजी क्षेत्र की तरह उत्पादकता, गुणवत्ता और कामयाबी का परचम लहराएगा।
[लेखक ख्यात अर्थशास्त्री हैं]
पत्रिका से साभार

Saturday

कुत्ते से करवाया गया कैदी का रेप

जुल्म की इंतहा, जिसे सुनकर पत्थर दिल भी कांप जाए। लीबिया की जेल में बंद रहे फलस्तीनी मूल के एक डॉक्टर ने अपने साथ किए गए भयावह टॉर्चर की जो कहानी कोर्ट के सामने पेश की, वह दुनिया में मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ने की गवाह है। कई बच्चों में एड्स फैलाने के आरोप में बंद डॉक्टर अशरफ अल-हजूज को अन्य भयानक पीड़ाएं तो दी ही गईं, उनका एक जर्मन शेफर्ड कुत्ते से रेप भी करवाया गया। हजूज के निर्ममतापूर्वक नाखून उखाड़े गए। उन्हें बिजली के शॉक भी दिए जाते थे। हजूज को आठ साल से भी ज़्यादा समय तक बुल्गारिया की पांच नर्सेस के साथ लीबिया की एक जेल में रखा गया था। इनमें से ज़्यादातर को मौत की सज़ा सुना दी गई थी। इन लोगों पर आरोप था कि इन्होंने 438 बच्चों को एड्स-संक्रमित खून चढ़ाकर उनमें यह बीमारी फैलाई। हजूज ने खुद को बेकसूर बताते हुए जज से कहा कि मैंने अपने ऊपर किए जा रहे टॉर्चर के चलते मान लिया कि मैंने बच्चों में एड्स फैलाए और सीआईए (अमेरिकी खुफिया एजंसी) और मोसाद (इसराइली खुफिया एजंसी) के साथ सहयोग किया। डर इतना था कि मैं कुछ भी मानने को तैयार था। यह तब हुआ, जब मेरे साथ कुत्ते वाला प्रकरण हो चुका था। इन छहों कैदियों पर टूटे सितम के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी प्रतिक्रिया हुई जिसकी वजह से लीबिया को इनकी मौत की सज़ा को उम्रकैद में तब्दील करना पड़ा। फ्रांस की पूर्व प्रथम महिला सेसिलिया सार्कोज़ी व अन्य की कोशिशों से आखिरकार इन छहों की दोज़ख की ज़िंदगी का अंत हुआ और जुलाई 2007 में ये छूटकर घर लौटे। हजूज ने यह भी कहा कि टॉर्चर के दौरान मेरी आंखों पर पट्टी बांध दी जाती थी। जेल में बिताए शुरुआती दिनों में मेरे साथ टॉर्चर ज़्यादा हुआ। मैं उस वक्त भी मौजूद रहता था बाकी कैदियों को यातना दी जाती थी। ये सभी छूटकर बुल्गारिया लौट आए।

अम्मा इज्जत तोप दो

  • नवीन पाण्डेय
हरिद्वार। '..हम लोगों के देश में बाढ़ आई गई हाय, बाढ़ में सब दहई गया है, अम्मा, बहन, भईया हमार इज्जत तोप दो, साड़ी, बर्तन, कपड़ा दइ द।' यह वेदना उस महिला की है जो बिहार की बाढ़ में अपना मकान, सामान व पशु सब कुछ खो चुकी है। नाते और रिश्तेदार से बिछड़ चुकी है। दाने-दाने को मोहताज हो गई है।
कहीं पनाह नहीं मिली तब 20 लोगों के कुनबे को लेकर वह मां गंगा की नगरी पहुंच गई। घर-घर घूम कर वह बिहार की बाढ़ में सब कुछ बह जाने की बात कहकर फूट-फूट कर रोती है और तन ढकने को कपड़ा और भोजन बनाने को बर्तन मांगती है। कुछ का दिल पसीजता है तो वे साड़ी-बर्तन दे देते हैं, जबकि बहुत उसकी आवाज को सुनते तक नहीं।
बिहार की बाढ़ अब राष्ट्रीय आपदा घोषित हो चुकी है। निश्चित रूप से बिहार की तस्वीर देख रूह कांप जाती है। सभी के मुंह से यही निकलता है, ऐसी आपदा कहीं न आए।
बिहार के पूर्णिया जो सबसे ज्यादा बाढ़ प्रभावित क्षेत्र है से फुलझरी नाम की महिला ट्रक से दो दिन का सफर तय कर अपने घरवालों और पड़ोसियों को लेकर हरिद्वार पहुंची हैं। फुलझरी ज्वालापुर की लाल मंदिर कालोनी के एक मकान की दहलीज पर फूट-फूटकर रोती है। कालोनी वालों से कपड़ा, बर्तन, खाने को अनाज मांगती है। अम्मा, बहन व भाई का हवाला देती है। फुलझारी बिहार के हालात के बारे में बार-बार कहती है 'हम लोग के देश में बाढ़ आई गई हय, बाढ़ में सब दहइ गई ह' और फिर फूट-फूटकर रोने लगती है। रोते हुए कहती है कई दिन हो चुका है, पेट भर खाना नहीं मिला। रिश्तेदार व नातेदार कहां है, उसे कुछ पता नहीं। घर और मवेशी बाढ़ की भेंट चढ़ चुके हैं। हरिद्वार में उसके प्रदेश के लोग हैं, उनके सहारे वह यहां पहुंचे हैं। अब घर-घर घूमकर बर्तन, साड़ी, कपड़ा मांग रहे हैं, जिससे गुजर बसर चल सके।
बाढ़ ने मीना को अपनों से किया अलग
सहरसा [बिहार]।
कोसी नदी में आई बाढ़ में फुलझारी की तरह ही मीना देवी ने भी अपना सबकुछ खो दिया है। वे अपने पति और दो बच्चों से बिछुड़ गई हैं। नदी की तेज धार में उनका घर, कई पालतू जानवर व अनाज की बोरियां बह गई हैं, लेकिन उनकी आंखें अब भी अपने पति और बच्चों की राह तक रही हैं।
अपनी बेटी और अन्य ग्रामीणों के साथ गत पांच दिनों से शहर के एक राहत शिविर में रह रही मीना ने कहा कि मेरी नींद उड़ गई हैं और भूख समाप्त हो गई है। फिलहाल मैं पानी पीकर दिन गुजार रही हूं और अपने पति व बच्चों के सुरक्षित रहने की प्रार्थना करती रहती हूं। मीना लगातार जिले के अधिकारियों से अपने पति और बच्चों का पता लगाने की गुहार कर रही हैं।
उन्होंने कहा कि हम लोग यहां सुरक्षित पहुंच गए है, लेकिन मैं अपने पति और बच्चों को लेकर चिंतित हूं, जो बाढ़ आने से ठीक एक दिन पहले अपने रिश्तेदार के यहां एक समारोह में भाग लेने गए थे। उल्लेखनीय है कि राज्य में आई बाढ़ से 14 जिलों के करीब 20 लाख प्रभावित हुए है।
जागरण

Wednesday

अब बजेगी रिंगटोन- कंडोम...कंडोम....

यदि किसी शादी की पार्टी में आपका फोन बजे और उसकी रिंगटोन हो- कंडोम...कंडोम...तो क्या आप शर्मा जाएँगे, लज्जित होंगे और घबरा जाएँगे? और आपके आसपास खड़े लोगों की क्या प्रतिक्रिया होगी?यदि आप ये सोच रहे हैं कि लोग ऐसे रिंगटोन को अच्छा नहीं मानेंगे तो आप गलत हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ज़्यादातर लोगों को इससे कोई आपत्ति नहीं बल्कि वे ऐसे रिंगटोन को स्मार्ट, जागरूक और ज़िम्मेदार बर्ताव की निशानी मानते हैं। बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट ने ऐसी रिंगटोन तैयार की है, जो एड्स के बारे में जागरूकता पैदा करने और कंडोम का इस्तेमाल बढ़ाने के लक्ष्य से तैयार किए गए उसके अभियान का हिस्सा है। अगस्त में शुरू हुए इस रिंगटोन को दो ही दिन में लगभग बीस हजार लोगों ने डाउनलोड किया। इस विज्ञापन को बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन की आर्थिक मदद से बनाया गया है और इसे भारत का राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नैको) देश में कंडोम के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल करेगा। 'जो समझा वही सिकंदर' : इस विज्ञापन अभियान की मुख्य पंक्ति है- 'जो समझा वही सिकंदर।' बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट की क्रिएटिव डायरेक्टर राधारानी मित्रा का कहना है कि लोगों के लिए रिंगटोन व्यक्तिगत पसंद व्यक्त करने का माध्यम बनता जा रहा है। हमें लगा कि कंडोम इस्तेमाल करने वाले लोगों को समझदार दिखाने का ये सबसे बेहतर माध्यम है। इस रिंगटोन को इस्तेमाल करने से लोगों की कंडोम के बारे में झिझक भी खत्म होगी।इस अभियान के तहत रिंगटोन को वेबसाइट से डाउनलोड किया जा सकता है, ऑनलाइन खेल खेले जा सकते हैं और विज्ञापन टीवी और रेडियो के जरिए देखा जा सकता है। रिंगटोन को भारत में 'सीओएनडओएम' लिखकर 56887 नंबर पर एसएमएस करके भी डाउनलोड किया जा सकता है। गौरतलब है कि रिंगटोन विज्ञापन इस अभियान का तीसरा चरण है जिसके तहत इसे आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और तमिलनाडु के लोगों तक पहुँचाया जा रहा है, जहाँ एचआईवी संक्रमण की दर बहुत अधिक है।

Monday

कौन हैं राजगुरु.. याद नहीं

  • हजारी लाल
अफसोस है जिस शख्स ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम देश को गुलामी की बेड़ियों से आजाद करवाया आज उसी को सभी ने भूला दिया।
अमर शहीद भगत सिंह के साथ कंधे से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता आंदोलन में प्राणों की आहुति देने वाले शहीद राजगुरु का जन्म शताब्दी समारोह रविवार को अंधेरे में गुजर गया। न तो किसी राजनीतिक दल को इनकी याद आई और न ही प्रशासन को। नतीजतन शहीद के सौवें जन्मदिवस पर किसी ने श्रद्धा के दो फूल चढ़ाने की भी जहमत नहीं उठाई।
हालांकि नौ दिन पहले ही आजादी दिवस पर देश के नेताओं व प्रशासनिक अधिकारियों ने शहीदों की कुर्बानियों को हमेशा याद रखने और उनके पद चिन्हों पर चलने की कसमें खाई लेकिन उनके ये वादे-कसमें बच्चों की तरह खेल-खेल में किए गए वादों की तरह टूट गए। विडंबना देखिए कि जन्मशताब्दी मनाने के लिए प्रशासनिक अधिकारी सरकार के पत्र का इंतजार करते रहे। जबकि सत्ता के नशे में चूर नेता राजनीतिक गलियारों में अपने खेल में उलझे रहे। कुछ दिन पहले शहीद भगत सिंह की प्रतिमा संसद में लगाए जाने को लेकर शोर-शराब कर रही बादल सरकार को उनके साथी राजगुरु की शहादत याद न रही है। नेताओं के इस भेदभाव से जहां क्षेत्रवाद की बू आती है वहीं महाराष्ट्र में जन्मे राजगुरु को प्रदेश भर में कहीं याद न करना शहीदों का घोर अपमान है।
इस संबंध में जब होशियारपुर के डीसी एन के वधावन ने बातचीत की गई तो उन्होंने कहा कि वह शहीद राजगुरु को नतमस्तक करते है। उन्हें इस संबंध में समारोह आयोजित करने संबंधी सरकार की तरफ से कोई पत्र नहीं आया था। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि शहीद सभी के लिए सम्माननीय है। जबकि फिरोजपुर के डीसी ने व्यक्तिगत तौर पर अफसोस जाहिर करते कहा कि वह बाढ़ के काम में इस तरह उलझे कि उन्हें याद ही नहीं रहा।
गौरतलब है कि शहीद राजगुरु का जन्म 24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र प्रदेश में हुआ था। वे देश को आजाद करवाने के लिए मात्र 22 साल, सात महीने, छह दिन की आयु में शहीद भगत सिंह व सुखदेव थापर के साथ फांसी के फंदे को हंसते-हंसते चूम लिया था। इतिहास गवाह है कि पिछले 61 वर्षो से सरकारी तंत्र शहीद भगत सिंह, शहीद सुखदेव व शहीद राजगुरु की याद में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री व तमाम मंत्री व प्रशासनिक अधिकारी हर साल हुसैनीवाला में शहीदों को प्रणाम करते जाते है और उन्हे न भूलने की कसमें खाते है। मगर वही शहीद राजगुरु की जन्म शताब्दी को मनाना ही भूल गए। किसी को ख्याल ही नहीं रहा कि शहीद राजगुरु की जन्म शताब्दी है।
कुछ याद उन्हे भी कर लो..
होशियारपुर जिले में न तो सरकारी तौर पर उनकी याद में कोई समारोह हुआ और न ही खुद को समाज का ठेकेदार कहलाने वालों को उनकी याद आई। इससे खफा होकर नाटककार अशोक पुरी ने अपनी टीम के कलाकार तिलक राज राजू, मनजीत सिंह, भूपिंदर पधियानवी, लाडी डडियाना के साथ यहां पर नुक्कड़ नाटक कर सरकार व प्रशासन की उदासीनता को उजागर किया। कलाकारों ने कटाक्ष किया कि बड़े अफसोस की बात है कि खून बहाकर आजादी दिलाने वाले सपूत को यह भूल गए।
जागरण

कौन हैं राजगुरु.. याद नहीं



  • हजारी लाल

अफसोस है जिस शख्स ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम देश को गुलामी की बेड़ियों से आजाद करवाया आज उसी को सभी ने भूला दिया।
अमर शहीद भगत सिंह के साथ कंधे से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता आंदोलन में प्राणों की आहुति देने वाले शहीद राजगुरु का जन्म शताब्दी समारोह रविवार को अंधेरे में गुजर गया। न तो किसी राजनीतिक दल को इनकी याद आई और न ही प्रशासन को। नतीजतन शहीद के सौवें जन्मदिवस पर किसी ने श्रद्धा के दो फूल चढ़ाने की भी जहमत नहीं उठाई।
हालांकि नौ दिन पहले ही आजादी दिवस पर देश के नेताओं व प्रशासनिक अधिकारियों ने शहीदों की कुर्बानियों को हमेशा याद रखने और उनके पद चिन्हों पर चलने की कसमें खाई लेकिन उनके ये वादे-कसमें बच्चों की तरह खेल-खेल में किए गए वादों की तरह टूट गए। विडंबना देखिए कि जन्मशताब्दी मनाने के लिए प्रशासनिक अधिकारी सरकार के पत्र का इंतजार करते रहे। जबकि सत्ता के नशे में चूर नेता राजनीतिक गलियारों में अपने खेल में उलझे रहे। कुछ दिन पहले शहीद भगत सिंह की प्रतिमा संसद में लगाए जाने को लेकर शोर-शराब कर रही बादल सरकार को उनके साथी राजगुरु की शहादत याद न रही है। नेताओं के इस भेदभाव से जहां क्षेत्रवाद की बू आती है वहीं महाराष्ट्र में जन्मे राजगुरु को प्रदेश भर में कहीं याद न करना शहीदों का घोर अपमान है।
इस संबंध में जब होशियारपुर के डीसी एन के वधावन ने बातचीत की गई तो उन्होंने कहा कि वह शहीद राजगुरु को नतमस्तक करते है। उन्हें इस संबंध में समारोह आयोजित करने संबंधी सरकार की तरफ से कोई पत्र नहीं आया था। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि शहीद सभी के लिए सम्माननीय है। जबकि फिरोजपुर के डीसी ने व्यक्तिगत तौर पर अफसोस जाहिर करते कहा कि वह बाढ़ के काम में इस तरह उलझे कि उन्हें याद ही नहीं रहा।
गौरतलब है कि शहीद राजगुरु का जन्म 24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र प्रदेश में हुआ था। वे देश को आजाद करवाने के लिए मात्र 22 साल, सात महीने, छह दिन की आयु में शहीद भगत सिंह व सुखदेव थापर के साथ फांसी के फंदे को हंसते-हंसते चूम लिया था। इतिहास गवाह है कि पिछले 61 वर्षो से सरकारी तंत्र शहीद भगत सिंह, शहीद सुखदेव व शहीद राजगुरु की याद में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री व तमाम मंत्री व प्रशासनिक अधिकारी हर साल हुसैनीवाला में शहीदों को प्रणाम करते जाते है और उन्हे न भूलने की कसमें खाते है। मगर वही शहीद राजगुरु की जन्म शताब्दी को मनाना ही भूल गए। किसी को ख्याल ही नहीं रहा कि शहीद राजगुरु की जन्म शताब्दी है।
कुछ याद उन्हे भी कर लो..
होशियारपुर जिले में न तो सरकारी तौर पर उनकी याद में कोई समारोह हुआ और न ही खुद को समाज का ठेकेदार कहलाने वालों को उनकी याद आई। इससे खफा होकर नाटककार अशोक पुरी ने अपनी टीम के कलाकार तिलक राज राजू, मनजीत सिंह, भूपिंदर पधियानवी, लाडी डडियाना के साथ यहां पर नुक्कड़ नाटक कर सरकार व प्रशासन की उदासीनता को उजागर किया। कलाकारों ने कटाक्ष किया कि बड़े अफसोस की बात है कि खून बहाकर आजादी दिलाने वाले सपूत को यह भूल गए।

जागरण

Sunday

आज भी खड़ा है संजीवनी बूटी वाला पहाड़

रामायण का लंका कांड। युद्ध के मैदान में लक्ष्मण और मेघनाद एक दूसरे से जूझ रहे थे। इस बीच मेघनाद ने चला दी शक्ति, बाण लक्ष्मण के सीने में लगा। मूर्छित हो गए लक्ष्मण।
विभीषण के कहने पर लंका से वैद्य सुषेण को बुलाया गया। सुषेण ने आते ही कहा कि लक्ष्मण को अगर कोई चीज बचा सकती है ते वो हैं चार बूटियां-मृतसंजीवनी, विशालयाकरणी, सुवर्णकरणी और संधानी बूटियां। ये सभी बूटियां सिर्फ हिमालय पर मिल सकती थीं।
हनुमान आकाशमार्ग से चलकर हिमालय पर्वत पहुंचे। सुषेण ने संजीवनी को चमकीली आभा और विचित्र गंध वाली बूटी बताया था। पहाड़ पर ऐसी कई बूटियां थीं। पहचान न पाने के कारण हनुमानजी पर्वत का एक हिस्सा ही तोड़कर उठा ले गए थे।
पहाड़ लेकर युद्धक्षेत्र पहुंचे हनुमान ने पहाड़ वहीं रख दिया। वैद्य ने संजीवनी बूटी को पहचाना और लक्ष्मण का उपचार किया। लक्ष्मण ठीक हो गए और राम ने रावण को युद्ध में पराजित कर दिया। हनुमान का लाया वो पहाड़ वहीं रखा रहा।
उस पहाड़ को आज सारी दुनिया रूमास्सला पर्वत के नाम से जानती है। श्रीलंका की खूबसूरत जगहों में से एक उनावटाना बीच इसी पर्वत के पास है। उनावटाना का मतलब ही है आसमान से गिरा।
श्रीलंका के दक्षिण समुद्री किनारे पर कई ऐसी जगहें हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि वहां हनुमान के लाए पहाड़ के टुकड़े गिरे थे। इनमें रूमास्सला हिल सबसे अहम है। खास बात ये कि जहां-जहां ये टुकड़े गिरे, वहां-वहां की जलवायु और मिट्टी बदल गई।
इन जगहों पर मिलने वाले पेड़-पौधे श्रीलंका के बाकी इलाकों में मिलने वाले पेड़-पौधों से काफी अलग हैं। रूमास्सला के बाद जो जगह सबसे अहम है वो है रीतिगाला। हनुमान जब संजीवनी का पहाड़ उठाकर श्रीलंका पहुंचे, तो उसका एक टुकड़ा रीतिगाला में गिरा।
रीतिगाला की खासियत है कि आज भी जो जड़ी-बूटियां उगती हैं, वो आसपास के इलाके से बिल्कुल अलग हैं। दूसरी जगह है हाकागाला। श्रीलंका के नुवारा एलिया शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर हाकागाला गार्डन में हनुमान के लाए पहाड़ का दूसरा बडा़ हिस्सा गिरा।
इस जगह की भी मिट्टी और पेड़ पौधे अपने आसपास के इलाके से बिल्कुल अलग हैं। पूरे श्रीलंका में जगह-जगह रामायण की निशानियां बिखरी पड़ी हैं। हर जगह की अपनी कहानी है, अपना प्रसंग है।
आईबीएन-7

Saturday

एक गोद सूनी कर भरी गई दूसरी गोद

आस्ट्रेलिया में भारतीय बच्चों की तस्करी का सनसनीखेज मामला सामने आया है। एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत से 13 बच्चे चुराकर आस्ट्रेलिया लाए गए ताकि उन्हें यहां गोद दिया जा सके। आस्ट्रेलियाई सरकार ने मामले को गंभीरता से लिया है और इसकी जांच शुरू करा दी है।
मशहूर 'टाइम' पत्रिका में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि गोद लेने संबंधी कामकाज से जुड़ी एक भारतीय एजेंसी ने इन बच्चों को चुराया। एजेंसी ने बच्चों को गोद देने के मकसद से उनके नाम बदले, माता-पिता की फर्जी तस्वीरें पेश कीं और अन्य फर्जी दस्तावेज तैयार किए।
रिपोर्ट में मानवाधिकार मामलों के एक भारतीय वकील के हवाले से कहा गया है पिछले 10 से 15 सालों के दौरान आस्ट्रेलिया लाए गए करीब 400 बच्चों में से 30 तस्करी के मामले थे। आस्ट्रेलिया के अटार्नी जनरल राबर्ट मैक्लीलैंड ने भी बच्चे गोद लेने के दो मामलों में तस्करी की बात पर सहमति जताई है। उन्होंने कहा कि इस खुलासे के बाद मामले की जांच शुरू कर दी गई है।
मैक्लीलैंड के मुताबिक भारत में इस एजेंसी के संपर्क में आने से पहले भी बच्चों की तस्करी की बात सामने आती रही है। मैक्लीलैंड ने तो यहां तक कहा कि वह जानते हैं कि इनमें से एक बच्चा अभी कहां रह रहा है। हालांकि उन्होंने उसकी पहचान और जगह बताने से इनकार कर दिया।
टाइम में दावा किया गया है कि चेन्नई की एक नौ वर्षीय लड़की को उस वक्त चुरा लिया गया जब उसकी मां बाजार गई थी। वर्ष 2000 में इस लड़की को क्वींसलैंड में रहने वाले एक परिवार ने गोद ले लिया था। क्वींसलैंड राज्य सरकार में बाल सुरक्षा मंत्री मार्गरेट कीच ने भी माना कि राज्य में गोद लिए गए कुछ बच्चे तस्करी के जरिए लाए गए हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि हमारी सरकार संघीय व अन्य जांच एजेंसियों के साथ मिलकर इस मामले की गहराई से छानबीन करेगी।
जागरण

Friday

अब इंजेक्शन से नसबंदी

  • अविनाश बाकोलिया
परिवार नियोजन के लिए अब पुरूषों को ऑपरेशन जैसी जटिल प्रक्रिया से नहीं गुजरना होगा। सिर्फ एक इंजेक्शन से ही नसबंदी हो जाएगी। यह नई तरकीब ढंूढी है राजस्थान यूनिवर्सिटी एवं सवाईमानसिंह अस्पताल के प्रोफेसरों ने। गौरतलब है कि अभी तक भारत में पुरूष नसबंदी का औसत सिर्फ दो फीसदी है। इसके पीछे प्रमुख कारण शल्य क्रिया को लेकर लोगों के मन में बैठा भय बताया जाता है। मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर एवं इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की ओर से पुरूषों के लिए ऑपरेशन के अलावा अन्य विकल्पों को तलाशने के तहत यह जिम्मेदारी राजस्थान यूनिवर्सिटी के प्राणिशास्त्र विभाग के प्रो। एन.के. लोहिया व एसएमएस के यूरोलॉजी विभाग के विभागाघ्यक्ष प्रो. टी.सी. सदासुखी व एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राजीव माथुर को सौंपी गई। रिसर्च के जरिए इन्होंने "रीसूग" नामक इंजेक्शन इजाद किया। इस इंजेक्शन का एक साल से फेज-तीन क्लीनिकल ट्रायल चल रहा है। इसके तहत अब तक आठ लोगों को इंजेक्शन लगाया जा चुका है। इसका परिणाम सार्थक रहा। अभी यह प्रयोग करीब दो साल चलेगा।
इस प्रक्रिया में स्टाइरिन मैलिक एनहाइड्राइड (एसएमए) नामक एक को-पोलीमॉर को डायमिथाइल सल्फो-ऑक्साइड (डीएमएसओ) में मिलाकर 6 0 मिलीग्राम की मात्रा में दोनों शुक्राणु नलिकाओं में इंजेक्शन दिया जाता है। इस इंजेक्शन का नाम रीसूग दिया गया है। एक इंजेक्शन का असर करीब 10 वर्ष रहता है। इस दौरान पुरूष को परिवार नियोजन के किसी भी प्रकार के संसाधन अपनाने की जरूरत नहीं पड़ती।
रीसूग इंजेक्शन से शुक्राणु नलिका बाधित हो जाती है। एसएमए से पीएच (हाइड्रोजन ऑयन कंसनटे्रशन) कम हो जाता है। इससे शुक्राणु की मेम्बरेन (बाह्य झिल्ली) डैमेज हो जाती है। इसके चलते शुक्राणु की प्रजनन क्षमता खत्म हो जाती है।
पत्रिका से साभार

Tuesday

स्वच्छता वर्ष में भारत की भागीदारी

  • मिथिलेश कुमार
दुनिया भर में कम से कम 120 करोड़ लोग शौचालय सुविधा से वंचित हैं। इसमें सर्वाधिक संख्या भारत के लोगों की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ द्वारा संयुक्त रूप से किए गए अध्ययन रिपोर्ट में बताया गया है कि शौचालय का उपयोग न करने वाले लोगों के देशों की सूची में यह देश पहले नंबर पर है। निश्चित है कि इस तरह की रिपोर्ट में यह देश के लिए एक चुनौती है। सवाल है कि महाशक्ति बनने की राह पर चल रहा भारत इस तरह के मामले में अपनी छवि कैसे सुधारेगा? इसके लिए कौन से कदम उठाए जाएंगे?

भारत में करीब 66 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके लिए शौचालयकी कोई सुविधा नहीं है और उन्हें खुले में मलत्याग के लिए जाना पड़ता है। इसतरह भारत के आधे लोगों के पास शौचालय की सुविधा नहीं है। ऐसे में सवाल यह भी है कि इस बड़ी आबादी को शौचालय की सुविधा किस तरह से मुहैया कराई जा सकती है। भारत जैसी स्थिति और भी देशों में है। इस रिपोर्ट में भारत के बाद इंडोनेशिया, इथोपिया और पाकिस्तान का नंबर आता है। इंडोनेशिया में लगभग छह करोड़ साठ लाख लोग शौचालय की सुविधा से वंचित हैं, इथोपिया में यह संख्या पांच करोड़ बीस लाख है और पाकिस्तान में पांच करोड़ लोगों को शौच घर नसीब नहीं है। इसी तरह नाइजीरिया में भी दो करोड़ और ब्राजील तथा बांग्लादेश में एक करोड़ अस्सी लाख लोग खुली जगहों में शौच जाने के लिए बाध्य हैं। इन सबके लिए क्या संयुक्त राष्ट्र स्वच्छता अभियान के लिए और सहयोग नहीं दे सकता। यह ऐसा मुददा है जो हर किसी से जुड़ा है लेकिन इस तरफ ध्यान किसका है? जहां कहीं गंदगी नजर आती है लोग एक-दूसरे को कोसते हुए आगे निकल जाते हैं। देश के हजारों-लाखों की भीड़ वाले स्वयंसेवी संगठन भी इस दिशा में गिने-चुने ही हैं। उन्हें भी आगे आने और इस दिशा में चलाए जा रहे भारत सरकार के कार्यक्रमों में सहयोग करना होगा ताकि उसका लाभ उन वंचित लोगों तक पहुंच सके और भारत की छवि में सुधार हो सके।

राष्ट्र संघ की ओर से वर्ष 2008 को अंतरराष्ट्रीय स्वच्छता वर्ष घोषित किया गया है और इसी कड़ी में जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि यह बात स्वच्छता के लिहाज से सबसे जोखिम भरा कदम है। गंदगी और मल से पटे स्थान बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक होते हैं क्योंकि इनसे तुरंत दस्त फैलता है। गौरतलब यह भी है कि पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में मृत्यु का यह सबसे बड़ा कारण है। यूनिसेफ के कार्यकारी निदेशक ऐन एम वेनेमैन ने भी माना है कि स्थिति यदि ऐसे ही रही तो दुनिया अपने सहस्त्राब्दि वर्ष के स्वच्छता के लक्ष्य से 70 करोड़ लोगों की संख्या से पिछड़ जाएगी। ऐसे में क्या उपाय हैं, उन सब पर गौर किए जाने की जरूरत है।

ऐसा नहीं है कि खुले में शौच जाने की परंपरा ही वर्षों से रही है। प्राचीन काल में भी शौचालयों का उल्लेख मिलता है। इसका इतिहास हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की संस्कृतियों जितनी पुरानी है। मुगलकाल में अकबर के राजभवन के अलावा राजस्थान के गोलकुंडा में भी इसके अवशेष प्राप्त हुए हैं और आज के जमाने में भी इसका महत्व बढ़ गया है। प्रसिध्द गायिका जेनिफर लोपेज को उनके पूर्व प्रेमी एफ्लेक ने उनके जन्मदिन पर मंहगा शौचालय उपहार में दिया था। थाइलैंड में हाथियों के लिए विशिष्ट शौचालय बने हैं। पेरिस में घरेलू कुत्ते, बिल्लियों के लिए भी शौचालय बनाए गए हैं। यह तो विश्व के तमाम उदाहरण भर है। भारत सरकार जानवरों के लिए तो नहीं लोगों के लिए ही कुछ सुविधाएं मुहैया करा दे तो उसका नाम उल्लेखनीय हो जाएगा।

यह जरूर है कि भारत में इस दिशा में काम करने वाले इने-गिने संस्थानों में सुलभ इंटरनेशनल का नाम आता है। इसने देशभर में सुलभ शौचालय कॉम्पलेक्स बनाए हैं लेकिन इसकी जरूरत वहां भी है जहां लोग खुले में सड़कों के किनारे, रेल पटरियों पर मलत्याग के लिए जाते हैं। क्या यह संस्थान उन क्षेत्रों को चिन्हित कर इस दिशा में काम करेगा? सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिदेश्वरी पाठक कहना है कि इस विषय पर कोई बात नहीं करना चाहता और इस काम में लगे लोगों को हीनभावना से देखा जाता है। शौचालय की सुविधा से वंचित लोगों की संख्या भारत में सर्वाधिक है जाहिर है भारत को स्वच्छता की दिशा में काफी प्रयास करने की जरूरत है तभी सहस्त्राब्दी लक्ष्य को पाया जा सकता है और वंचितों के आंकड़ों में कमी आ सकती है।
पश्चिमी एशिया के कुछ देशों ने वाकई इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। उन्होंने स्वच्छता सेवाओं में 84 प्रतिशत तक का सुधार किया है लेकिन नाइजर, चाड और घाना ने 10 प्रतिशत से भी कम सुधार किए हैं। जिन देशों ने में अभी तेजी से सुधार की दरकार है उनमें म्यामार, अरब रिपब्लिक, वियतनाम, ग्वातेमाला, फिलीपींस, अंगोला, पाकिस्तान और मैक्सिको जैसे गरीब देश शामिल हैं। भारत की स्थिति में अभी और सुधार की दरकार है तभी वह एशिया के इस आंकड़े को संतुलित करने में अपनी भागीदारी निभा सकेगा।
हम समवेत

Monday

चिरू रामाराव बनने की राह पर



  • कल्याणी शंकर

फिल्मी सितारे ऎसा क्यों सोचते हैं कि अगर उन्हें फिल्मों में सफलता मिल गई, तो वे राजनीति में भी सफल ही होंगेक् क्या इसीलिए तेलगु फिल्मों के प्रसिद्ध सितारे चिरंजीवी ने राजनीतिक पार्टी का गठन किया हैक् अपनी नवगठित पार्टी के कार्यालय का हैदराबाद में उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा कि पार्टी के नाम की घोषणा 26 अगस्त को तिरूपति में की जाएगी। वे आंध्रप्रदेश में एन। टी. रामाराव की तरह ही कुछ करने की आशा रखकर अगले चुनावों में वे कांग्रेस को सत्ता से बाहर करना चाहते हैं। एन. टी. रामाराव ने वर्ष 1982 में अपनी पार्टी गठित कर "आत्म गौरवम" के नारे पर नौ माह के अंदर सत्ता प्राप्त की थी। चिरंजीवी ने "सामाजिक न्याय" को अपना नारा बनाया है। वे अपने राजनीतिक कòरियर के लिए बहुत घ्यानपूर्वक योजना बना रहे हैं। इसके लिए उन्होंने फिल्मी परदे पर अपनी 30 वर्षो की छवि में सामाजिक जागरू कता का तत्व शामिल किया है।अपने लाखों प्रशंसकों के बीच "चिरू " के नाम से विख्यात 54- वर्षीय चिरंजीवी को क्या सफलता मिलेगीक् चिरंजीवी को अपने दिमाग में यह बात घ्यान रखनी चाहिए कि जब एन. टी. रामाराव ने तेलगु देशम पार्टी (टीडीपी) की स्थापना की थी, तब से लेकर अब तक स्थितियां काफी बदल चुकी हैं। इस बीच मुसी नदी (हैदराबाद) में बहुत पानी बह चुका है। जब एन. टी. रामाराव को कांग्रेस ने राज्यसभा की सीट देने से मना किया था, उन्होंने टीडीपी गठित की थी, लेकिन तब राज्य में राजनीतिक खालीपन था, क्योंकि कांग्रेस का कोई विकल्प लोगों के पास नहीं था। जब कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव राजीव गांधी 1982 में आंध्रप्रदेश आए, उन्होंने हवाई अड्डे पर मुख्यमंत्री टी. अंजैया को अपमानित किया था। रामाराव ने इस घटना का अपने राजनीतिक उद्भव के लिए चालाकीपूर्वक इस्तेमाल किया था। जल्द ही उन्हें राज्य के युवाओं और महिलाओं से अनपेक्षित समर्थन मिला जिन्होंने उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया। उन्हें वामपंथियों का समर्थन भी हासिल था। रामाराव की तुलना में चिरू को राज्य में पहले से ही स्थापित कांग्रेस और टीडीपी से मुकाबला करना पड़ेगा। अगर वे सत्ता में आना चाहते हैं, तो उन्हें अपने लिए कुछ सहयोगी दल जुटाने ही चाहिए। वर्तमान में वे केवल तीसरे विकल्प के रूप में देखे जा सकते हैं। इस सितारे को कौन सी बात ऎसा विश्वास दे रही हैक् पड़ोसी राज्य तमिलनाड़ु में अन्नाद्रमुक के संस्थापक एम. जी. रामचंद्रन पूजे जाते थे और बाद में उनकी उत्तराधिकारी जे. जयललिता भी दो बार भारी बहुमत के साथ सत्ता में आ चुकी हैं। हाल ही विजय कांत ने अपनी पार्टी गठित की है और कुछ वोट भी हासिल किए हैं। एक अन्य सितारे शरत कुमार भी इन दिनों राजनीति के छिछले तालाब में तैर रहे हैं। द्रमुक और अन्नाद्रमुक जैसी पार्टियों में कई फिल्मी हस्तियां शामिल हैं। कुछ भी हो लेकिन राजनीति में शामिल होने वाले सभी फिल्मी सितारों को सफलता नहीं मिली है। दिवंगत शिवाजी गणेशन जिनके पीछे लाखों प्रशंसकों की ताकत भी थी, हालांकि सांसद बने लेकिन कांग्रेस में बड़े पदों तक नहीं पहुंच पाए। ऎसे ही रेवती, लता और एस. एस. राजेन्द्रन भी कुछ खास छाप छोड़ने में कामयाब नहीं हो पाए। चिरंजीवी रामाराव के करिश्मे को दोहराना चाहते हैं। उनके पास उनकी जाति से जुड़े लाभों के अतिरिक्त नाम, प्रसिद्धि, प्रशंसकों का प्यार और धन जुटाने की क्षमता सभी कुछ है। रामाराव की ही तरह वे न केवल तिरूपति से चुनाव लड़ेंगे बल्कि अपनी पार्टी के नाम की घोषणा भी वहीं से करेंगे। रामाराव जहां अपने प्रामाणिक गुणों और बहादुर रवैये के कारण जाने जाते थे, वहीं चिरंजीवी नरम स्वभाव, सुलझे हुए और खतरों को टालने वाले व्यक्ति हैं। अपने इस नए काम के लिए धन जुटाने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी। देश-विदेश में बसे उनके प्रशंसक उनकी पार्टी के प्रचार कार्य के लिए धन देकर खुश होंगे। चिरू केवल अपनी फिल्मी छवि पर ही निर्भर नहीं कर रहे हैं, बल्कि जातिगत समीकरण पर भी भरोसा कर रहे हैं। चिरंजीवी असरदार कापु समुदाय के हैं, जो तटवर्ती पश्चिमी और पूर्वी गोदावरी जिलों में भारी संख्या में रहते हैं। वे दूसरे समुदायों से भी समर्थन जुटाने की आवश्यकता महसूस कर रहे हैं। कापु समुदाय को सत्ता में हिस्सेदारी की चिरंजीवी से काफी उम्मीदें हैं। वे उनका जोशपूर्वक समर्थन कर रहे हैं। अन्य समुदाय वैसे ही पहले से राज्य में रेड्डी-खम्मा समुदायों के वर्चस्व से उकता चुके हैं। राजनीति में चिरू के प्रवेश से टीडीपी और कांग्रेस जैसे अन्य प्रमुख दल हिल चुके हैं। हालांकि राज्य में किसी तरह की सत्ता-विरोधी लहर दिखाई नहीं दे रही है, लेकिन अनियंत्रित भ्रष्टाचार और अन्य पिछड़ा वर्ग की उपेक्षा का विचार बड़े पैमाने पर फैला हुआ है। विपक्षी पार्टियों के सरकार के खिलाफ विरोध पैदा करने के प्रयासों से सत्तासीन कांग्रेस सफलतापूर्वक निपट चुकी है। नए संगठनों में नेताओं का पलायन भी टीडीपी की समस्या है, अन्य किसी दल की नहीं। इसका यह मतलब कतई नहीं कि चिरंजीवी के संगठन से कांग्रेस को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वह उसे नुकसान पहुंचाने की इस फिल्मी सितारे की क्षमता से सावधान है। जब रामाराव ने तेलगुदेशम पार्टी गठित की थी, तब केन्द्र में सत्तासीन कांग्रेस ने उसे नुकसान पहुंचाने की उसकी ताकत को कमजोर आंकने की भूल की थी। कापु समुदाय परम्परागत रूप से कांग्रेस का मतदाता है, लेकिन चिरंजीवी के आने से इसमें बदलाव होगा। हाल ही उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को तीसरे मोर्चे की ओर से प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार बताने वाले टीडीपी प्रमुख चन्द्रबाबू नायडु और टीआरएस प्रमुख चन्द्रशेखर राव चिरू की पार्टी के आने की आहट से घबड़ाए हुए हैं। पृथक तेलंगाना के अपने वादे को पूरा नहीं कर पाने वाली टीआरएस अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए बसपा जैसे अन्य दलों की ओर देख रही है। टीडीपी सरकार- विरोधी लहर और ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं की शक्ति बढ़ाने पर निर्भर कर रही है। माकपा और भाकपा जैसी वामपंथी पार्टियों के प्रादेशिक नेता चिरंजीवी को अपनी राजनीतिक योजनाएं मजबूत करने के लिए बढ़ावा दे रहे हैं, जबकि उनके राष्ट्रीय नेता तीसरे मोर्चे की उनकी महत्वाकांक्षी योजना में भागीदार एन. चन्द्रबाबू नायडु के साथ बातचीत करते रहे हैं। क्या चिरंजीवी टीआरएस के साथ गठबंधन करने के लिए तैयार होकर वे आंध्रप्रदेश के तटीय इलाकों की सीटों के नुकसान को झेलेंगे जो पृथक तेलंगाना के खिलाफ हैक् अकेले कापु समुदाय अपने स्तर पर राजनीति में चिरंजीवी को सफलता नहीं दिलवा सकता। चिरू इस समुदाय के अतिरिक्त अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जातियों के एक वर्ग को मिलाकर जातिगत आधार पर एक इन्द्रधनुषीय संगठन बनाना चाहते हैं। उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती चिरू को पहले ही अपनी पार्टी बसपा में शामिल होने के संकेत भेज चुकी हैं। अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जातियों के कुछ समूह पहले ही चिरंजीवी को अपना समर्थन दे चुके हैं। इनके अलावा चिरंजीवी को नक्सली संगठनों की ओर से भी मदद और समर्थन का आश्वासन मिल चुका है जो तेलंगाना क्षेत्र में बहुत प्रभाव रखते हैं। चिरू को असल जिंदगी की अपनी इस भूमिका को निभाने के लिए बहुत सावधानीपूर्वक कदम उठाने होंगे। उनके पास राजनीतिक अनुभव की कमी है और वे अपने पारिवारिक सदस्यों से ही घिरे हुए हैं। उन्हें अपने प्रतिद्वंद्वियों को कमतर नहीं आंकना चाहिए जिनके पास अनुभव, पैसा और बचे रहने की पर्याप्त क्षमता है। हाल ही चिरंजीवी ने मीडिया के सामने कहा था कि "आशा करता हूं कि मैं 294 में से 225 सीटों पर जीत दर्ज करू ंगा और अपनी सरकार बनाऊंगा।" लेकिन क्या वे ऎसा कर पाएंगेक्कुछ भी हो लेकिन राजनीति में शामिल होने वाले सभी फिल्मी सितारों को सफलता नहीं मिली है। दिवंगत शिवाजी गणेशन जिनके पीछे लाखों प्रशंसकों की ताकत भी थी, हालांकि सांसद बने लेकिन कांग्रेस में बड़े पदों तक नहीं पहुंच पाए। ऎसे ही रेवती, लता और एस. एस. राजेन्द्रन भी कुछ खास छाप छोड़ने में कामयाब नहीं हो पाए

[लेखिका वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक हैं]

पत्रिका से साभार

Saturday

किसान पुत्र के राज में उजड़ते गांव

  • विनय दीक्षित
भारतीय जनता पार्टी प्रायोजित किसान पुत्र शिवराज सिंह के शासनकाल में मध्यप्रदेश के गांवों की सही स्थिति कैसी है, यह बताने की जरूरत नहीं है। मुख्यमंत्री और सरकार लम्बे चौड़े दावे प्रचारित करते हैं कि सरकार ग्रामीण क्षेत्रों के विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। गांव में बिजली पानी सड़क स्कूल अस्पताल जैसी बुनियादी नागरिक सुविधाओं का मुकम्मल इंतजाम किया गया है और गांव में रोजगार के अवसर सुलभ कराये जा रहे हैं। सरकारी प्रदर्शनियों और मीडिया के विज्ञापनों में सरकार गांव की खुशहाल तस्वीर दिखाकर यह भ्रम पैदा कर रही है कि आज राज्य के गांव खुशहाल है और तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन सच छिपाये नहीं छिपता। सरकारी दस्तावेज़ बताते हैं कि मध्यप्रदेश में सैकड़ों की संख्या में छोटे-छोटे गांव उजाड़ वीरान होते जा रहे हैं। इन गांव में रहने वाले गरीब मजदूर और छोटे किसान, गांव में बुनियादी सुविधाओं के अभाव, खेती की बदहाली और रोजी रोटी के साधानों की कमी के कारण गांव छोड़ने पर मजबूर किए जा रहे हैं। इसके अलावा राजस्व ग्रामों से कहीं ज्यादा बुरी हालत इन वनग्रामों की है, जिन्हें कि राज्य सरकार के वन विभाग ने मनमाने तौर से 2006 के पहले अवैध और अतिक्रमण वाली बस्ती बताकर बल पूर्वक खाली करा दिया था वहाँ के निवासियों को घरवार, खेत, खलिहान और गांव छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया।
यह सर्व विदित है कि सन् 2006 में वनाधिकार (मान्यता) कानून का प्रारूप केन्द्र सरकार द्वारा प्रकाशित किए जाने के बाद और राज्य सरकार को भेजे जाने के बाद मध्यप्रदेश का वन विभाग वन भूमि बचाने के नाम पर कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो गया था क्योंकि यह कानून लागू होने के बाद वन भूमि पर कब्जाधारियों का अधिकार कानूनी रूप से वैधा हो जाता। शासन की यह मंशा तत्कालीन प्रमुख सचिव वन विभाग द्वारा नेता प्रतिपक्ष श्रीमती जमुना देवी को लिखे पत्र से साफ ज़ाहिर होती है। प्रमुख सचिव वन विभाग ने नेता प्रतिपक्ष के दिनांक 21 अगस्त 2007 के पत्र के संदर्भ में जवाब दिया है- ''मैं आपको अवगत कराना चाहूगी कि अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 अभी तक लागू नहीं हुआ है एवं न ही अंतिम रूप में बनाये गये नियमों का प्रकाशन हुआ है, जब तक केन्द्र शासन इस संबंध में अधिनियम लागू करने की अधिसूचना जारी न कर दे, वन भूमि से बेदखली की कार्यवाही रोका जाना वैधानिक नहीं होगा। वैसे भी वन विभाग के द्वारा सामान्यत: पुराने अतिक्रमण नहीं हटाये जा रहे है।'' इससे स्पष्ट है कि वनाधिकार मान्यता कानून के उद्देश्य की पूर्ति न करने की इच्छा से राज्य सरकार ने कानून लागू होने से पहले ही वनग्रामों को उजाड़ करने की कार्यवाही तेजी की थी वैसे भी भाजपा शासन के तीन वर्षों में वन भूमि पर काबिजों की बेदखली का अभियान जोरों से चलाया गया। ऐसे ही अभियान के दौरान पिछले वर्ष सागर जिले में आदिवासी वनवासियों ने अपना विरोध भी व्यक्त किया था, जिसे बल पूर्वक दबा दिया गया। गोंडवाना मुक्ति सेना और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के नेताओं के अलावा कई जनसंगठनों ने इस बारे में राज्य शासन से अपना विरोध व्यक्त करते हुए बेदखली की कार्यवाही रोकने की अपील की थी। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, नेता प्रतिपक्ष जमुना देवी ने वन भूमि के व्यवस्थापन और वन भूमि पर कब्जे को नियमित करने के मामले में शासन से लगातार पत्र व्यवहार किया है और बातचीत भी की है, लेकिन वनग्रामों और वनवासियों को उजाड़ने के लिए कृत संकल्प वन विभाग को मुख्यमंत्री ने खुला समर्थन दिया। इसी का नतीजा है कि कुछ महीनों में ही राज्य में सैकड़ों छोटे गांव और वनग्राम उजाड़ हो गये।
हम समवेत

Thursday

नेपाली माओवादी की भारत में दस्तक

  • मंतोष कुमार सिंह

पहले से ही नक्सली हिंसा से ग्रस्त भारत में नेपाली माओवादियों की दस्तक से केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और पुलिस-प्रशासन के होश उड़ गए हैं। नेपाल में हथियार छोड़कर संसदीय लोकतंत्र में शामिल हुए माओवादियों के प्रमुख नेता पुष्प कमल दहल उर्फ प्रंचड से नाराज माओवादी भारत को अपना ठिकाना बनाने लगे हैं। माओवादियों ने उड़ीसा के मलकागिरी जिले को अपने लिए सबसे सुरक्षित माना है। बताया जा रहा है कि पिछले दिनों जिले के नगरिकों ने नेपाली माओवादियो को देखा भी था। खुफिया अधिकारियों को भी घुसपैठ का अंदेशा हो गया है। उनका कहना है कि हमें नेपाली माओवादियों की घुसपैठ की सूचना मिली है, लेकिन जब तक वे पकड़े नहीं जाते कुछ भी कहना उचित नहीं होगा। कुछ समय पहले नेपाल ने भी भारत को आगाह किया था कि माओवादियों का एक हिस्सा भारतीय सीमा में प्रवेश कर सकता है।

दूसरी ओर पिछले दिनों उड़ीसा में हुई दो बड़ी नक्सली वारदातों से पुलिस-प्रशासन में खलबली मची हुई है। पुलिस महानिदेशक गोपाल चंद्र नंदा का कहना है कि हालांकि मलकानगिरि की पहचान माओवादी गतिविधियों के एक गढ़ के रूप में की जाती रही है, लेकिन कभी उग्रवादियों के हाथों इतनी बड़ी संख्या में लोग मारे नहीं गए। गौरतलब है कि 29 जून को बालीमेला जलाशय पार करते हुए आंध्रप्रदेश के ग्रेहाउंड फोर्स के 36 कमांडो समेत 38 पुलिसकर्मी मारे गए। उसके कुछ ही दिनों बाद 16 जुलाई को संदिग्ध उग्रवादियों की ओर से बारूदी सुरंग में कराए गए विस्फोट में उड़ीसा पुलिस के 17 पुलिसकर्मी मारे गए। प्रशासन इन घटनाओं के पीछे के कारणों के बारे में एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहा है। उड़ीसा पुलिस माओवादी हिंसा में अचानक इजाफे के पीछे के कारणों का पता अभी तक नहीं लगा पाई है।

माओवादी आंदोलन ने नेपाल के पशुपतिनाथ से आंध्रप्रदेश के तिरूपति तक एक लाल गलियारे के निर्माण को अपना लक्ष्य बनाया है। ऐसे में नेपाल में प्रचंड को सत्ता मिलने के बाद माओवादी कार्यकर्ता सीमा लांघ कर भारत में आने की बात को नकारा नहीं जा सकता है। लंबे अर्से से भारत के माओवादी अपने नेपाली समकक्षों से नैतिक के साथ-साथ साजो सामान का समर्थन हासिल करते रहे हैं। कुछ समय पहले उड़ीसा के गजपति जिले के मंद्राबाजू इलाके से कम से कम छह सीडी बरामद की गई थी। इनसे राय में नेपाली माओवादियों की मौजूदगी जाहिर होती है। नेपाली भाषा की सीडी भारतीय माओवादियों और उनके नेपाली समकक्षों के बीच के रिश्तों का एक संकेत हो सकती है।

दक्षिण-पश्चिमी रेंज के पुलिस उप महानिदेशक संजीव पंडा ने भी दोनों घटनाओं में भारत के बाहर प्रशिक्षित माओवादियों के हाथ होने की आशंका जताई है। पंडा के अनुसार विस्फोटकों की भारी मात्रा वाली बारूदी सुरंगों में विस्फोट कराने के लिए बेहद कुशल होना होगा, जो भारतीय माओवादियों के लिए संभव नहीं है। उल्लेखनीय है कि विस्फोट इतना जबरदस्त था कि बारूदी सुरंग निरोधी वाहन पूरी तरह तबाह हो गया। यह सर्वविदित है कि उड़ीसा, आंध्रप्रदेश और छत्तीसगढ़ में सक्रिय माओवादी दूसरे इलाकों के विशेषज्ञों से मदद ले रहे हैं और शायद इन स्थानों में नेपाल भी शामिल है। उड़ीसा में पिछले कुछ वर्षों से नक्सली हिंसा में तेजी से वृध्दि हुई है। राय के अधिकारी इन स्थितियों से निपटने में असमर्थता जाहिर कर रहे हैं। राय के दक्षिणी, उत्तरी और उत्तर पश्चिमी इलाके में नक्सली सबसे अधिक सक्रिय हैं। राय के कम से कम आठ जिलों मलकानगिरि, कोरापुट, रायगडा, गजपति, संबलपुर, देवगढ़, सुंदरगढ और मयूरभंज में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का प्रभाव है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी- मार्क्सवादी लेनिनवादी (जनशक्ति) क्योंझर, जाजपुर और ढेनकेनाल जिले में सक्रिय है। राय के तीस जिलों में से 15 जिले नक्सल प्रभावित हैं। वहीं देश के 13 रायों आंध्रप्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट, कर्नाटक और केरल में नक्सली सक्रिय हैं। नक्सल प्रभावित राय लंबे अरसे से यह मांग करते आ रहे हैं कि नक्सल समस्या को रायों की समस्या न मानकर राष्ट्रीय समस्या माना जाए, क्योंकि लगभग आधा देश इससे ग्रसित है। रायों के बीच आपसी समन्वय न हो पाने के कारण यह समस्या बढ़ती ही जा रही है। प्रभावित रायों में अलग-अलग दलों की सरकार होने का लाभ सबसे यादा नक्सली ही उठा रहे हैं। इसलिए मांग उठ रही है कि केन्द्र सरकार इस समस्या से निपटने के लिए केंद्रीय रणनीति बनाए। दूसरी ओर, केन्द्र सरकार इसके लिए तैयार नहीं है। केन्द्र और रायों की इसी खींचतान का लाभ नक्सली ले रहे हैं। उनकी गतिविधियां बेखौफ जारी हैं। पीड़ित राय सरकारें अपने-अपने ढंग से नक्सलियों से लड़ रहे हैं। संयुक्त रूप से कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। धडल्ले से नक्सलियों के प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं। जिनकी जानकारी सबको है। ऐसे में केंद्र और प्रभावित राय सरकारों को एक मंच पर आकर कोई कारगर रणनीति बनाकर नक्सलियों के खिलाफ चौतरफा धावा बोल देना चाहिए तब जाकर सफलता मिलेगी। केन्द्र और राय सरकारें जब तक एकजुट हो कर नक्सली समस्या का समाधान नहीं करेंगे, तब तक समस्या का समाधान एक दिवा स्वप्न ही साबित होगा।

Tuesday

नकली दूध की जांच करे मात्र 50 पैसे में

  • संजय योगी
हिसार। यूरिया मिलाकर नकली दूध बनाने वाले सावधान हो जाएं क्योंकि अब दूध की जांच घर-घर में हो सकेगी और वह भी मात्र 50 पैसे के खर्च पर।
यह तकनीक ईजाद की है गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के फूड प्रोसेसिंग विभाग के अधिष्ठाता डा. बीएस खटकड़ के मार्गदर्शन में छात्र दीपक मृदगिल ने। दीपक ने शोध कर अपनी रिपोर्ट विभाग के अधिष्ठाता डा. खटकड़ को जमा करवा दी तथा विभाग अपने शोधार्थी की इस तकनीक को पेटेट करवाने जा रहा है। इस तकनीक से पहले दूध में यूरिया की जांच करने वाले टेस्ट डीएमएबी से दूध में केवल यूरिया की मात्रा का पता चलता था, जबकि इस तकनीक से प्राकृतिक रूप से दूध में उपलब्ध यूरिया तथा बाहर से मिलाए गए यूरिया की मात्रा अलग-अलग पता चल जाती है। दूसरा इस जांच में उपयोग किए जाने वाले केमिकल सस्ते तथा खतरनाक नहीं होते जबकि डीएमएबी टेस्ट में हाइड्रोक्लोरिक एसिड का उपयोग किया जाता है जो खतरनाक होता है। हालांकि कृषि क्षेत्र में यूरिया का उपयोग ज्यादा होने के कारण दूध में यूरिया की मात्रा वैसे भी बढ़ गई है वहीं ऊपर से मिलावटी दूध तैयार करने वाले भी यूरिया को दूध में डाल देते है।
अपने शोध में विद्यार्थी ने कहा है कि दिल्ली के साथ लगने वाले हरियाणा, उत्तरप्रदेश व राजस्थान के कुछ हिस्से में यूरिया से मिलावटी दूध तैयार किया जाता है जिसे हर जगह सप्लाई किया जाता है। हरियाणा में वर्ष 2000 से लेकर 2005 तक मिलावटी दूध तैयार करने के 1584 मामले अदालतों में पहुंचे जिसमें से 1026 मामलों में आरोपी आरोपमुक्त होने में कामयाब हो गए। इन 1026 मामलों में से 437 मामले हिसार, भिवानी, गुड़गांव, रोहतक व करनाल के थे।
आज जहां घर-घर में मिलावटी दूध पहुंच रहा है ऐसे में गुजवि के विद्यार्थी द्वारा तैयार की गई यह तकनीक कई मायनों में महत्व रखती है।
जागरण

Monday

लालू का भर्ती बोर्डः जमीन दो-नौकरी लो

  • सुकेश रंजन
करीब साल भर पहले आईबीएन 7 को ये भनक मिली कि रेल मंत्री लालू प्रसाद के परिवार की मिल्कियत बढ़ती जा रही है। उनके खानदान के पास एक के बाद एक जमीन के टुकड़े आते जा रहे हैं। साल भर से आईबीएन 7 इस राज की तह तक पहुंचने में लगा था।
आईबीएन 7 की तफ्तीश में पता चला है कि उन्होंने लाखों की जमीन के बदले लोगों को रेलवे में नौकरियां दी हैं। आईबीएन 7 के पास उन तमाम जमीनों के पुख्ता कागजात हैं।
साथ ही ये भी अजब संयोग है कि उनकी पार्टी से केंद्र में मंत्री बने रघुनाथ झा और कांति सिंह ने भी मंत्री पद की शपथ लेने के आसपास ही लाखों की जायदाद लालू के परिवार वालों को भेंट कर दी।
लालू यादव पर आरोप है कि अगर रेलवे में नौकरी चाहिए तो मंत्री जी या उनके परिवार से संपर्क करना पड़ता है। ये वे लोग कह रहे हैं जिन्होंने अपनी जमीन लालू यादव और उनके परिवारवालों को दीं और एवज में उन्हें नौकरी मिली।
बिशुनदेव के परिवार में कई लोग हैं जिन्हें रेलवे में नौकरी मिल चुकी है। कई ऐसे हैं जिन्हें नौकरी मिलने का इंतजार है। स्टिंग ऑपरेशन में बिशुनदेव ने यह बात कही है। आईबीएन 7 के पास इस बात के दस्तावेजी सबूत भी हैं।
इसी प्रकार 5 फरवरी, 2008 को किशुनदेव ने अपनी जमीन का एक बड़ा टुकड़ा राबड़ी देवी को लिख दिया। कीमत लगाई गई चार लाख 21 हजार रुपए। वैसे इस रजिस्ट्री में इस बात का जिक्र नहीं है कि ये रकम राबड़ी देवी ने किशुनदेव राय को कैसे अदा की।
राबड़ी देवी ने जमीन लिखवाई हो या खरीदी हो...इतना तय है कि जिससे जमीन ली उसके परिवार में लोगों को नौकरी मिली। किशुनदेव राय के परिवार के ही संजय राय, धर्मेंद्र राय और रविंद्र राय ने भी अपनी जमीन पांच फरवरी 2008 को ही राबड़ी देवी के नाम लिख दी।
कीमत एक बार फिर वही चार लाख 21 हजार रुपए। इस बार भी रजिस्ट्री में भुगतान के तरीके का जिक्र नहीं है। आईबीएन 7 के पास मौजूद दस्तावेजों के मुताबिक 21 फरवरी, 2006 को मनोज कुमार, राजेश कुमार, विनोद कुमार, गोपी कृष्ण, सुशीला देवी ने करीब ढाई कट्ठा जमीन लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव के नाम लिखी। इस परिवार के एक सदस्य को भी रेलवे में नौकरी मिल चुकी है।
इसी तरह पटना के रहने वाले योगेन्द्र नारायण के बेटे को रेलवे में नौकरी मिल गई है। योगेंद्र ने 28 जनवरी 2008 को12061 वर्ग फीट जमीन ए के इंफो सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड को बेची।
पटना से सटी इस जमीन को 17 लाख 60 हजार रुपए में बेचा गया। 28 जनवरी को ही योगेंद्र के भाई वीरेंद्र नारायण ने भी अपनी 5954 वर्ग फीट जमीन ए के इंफो सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड को 8 लाख 60 हजार रुपए में बेच दी। वीरेंद्र के बेटे भी भारतीय रेल का हिस्सा बन चुके हैं।
रही बात ए के इंफो सिस्ट्मस प्राइवेट लिमिटेड की तो ये कंपनी दिल्ली में रजिस्टर्ड है और लालू यादव के दामाद शैलेष यादव इस कंपनी में पार्टनर हैं। नारायण भाइयों में से तीसरे राकेश ने भी जमीन का एक और बड़ा प्लॉट ए के इंफो सिस्ट्मस प्राइवेट लिमिटेड के नाम कर दिया है। क्या ये महज इत्तेफाक है।
आईबीएन-7

Sunday

एक पेड़ को बचाने की लड़ाई

  • नवीन नवाज
डायनासोर दुनिया से विलुप्त हो चुके है। उनसे पहले के जीव-जंतु भी अब किस्से-कहानियों का हिस्सा हैं, लेकिन एक पेड़ की प्रजाति, जो डायनासोर से पहले भी थी, आज भी जिंदा है। इसी प्रजाति का एक पेड़ जिंगो बाईलोवा कश्मीर में खड़ा है, लेकिन अब अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। इसे यहां चीनी दरख्त कहते है।
भूमि की उर्वरा शक्ति कायम रखने और सौंदर्य प्रसाधन से लेकर दवा तक बनाने के काम आने वाला जिंगो बाईलोवा कोरिया, जापान के अलावा अमेरिका, यूरोप में भी पाया जाता है। कश्मीर के लालमंडी क्षेत्र में स्थित यह पेड़ दक्षिण एशिया का सबसे पुराना जिंगो बाईलोवा है। इसकी आयु दो सौ साल है। यह पेड़ भी मर जाता अगर कश्मीर के फ्लोरीकल्चर डेवलपमेंट एक्सटेशन अधिकारी फिदा अली आलमगीर इधर ध्यान नहीं देते। फिदा ने जब देखा, यह पूरी तरह सूख चुका था। अब इस पर पत्ते आ रहे हैं। इसकी शाखाओं से अन्य पेड़ लगाने की प्रक्रिया भी शुरू है।
फिदा अली कहते हैं कि यह वृक्ष, पेड़ों के किसी भी वर्ग में नहीं आता। इसका अपना अलग वर्ग है। जिंगो बाईलोवा उसी इलाके में होता है, जहां मौसम शीतोष्ण हो। कश्मीर का मौसम ऐसा ही है, यहां साल का औसत तापमान 17 डिग्री के आसपास रहता है, जबकि बारिश करीब 1100 मिलीमीटर होती है। जमीन की प्रकृति भी एसिडिक होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि यह पेड़ पौने तीन करोड़ साल पहले भी पाया जाता था। उस समय डायनासोर थे। पचहत्तर लाख साल पहले ये पेड़ उत्तरी अमेरिका से भी समाप्त हो गए और 25 लाख साल पहले यूरोप में भी इनका नामों-निशान नहीं रहा, लेकिन बाद में अन्य जगहों से लाकर यहां इन्हें लगाया गया। चीन को इसका घर माना जाता है। जिंगो बाईलोवा 40 साल बाद फल देता है और उसी समय इसके नर या मादा वर्ग में होने की पुष्टि होती है। फिदा ने बताया कि नर पेड़ ही ज्यादा मिलते हैं, उनके पत्ते ज्यादा खूबसूरत होते है और गिरने के समय वह स्वर्णपत्र जैसे नजर आते है। फल नर पेड़ पर भी लगते है। उन्होंने बताया कि हमारे देश में जालंधर, ऊटी और देहरादून में भी जिंगो के पेड़ है, लेकिन एक या दो ही और इनकी आयु कहीं भी तीस-चालीस साल से ज्यादा नहीं है।
इस पेड़ का घेरा पौने दो मीटर है, जबकि कोरिया में पाए गए जिंगो का घेरा पौने सात मीटर है। फिदा अली के मुताबिक जब यह पेड़ उन्होंने देखा, तो यह लगभग मर चुका था। पेड़ को किसी ने गलत तरीके से काटा था। उन्होंने इसके आसपास मिट्टी का चबूतरा बनवाया और इसका उपचार शुरू किया। अब इसके निचले हिस्से में शाखाएं निकलने लगी हैं। यह पेड़ नर है। फिदा ने बताया कि इसके बाद पूरी वादी में करीब 50 जिंगो बाईलोवा मिले। इनमें 30 मादा हैं। उन्होंने बताया कि इस पेड़ पर रेडियो एक्टिव किरणों का असर नहीं होता। हिरोशिमा पर 1945 में एटम बम गिरा था। उस समय वहां सब कुछ तबाह हो गया, लेकिन जिंगो बाईलोवा जलने के बावजूद बच गए।
जागरण

Friday

रिक्शा खींच रहा शहीद का पोता

  • विजय सिंह
बेतिया [प.चंपारण]। यह उस गणेश राव के परिवार की दुख भरी कहानी है, जिन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 24 अगस्त 1942 को नगर के बड़ा रमना मैदान में अपने सीने पर फिरंगियों की गोली खायी और अपने सात साथियों के साथ शहीद हो गए। आज उनके पोते उसी शहर में रिक्शा खींच और राजमिस्त्री का काम कर अपना जीवन-यापन कर रहे हैं।
पुरानी गुदरी मोहल्ले के छोटे से खपरैल मकान में पूरे परिवार की जिंदगी की गाड़ी जिस हाल में चल रही है, उसे देखकर किसी का भी हृदय द्रवित हो उठेगा।
सरकारी आश्वासन के सहारे शहीद की विधवा, बेटे और बहू गुजर गए। अभी परिवार में उनके तीन पोते शंभु राव, प्यारे लाल राव व ओम प्रकाश राव हैं। प्यारे लाल रिक्शा चलाते हैं तो ओमप्रकाश व शंभु राज मिस्त्री का काम कर रहे हैं। जब इस संवाददाता ने उनसे उनके दादा [गणेश राव] की शहादत के किस्से सुनाने की गुजारिश की तो उनके मुंह से कुछ निकलता, इसके पहले ही उनकी आंखें बरसने लगीं।
प्यारेलाल कह रहे थे, '1970 में तत्कालीन मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय ने बेतिया में शहीद स्मारक का शिलान्यास किया तथा शहीदों के आश्रितों को सम्मान पत्र दिया। उस दिन उन्होंने पक्का मकान और जमीन देने का भरोसा दिया। तब से लेकर आज तक कई सीएम और डीएम आए, पर उनसे मिलने के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला। प्रधानमंत्रियों में एचडी देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी और अब मनमोहन सिंह तक पत्राचार कर थक चुका हूं। अब तमन्ना है, एक बार राष्ट्रपति से मिल लूं। मगर, आर्थिक विपन्नता के कारण दिल्ली दूर लगती है। क्या करूं, समझ नहीं पा रहा हूं।'
संपत्ति के नाम पर इस परिवार के पास महज आठ धूर जमीन और जीर्ण-शीर्ण खपरैल मकान है। इसी मकान में भेड़-बकरियों की तरह रहने की मजबूरी है। सरकार की बात तो दूर, किसी जन प्रतिनिधि तक ने इनकी सुधि नहीं ली। प्रेरणा की बात यह है कि सरकारी सहायता की आस में पथरा चुकीं इस परिवार की आंखों में आज भी देशभक्ति का जज्बा देखा जा सकता है।
जागरण

Thursday

सच हुआ प्रीति का सपना

  • मुकुल श्रीवास्तव
जब मैं वक़्त की गर्दिश में बिखर जाऊँ
जब मैं ख़ुद को ख़ुद से ही दूर पाऊं
तुम साथ निभाने आना
मुझसे दूर न जाना मेरी माँ...
ये प्रीति के पहले संगीत एलबम के गाने की पंक्तियाँ हैं. प्रीति एक आम हिंदुस्तानी लड़की है जो सपने देखती है और उन्हें पूरा करना चाहती है.
लेकिन प्रीति उन आम हिंदुस्तानी लड़कियों की तरह ख़ुशकिस्मत नहीं है जिनको बचपन से अपने माता-पिता का प्यार और साथ मिलता है,जिनके अभिवावक अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने जाते हैं, गर्मी की छुटियों में घुमाने ले जाते हैं. बच्चे रूठ जाते हैं तो उन्हें मनाते भी हैं.
प्रीति के जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, फिर भी वह ख़ास है.
प्रीति जब महज़ पाँच साल की थी तब उसकी माँ ने उसे लखनऊ के एक बाल गृह में छोड़ दिया था.
पॉँच साल की इस मासूम बच्ची ने ज़िंदगी की इस कड़वी सच्चाई को स्वीकारा और हालात से समझौता करने के बजाय उनसे दो-दो हाथ करने का फ़ैसला किया.
प्रीति के हौसले और प्रतिभा का नतीजा है उसके गानों का यह पहला एलबम, जो जल्द ही रिलीज़ होने जा रहा है. प्रीति के इस एलबम के तीन गानों की रिकॉर्डिंग हो चुकी है.
इस एलबम को उसने अपनी मां को समर्पित किया है जिसका धुंधला चेहरा उसकी यादों मैं कहीं आज भी बसा है और जिसकी याद उसकी आंखों को नम कर जाती है।

प्रीति ने होश संभालते ही यह बात अच्छी तरह समझ लिया था कि वो एक ऐसी जगह है जहाँ से एक बेहतर भविष्य का सपना नहीं देखा जा सकता.
ये बात उसे अक्सर कचोटती भी थी. अपना दर्द हल्का करने के लिए वह कुछ गुनगुना लिया करती थी. उसके गाने का यह शौक परवान चढ़ा उसी बालगृह में जहाँ स्कूल से लौटने के बाद संगीत सिखाने की भी व्यवस्था थी. बालगृह में ही उसने थोड़ा बहुत संगीत सीखा.
प्रीति ने कक्षा छह से 12 तक संगीत की पढ़ाई एक विषय के रूप में की है.
कहते हैं कि गाना गले से नहीं, दिल से गाया जाता है और जब प्रीति गाती है तो उसकी आवाज़ आत्मा तक उतर जाती है.
कम बोलने और गुमसुम सी रहनी वाली प्रीति को कभी यह भरोसा नहीं था कि वो गा सकती है लेकिन जब लखनऊ के स्थानीय प्रतिभा खोज कार्यक्रम में एक स्थानीय निवासी ने उसका गाना सुना तो उन्हें लगा कि प्रीति के पास प्रतिभा है और इसे आगे लाने की ज़रुरत है.
उनका प्रयास रंग लाया और मदद के कई हाथ आगे आए जिसका नतीजा है यह एलबम जिसके कुछ गाने लखनऊ के मशहूर इतिहासकार और गीतकार योगेश प्रवीण ने लिखें हैं.
माइक्रो फ़ोन के सामने खड़े होकर गाने को प्रीति अदभुत अनुभव मानती है।

संगीत शिक्षिका मंजुला पाण्डेय कहती हैं कि प्रीति को रियाज़ की बहुत ज़रूरत है.
प्रीति को रियाज़ का मौका ज़्यादा नहीं मिल पाता. पढ़ाई के बाद जो वक्त मिलता है उसमें बाल गृह के नियमानुसार वहां के काम भी उसे करने पड़ते हैं. लेकिन प्रीति का जज़्बा और जुनून है कि कपड़े धोते वक्त या खाना बनाते वक्त वह रियाज़ करती है.
प्रीति कहती है कि उसे लता मंगेशकर और सोनू निगम की आवाज़ बहुत पसंद है. संगीत को अपना सब कुछ मानने वाली प्रीति संगीत के क्षेत्र में ही अपना भविष्य सवाँरना चाहती है जिससे वो अपने जैसे बच्चों के लिए कुछ कर सके.
सबके दर्द को अपना मानने वाली प्रीति कहती है कि ये बालगृह एक परिवार है यहाँ किसी को कुछ भी होता है तो दुःख सबको होता है.
प्रीति ग्रेजूएशन के पहले वर्ष में पढ़ती है। अपने दिल में माँ से मिल पाने की ख़्वाहिश और कुछ कर दिखने का जज़्बा ही है जो प्रीति को हालात से लड़ने की ताक़त देता है. वह कहती है कि उसका संघर्ष अभी जारी है.

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम

मोना के जज्बे को सलाम



  • रणधीर गिलपत्ती

बठिंडा । अगर हौसला बुलंद हो, तो शारीरिक अपंगता भी बौनी हो जाती है और कामयाबी कदम चूमने लगती है। ऐसे लोगों के लिए जिंदगी दिन काटने के बजाय लुत्फ लेने का साधन बन जाती है। ऐसा ही उम्दा उदाहरण है यहां के बैंक अधिकारी जग्गर सिंह सिद्धू और जगजिंदर कौर की बेटी मोना, जो विकलांग होने के बावजूद न केवल मनमीत सिद्धू के नाम से कामयाब डॉक्टर बन गई है, अपितु हैदराबाद से अस्पताल प्रबंधन में पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री लेकर पढ़ाई के लिए अमेरिका भी पहुंच गई है। जिस किसी ने भी उनकी उपलब्धियों को जाना, उसने उनकी हिम्मत को सलाम किया है।
मिले विवरण के अनुसार जिले के गांव मेहता में पैदा हुई मोना पर 11 माह की आयु में ही पोलियो का हमला हो गया। इसमें उनकी एक टांग और बाजू आंशिक रूप से विकृत हो गई।
मोना के मां-बाप व ताया नंद सिंह मेहता , ने उनके इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी पर हर जगह से उन्हें 'रब्ब दा भाणा' मानने की नसीहत ही मिली।
मोना ने शहर के सेंट जोसेफ स्कूल से 90 फीसदी अंक लेकर मैट्रिक पास की। उन्होंने मेडिकल ग्रुप में 12वीं की परीक्षा 80 प्रतिशत अंकों से उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने एमबीबीएस के लिए हुए प्री-मेडिकल एंट्रेंस टेस्ट में उच्च स्थान पाकर अमृतसर के सरकारी मेडिकल कालेज में दाखिला लिया।
प्रथम श्रेणी में एमबीबीएस की डिग्री पास करने के बाद उन्होंने अस्पताल प्रबंधन की मास्टर डिग्री के लिए अपोलो इंस्टीटयूट ऑफ हास्पिटल मैनेजमेंट, हैदराबाद की दाखिला परीक्षा में टॉप किया। इसी दौरान मोना ने लंदन के क्लीनिकल रिसर्च इंस्टीटयूट की रजिस्टर्ड मेंबरशिप, नेशनल ला स्कूल बेंगलूर से मेडिकल ला और एंथिक्स से मेडिकल इंफारमेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा हासिल किया। दो साल बाद ही उन्हें मैक्स हास्पिटल नई दिल्ली ने असिस्टेट मेडिकल सुपरिंटेडेट नियुक्त कर लिया।
यह मोना की उपलब्धियों का ही जलवा है कि देश की मशहूर मासिक मैगजीन 'मैनेजमेंट कंपास' ने इस माह के अंक का टाइटल पेज उन्हें समर्पित कर दिया है।
इसके बाद मोना ने विदेश जाकर उच्च शिक्षा हासिल करने का मन बनाया। उनके पिता ने अपना मकान बैंक के पास गिरवी रखकर उसकी पढ़ाई के लिए राशि जुटाई। मोना ने खुद ही अमेरिकी दूतावास से संपर्क किया व सभी दस्तावेज तैयार कर लिए। इस माह की दो तारीख को वह लॉस एंजिल्स यूनिवर्सिटी में हेल्थ मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए रवाना हुई हैं। यह मोना के हौसले का ही करिश्मा है कि उन्होंने अपंगता के बहाने समाज में दया का पात्र बनकर जीने के बजाय आत्मविश्वास के सहारे अपना रास्ता खुद बनाया। मोना पर उसके परिजनों को ही नहीं पूरे क्षेत्र को भी गर्व है।

जागरण

मोना के जज्बे को सलाम

  • रणधीर गिलपत्ती
बठिंडा । अगर हौसला बुलंद हो, तो शारीरिक अपंगता भी बौनी हो जाती है और कामयाबी कदम चूमने लगती है। ऐसे लोगों के लिए जिंदगी दिन काटने के बजाय लुत्फ लेने का साधन बन जाती है। ऐसा ही उम्दा उदाहरण है यहां के बैंक अधिकारी जग्गर सिंह सिद्धू और जगजिंदर कौर की बेटी मोना, जो विकलांग होने के बावजूद न केवल मनमीत सिद्धू के नाम से कामयाब डॉक्टर बन गई है, अपितु हैदराबाद से अस्पताल प्रबंधन में पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री लेकर पढ़ाई के लिए अमेरिका भी पहुंच गई है। जिस किसी ने भी उनकी उपलब्धियों को जाना, उसने उनकी हिम्मत को सलाम किया है।
मिले विवरण के अनुसार जिले के गांव मेहता में पैदा हुई मोना पर 11 माह की आयु में ही पोलियो का हमला हो गया। इसमें उनकी एक टांग और बाजू आंशिक रूप से विकृत हो गई।
मोना के मां-बाप व ताया नंद सिंह मेहता , ने उनके इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी पर हर जगह से उन्हें 'रब्ब दा भाणा' मानने की नसीहत ही मिली।
मोना ने शहर के सेंट जोसेफ स्कूल से 90 फीसदी अंक लेकर मैट्रिक पास की। उन्होंने मेडिकल ग्रुप में 12वीं की परीक्षा 80 प्रतिशत अंकों से उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने एमबीबीएस के लिए हुए प्री-मेडिकल एंट्रेंस टेस्ट में उच्च स्थान पाकर अमृतसर के सरकारी मेडिकल कालेज में दाखिला लिया।
प्रथम श्रेणी में एमबीबीएस की डिग्री पास करने के बाद उन्होंने अस्पताल प्रबंधन की मास्टर डिग्री के लिए अपोलो इंस्टीटयूट ऑफ हास्पिटल मैनेजमेंट, हैदराबाद की दाखिला परीक्षा में टॉप किया। इसी दौरान मोना ने लंदन के क्लीनिकल रिसर्च इंस्टीटयूट की रजिस्टर्ड मेंबरशिप, नेशनल ला स्कूल बेंगलूर से मेडिकल ला और एंथिक्स से मेडिकल इंफारमेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा हासिल किया। दो साल बाद ही उन्हें मैक्स हास्पिटल नई दिल्ली ने असिस्टेट मेडिकल सुपरिंटेडेट नियुक्त कर लिया।
यह मोना की उपलब्धियों का ही जलवा है कि देश की मशहूर मासिक मैगजीन 'मैनेजमेंट कंपास' ने इस माह के अंक का टाइटल पेज उन्हें समर्पित कर दिया है।
इसके बाद मोना ने विदेश जाकर उच्च शिक्षा हासिल करने का मन बनाया। उनके पिता ने अपना मकान बैंक के पास गिरवी रखकर उसकी पढ़ाई के लिए राशि जुटाई। मोना ने खुद ही अमेरिकी दूतावास से संपर्क किया व सभी दस्तावेज तैयार कर लिए। इस माह की दो तारीख को वह लॉस एंजिल्स यूनिवर्सिटी में हेल्थ मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए रवाना हुई हैं। यह मोना के हौसले का ही करिश्मा है कि उन्होंने अपंगता के बहाने समाज में दया का पात्र बनकर जीने के बजाय आत्मविश्वास के सहारे अपना रास्ता खुद बनाया। मोना पर उसके परिजनों को ही नहीं पूरे क्षेत्र को भी गर्व है।
जागरण

Monday

निकेता को गर्भपात की इजाजत नहीं

बंबई हाईकोर्ट ने मुंबई की एक महिला की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने 26 सप्ताह के भू्रण में विकार होने की आशंका व्यक्त करते हुए अदालत से गर्भपात की अनुमति मांगी थी।
याचिकाकर्ता निकेता और हरेश मेहता ने उनके चिकित्सक निखिल दातार के साथ बंबई हाईकोर्ट में चिकित्सकीय तरीके से गर्भपात कराने के कानून [एमटीपी] के संबंध में याचिका दाखिल की थी। निकेता ने गर्भधारण के 24 सप्ताह बाद यह पाया कि भ्रूण में हृदय संबंधी विकार हैं।
याचिकाकर्ताओं ने चाहा है कि एमटीपी कानून में संशोधन किया जाए ताकि गर्भस्थ शिशु की जान को खतरा होने की स्थिति में गर्भधारण के 20 सप्ताह बाद भी गर्भपात कराया जा सके।
इस मामले में जेजे अस्पताल के अधिष्ठाता ने चिकित्सकों की एक समिति गठित की थी। याचिकाकर्ताओं द्वारा स्वतंत्र चिकित्सकीय विशेषज्ञों की ओर से तैयार कराई गई रिपोर्ट न्यायालय को सौंपने की संभावना है।
जागरण

Sunday

कबूतर से कूरियर तक

कासिद के जरिए खत भेजने से शुरू हुआ डाक का सिलसिला भले कूरियर और ई-मेल के दौर में पहुंच गया हो लेकिन भारत में आज भी कबूतरों, खच्चरों और ऊंट से डाक सेवा बदस्तूर चल रही है।नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित अरविंद कुमार सिंह लिखित पुस्तक 'भारतीय डाक : सदियों का सफरनामा' के अनुसार उड़ीसा पुलिस ने 1946 में कबूतर डाक सेवा स्थापित की। 40 कबूतरों के साथ शुरू की गई सेवा में इस वक्त करीब 1000 से अधिक कबूतर कार्यरत हैं।ये कबूतर दुर्गम इलाकों में प्राकृतिक प्रकोप या किन्हीं अन्य कारणों से जहां आदमी नहीं पहुंच सकता वहां आज बतौर डाकिया सेवा देते हैं। इस किताब के लेख चिठ्ठियों की अनोखी दुनिया को राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद कक्षा आठवीं की हिन्दी की नई पाठ्यपुस्तक वसंत भाग-3 में शामिल किया गया है।बहरहाल दुनिया की अपनी तरह की यह अनोखी डाक सेवा मोबाइल और इंटरनेट के युग में बंद होने की कगार पर पहुंच गई है। पुस्तक के अनुसार दुनिया की जानी मानी समाचार एजेंसी 'रायटर' ने कबूतरों का उपयोग समाचार हासिल करने के लिए लंबे समय तक किया।इसी प्रकार ब्रिटेन की ग्रेट बैरियर पिजनग्राम कंपनी ने 65 किमी कबूतर संदेश सेवा स्थापित की थी, ताकि संदेश तेजी से पहुंचाया जा सके।
भाषा

Friday

हमारी जम्हूरियत में खुमानलीमा क्या इरोम शर्मिला की मांग पूरी होगी ?


  • सुभाष गाताड़े
अगर आप को जिन्दगी के साठ बसन्त पार कर चुकी खुमानलीमा (Khumanleima) के बारे में बताया जाए तो क्या आप पहचान सकते हैं ? सम्भवत: नहीं। खुमानलीमा ने पिछले दिनों सूबा मणिपुर के पूर्वी इम्फाल जिले के बामोन काम्पू गांव में अपनी बेटी का अन्तिम संस्कार किया। पारम्पारिक पोशाक पहने सौ से अधिक लोग वहां गर्दन झुकाए खड़े थे और खुमानलीमा को तसल्ली दे रहे थे। (11 जुलाई 2008)विडम्बना यही है कि इस अन्तिम संस्कार में खुमानलीमा की बेटी का मृत शरीर नहीं रखा गया था, उसे तो बहुत पहले दफनाया गया है। यह अन्तिम संस्कार उसकी तस्वीर रख कर किया गया। खुमानलीमा की बेटी को गुजरे चार साल बीत गया और फिर किस वजह से इस अन्तिम संस्कार में चार साल लग गए थे ? यह एक लम्बी कहानी है जिसमें कहीं न कहीं हम सब जाने अनजाने शामिल रहे हैं, भले ही दर्शक के रूप में ।

10 जुलाई 2004 की रात को असम राइफल्स के जवानों का एक दस्ता खुमानलीमा के घर पहुंचा था, जहां से वे उनकी युवा बेटी थांगजाम मनोरमा को उठा कर ले गए थे। उनका कहना था कि मनोरमा मणिपुर में जारी उग्रवादी आन्दोलन की सदस्या है और इसी सम्बन्ध में उन्हें कुछ जरूरी पूछताछ करनी है। उन्होंने यह भरोसा भी दिलाया था कि सुबह तक छोड़ देंगे। अगले दिन पास के जंगलों में थांगजाम मनोरमा मिली अवश्य लेकिन जिन्दा नहीं बल्कि एक क्षतविक्षत लाश के रूप में, अपने जिस्म पर अत्याचार की तमाम निशानियां लिए हुए। जाहिर था कि असम राइफल्स के 'रणबांकुरों' ने सूचनाएं पाने के लिए उसे प्रचण्ड यातनांए और उस पर सामूहिक बलात्कार भी किया था।
वह बात अब इतिहास हो चुकी है कि किस तरह थांगजाम मनोरमा के अत्याचारियों को दण्डित करने के लिए एक जबरदस्त जनान्दोलन खड़ा हुआ था, जिसने पूरे सूबे को अपने चपेट में लिया था। आन्दोलनकारियों की मांग थी कि थांगजाम मनोरमा के अत्याचारियों को दण्डित किया जाए और औपनिवेशिक काल के काले कानूनों की याद दिलाता 'आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर्स एक्ट' जिसने समूचे सूबे में ही नहीं पूरे उत्तार-पूर्व में कहर मचा रखा है, उसे निरस्त किया जाए।

इस दौरान इन्साफ की मांग करते हुए मणिपुर की महिलाओं के एक छोटे से हिस्से द्वारा उठाये सुनियोजित एवं सुविचारित कदम की महज राष्ट्रीय मीडिया ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चर्चा हो चुकी है। 15 जुलाई 2004 के दिन असम राईफल्स के इलाकाई मुख्यालय के सामने सूबे की चन्द प्रतिष्ठित एवम बुजुर्ग महिलाओं ने बाकायदा निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया था। वे अपने साथ जो बैनर लायी थीं उस पर लिखा था : 'भारतीय सेना आओ हम पर बलात्कार करो' ' भारतीय सैनिकों आओ हमारा मांस नोचो'। मीडिया के सामने उठाये गये इस कदम ने गोया इस समूचे आन्दोलन को नयी उंचाइयों पर ले जाने का काम किया।

यह जुदा बात है कि इतनी व्यापक सरगर्मी के बाद जिसकी प्रतिक्रिया देश-विदेश में सुनायी दी थी, अभी भी असम राइफल्स के उन दोषी जवानों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है, कहा जा रहा है कि अभी तक केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने इस सम्बन्ध में कोई आदेश नहीं दिया है। वह कुख्यात कानून निरस्त होना तो दूर की बात रही। दरअसल इस अधिनियम (1958) के प्रावधान के तहत सुरक्षाबलों की किसी ज्यादती के खिलाफ कार्रवाई के लिए केन्द्रीय गृह मंत्रालय की अनुमति लेनी पड़ती है।

अपनी युवा बेटी की लाश देख कर खुमानलीमा ने कसम खायी थी कि उसके अत्याचारियों को जब तक वह सज़ा नहीं दिलवाएंगी वह उसका अन्तिम संस्कार नहीं करेंगी। चार साल तक उन्होंने इस संकल्प को बखूबी निभाया। वैसे यही प्रतीत होता है कि उनके सामने खड़ी कड़वी हकीकत ने उन्हें अपना संकल्प भूलने के लिए मजबूर किया। पारम्पारिक मूल्य-मान्यताओं में यकीन रखनेवाली खुमानलीमा को लगा होगा कि कहीं ऐसा न हो कि मनोरमा की अतृप्त आत्मा भटकती रहे। संकेतों में इसी बात को खुमानलीमा ने मीडिया को बताया कि 10 जुलाई की रात खुद थांगजाम मनोरमा उनके सपने में आयी थी, जिसमें उसने अपनी मां को बताया था कि वह 'बेहद भूखी है और थकी है'। मां ने शायद उसी के बाद तय किया कि अन्तिम संस्कार कर लेंगे।

यह साफ है इन बुजुर्ग महिलाओं का वह ऐतिहासिक प्रदर्शन या मणिपुर की जनता का लम्बा शान्तिपूर्ण आन्दोलन या उसके समर्थन में देश के अलग-अलग हिस्सों में उठी सरगर्मियां या उन दिनों सत्तासीन हुई मनमोहन सिंह सरकार द्वारा अधिनियम की समीक्षा के लिए बनायी गयी न्यायाधीश जीवन रेड्डी कमेटी - जिसने साफ लब्जों में कानून को जनपक्षीय बनाने के लिए सुझाव दिए थे - कोई भी काम नहीं आया है।

पिछले दिनों इस कुख्यात कानून के बनने के पचास साल पूरे हुए।

अगर आप इस अधिनियम के प्रावधानों पर नज़र डालें तो पता चलेगा कि इस कानून के तहत सुरक्षा बलों को असीमित अधिकार दिये गये हैं और अगर वे ज्यादतियां भी करें तो भी चाह कर भी लोग अदालत की शरण नहीं ले सकते हैं। साधारण नागरिकों के लिये अपने ऊपर हुए अत्याचार की जांच शुरू करवाने के लिये केन्द्र सरकार से गुहार लगाना कितना लम्बा, खर्चीला और पीड़ादायी अनुभव होता होगा।

अभूतपूर्व दमन अभूतपूर्व किस्म के प्रतिरोध को जन्म देता है।

पिछले आठ साल से मणिपुर की चर्चित कवयित्री और सामाजिक कार्यकर्ती इरोम शर्मिला इस कानून को निरस्त करने की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर हैं।

वह नवम्बर 2000 की बात है जब इरोम की भूख हड़ताल शुरू हुई थी। उस दिन मणिपुर की राजधानी इम्फाल के हवाई अड्डेवाले इलाके में सुरक्षा बलों ने अंधाधुंध गोलियां चला कर दस नागरिकों को मार डाला था। यह कोई पहला वाकया नहीं था जब मणिपुर या उत्तर पूर्व की सड़कें मासूम लोगों के खून से लाल हुई थीं। लेकिन इरोम को लगा कि अब सर पर से पानी गुजरने को है लिहाजा उन्होंने उसी दिन से ऐलान कर दिया था कि आज से वे खाना छोड़ रही हैं।

विगत आठ साल से अधिक समय से उनकी हड़ताल जारी है। फिलवक्त सरकारी अस्पताल में न्यायिक हिरासत में रखा गया है, जहां उन्हें एक नली के जरिये जबरदस्ती खाना खिलाया जाता है। हर पन्दरह दिन पर उन्हें जिले के सेशन जज के सामने पेश किया जाता है जो उनकी रिमाण्ड की मुद्दत को और पन्दरह दिन बढ़ा देता है। यह सिलसिला यूं ही चल रहा है।

उनके भाई सिंहजीत सिंह ने पिछले दिनों बताया कि इतनी लम्बी हड़ताल के कारण इरोम की हड्डियां अन्दर से बेहद कमजोर हो चली हैं। मगर इरोम अपने संकल्प से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

अमेरिका के नागरिक अधिकार आन्दोलन के चर्चित अश्वेत नेता मार्टिन ल्यूथर किंग ने कहीं लिखा था

हम लोग नहीं भूल सकते कि हिटलर ने जर्मनी में जो कुछ किया वह 'कानूनी' था और हंगेरी के स्वतंत्राता सेनानियों ने जो भी किया वह 'गैरकानूनी' था। हिटलर के जर्मनी में एक यहुदी की मदद करना 'गैरकानूनी' था, लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर मैं उन दिनों जर्मनी में रहता तो मैंने अपने यहुदी भाई-बहनों का साथ दिया होता भले ही वह काम गैरकानूनी था.... हम जो अहिंसक प्रत्यक्ष कार्रवाई में उतरते हैं तो तनाव को जनम नहीं देते है। हम लोग बस छिपे तनाव को सतह पर ला देते है।'

क्या अहिंसा के पुजारी की आए दिन कसमें खाने वाले मुल्क के हुक्मरान उस तनाव को दूर करने के लिए संकल्प करेंगे जिसे खुमानलीमा, इरोम शर्मिला जैसों के शान्तिपूर्ण प्रतिरोधा ने सतह पर ला दिया है।


हम समवेत