Tuesday

आ गइल 'महतारी'

अपनी लोगन के बिछड़ला के केतना दुख होला सबके पता बा। दुख वो समय अउरी बढ़ जाला, जब अपनी 'महतारी' के लोग भुला जाला, अपनी भाषा के बिसरा देला, सांस्कृति से दूर हो जाला, अपनी माटी के महक से अंजान हो जाला। अपनी देश में भी करोड़ों लोग एइसन बाड़ें जे ये तरह के गलती करत बाडऩ। कहे के मतलब बा कि सात समंदर पार रही के भी जनम धरती और भाषा के नाहीं भुलाए के चाहीं। काहें कि इहे आपन जीवन ह, महतारी है। एही लोगन के सजग करे के खातिर हम 'महतारी' ब्लाग लेके आइल बानी। 'महतारी' मतलब अपनी भाषा में आपन बात। 'महतारी' में भोजपुरी से जुड़ल सब जानकारी देवे के कोशिश कइले बानी। उम्मीद बा कि अउरा सभे के 'महतारी' पसंद आई। सुझाव के इंतजार रही।

ब्लाग-http://www.mahtari.blogspot.com
Email- mantosh11@gmail.com

पहिला रचना पेश बा-------

कइसे रहबअ, तोर बिन संघतिया
मंतोष सिंह

जात रहनी बहरा, रुआंसु भइल अंखिया
कइसे रहबअ, तोर बिन संघतिया।।
माई छुटली, बाप अउरी घरवा दुअरिया
जिनगी अंहार भइल, गइल अंजोरिया
जिया में डसेला, परदेस वाली रतिया
कइसे रहबअ, तोर बिन संघतिया।।
गंउवा के खेतवा में, बइठे ना कोयलिया
सरसो ना जौ, गेंहू, लौउके ना बलिया
चारू ओर पसरल बा, दिन में अंहरिया
कइसे रहबअ, तोर बिन संघतिया।।
शादी-बियाह में लौउके नाहीं डोली
छठ, जिऊतिया, तीज होखे नाहीं होली
फुरसत ना बा इंहा, बाटे ना बटोहिया
कइसे रहबअ, तोर बिन संघतिया।।
मन नाहीं लागताअ, लिखतानी पतिया
हमके भेजा दअ यार, गंवई से गडिय़ा
अब ना सहाताअ, परदेस में दरदिया
कइसे रहबअ, तोर बिन संघतिया।।

Friday

महिलाओं को सेना में स्थायी कमीशन

दर्पण में 23.4.08 को खबर प्रकाशिक की गई थी कि महिलाओं को मिलेगा स्थायी कमीशन! जिसपर 26.9.08 को मोहर लग गई पूरी खबर पढीए


सेना के तीनों प्रमुखों की समिति ने महिलाओं को फौज में स्थायी कमीशन देने की सिफारिश के बाद रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने शुक्रवार को इस एतिहासिक फैसले पर मुहर लगा दी।

सैन्य प्रमुखों की समिति ने सशस्त्र बलों में शिक्षा और न्यायिक शाखा में महिलाओं को पुरुषों की तरह स्थायी कमीशन देने की सिफारिश की थी। हालांकि महिलाओं को अभी भी लड़ाकू भूमिका में नहीं रखा जाएगा।

रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी विज्ञप्ति में इस फैसले की पुष्टि करते हुए बताया गया कि एंटनी ने इस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है। गौरतलब है कि अभी तक महिलाओं को सशस्त्र सेनाओं में अस्थायी तौर पर ही लिया जाता था और उनकी नौकरी 15 साल से कम होती है। इसी कारण महिला अधिकारियों को लेफ्टीनेंट कर्नल रैंक से ऊपर का दर्जा नहीं मिल पाता है।
रक्षा मंत्रालय के नियमों के तहत महिलाओं को स्थायी कमीशन देने के मुद्दे को कैबिनेट के पास ले जाने की आवश्यकता नहीं है और रक्षा मंत्रालय मंत्री के स्तर पर यह फैसला लेने के लिए सक्षम हैं। यह महत्वपूर्ण फैसला पिछले एक साल से लंबित था।

हाल ही में एंटनी ने संसद में कहा था कि इस मामले पर सक्रियता से विचार किया जा रहा है और लड़ाई के मोर्चे के अलावा महिलाओं को स्थायी कमीशन दिया जाएगा। इस फैसले के बाद राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और भारतीय सैन्य अकादमी जैसे संस्थानों के द्वार भी महिलाओं के लिए खुल जाएंगे। लेकिन सूत्रों ने बताया कि इस निर्णय से मौजूदा शार्ट सर्विस कमीशन प्राप्त महिला अधिकारियों को लाभ नहीं होगा क्योंकि इससे अनेक तरह की जटिलताएं पैदा होने की संभावना है।

महिलाओं को स्थायी कमीशन के जरिये परिवहन विमान और हेलीकाप्टर तक के पायलट के तौर पर सैन्य बलों में नौकरी मिलती रही है। इसके अलावा मेडिकल, डेंटल और नर्सिग में उन्हें स्थायी कमीशन मिलता रहा है।

पुरुष वर्चस्व की मानसिकता के कारण महिलाओं को स्थायी कमीशन देने की यह सिफारिश काफी ना-नुकर के बाद शीर्ष तक पहुंची है। अलबत्ता अब भी ऐसे सैन्य अधिकारियों की कमी नहीं है जिनके गले महिलाओं को स्थायी कमीशन देने का निर्णय उतर नहीं पा रहा है।

Tuesday

कोई मेरे बच्चे को गोद ले लो

बिहार में बाढ़ ने लाखों लोगों को बर्बाद कर दिया। इस बर्बादी का एक पहलू हम आपको बताने जा रहे हैं। जिसे सुनकर शायद आप अपने आप को रोक न सके। एक मां चाहती है कि कोई उसके बच्चों को गोद ले ले। पुर्णिया के निदान राहत शिविर में अपने चार दुध मुंहे बच्चे को लेकर बैठी एक औरत।

मधेपुरा के रतन पट्टी इलाके की रहने वाली एक औरत के घर में बाढ़ आने तक सब कुछ ठिक चल रहा था। लेकिन बाढ़ आने के बाद घर से पती और बच्चों के साथ निकली सुखीया देवी का बाढ़ के पानी के धार नें सब कुछ छीन लिया। अब सुखीया अपने चारों बच्चों को लेकर दर-दर भटकने को मजबुर है। वो चाहती है की इसके बच्चे को कोई गोद लेले । एक अपने कलेजे के टुकड़ों को अपने से जुदा करना चाहती है। दुनिया में भला कौन सी मां होगी जो अपने बच्चों को ही अपने से दूर करना चाहती है। लेकिन एक ऐसी मां है जो चाहती है ऐसा करना। वो लाचार है, मजबूर है। आपको और हमें इसके दुखों का अंदाजा नहीं हो सकता क्योंकि हमारे पास रहने को पक्के छत का एक घर है। इस मां के पास प्लास्टिक की छत है जिसमें किसी तरह वक्त गुजरता है। हमारे पास बदन छुपाने के लिए अच्छे कपड़े हैं लेकिन इस मां के पास अपने बच्चों और खुद के लिए तन ढकने के लिए कपड़े तक नहीं। हम अपने घरों और होटलों में लजीज खाना खाते हैं इस मां के बच्चे उबले चावल खाकर अपना पेट भरते हैं।दरअसल बाढ़ आने के बाद सुखिया अपने पति और बच्चों के साथ घर से निकली थी। उस वक्त सड़क पर पानी कम होने की वजह से सुखिया अपने तीन बच्चों को लेकर बाहर तो आ गई, लेकिन एक बच्चा पानी में फंस गया। अपने बेटे को बचाने के लिए सुखिया का पति लौटा। लेकिन पानी की तेज धार सुखिया के पति को अपने साथ बहा ले गयी। पिता की लाश नहीं मिली। परंम्परा के मुताबिक पिता की कठपुतली बनाकर बेटे ने उसे आग दी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि कौन पालेगे इन मासूमों को। इस मां की बेबसी देखकर कुछ मदद के लिए आगे जरूर आए हैं। लेकिन वो मदद कुछ दिनों के लिए ही काफी है। इन मासूमों के सामने पूरी जिंदगी पड़ी है। कैसे पालेगी इनको ये वो सवाल है जिसका जवाब ये मां हम सभी की आंखों में तलाश रही है।

आईबीएन-7

Sunday

पापा क्यों वादा तोड़ गए

संजय राय
आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब देते वक्त शहीद हो गए दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा के बेटे दिव्यांशु की आंखों से अब आंसू थम ही नहीं रहे हैं। शुक्रवार की रात तक दिव्यांशु यह सोचकर खुश था कि शनिवार को उसे अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी और वह परिजनों से जाकर मिल सकेगा, लेकिन पिता की शहादत की खबर पाकर उसकी प्रसन्नता काफूर हो गई।
उसकी खुशी गम में बदल गई और पैरों तले से जमीन खिसक गई। दिव्यांशु अब तक नहीं समझ पा रहा है कि उससे मिलने का वादा करने वाले पापा अपना वादा कैसे भूल गए हैं? ज्ञात हो कि दिव्यांशु को यह खबर शुक्रवार तक नहीं दी गई थी कि उसके पिता शहीद हो गए हैं। हालांकि कीर्ति नगर स्थित कालरा अस्पताल में शनिवार की सुबह उस समय अजीब स्थिति पैदा हो गई, जब दिव्यांशु को तीन दिन तक भर्ती रहने के बाद अस्पताल से 'रिलीव' कर दिया गया। उसे घर ले जाने अस्पताल पहुंचे परिजन यही सोचने लगे कि दिव्यांशु को पिता की शहादत की जानकारी कौन दे? यूं तो, सुबह साढ़े छह बजे परिजनों के साथ भारी संख्या में पुलिस मौजूद देखकर दिव्यांशु को शक हुआ, लेकिन चंद सेकेंड बाद जब पिता की शहादत की सूचना मिली, तो वह जैसे बुत में तब्दील हो गया। भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच दिव्यांशु को द्वारका सेक्टर-चार स्थित ओम सत्यम अपार्टमेंट ले जाया गया। यहां कुछ देर बाद ही शहीद मोहन चंद का पार्थिव शरीर लाया गया। पिता का शव देखकर दिव्यांशु मां से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगा। कालरा अस्पताल के सीईओ डॉ। आरएन कालरा ने बताया कि शनिवार की सुबह छह बजे दिव्यांशु के स्वास्थ्य की जांच की गई थी। वह पूरी तरह से स्वस्थ हो चुका है। उसके शरीर में तब एक लाख, 70 हजार प्लेटलेट्स थे। दिव्यांशु को 17 सितंबर को कालरा अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह डेंगू से पीड़ित था। उसके रक्त में प्लेटलेट्स की संख्या खतरनाक स्तर तक पहुंच गई थी। उसे 17 यूनिट से अधिक प्लेटलेट्स चढ़ाया गया था।



साभार. जागरण

Saturday

जाबांज़ शर्मा को आखिरी सलामी

आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हुए दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा का शाम करीब साढ़े चार बजे निगमबोध घाट पर अंतिम संस्कार कर दिया गया। उनकी चिता को उनके बेटे देवेंशु ने मुखाग्नि दी।
देश के इस जांबाज़ की अंतिम यात्रा में उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए निगमबोध घाट पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित समेत कई नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। गौरतलब है कि शर्मा लगभग 19 साल से दिल्ली पुलिस में थे। वह शुक्रवार को आतंकवादियों के साथ हुई भीषण मुठभेड़ में गोलियां लगने से घायल हो गए थे, लेकिन बाद में अस्पताल में उनका निधन हो गया। मुठभेड़ विशेषज्ञ के रूप में जाने जाने वाले और आतंकवाद विरोधी दस्ते की विशेष शाखा में तैनात शर्मा बहादुरी के लिए राष्ट्रपति पदक सहित सात बहादुरी पदक हासिल कर चुके थे।

नवभारतटाइम्स.कॉम

Friday

जांबाज इंस्पेक्टर एमसी शर्मा नहीं रहे

दिल्ली के जामिया नगर में उग्रवादियों के साथ मुठभेड़ में ज़ख्मी हुए स्पेशल सेल के दो पुलिस कर्मियों में से एक इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा की मौत हो गई है शर्मा को तीन गोलियां लगी थीं। मुठभेड़ में पुलिस में दो आतंकियों को मार गिराया था, जबकि एक आतंकी को हिरासत में लिया था। पुलिस इंस्पेक्टर शर्मा को कई बहादुरी पुरस्कार मिल चुके हैं। उन्हें चार बार राष्ट्रपति सम्मान से नवाजा गया। सात बार उन्हें पुलिस का मेडल भी मिला है। दिल्ली पुलिस के जांबाज शहीद इंस्पेक्टर महेश चंद्र शर्मा पिछले चार दिनों से ऑपरेशन एल-18 पर खुद नजर रख रहे थे, वे अपने फर्ज के प्रति कितने ईमानदार थे इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इन चार दिनों में वे अपने घर नहीं गए, वो भी तब जबकि उनका एकमात्र पुत्र गंभीर रूप से बीमार और अस्पताल में भर्ती है। 1989 को दिल्ली पुलिस सेवा में बतौर सब इंस्पेक्टर भर्ती स्पेशल सेल के ऑफिसर शर्मा 35 आतंककारियों को अपनी गोलियों का निशाना बनाने के साथ ही 81 को सींखचो के पीछे पहुंचा चुके थे। अपराध के प्रति बेहद सख्त शर्मा ने 40 गैंगस्टरों को मार गिराया जबकि 129 उनके कारण गिर्फ्तार किए गए।

Thursday

कोई लौटा दे सिमरन के बीते हुए दिन...


हर बार की तरह इस बार फिर धमाके हुए। दो दिन बीते नहीं की हम उसे भूलने लगे। लेकिन एक मासूम की दास्तां आपको ये धमाके भूलने नहीं देगा।ये दास्तां है बेटी सिमरन की। दिल्ली बम धमाके में सिमरन के साथ जो हुआ भगवान न करे किसी के साथ हो। छोटी सी बच्ची ने धमाके में अपने पिता, दादा और बुआ को खो दिया। उसकी मां अस्पताल में भर्ती है। अब हालत ये है कि सिमरन बुखार से तड़प रही है।।न कुछ खाती है,ना पीती है।

अब तो लगता है कुदरत भी सिमरन पर तरस नहीं खा रही। बारिश की वजह से सिमरन का घर उजड़ गया है और वो तेज बुखार में फुटपाथ पर रह रही है।

गफ्फार मार्केट में हुए बम धमाके ने सिमरन की हंसी छीन ली। पिता छीन लिया, दादा का प्यार छीन लिया और बूआ की पुचकार छीन ली। औऱ अब सिमरन को तो मां की गोद भी नसीब नहीं।

धमाके में घायल होने की वजह से मां अस्पताल में है।.अब तो सिमरन की हालत इतनी दर्दनाक हो गई है कि उसके सिर पर छत तक मयस्सर नहीं। पहले धमाके की वजह से सब कुछ तहस-नहस हो गया और अब बारिश ने अपना कहर ढाना शुरू कर दिया है। बंजारा परिवार सड़क के किनारे पेड़ के नीच रहता था। लेकिन अब बारिश की वजह से अब खुले आसमान के नीचे फुटपाथ पर रहने को मजबूर है।

सिमरन की आंखे जब भी खुलती हैं तो अपने पापा को ढूंढ़ती है। अपने दादा और बूआ की पुकार सुनने को बेताब रहती है। पता नहीं उसे ये अंदाजा भी है या नहीं कि इनमें से अब कोई नहीं आएगा। सिमरन की मां ने जब अपनी बेटी की हालत के बारे में सुना तो वो रह न सकी। बेटी फुटपाथ पर बुखार में तड़पती रही और वो अस्पताल के बिस्तर पर अपना इलाज करवाए। मां का दिल तड़प उठा। अपना इलाज अधूरा छोड़कर वो बेटी के पास चली गई।

लेकिन मां-बेटी का मिलन ज्यादा वक्त तक नहीं हो सका। सड़क पर अपना आसरा बनाए सिमरन का परिवार बारिश की मार झेल नहीं पाया। मजबूरन कमलेश को वापस अस्पताल भेजना पडा। सिमरन तो मानो टूट ही गयी। बुधवार रात तक उसका बुखार चढ़ गया सिमरन का परिवार अपनी लाडली की मुस्कान वापस लाना चाहता है। लाखों जतन किए, लेकिन सिमरन तो गुमसुम है। ना कुछ खाती है और नी ही कुछ पीती है।सरकार ने तो ब्लास्ट पीड़ितों के लिए मुवाअवजे की घोषणा करके खानापूर्ति कर ली। लेकिन जो दर्द सिमरन और उस जैसे सैकड़ों लोग सह रहे हैं उसे कौन दूर करेगा?

आईबीएन-7

Tuesday

उनके आने से सुकून मिलता है

  • मंतोष कुमार सिंह
उनके आने से सुकून मिलता है
जख्मों पर मरहम लगाने से सुकून मिलता है
दरद ए बयार में कोई जो अपना पूकारे
धूप में भी छांव मिलता है
उनके आने से सुकून मिलता है
कभी आप भी दरद लेकर देखना
अपनों को करीब रखकर देखना
गम में भी खुशी मिलती है
उनके आने से सुकून मिलता है

Monday

फतवा... फतवा... फतवा...

अवध के नवाब अमजद अली शाह के वंशज नवाब सैय्यद बदरुल हसन उर्फ पप्पू पोलिस्टर द्वारा कई धार्मिक सीरियलों में भगवान नंदी का किरदार निभाए जाने से कई कट्टरपंथी मौलाना खफा हो गए हैं। इन मौलानाओं ने हसन के खिलाफ कलमा पढ़कर दोबारा मुसलमान बनाने का फरमान तक जारी कर दिया है। एक मुसलमान होने के नाते हिन्दू देवी-देवताओं के किरदार निभाने पर मौलानाओं की तल्ख टिप्पणियों से नवाब बदरुल हसन बुरी तरह आहत और परेशान हैं।
नवाब बदरुल हसन उर्फ पप्पू पोलिस्टर ने कई धार्मिक सीरियलों मसलन ' ओम नमः शिवाय ' , ' संतोषी माता ' , ' जय हनुमान ' और ' सत्यनारायण की कथा ' में नंदी का किरदार निभाया है। उनके बेटे अमन पोलिस्टर ने भी एक सीरियल में भगवान गणेश का किरदार निभाया है। पोलिस्टर ने बताया कि दारुल उलूम ने मेरे किरदार को गैर इस्लामिक काम बताते हुए फतवा जारी किया है। मौलानाओं के व्यवहार से बुरी तरह आहत नवाब ने कहा कि वह कि वह खुदा और उसके रसूल को न सिर्फ मानते हैं बल्कि उनके बताए रास्ते पर भी चलते हैं और सच्चे मुसलमान हैं। उन्होंने कहा कि मैं एक सच्चे मुसलमान के साथ-साथ एक कलाकार भी हूं और अपने पेशे के रूप में अगर भगवान गणेश और नंदी का रोल करता हूं तो कटटरपंथी मुस्लिम उलेमाओं और धर्मगुरुओं की त्यौरियां चढ़ना गैर वाजिब है। नवाब हसन ने बताया कि उनके बेटे अमन पोलिस्टर के एक सीरियल में भगवान गणेश का रोल करने से कुछ उलेमा इतने खफा हो गए कि उन्होंने फोन पर धमकियां देना शुरू कर दिया। एक मौलाना ने तो यहां तक कहा कि सीरियल में गणेश के रूप में तुम्हारे बेटे का सिर कटा था, हम घर आकर उसका सिर काटेंगे। एक साल पहले इसकी रिपोर्ट मुंबई के अंधेरी ईस्ट स्थित मेगवाड़ी थाने में दर्ज कराई गई थी। इतना ही नहीं नवाब हसन के सगे चाचा विलायत हुसैन ने यह कहते हुए पुश्तैनी सम्पति देने से मना कर दिया है कि खुद तो भगवान बन गए, लड़के को भी भगवान बना दिया। यह इस्लाम धर्म विरुद्ध आचरण है। पप्पू पोलिस्टर बताते हैं कि शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे बेटे अमन के गणेश के किरदार और बोले गए संस्कृत श्लोकों व संवादों से इतने प्रभावित हुए कि वह हमारे घर आए और कहा कि मुस्लिम होकर तुम्हारा बेटा जितनी शुद्ध संस्कृत बोलता है उतना तो मेरा बेटा भी नहीं बोल सकता। भगवान के किरदारों से मिली शोहरत पर फख्र करते हुए नवाब हसन कहते हैं कि हिन्दुस्तान में हिन्दुओं ने जितनी बेपनाह मोहब्बत दी, उतनी मुस्लिम समाज से नहीं मिली। इसका मुझे और मेरे परिवार को जीवन भर अफसोस रहेगा।
नवभारत टाइम्स

Friday

धन कमाने में बिक गई नींद हमारी

  • डॉ।महेश परिमल
बरसों पहले कृश्न चंदर की उपन्यास पढ़ी थी 'बम्बई रात की बाँहों में'। तब उम्र छोटी थी, इसलिए उसके कथानक को समझ नहीं पाया, आज जब यह मायानगरी हमारे सामने मुम्बई बनकर आई है, तब से यह सपनों का शहर बनकर रह गई है। हर आदमी यहाँ एक सपना लेकर आता है। सपने का संबंध नींद से है, पर यहाँ के लोग अब अपनी नींद बेचकर धन कमाने में लगे हैं। लोग दिन में सपने देखते हैं और रात में उसे पूरा करने के लिए परिश्रम करते हैं। केवल मुम्बई ही नहीं, आज हर महानगर इसकी चपेट में है। हर शहर अब रात को और अधिक रंगीला होने लगा है। लोगों को अब शहर की रातें लुभाने लगी हैं। आपने घ्यान दिया होगा कि अब लोग रात का सफर करने में अधिक दिलचस्पी लेने लगे हैं। यात्रा चाहे ट्रेन की हो, बस को हो या फिर प्लेन की। एक तरह से आज की प्रतिस्पर्धा वाली इस जिंदगी में लोग अपनी स्वाभाविक नींद को तिलांजलि देकर धन कमाने में लग गए हैं।
पहले बिजली नहीं थी, तब लोग रात का समय सोने में ही निकालते थे। इससे न केवल शारीरिक क्रियाएँ, बल्कि स्वास्थ्य की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती थी। आज समय सबसे आगे निकल जाने का है। सबके पास समय की कमी है। किसी को किसी से बात करने का समय नहीं है। विज्ञान के इस युग में मोबाइल और लेपटाप ने पूरी दुनिया को ऊँगलियों में समा दिया है। लोग अब ऑफिस से ही देर से लौटते हैं, साथ में काम भी लेते आते हैं, इसलिए रात जागकर काम पूरा करने में लग जाते हैं। स्वभाविक है इससे नींद को अपने से दूर करना होता है। नींद दूर करने के साधनों में व्यसन एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। आजकल कार्पोरेट कल्चर के अंतर्गत लोगों को 247 की डयूटी करनी पड़ती है। याने आप सातों दिन डयूटी पर होते हैं, आपको कभी भी ऑफिस बुलाया जा सकता है। आखिर मोटी तनख्वाह अपना असर कहीं तो दिखाएगी! अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं है, जरा अपने बच्चों की दिनचर्या पर ही नजर डाल लें, आप पाएँगे कि उनके पास केवल नींद का समय नहीं है, बाकी सब के लिए समय है। घंटों मोबाइल पर बातें हो सकती हैं, कंप्यूटर पर घंटों बैठकर चेटिंग की जा सकती है, देर रात के फिल्म शो देखे जा सकते हैं, पार्टियाँ अटेंड की जा सकती है, पर सोने के लिए समय नहीं है। शरीर थककर चूर हो रहा है, पर काम का बोझ इतना है कि नींद भगाने के लिए सिगरेट, शराब, ड्रग्स आदि का सहारा लेना पड़ रहा है। यही हाल व्यापारियों का है, लोग अब रात की शापिंग अधिक करने लगे हैं, इसलिए उनकी दुकान रात के एक-दो बजे बंद होने लगी है, देर रात घर लौटकर भोजन करना, फिर टीवी पर फिल्में देखना या फिर कोई विशेष दिलचस्प कार्यक्रम देखकर सुबह चार बजे तक सोना हो पाता है। ऐसे में शरीर की सारी मशीनरी को काफी मेहनत करनी पड़ती है। शरीर का समय-चक्र बदल जाता है। इन सबका असर स्वास्थ्य पर किस तरह पड़ रहा है, यह जानने की जरूरत नहीं है। आज युवा इसका प्रतिस्पर्धी युग का सबसे पहला शिकार है। कम समय में काफी कुछ पा लेने की चाहत उसे भटका रही है। आश्चर्य इस बात का है कि इसे आज के पालक भी नहीं समझ पा रहे हैं। आज स्वास्थ्य गौण हो गया है, धन ही सब-कुछ हो गया है।धन ही सब-कुछ हो गया है। नीतिशास्त्र में कहा गया है कि जो रात को जल्दी सो जाते हैं और सुबह जल्दी उठते हैं, वे वीर बनते हैं, उनकी विद्या, बुद्धि, धन में वृद्धि होती है और शरीर के साथ-साथ जीवन भी सुखी होता है। उधर, आज के लोगों को वीर बनना है, विद्या प्राप्त करनी है, धन कमाना है, बुध्दिमान बनना है, जीवन को सुखी बनाना है, पर रात को जल्दी सोना नहीं है और सुबह जल्दी उठना नहीं है। आज की पीढ़ी नींद की व्याख्या कुछ अलग ही तरीके से करती है। उनकी तमाम कामयाबी के पीछे नींद के लिए कोई जगह नहीं है। उनका तो यहाँ तक कहना है कि दिन-रात मिलकर केवल 24 घंटे के ही क्यों होते हैं, यदि ये 30 या 36 घंटे के होते, तो भी हमें कम ही पड़ते। नींद बेचकर जागने की नई पीढ़ी की यह आदत उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। एशियन हार्ट इंस्टीटयूट के नींद के विशेषज्ञ डॉ। शेखर घमंडे कहते हैं कि मानव शरीर को रोज 6 से 8 घंटे की नींद की आवश्यकता होती है। नींद में कटौती करना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है। दूसरी ओर हिंदुजा अस्पताल के नींद विशेषज्ञ डॉ1 अशोक महासौर का कहना है कि कम नींद लने से शरीर की प्रतिरोधात्मक शक्ति घट जाती है। फलस्वरूप उसका काम भी प्रभावित होता है। यदि व्यक्ति एक वर्ष तक ही कम नींद लेना शुरू कर दे, तो उसके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ेगा ही। आज पति के पास इतना समय नहीं है कि पत्नी से दो मीठे बोल बोल सके। नींद कम लेने से लोगों के आपसी संबंध बिगड़ने लगे हैं, लोग चिड़चिड़े होने लगे हैं। प्रकृति के बनाए नियमों को तोड़कर हम खुशियाँ प्राप्त नहीं कर सकते। देर रात भोजन करने से पाचन शक्ति का नाश होता है। आयु कम होती है। हमें यह तय कर लेना चाहिए कि हमारी प्राथमिकता क्या है स्वास्थ्य या पैसा? पैसा कमाने के लिए स्वास्थ्य की बलि देना कहाँ की समझदारी है?
हम समवेत

Tuesday

रेत में, रेत से,घर

  • मंतोष कुमार सिंह
सुनहरी यादों के
कुछ कंकड़
कुछ पत्थर
चुनकर बनाता हूं
एक घर
खड़ा करता हूं
उसका ढांचा
मेरा घर
जो अक्सर झूलता है
भावनाओं के झूले में
भावनाओं को
मूतॅ रूप देना
कितना किठना है
अभाओं से जुझते
इस मरूभूमि में
यादों से बाहर आकर
बार-बार हटाता हूं
रेत के ढेर को
अपने हाथों से
सोचता हूं
कैसे बन सकता है
रेत में
रेत से
घर

Monday

कभी तो मिलते अकेले में

  • मंतोष कुमार सिंह
दिल के अरमान, दिल में दफन हो गए
उनसे मिले बरसो हो गए
कभी तो मिलते अकेले में
बाते करते अकेले में
मेरे आंसुओं पर अब तरस नहीं आती
उनको कभी मेरी याद नहीं आती
कभी तो याद करते अकेले में
बाते करते अकेले में

Sunday

अभिशाप का दोषी कौन

  • हिमवंत
कोसी को बांधने की कोशिश खतरनाक पोस्ट पर हिमवंत जी ने आपनी बात बहुत ही शानदार तरीके से रखी है उनकी टिप्पणी उसी रूप में पोस्ट कर रहा हू

काम का विशेषज्ञ वो है जो ईस अभिशाप को वरदान मे बदलने की तरकीब बताए। जल संशाधन हमारे लिए वरदान है, लेकिन आज यह अभिशाप बना हुआ है। कौन है दोषी इसके लिए? जब भी जल संशाधनो के व्यवस्थापन की बात चलती है, नेपाल के छद्म राष्ट्रवादी और भारत मे मेघा पाटकर सरीखे लोग विरोध शुरु कर देते है। भारत में अटल जी के समय बाढ की समस्या से छुटकारा पाने के लिए नदीयों को जोडने की बात चली थी तो मेघा पाटकर नेपाल पहुंच गई और लोगो को भारत की योजना के विरुद्ध भडकाने लगी। नेपाल मे भारत जब भी तटबन्ध निर्माण या मरम्मत की कोशिश करता है तो नेपाल मे भारत विरोधी ईसे नेपाल की राष्ट्रिय अस्मिता से जोड कर अंनर्गल दुष्प्रचार शुरु कर देते है। नेपाल मे भारत द्वारा तटबन्ध के मरम्मत मे अडचन एवम असहयोग भी प्रमुख कारक रहा है तराई की इस त्रासदी के लिए। नेपाल मे तटबन्धो मे पत्थरो को बांधने वाले गैबिन वायर (तार) तक चुरा लिए गए थे। नेपाल सरकार तटबन्धो की सुरक्षा के प्रति गम्भीर नही थी। तटबन्ध के टुटने के कई कारणो मे पत्थरो को बांधने वाले तारो की चोरी भी प्रमुख कारण है। जो भी हो, कोशी के इस कहर से सब को सबक लेना जरुरी है। भारत और नेपाल के बीच जल सन्धि को मजबुत किया जाना चाहिए। जल संशाधनो के विकास मे अविश्वास के वातावरण को समाप्त किया जाना चाहिए। नेपाल के नव निर्वाचित प्रधानमंत्री प्रचण्ड ने बिना सोचे समझे कोशी नदी के सम्झौते को एतिहासिक भुल तक कह डाला, एसे बयानो से अविश्वास बढेगा यो दोनो देशो के लिए प्रत्युपादक है। काठमांडौ मे भारत के राजदुत हर महिने नेपाल के प्रधानमंत्री से मिलते थे, लेकिन कोशी के तटबन्ध की सुरक्षा उनकी प्राथमिकता मे नही होती थी। वे तो महारानी सोनिया को खुश करने के लिए प्रधानमंत्री को ईस बात के लिए मनाते है की हिन्दु राष्ट्र समाप्त कर धर्म निर्पेक्ष बनाया जाए नेपाल को। नेपाल मे भारत के राजनयिको को राजनैतिक गतिविधियो की बजाए जन सरोकार के विषयों मे अधिक ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

कोसी को बांधने की कोशिश खतरनाक

जल संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाले प्रख्यात पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र का कहना है कि कोसी पर बैराज और तटबंध बनाकर उसे बांधने की कोशिश आगे और तबाही का सबब बन सकती है।
मिश्र ने बताया कि गाद से भरी कोसी पर अगर तटबंध बना दिए जाएं तो यह एक बार फिर पूर्व-पश्चिम की ओर अपनी दिशा बदलेगी और क्षेत्र की भौगोलिक बनावट के विपरीत बहाव के साथ दोबारा तबाही का कारण बनेगी। जल व्यवस्था और पारंपरिक जल संरक्षण पर अनेक किताबें लिखने वाले मिश्र ने कहा, 'कोसी की सात धाराओं को नहीं बांधा जा सकता।
मैदानी इलाकों में नदी में गाद जमा होने के कारण पानी दिशा बदल रहा है। यह नदी 20 हजार साल पुरानी है। पिछले 200 साल में ये अपने असली रास्ते से करीब 120 किलोमीटर विचलित हुई है।
उन्होंने बताया कि भारत-नेपाल सीमा पर बनाया गया बैराज इसके पानी को नियंत्रित नहीं कर पाया है, जबकि इससे नदी की दिशा जरूर बदल गई है। मिश्र ने कहा कि बैराज और तटबंध उन नदियों में कारगर सिद्ध हो सकते है जिनमें गाद कम होता है और जिनकेबहाव की गति धीमी है।
उल्लेखनीय है कि अपनी किताब 'साफ माथे का समाज' में मिश्र ने उत्तरी बिहार की नदियों, समाज पर उनके प्रभाव और बाढ़ तथा उसके प्रबंधन का जिक्र किया है।

Saturday

ये अंगोछा-छाप नेता !

  • राजेन्द्र जोशी
जनस्वास्थ्य के लिए खतरा हैं झोला छाप डॉक्टर और प्रजातंत्र के लिए खतरा बने अंगोछा छाप नेता। जिस तरह न डिग्री, न डिप्लोमा, झोले में भरी जड़ी बूटी और दवाइयाँ, लटका लिए कांधो पर झोले और बन गये डॉक्टर। ठीक उसी तरह न नैतिकता, न सिध्दांत, न जनसेवा की भावना, न देश के प्रति प्रेम गले में ढांक लिया रंग-बिरंगा अंगोछा और बन गये नेता। झोला छाप डॉक्टर ने किसी रोगी का उपचार किया तो उस रोगी के जीवन का अंतिम प्रहर होता है ठीक उसी तरह अंगोछा-छाप नेताओं ने जहाँ भी अपनी कारस्तानी शुरू की तो समझ लेना उस रंग वाले झंडे की पार्टी का सत्यानाश ही होकर रहता है, जिस रंग में ये नेता अपना अंगोछा रंग लेते हैं।
गाँव-गाँव में शहर-शहर में खूब फैल गये हैं जैसे नीम हकीम डॉक्टर और ऐसे ही फैल गये है हुड़दंगबाज अंगोछा छाप नेता । आम सभाओं में, जलसों में जुलूसों में, उत्सवों में, पर्वों में, सड़कों पर बाजारों में, रेलों में, बसों में, हर जगह दिख जायेंगे ये अंगोछा छाप नेता। न ये मंत्री हैं, न विधायक हैं, पंच हैं, न सरपंच, न सहकारिता के चुनाव लड़े, न मुहल्ला कमेटी में। फिर भी ये नेता हैं, ये नेता क्यों हैं, किसने बनाया, काहें के लिए बनाया यह मामला अब गोपनीय नहीं रहा। सब कुछ खुलकर मैदान में आ गया। हकीकत सामने आ गई। जिनके पास कल तक पजामा-कमीज की सिलाई के पैसे नहीं थे। सिलाई मांगने के लिए दर्जी चक्कर लगाया करते थे, वे आज गले में अंगोछा डालकर जन-जन के भाग्य विधााता बनने की दौड़ में शामिल हो गये हैं।
किसको ज़रूरत है, इन अंगोछा छाप नेताओं की ! क्या देश को क्या समाज को, क्या सरकार को या खुद उनको। नहीं इनमें से किसी को इनकी जरूरत नहीं हैं। इनकी तो जरूरत पड़ती है, कतिपय बड़ी-बड़ी राजनैतिक पार्टियों के उन खूंखार इरादों वाले राजनेताओं को, जो धानबल और बाहुबल के दम पर सत्ता, संगठन और समाज में अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहते हैं। इनकी जरूरत हैं उन रहनुमाओं को जिनमें न तो क्षमता होती है सत्ता-संचालन की और न ही होती है भावना समाज सेवा की। इन अंगोछा छाप नेताओं का उपयोग तो होता है बर्र के छत्ते की तरह। मधुमक्खी पालने के व्यवसाय की तरह। कतिपय राजनेताओं और राजनैतिक पार्टियों द्वारा मधुमक्खी की तरह इनको पाला जाता है और समय-समय पर उन्हें उड़ा दिया जाता है जलसों, समारोहों और भीड़ में भगदड़ मचाने के लिए। जिस तरह मधुमक्खियाँ नहीं जानती कि वे क्या कर रही हैं, किसके बदन से लिपट रही है, किस किस को काट रही है या फिर किस तरह के आयोजन में घुस रही है। जब मधुमक्खियां उड़कर हुड़दंग मचवाना ही है तो फिर यह नहीं देखा जाता कि इसमें कौन प्रवाहित हो रहा है और उसे कितना नुकसान पहुंच रहा है। अंगोछा-छाप नेताओं का उपयोग अपनी राजनीति की धााक जमाने के लिए अति उत्तम सिध्द हो रहा है। जिस राजनैतिक पार्टी ने इन्हें अंगोछे वितरित किए है, उनके लिए ये नेता जमीन तैयार करने में खाद और बीज का काम करते हैं। जितना ज्यादा ये खाद-बीज का उपयोग करेंगे उसी के अनुसार ये लहलहाती फसलों का ख्वाब देखने लगते हैं।
आज का युग बाजारवाद का युग है। बाजार का भी खूब दिमाग चलता है। जहाँ उसे जरा सी गुंजाइश दिखती है, बाजार फट से बीच में कूद पड़ता है। राजनीति के इस 'मधुमक्खी-युध्द' में भी बाजार की पौ बारह हो रही है। दूकानों में खूब अंगोछे बिक रहे हैं। बजार कुर्ता पाजामा के कपड़ों के थान के थान बेचने में व्यस्त है और दर्जी की सिलाई मशीन की 12 बजे रात तक भी आवाज बंद नहीं होती है। खूब नाप लिए रहे हैं। कपड़ा बाजार की चांदी हो रही है। पहले भी थी, अब भी है। पहले टोपियों के कपड़े बिकते थे, टोपियां सिलती थी, अब अंगोछे के कपड़े बिक रहे हैं, अंगोछे की किनारे प्रिंट हो रही हैं।
अंगोछा छाप नेताओं की आई बाढ़ को देखकर पहले आम जनता आश्चर्य करती थी। सोचती थी-आज देश में हर आदमी नेता बन रहा है, सेवा के क्षेत्र में उतर रहा है, देश सचमुच आगे बढ़ रहा है, विकास होगा और खूब जमकर विकास होगा। नेताओं में देशप्रेम की भावना का ज्वार उमड़ पड़ा है। अब इन अंगोछाधारी नेताओं की बढ़ती फौज की हकीकत छुप नहीं रही है। जनता समझ गई है। ये अंगोछाधारी फौज न जाने कब कहा एकदम से हमला बोल देगी। पर्व, उत्सव, त्यौहार और यहाँ तक कि निजी-पारिवारिक और शादी-ब्याह के समारोह भी सुरक्षित नहीं रहे। कभी भी अंगोछाधारियों की फौज कही भी घुसकर किसी का भी खाना खराब करने में देर नहीं लगाती है।
लोग नववर्ष की पार्टियां मनाते है। दुनियादारी से दूर रहकर नाचते हैं, गाते हैं, मौज-मस्ती करते हैं। युवा प्रेमी जन वेलेन्टाइन डे मनाते हैं, फिल्मी नाइटें होती हैं, होटलों में व्यंजन समारोह होते हैं। ऐसे आयोजनों में ये अंगोछाधारी नेता भी घुस घुसकर अपनी ही तरह का जश्न मनाते हैं पर इनके जश्न मनाने का तरीका वो नहीं होता जो सबका होता है। इन अवसरों पर वे भी खूब धींगामस्ती करते हैं, हुड़दंग मचाते हैं और आयोजनों में विघ्न डालते हैं। उत्साहपूर्वक जश्नों और जलसों में शामिल होकर अपनी वह भूमिका निभाते हैं जो उन्हें अपनी राजनैतिक पार्टी के रिंग मास्टरों द्वारा दी जाती है। जब आम चुनाव आने लगते हैं, अंगोछाधारियों की पूछ परख बढ़ने लगती है। मतदान केन्द्र बनते हैं उनकी देखरेख के लिए राजनैतिक पार्टियां इनको जवाबदारियां सौंपती हैं। ट्रेनिंग देती हैं कैसे मतदाता को मतदान केन्द्र तक लाया जाय और किस बटन को दबाने के लिए मतदाता को कैसे भयग्रस्त कर दिया जाय। मतदाताओं में सभी मतदाता साहसी, पराक्रमी और चतुर नहीं होते। बेचारे दब जाते हैं। जो नहीं दब पाते, न दबे, फर्क नहीं पड़ता। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को उठाकर ले जाना भी इन्हें आता है।
भले ही आपके काम के, समाज के काम के और देश के काम के लिए इन अंगोछा छाप नेताओं की जरूरत न हों उनकी बला से। उनकी तो जरूरत है उन राजनैतिक दलों को जो भीड़ में भगदड़ मचवाकर, धाधाक रही नैतिकता की आंच में तवा चढ़ाकर अपनी रोटी सेंकने में सिध्दहस्त हो गये हैं। बढ़ती बेरोजगारी की अब किसी को चिंता कतई नहीं करना चाहिए। भले ही नौकरियां न हो सरकारों में, भले ही वेकेंसी न हो टाटा, बिड़ला, अंबानी, मित्तल की कंपनियों में राजनीति के बाजार में आज भी जरूरत है हुड़दंग मचाने के लिए सब तरफ से धाकियाये कहे जवानों की। कुछ नहीं करना है आपको, डिग्री या डिप्लोमा हो न हो आपके पास में। आपको तो सामने जाकर खड़ा हो जाना है। अंगोछा तो डाल ही देंगे कांधो पर अपनी राजनीति कराने वाले।
हम समवेत

Friday

थर थर कांपे रोज अंगनवा

स्कंद पुराण बाल्मीकि रामायण जैसे पौराणिक ग्रंथों तथा प्रसिद्ध आंचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु की परती परिकथा में कोसी के रौद्र रूप तथा नदी के कारण होने वाले विनाश और पुनर्निर्माण का उल्लेख मिलता है।
प्रसिद्ध आंचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु ने अपनी कृति परती परिकथा में कोसी के रौद्र रूप तथा इसके कारण होने वाले विनाश और निर्माण को सजीव ढंग से प्रस्तुत किया है। रेणु ने परती परिकथा की शुरूआत धूसर वीरान परती जमीन विशेषण से की है जो उसके रौद्र रूप को अभिव्यक्त करती है। उन्होंने आंचलिक लोकगीत के जरिये भी इसे बड़े ही सजीव ढंग से पेश किया है। रेणु कहते हैं-
थर थर कांपे रोज अंगनवा, रोये जी आकास।
घड़ी घड़ी पर मूर्छा लागे बेर बेर पियास।
घाट न सूझे बाट न सूझे, सूझे अप्पन हाथ।
रेणु ने परती परिकथा में लिखा है कि कोसी की शादी के बाद उनका संबंध ससुराल वालों के साथ अच्छा नहीं रहा। उनकी ननद जोगवंती और गुणवंती उन्हें काफी सताती थी। इसके कारण एक दिन वह घर छोड़ कर निकल जाती हैं।
कोसी को घर छोड़ कर जाता देख गुणवंती तंत्र साधना कर उन्हें रोकने का प्रयास करती है जबकि जोगवंती आंधी तूफान उत्पन्न कर उनका मार्ग अवरुद्ध करने का प्रयास करती हैं। दूसरी तरफ कोसी की सौतेली बहन दुलारी ने पौष पूर्णिमा के दिन उनकी याद में बररिया घाट पर दिया जलाया था। आज भी लोग घाट पर दिया जलाने की इस परंपरा को कायम रखे हुए हैं।
इसके बाद कोसी क्षेत्र के लोगों को विनाश का श्राप दे देती हैं लेकिन बाद में उनका मन पिघल जाता है। लोगों के दुख के क्षुब्ध कोसी कहती हैं-
जहां जहां बैठ कर मैं रोयी वहां खुशहाली और जबर्दस्त हरियाली होगी।
कोसी क्षेत्र में इस महा जल प्रलय के बाद लोगों को उम्मीद है कि गंगा से मिलन के बाद इस क्षेत्र में खुशहाली जरूर लौटेगी। स्कंद पुराण में कोसी का शिव-पार्वती की पुत्री के रूप में उल्लेख किया गया है। इस लिहाज से उन्हें गणेश और गंगा की बहन भी कहा गया है। इसमें कहा गया है कि कोसी का ब्याह एक ऋषि के साथ हुआ था जिनकी असमय मृत्यु हो गई। ऋषि की असमय मृत्यु से कोसी को काफी दुख हुआ। इसके बाद जब भी उन्हें अपने परिवार के लोगों की याद आती है तो वह रौद्र रूप धारण कर लेती है और अपनी बहन गंगा के मिलने के बाद शांत हो जाती है। इसके बाद क्षेत्र में खुशहाली का भी उल्लेख मिलता है। स्कंद पुराण में कोसी नदी का उल्लेख कोसिका मैया के रूप में मिलता है। कोसी क्षेत्र में गणेश चतुर्थी के अवसर पर कोसी नदी के घाट पर पूजा अर्चना की जाती है। इसके अलावा इसी समय चौड़-चंद्र के दौरान भी कोसी नदी की पूजा की जाती है। कोसी नदी का उल्लेख बाल्मीकि रामायण में भी मिलता है। जहां उन्हें विश्वामित्र की बहन बताया गया है।
जागरण

दिलों को दूर करती दौलत

  • महेश परिमल
जो जीवन में केवल सम्पत्ति को ही सब कुछ मानते हैं, उनके लिए बुरी खबर। जीवन में धन ही सब-कुछ नहीं है। इससे बढ़कर भी दुनिया में ऐसा बहुत-कुछ है, जिसे पाकर हम खुश हो सकते हैं, गर्व का अनुभव कर सकते हैं। निश्चय ही आप सोच रहे होंगे कि यह तो उचित नहीं है। लेकिन सच तो यही है कि आज जितना महत्व धन का है, उससे अधिक महत्व सुख का है। अब यह बात अलग है कि हमने ही इन सुखों को दो भागों में विभाजीत कर एक मायावी सुख की लालसा में रहते हैं। आज लोग जिस सुख के पीछे भाग रहे हैं, वह क्षणिक है। इसे समझना हो, तो उस दम्पति की व्यथा से समझा जा सकता है, जब वे गरीबी के बीच अपना जीवन गुजार रहे थे, अचानक उन्हें जैकपॉट में बेतहाशा धन मिला। इस धन से उन्होंने तमाम भोतीक सुख की प्राप्ति कर ली, पर जो फाके-मस्ती वाले जीवन में था, वह बेशुमार धन के ढेर पर बैठकर नहीं मिला।
आज हमने सुख को विभाजीत कर दिया है। एक भौतिक सुख दूसरा आत्मिक सुख। इसे हम एसी की ठंडी हवा और नीम के पेड़ के नीचे बैठकर ठंडी हवा के झोंके की संज्ञा दे सकते हैं। जिन्होंने इन दोनों ही तरह की हवा के मो लिए हैं, वे अच्छी तरह से जानते हैं कि किस तरह की हवा अच्छी लगती है। देखा जाए, तो आत्मिक सुख ही जीवन जीने मूलमंत्र है। कोई दौलतमंद है और सुखी है, इस बात में अब सच्चाई नहीं रही। इसके बाद भौतिक सुख की प्राप्ति के लिए अधिक से अधिक धन संग्रह करना याने मुसीबतों को आमंत्रित करना है। जो लोग कहते हैं कि पैसा तो हाथ का मैल है, ऐसे लोगों को आज की पीढ़ी माफ करने वाली नहीं है, परंतु समय पर कमाया हुआ धन और समय पर खर्च किया गया धन भी सुखमय सांसारिक जीवन नहीं दे सकता, यह सच है। बेशुमार धन के बीच भी एक अच्छी गहरी नींद के लिए तरसते रहते हैं, शायद इस सच को वे ही समझते हैं, जो सालों से गहरी स्वाभीवित नींद नहीं ले पाए हैं।
अब बात उस दम्पति की, जिनकी शादी को अधिक समय नहीं हुआ था। पति कूग पोप 23 वर्ष का था और उसकी पत्नी कलेर आवन 25 वर्ष की थी। उन्हें रहने और खाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। जीवन फाके मस्ती में कट रहा था। फिर भी वे खुश थे। कुछ नहीं था, पर प्यार और अपनापे की बेशुमार दौलत उनके पास थी। वे दु:खी रहकर भी सुख के क्षणों को पा ही लेते थे। ऐसे में उनकी पुत्री सेरेन के जन्म के बाद उन्हें 50 लाख पाउंड का जैकपॉट लग गया। इसके पहले दस हजार पाउंड का कर्ज था, जिसे देने के लिए वे जद्दोजहद कर रहे थे। वे अपनी पुत्री सेरेन को क्रिसमस गिफ्ट भी देने की स्थिति में नहीं थे। लेकिन जैकपॉट लगते ही उनका जीवन ही बदल गया। अब वे अपना दो रुम वाला फ्लैट छोड़कर स्वीमिंग पूल वाले विशाल बंगले में रहने लगे। विश्व के तमाम भौतिक सुख उनके कदमों पर थे। वे अपने आपको सबसे सुखी परिवार मान रहे थे। लेकिन यह भौतिक सुख वास्तव में सुख नहीं था। दौलत के आते ही तमाम बुराइयाँ भी आने लगी। पति कूगपोप को पत्नी बुरी लगने लगी। इसलिए उसने अपने लिए एक गर्लफ्रेंड ढूँढ ली। इसका नाम एलाइस था। दोनों साथ-साथ घूमने लगे, कुछ समय बाद कूगपोप अपने घर से 100 मील दूर अपनी गर्लफेरंड के साथ रहने चला गया। कुछ समय बाद दोनों में तलाक हो गया। लाखों पाउंड के मालिक बनने के बाद उनके जीवन से असली सुख दूर चला गया। दोनों ने स्वीकार किया कि जब वे कड़के थे, तब अधिक सुखी थे।
आज भीतर के सुख को प्राप्त करने की सीख देने वाले देश भर के तमाम साधु-संतों की सम्पत्ति पर एक नजर डालें, तो स्पष्ट हो जाएगा कि वे स्वयं भी कतई सुखी नहीं हैं। क्या ये दौलत उन्हें खुशी दे सकती है? लेकिन आज उनकी सम्पत्ति को देखकर यही लगता है कि वे न जाने किस सुख की बात करते हैं। वास्तव में देखा जाए, तो जिस सुख को हम बाजार में खरीदने जाते हैं, वह हमारे भीतर ही है। घर में तमाम सुख-सुविधाएँ से सुसज्जित हो जाए, तब भी हमें ऐसा लगेगा कि कुछ बाकी रह गया। साल भर पिज्जा या फास्ड फूड खाने वाला यदि एक दिन माँ के हाथ की जली रोटी ही खा ले, तो वह सारे स्वाद भुल जाएगा। पर वह जली रोटी मिले कहाँ से? उसने तो पिज्जा में ही जीवन का असली सुख ढूँढ़ने की कोशिश की है, वह भला कैसे मिलेगा?
सुखी होने किताब बेचने वाले किताब से लाखों कमा लेते हैं, पर सुख नहीं कमा पाते। सुख के संबंध में कई पोथियाँ लिखी गई हैं, पर असली सुख की चावी कहाँ है, यह कोई नहीं बता पाया है। लोगों के हाथ में जो नहीं है, वे उसे पाने की जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं। लेकिन जो उनके पास है, उसका उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। हर हाल में खुश रहने वाले संभवत: असली सुख प्राप्त कर सकते हैं। कोई सुख के लिए घर बसाता है, तो कोई सुख के लिए घर छोड़ता है। जीवन के एक-एक क्षण को जीने की कोशिश करो, यही सुख की सही व्याख्या है।
आज हम सभी एक दूष्टिभरम में जी रहे हैं। जो वास्तव में सुख है, उसकी तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता। दूसरा कितना सुखी है, हम यही देख रहे हैं। हम कितने दु:खी हैं, यही हमें दिखाई दे रहा है। सुख और दु:ख के बीच एक महीन रेखा है, बहुत ही कम अंतर है इसमें। सुख खुशी देने में है, पाने में नहीं। इसलिए खुशी को जो भी क्षण मिले, उसे पकड़ लो और फिर उसे बाँट दो, आप देखेंगे कि वही खुशी दोगुनी होकर आपके पास आ जाएगी। आप इसे फिर बाँट दीजिए, फिर देखो कमाल, आप से बड़ा सुखी कोई नहीं होगा। बड़े-बड़े साधू-महात्मा और रइसजादे भी आपसे जलने लगेंगे, क्योंकि आपके पास कुछ भी न होकर खुशियों की दौलत है। बेशुमार दौलत होने के बाद भी आत्मिक सुख नहीं पाने वाले निर्धन की सूची में आते हैं, दूसरी ओर जेकपाट जीतने वाले युगल आखिर में सुख का जेकपाट जीत तो गए, पर उन्हें तलाक लेना पड़ा।
हम समवेत

Thursday

गणेशजी ने पंडाल में किए बम निष्क्रिय!

भारत में हर जगह गणेश उत्सव की धूम है तो फिर इस उत्सव को मनाने में गुजरात भला कैसे पीछे रहता। गुजरात में भी ये उत्सव पूरे जोर-शोर से मनाया जा रहा है। मगर 26 जुलाई को हुए अहमदाबाद ब्लास्ट की कसक आज भी यहां के लोगों के दिलों में कितनी गहरी है इसका अंदाजा यहां पर बने एक पंडाल को देखकर लगाया जा सकता है।
मंगलकर्ता, विघ्नहर्ता गणेश यहां बम को निष्क्रिय कर रहे हैं। श्रद्धालुओं ने गणेश जी को एक नया रूप दिया है। इनका मानना है कि 26 जुलाई को हुए अहमदाबाद ब्लास्ट के बाद जिस तरह से सूरत में बमों को निष्क्रिय कर दांव पर लगी हजारों जानों को बचाया गया वो गणेश जी का ही करिश्मा था।
पुराणों में लिखा है की जब जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है और कोई अनचाही मुसीबत आती है तब विघ्नहर्ता गणेश जी सभी बाधाओं को दूर कर अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। गुजरात के इन श्रद्धालुओं का भी मानना है की जैसे सूरत में गुजरात पुलिस ने सभी बम को विफल किया और एक बड़ी अनहोनी को टाल दिया ऐसा भगवान गणेशजी के चमत्कार से ही संभव हुआ।
आईबीएन-7

Tuesday

बिना आईडी प्रूफ के नहीं होगा रेलवे रिजर्वेशन

  • पूनम गौड़
अगर आप रेलवे में आरक्षण कराने जा रहे हैं, तो आपके पास पहचान पत्र या फोन नंबर होना चाहिए। बिना आईडी प्रूफ के रेलवे आपको रिजर्वेशन नहीं देगी। रेलवे ने यह कदम सुरक्षा के मद्देनजर उठाया है। उत्तर रेलवे के डिविजनल रेलवे मैनिजर राकेश सक्सेना का कहना है कि यात्री अब आरक्षण फॉर्म पर अपना फोन नंबर देंगे। इसके न होने पर फोटो पहचान पत्र दिखाकर आरक्षण करवाया जा सकता है। रेलवे अधिकारियों के अनुसार इसके कई लाभ होंगे। एक तो यह कि हादसे के समय व्यक्ति की पहचान आसानी से हो सकेगी और क्लेम देने में भी परेशानी नहीं आएगी। दूसरा कोई भी व्यक्ति गलत इरादों के साथ आरक्षण नहीं करवा पाएगा और तीसरा रेलवे टिकटों की कालाबाजारी कम हो सकेगी। उत्तर रेलवे के सभी आरक्षण केंद्रों को यह आदेश जारी कर दिए हैं। इंडियन रेलवे आतंकवादियों के निशाने पर है। खुफिया एजंसियों ने रेलवे को चेतावनी दी है कि आतंकी व पाकिस्तानी खुफिया एजंसी आईएसआई के एजंट देश में रेलवे के माध्यम से ही मूवमंट कर रहे हैं। इसके चलते अब रेलवे ने रिजर्वेशन सिस्टम में व्यापक सुधार करने की दिशा में कदम उठाएं हैं। रेलवे रिजर्वेशन के लिए आईडी को अनिवार्य कर दिया गया है। रेलवे के नए नियमों के मुताबिक आरक्षण करवाने से पूर्व आपको अपना लैंडलाइन या मोबाइल नंबर फॉर्म पर लिखना होगा। इसके अभाव में आपको अपना कोई भी आईडी प्रूफ दिखाना होगा। इसके बिना आपको आरक्षण मिले, ऐसी गारंटी नहीं है। रेलवे की माने तो फोन नंबर वेरिफिकेशन के बाद ही जारी किए जाते हैं इसलिए व्यक्ति के नंबर से उस तक पहुंचा जा सकता है। अभी तक बिना किसी औपचारिकताओं और पूछताछ के रेलवे आरक्षण लोगों को उपलब्ध हो जाते थे। जिसकी वजह से असामाजिक तत्व और आतंकवादियों के मद्देनजर रेलवे को सुरक्षित माध्यम मानते थे। रेलवे सूत्रों के अनुसार आईबी के मुताबिक आतंकी और आईएसआई रेलवे में सफर को सबसे सुरक्षित मानते हैं। ऐसे में अब रेलवे ने भी इन नई चुनौती से निपटने के लिए नियमों में बदलाव किए हैं। रेलवे का दावा है कि ऐसा सिर्फ सुरक्षा कारणों से नहीं बल्कि यात्रियों की सहूलियत के लिए भी किया जा रहा है। पिछले साल भी फेस्टिवल सीजन से पहले रेलवे ने आरक्षण करवाने वालों की जांच के लिए मुहिम छेड़ी थी। उस समय रेलवे ने आरक्षण फार्म में दर्ज पतों की जांच की थी, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में पतों की जांच करना रेलवे के लिए टेढ़ी खीर साबित हुआ। अब बदलावों के तौर पर टेलिफोन नंबर या फोटो आई कार्ड को अनिवार्य किया गया है। इस योजना का एक मकसद दलालों पर लगाम कसना भी है। सूत्रों के अनुसार फेस्टिवल सीजन में विभिन्न जगहों की आरक्षित टिकटों के लिए यात्रियों में मारामारी रहती है। ऐसे में रेलवे दलाल भी सक्रिय हो जाते हैं। पूर्व में ऐसे कई खुलासे हो भी चुके हैं, जब आतंकी ट्रेनों में आवागमन करते हैं।
क्या होंगे पेच
भारतीय रेल में बड़ी आबादी ऐसी है, जिनके पास न तो फोन है ,और न ही वोटर आई कार्ड हैं। ऐसे लोग अपना आरक्षण कैसे करवाएंगे, इस बारे में रेलवे अभी तक कुछ ठोस रणनीति नहीं बना पाई है। वोटर आई कार्ड फिलहाल लोगों की पहुंच से दूर है। रेलवे डीआरएम राकेश सक्सेना का कहना है कि पहचान पत्र परिवार के किसी भी सदस्य का चल सकता है। मसलन यदि पत्नी को सफर करना है, तो वह अपने पति का पहचान पत्र दिखा सकती है। इसके साथ उसे अपनी जॉइंट फोटो दिखानी होगी। इसी तरह बच्चे भी अभिभावकों का पहचान पत्र दिखा सकते हैं। वह कहते हैं कि राशन कार्ड, ग्राम पंचायत से लिखा हुआ पत्र या फिर कंपनी के लेटर हेड पर लिखा हुआ स्टांप पेपर, रेजिडेंट वेलफेयर असोसिएशन का पत्र, स्कूल के पहचान पत्र या लिखित पत्र आरक्षण के लिए मान्य होंगे।
नवभारत टाइम्स